भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उनके भिन्नपंथ ।

इन बारह पंथोंके अतिरिक्त कबीर साहबके और भी पंथ हैं । जैसे नानक पंथ । दादूपंथ । यानिपपंथ । मूलकदासपंथ । गणेशपंथ । इत्यादि ।

इन पंथोंके अतिरिक्त हिन्दू और मुसलमानोंमें कबीर साहबके दूसरे भी कितनेही पंथ हैं जिनकी यथार्थता अभी लोगोंको भली भाँति ज्ञात नहीं हुई है इस कारण मैं कुछ लिख नहीं सकता । पंथके कितनेही लोग ऐसे हैं जिनके कि पंथके मनुष्य अब साहबको नहीं मानते । जैसे—नानकशाह, और दाऊद राम और शिवनारायणदास इत्यादि ।

जो लोग कबीर साहबको नहीं मानते उनका नाम शिष्योंमें लिखना किसी प्रकार युक्तिसङ्गत नहीं है । तो भी यह नहीं कहा जासकता है कि, जो कबीर साहबको नहीं मानते हैं उसमें उनके गुरुओंका अथवा उनके पथदर्शकोंका दोष है जिसका दोष होगा बही दोषी माना जावेगा ।

महाप्रलयकी कथा ।

महाप्रलयके विवरणका निचोड़ यह है । कि, प्रलयके अनेक भयानक चिह्न परिलक्षित होंगे । पृथ्वीपर विशेष पाप होंगे । महाप्रलयके सवासी वर्ष पहिलेसे बराबर ग्रहण लगता जावेगा, एकसौ वर्षपर्यन्त बराबर चन्द्रग्रहण होगा । इसके उपरान्त सूर्यग्रहण होगा । जब सूर्य और चंद्र ग्रहण समाप्त हो चुकेगा तब महा-प्रलय आवेगी । इतनी पानीकी विशेषता होगी कि, पृथ्वीसे ऊपर इतना ऊँचा पानी चढ़ेगा कि, जलकी झाग व लहरही दश सहस्र योजन ऊँची उठेगी । समस्त जीव मरजावेंगे समस्त शून्य हो जावेगा । पृथ्वी तथा आकाशमें कुछ दिखलाई न देगा । समस्त संसारकी रचनाको कालपुरुष समेट लेगा । पाँच तत्व तीन गुण कालपुरुषमें समा जावेंगे—आद्याको कालपुरुष निगल जावेगा । निरञ्जनके


१ शिक्ख—कबीर दासजीको नानक देवजीको गुरु नहीं मानते इसका कारण यह है कि, सुलतान बहलोदलोधीके शासन कालमें संवत् १५२६ विक्रमी कार्तिक शुक्ला क्षत्रिय (खत्री) पूर्णिमाको चार घडीके तड़के श्री कल्याण रायके; घर माता तुप्तीके उदरसे तलवण्डी (लहोर) में गुरु नानक देवजीने जन्म लिया । १५३२ पंद्रहसौ बत्तीसमें पाठशालामें पढ़ने बिठाया, १५३५ में पं. ब्रजनाथजीके पास संस्कृत पढ़ने भेजा । १५३९ में वहां फारसी आरंभ कराई १५४१ में सुलतान पुर (कपूरथला) गये तथा १५४२ में वहां नबावके मोदीखानेका कार्य किया । १५४५ में विवाह किया । १५५१ में नानक देवजीके घर श्री चन्द्रजीका जन्म हुआ । संवत् १५५४ में वे ईनामकी नदीपर स्नान करतीबार एकदिव्य साधुसे मुलाकात होते ही गृहकार्य त्यागकर कबरिस्तानमें आसन जा जमाया । यही समय नानक देवके प्रकटमें विरक्त होनेका हुआ है । १५६१ में दिल्ली गये तथा १५६३ में काशी आये तथा रघुनाथपुर कबीरजीसे मिलने पहुंचे, कबीर जी मार्गमें ही मिल गये वहां दोनोंमें सुन्दर सत्संग हुआ ऐसा तो सिक्ख भी मानते हैं परन्तु नानक देवजी शिष्य हुए ऐसा नहीं मानते ।

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