भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सत्ताईस वंश उनके हैं ताजदार । दखिन देशके आदमी बाजदार ॥
गुरु तीसरे राय बनके बशिकें । लिया तख्त ओ ताजशाही बफर्कें ॥
सोलह वंशले हुक्म जारी करें । जो सतगुरु तवस्सल तयारी करें ॥
गुरु चौथे सदते बम गरब कहे । बमैं सात फरजंदके छिप रहे ॥
ये चारों गुरु मुक्तिके रास हैं । फकत एक जाहिर धरमदास हैं ॥
धरमदासका सब पसारा हुआ । जहाँ मैं जहाँतक हजारा हुआ ॥
न अबतक वह जाहिर गुरु तीन हैं । कि सतगुरुके फरमान आधीन हैं ॥
गुरु चार दुनियांमें जब आयेंगे । नहजदे करी दौर दिखलायेंगे ॥
तो सारी जमींमें हो यह गुलगुलः । है सतनाम सत और सब बुलबुलः ॥
शिलह शोर तीनों कभीं गाहमें । हैं पोंशीदः सतगुरु हुकुम चाहमें ॥
निकल जब पड़ीं फौज साल तीन । हो मुक्तिसे मामूर सारी जमीन ॥
बमैं वंश चारों हुकुम पायेंगे । शपातीं किधरके किधर जायेंगे ॥
पडे शोर आलममें सत् नामका । हो शोदरः निजाते सरअज्जामका ॥
बहर सिम्र डंका हे साहब कबीर । फिरें बोलते सत्य नामे सफीर ॥
गुरु चार सतनाम डंका दिया । पुरुष कालके दिलमें सनका दिया ॥
बहरा जुझाऊ बजे डढ़ढ डोल । कि सब कैदियों की ही जञ्जीर खोल ॥
बजे झौझ और शंख मिरदङ्ग जो । जिसे देखते दूतदल दङ्ग हो ॥
न वे जूर पुर नूर है सब समात । तुलू मल्ल है कट गई सारी रात ॥
गुरु चार हरजाय बोले नकीब । न बाकी रहा और कोई कीब ॥
करे गुप्तगू उनसे जो दूबदू । मती सारे उनके न कोई अदू ॥

धर्मदाससाहबके बयालीसवंशकी प्रशंसाके

उर्दू शेर ।

धरमदासके जो बयालीस वंश । सो सब सत्य सुकृतिके रूप हंस ॥
जुदागानः तारीफ उनकी लिखूँ । कदम दतके पर अपने शिरको रखूँ ॥
है औवल बचन वंश चौरा'मनी । गुरु सत्य मारग धरमके धनी ॥
कि इनसाँका जिसमें गुजारः हुवा । परम पुर्ण यह पर न जारह हुवा ॥
बचनसे जो सतगुरुका अवतार है । उसीके महर जीव भवपार है ॥
सुदर्शन साहब दूसरे नाम जो । करे जीव भवपार कण्डहार सो ॥
जो कुल'पति साहब तीसरे नानदार । पनह जिसके सब जीव हों कामगार ॥