भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धर्मदासजीके बयालीस वंशकी स्थिति ।

कबीर सागर नं. ९ के पृ. १४४९ में लिखा हुआ है कि, धर्मदासजी के बयालीस वंशकी सत्यगुरुने यह स्थिति ठहराई है कि, प्रत्येक वंश पच्चीस वर्ष और बीस दिवसोंपर्यन्त गद्दीपर बैठकरे । इससे अधिक तथा न्यून कोई न रहें । सत्यगुरुकी आज्ञानुसार उनका अवतार और उनका अधिकार होता आता है । फिर वे अपनी इच्छासे शरीर छोड़कर सत्यलोकको सिधारते हैं । जिस दिवस साहबका चलना होता है उसके पूर्व अनेक सन्त महन्त दर्शनार्थ एकत्रित होते हैं । जिस दिवस पच्चीस वर्ष तथा बीस दिवस पूरे होते हैं उसी दिन जो गद्दीका अधिकारी होता है उसको गद्दीपर बैठ समस्त कार्य सौंप देते हैं । जब सब कार्य ठीक हो चुकता है उस समय आप पानका बीड़ा लेते हैं । इसको चलानेका बीड़ा कहते हैं । जब वह चलानेका बीड़ा लेते हैं उस समय हंस तो सिधार जाता है शरीर ठंडा हो जाता है । पीछे उस शवकी समाधि कर देते हैं । इतना कौतुक कबीर साहबका अबतक पृथ्वीपर प्रगट है । येही लोग अपने चेलोंसहित इस भवसागरके मांझी तथा नावके चलानेवाले हैं । एवम् इन्हो १२बयालीस वंशोंके नामसुमिरन बोधमें भी लिखे हुए हैं ।

चारों गुरुकी प्रशंसा ।

उर्दू शेर ।

गुरु चारको पहले ताजीमकर । सातएँ शकुवों खामए हाथ धर ॥
गुरु चार सतगुरु कदमके हैं खाक । चढे अर्श ऊपर शबद वादपाक ॥
मोअज्जज हुए खाक खाकी हुए । बहरखू रजाजू खुदाकी हुए ॥
बजुरगी किया अब मुबारक जवों । बनाया इन्हें दुज्दके पासवों ॥
बअतराफ चारों निगहवों किया । मकों मुक्तिके चार दरबों किया ॥
जहाँ बैठे वह कादिरे जुल जलाल । कि बरतख्त शाहंशहीला मिसाल ॥
बजीरान चारों खिरदमंद हैं । यह अरकाने दालत खुदाबंद हैं ॥
जबानिब जहाँमें किया चार है । बहर सिस्त यक यक मददगार है ॥
जो इनसाँ को सतगुरु हुजूरी करें । निजाते शफाअतसो पूरी करें ॥
परमधाम पहुँचावें चारों वजीर । चले साथले मर्दुमाने अफोर ॥
धरमदास औवल बसिमते शुमाल । किरोशन है जिसकी मोहब्बत कमाल ॥
यह औवल गुरु सबके शिरताज हैं । कि सब आदमी पैरवों आज हैं ॥
बयालीस वंश उनके रोशन जमीर । मुकाबिल है जिस हेच बद्रे मुनीर ॥
गुरु दूसरे हैं बजानिब जुनूब । चतुर्भुज साहब जिव अमाँ बख्शखूब ॥

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