कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंन तो उसके साथ कोई अच्छा लगाव है न ठौरही है यदि बहता है तो बहने दीजिये। मेरे कहूँका आदर नहीं करता मैं गिरते हुए उसमें दो धक्के और लगा दूँ ।
इस प्रकार कबीर साहबका धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुआ, वैरी और दूत भूत सब निराश होगा किसीका कुछ वश नहीं चला । जो समर्थ धनी स्वयम् सत्यपुरुषने धर्म प्रचलित किया फिर किसकी सामर्थ्य थी, जो रोक सकता ऐसा बेगसे चला कि, लाखों सेवक शिष्य होगा । सत्य कबीर और सत्य नामकी पुकार समस्त संसारमें पड़ी किसीके रोके कोई रुक नहीं सका ।
धर्म प्रचलित करनेकी कथा ।
पहले मैं वर्णन कर आया हूँ कि, सत्यपुरुषने कहा कि, ऐ ज्ञानीजी ! पृथ्वी पर जाओ और सुकृतिजी (धर्मदास) को जगाओ, उनको अचेत निद्रासे जाग्रत करो । सत्यपुरुषकी भक्तिमें लगाओ । सत्य पंथ पृथ्वीपर प्रचलित करो और बयालिस वंश नियत करके कलियुगके मनुष्योंका उद्धार करो ॥ सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार कबीर साहबने धर्मदासको जगाया, सत्यपुरुषकी भक्तिमें लवलौन किया ।
चार गुरुकी कथा ।
पहले मैं उनका विवरण लिखता हूँ, जो चार गुरु तथा कबीरपंथी कहलाते हैं । ये लोग कबीर साहबके मुख्य शिष्य हैं । इन्हींको कबीर साहबने अपना स्थानापन्न किया है । इन्हींके द्वारा और इन्हींके अनुग्रहसे संसारके मनुष्य मुक्ति पाते और परमधामको जाते हैं । इन्हीं चारों गुरुओंकी आज्ञा पृथ्वीपर प्रचलित है ।
पहले गुरु धर्मदासजी हैं । उनको उत्तरकी गुरुवाई प्रदान की है । उनके बयालीस वंश हैं । दूसरे चतुर्भुजदास हैं, उनको दक्षिण की गुरुवाई प्रदान की है उनको सताईस वंश है । तीसरे गुरुराज बंकेजी हैं । उनको पूर्वकी गुरुवाई प्रदान की गई है उनको सोलह वंश हैं । चौथे गुरु सहतीजी हैं । उनको सात वंश हैं उनको पश्चिमकी गुरुवाई प्रदानकी गई है । ये चारों गुरु चार ओर ठहराए गए हैं । जब ये चारों गुरु चारों ओरसे सत्यनामका डंका बजावेंगे तब कबीर साहबका धर्म भली भाँति पृथ्वीपर प्रचलित होगा । इन चारों गुरुओंमें अबतक केवल धर्मदास जीही प्रगट हुए हैं उनकी वंशगद्दी स्थिर हुई है । किन्तु पूर्वोक्त लिखित तीनों गुरु अबतक प्रगट नहीं हुए हैं—जब वे भी प्रगट हो जायेंगे तब इस धर्मका प्रचार विशेष रूपसे होगा । अब तो केवल धर्मदासजीके बयालीस वंशका विवरण करता हूँ ।