भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बत्तीसवाँ प्रकरण ।

बारहवीं बेर रामानुज स्वामी वैष्णवको उपदेश करनेका वृत्तान्त ।

तेतीसवाँ प्रकरण ।

तेरहवीं बेर शेख मनशूर आदिको बोध करनेका वृत्तान्त ।

२९ से ३३ तकके चारों प्रकरणोंका पूरा खुलासा इसी कबीर मनशूरके दूसरे भागमें मिलेगा । इसके आगे ।

कबीर साहबका काशीमें चौदहवीं बेर प्रागट्य की उत्थानिका ।

सत्यपुरुषके तेज तथा ज्योतिका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशीके लहर तालावमें ठहरना, पृथ्वी तथा आकाशका प्रकाशमय होजाना, समस्त तालावमें प्रकाश तथा जगमगाहटका फैल जाना । अष्टानन्दजीका इस आश्चर्यमयप्रकाशको देखकर आश्चर्यान्वित होना और इस घटनाका समाचार रामानन्द स्वामीको देना । उस प्रकाशका बालकके रूपमें होकर कमलके पुष्पों पर ठहरना । नीरू जोलाहेका अपनी स्त्रीका गवन लिये हुए उस तालाबके समीपसे होकर जाना । जोलाहिनका बालकको तालाबमें देखना और उसको लेकर अपने घरमें ले जाना । कबीर साहब का नीरू जोलाहेके घरमें रहना और भाँति २ के कौतुक दिखलाना । फिर रामानन्द स्वामीका शिष्य होना और समस्त सिद्धोंके साथ शास्त्रार्थ करके सबको वादविवादमें परास्त कर, वैष्णव धर्मकी रक्षा करना । शाह सिकन्दरलोदी का काशीजीमें आना । शेखतक्री बादशाहके पीर, का ब्राह्मणों तथा मुल्लाओं की साटसे कबीर साहबको बावन कसनी देना और कितनेही कौतुक कबीर साहब द्वारा प्रगट होकर कबीर साहबका निष्कलंकित रहना, उन्हें किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचना । कबीर साहबका स्वसम्बेदकी आज्ञाएँ प्रगट करना फिर आपका अन्तिमलीला करनेको मगहर जाना और हिन्दू मुसलमान दोनों जातियोंका कबीर साहबकी लाशको न पाना । वहाँ से आपका विलोपित हो जाना और शवकी जगह केवल चादर और कमलोंका फूल मिलना । हिन्दू मुसलमानोंका केवल चादर तथा कमलोंके फूलोंकी समाधि और कबर बनाना । और हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकताका वृत्तान्त । फिर अपना बाँधो गढ़में प्रगट होकर धर्मदास द्वारा सत्यपथ चलाना ।

सत्य पुरुषकी आज्ञा ।

सत्यपुरुषने जानी से कहा कि, ऐ जानीजी ! कालपुरुषने सब जीवोंको

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