भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 276

है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है । बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है । नासबूरी मक्कारी है । दरोग दन्द है ॥

इति समझौता ।

अथबन्द ।

प्रथम बोलिये मूल बन्ध दुजे बोलिये बोलिये कमर बन्ध । तीजे बोलिये लंगोट बन्ध पाँचवे बोलिये दानिश बन्ध ॥ छठै बोलिये शस्त्र बन्ध । सातवाँ बोलिये सहस बन्ध ॥ आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म विरले पाया ॥ मक्के हिंस मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौवल वीर मुसलमान कहाया । मुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दूके छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं मुसलमान ॥ दादा आदमने गाया । बडे बडे पीरनको फरमाया । खुदाने अली बादशाहको चिताया । हिम्मतें बन्दा मददे खुदा । दुआ फकीरा रहम अल्लाह । कदम दवैशाँ रद्द बलाय दादा आदम मामा हौ आ । मक्क मदीनेमें चढा तवा, पहिली रोटी फकीरको खा ॥ ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा हौवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजीने कह्यो ॥ कहै कबीर वीरको जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण बानी ।

इति श्रीकाफिरबोध ।

फिरिस्तोंका ब्यान ।

१ ओवल फिरिस्ता वसर (दृष्टि) है । जैसे खुदाकी सूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बसरकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने यह फिरिस्ता सब ीवधारीके संग लगा दिया है जो हर एकको बतलाता है कि, देखकर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिस्ता समग्र (श्रवणेंद्रिय) है उसक द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह (बुरा) मरगूब (भला) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

३ तीसरा फिरिस्ता शाम (घ्राणेंद्रिय) है । यह फिरिस्ता सुगन्धि दुर्गन्धि को बतलाता है ।

४ चौथा फिरिस्ता लमस (स्पशेंद्रिय) है जो बतलाता है कठिन और कोमल को ।

५ पाँचवा फिरिस्ता जायका (रसेन्द्रिय) है जो छः प्रकारके रसोंका ज्ञान बतलाता है ।

६ छठा फिरिस्ता हाथ है जो हाथसे करने योग्य कामोंको सिखाता है ।