कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1348, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिष्योंने छिपकर जागनेपर सेवरीको लकड़ी लाकर झाड़ू देते हुये पकड़ा । जब उसे ऋषिपुत्रोंने पहचाना तो उन्हें उससे बहुत घृणा हुई प्रायश्चित्तका स्नान करने पंपासरमें गये । वे तालाबमें नहाने लगे तो तालाबका जल बिगड़ गया और उसमें कीड़े पड़ गये, वो एकदम खराब हो गया ।
मतंग ऋषिने सेवरीका हाल सुनकर उसे बुलाया बहुत प्रेमपूर्वक आश्वासन किया । उसकी अपनी चेली बना लिया अपने शिष्योंको डाँटा कि, तुम लोग सेवरीसे इतनी घृणा क्यों करते हो ? इसपर तो हजारों ब्राह्मण निछावर हैं । मतंग ऋषिने सेवरीसे कहा कि, तुझको रामचन्द्रजी दर्शन देंगे ।
सेवरीने अपने गुरुसे सुना कि, महाराज रामचन्द्रजीका दर्शन होगा । रामचन्द्रजीके दर्शनकी चिन्तासे प्रेममें मग्न होगई । सदा महाराजके मिलनेका स्मरण रखती । महाराजसे मिलनेके लिये दौड़कर उसी मार्गपर जाती जिधरसे कि, महाराजके आनेका समाचार पाचुकी थी, दौड़ते २ उसके मनमें आता कि, हाय मैं भीलनी हूँ ! महाराज मुझसे कैसे मिलेंगे ? मुझको नीच जाति जान घृणा करेंगे । ऐसा विचार होतेही किसी झाड़ीमें छिप जाती, रोने लगती । विचार करती, महाराज पतित पावन हैं, तब फिर झाड़ीसे निकलकर दौड़ती । कभी दूर २ तक मार्ग बुहारती हुई कहती कि, महाराजके आनेका मार्ग शुद्ध करती हूँ कभी २ महाराजको इधर उधर झाड़ियोंमें ढूँढ़ती फिरती, नित्य वनमें जाकर फल तोड़ती. क्योंकि, आपभी फलही फूल खाकर रहा करती । जिस पेड़के फल भीठे देखती उसीको रखलेती पर जो खट्टा होता उसे तो आप खाती जो मीठा होता उस भगवानको खिलानेके लिये रख छोड़ती ।
महाराजने कृपाकर उसके आश्रम पर पदार्पण किया, उस समय वेर और फल लाकर सेवरीने भगवान्के सामने रखे । महाराजने उन फलोंको ऐसे सराह सराहके खाया कि, तीनों लोकके अधिपतियोंको भी ईर्षा हो । उस वनके कितने ऋषियोंके मनमें अहंकार था कि, हम ब्रह्म ऋषि अथवा राजऋषि हैं, सबके मनमें बड़ी ईर्षा और अभिमान हुआ कि, महाराज प्रथम हमारे आश्रम-पर न पधारकर भिलनीके आश्रम पर गये । अन्तर्यामी रामचन्द्रजीने ऋषियोंकी मनकी जानकर कहा कि, है कोई ऐसा तप और धर्म करके पूर्ण जो पम्पासरमें स्नान करे और उसके स्नान करनेसे इसका जल शुद्ध हो जावे । सब ऋषियोंने क्रमशः उसमें गोता लगाया पर जलका शुद्ध होना तो क्या और भी गन्दा तथा भ्रष्ट हो गया । भगवान् रामचन्द्रने सेवरीसे कहा कि, तू इसमें नहा जैसेही सेव-