भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1347, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1347

सेवरीकी कथा ।

शिवरी भीलनी ईश्वरकी भक्तिकी ऐसी रंगी, प्रेमको इस पूर्णता तक पहुँचाया कि, भगवान् रामचन्द्रने उसके हाथके बेर खाये, उसकी कथा इस प्रकार है कि—

एक सूर्य्य वंशके परम प्रतापी महाराज अपनी राजकुमारी तथा राज-महिषी आदिके साथ तीर्थ राज प्रयागके स्नानके लिये गया । वहाँ अन्तःपुरचरीने महाराजसे प्रार्थना की कि, मैं पवित्र उपदेशोंसे विश्वको पवित्र करनेवाले पवित्रात्मा ऋषि गणोंके पुनीत दर्शनोंसे अपनेको पवित्र करना चाहती हूँ । इस पर उत्तर मिला कि, राज महलोंमें रहनेवाली इस तरह नहीं फिरा करतीं । इस तरह फिरनेवाली तो भीलनी होती है । यह सुन तीर्थराजमें स्नान करती बार अभिलाषा प्रगट की कि, मेरा अब जन्म हो तो मुझे नीच कुलोंकी महिला बनाना जो स्वतंत्रता के साथ परम पावन ऋषिमुनियोंकी सेवा कर सकती हूँ । भक्त वत्सल भगवान् अपने भक्तोंकी मनो कामना सदा पूरी करते हैं । उसी पवित्रात्माका शबर राजके कुलमें जन्म होगया उक्त भीलोंके राजाके यह एकही कन्या थी । हाथों २ में ही क्रशमः युवावस्थाको प्राप्त हुई । पिताने विवाहकी तयारी की बड़े २ वन्य पशु विवाहोत्सव में मारनेके लिये इकट्ठे किये गये थे । एक दिन राजकुमारी प्यारी सहेलियोंके साथ राज प्रासादके ऊपर चंद्रकिरण ले रही थी कि, कटहरोमें बंधे हुए बनले पशुओंकी करुण मूर्ति आँखोंके सामने आगई, यही समय शिवरीके हृदय पर्वतनका था । दर्दभरे शब्दोंमें सखियोंसे बूझा किये पशु मुझे क्यों दुखभरी आँखोंसे देख रहे हैं ? उत्तर मिला कि, ए भोली राजकुमारी ! ये तेरे विवाहमें काम आयेंगे । यह सुनतेही शिवरीका मुख तेजसे तमतमा उठा, झट बोल उठी कि, ऐसा विवाह मुझे नहीं करना है जिसमें अनन्त जीव दुःख पावें । भगवान्से लौ लगाई कि, तू ऐसी नींद भेज दे कि सब सोजायं तो मैं महलके बाहिर निकल जाऊँ । जगदीशने अपनी परम भक्ताकी मनोकामना पूरी की । शिवरी उसी समय राज महलका परित्याग करके वनको चली गई ।

यह एक बनमें रहा करती थी । वहाँही पासमें मतंगऋषि भी रहा करते थे । शिवरी रातको छिपकर ऋषिके आश्रममें लकड़ी धर जाती । ऋषियोंके स्नान करने जानेके मार्गको बूहार जाती । यह सब काम रातको इस भयसे करती कि, यदि ऋषि अथवा ऋषिके शिष्य देखलेंगे तो नीच जाति जान क्रोधित होंगे ऋषि नित्य लकड़ी और मार्ग बूहारा हुआ देखकर आश्चर्य करते । बहुत दिनों तक विचार करनेपर भी सेवा करने वालेका पता न लगा कि एक दिन ऋषिके