कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1335, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौ०— चले राव जहाँ बद्रीनाथा । सुत कलत्र रानी ले साथा ॥
साधुरूप हमहूँ करि लीना । राव संग तत्छन पग दीना ॥
गये नृपति जहाँ प्रतिमा साजा । भौति भौति कर बाजत बाजा ॥
कछुक द्रव्यले आगे राखा । विनय दण्डवत बहुविधि भाखा ॥
होत कोलाहल मङ्गल चारी । भौति भौति गावैं नरनारी ॥
बद्री परसि राव करि आसन । नृपति बैठो जाइ सिंहासन ॥
हम जीवनसे शब्द पुकारा । घर घर फिरचो सबनके द्वारा ॥
चैतो प्राणी शब्द संदेशा । चलो तहाँ जहाँ हंस नरेसा ॥
जहैंवाँ जाव बहुरि नहिं आओ । यकचित होय नाम लौलाओ ॥
सकल जीवसे कहो चित्ताई । एको जीव न हम पतियाई ॥
सात दिवस ऐसे करि बीता । कौतुक एक तहाँ हम कीता ॥
छन्द— गयो मन्दिर पास ततक्षण जहाँ बद्रीनाथ हो ।
रूप पाहन कीन पारस दीन मस्तक हाथ हो ॥
प्रीति निशि भिनुसार भव तब आय पण्डा पूजहीं ।
करत आरति भयो चकित देख द्विज चित बूझहीं ॥
सोरठा— आरति आय कुधातु, प्रतिमा यह कंचन भयो ॥
कहैं सकल सो बात, राव जाय सिर नायऊ ॥
चौ०— राजा सुनत हरषि चित दीना । प्रभु दया कोइ जान न लीना ॥
भयो अचम्भो लोगन सबही । लीला आप कीन जो अबही ॥
स्तुति करें बहुत हरषाई । सत्य भेद कोई जानत नाहीं ॥
राजा दल फेरा सब साधू । चले संत सब युत्थय बांधू ॥
राजा झारी लीने हाथा । सकल भेषको नायो माथा ॥
रानी साधुन चरन पखारे । राजा अपने कर जलढारे ॥
सकल भेष बैठे जेवनारा । जय जय मंगल होत अपारा ॥
तब हम तहैंवाँ बैठे जाई । पूरन शसि सम रूप दिखाई ॥
स्वेत अंग कीन्हो अति पावन । अधर बैठि सुकृत मन भावन ॥
देखि लोग सब भये अचम्भा । हर्षित राय चरन गहि थम्भा ॥
बहुतक साधु मम गूह आवा । ऐसा साधु हम नहिं पावा ॥
को तुम काहु कहाते आये । अपनो परचो कहो बुझाये ॥
सुकृत वचन ।
जो तुम पूछे राय सुजाना । अपनी कथा कहूँ सहिदाना ॥
अमर लोक ते पुरुष पठाये । जीव उबारन हम जग आये ॥