भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1354

सब खारो खस को खींचकर पाला है तूने सींचकर ॥
बैठा क्यों आँखें मींचकर मुझको बता ऐ बागवों ॥
खुद बागमें शामिल किया और पालकर कामिल किया ॥
फिर काटना क्यों दिल दिया मुझको बता ऐ बागवों ॥
आजिज पड़ा आजिज पड़ा ऊँधा हुआ पानी घड़ा ॥
तुझ विन भरे फिर कौन आ मुझको बता ऐ बागवों ॥

बागवों बाग कुहनमें तेरे अशजार जिते ॥
कोई है समर बख्श हैं पुर खार किते ॥
तुही खालिक तुही मालिक सबी तहरीक तेरी ॥
तू शहन्शाह जहाँ फौजके सरदार किते ॥
सभी महकूम तेरे हाकिमे आला है तूही ॥
तुही सरकार बड़ा छोटे हैं सरकार किते ॥
है हयात अबदी उनको जिसे तू बख्श अमान ॥
जिन्दा है कोई कोई और हैं मुरदार किते ॥
आलमोंका तू खुदावन्द फिकर सबकी तुझे ॥
सबका दिलवर है तुही और दिलदार किते ॥
नाम लेते हैं बहुत लोग तेरी दुनियामें ॥
हंस है कोई कोई और वह तीमार किते ॥
आसमों और जमीं कापते कब्बीर कहे ॥
आशिकको खबर गो कि खबरदार किते ॥
पेशकश हाथ सर अपनाले गली यारमें आ ॥
बे कीमतके वस्ल खरीदार किते ॥
जिसको तू अमल बख्श है अलमस्त ॥
बे नशः के छूटे हैं सरशार किते ॥
सबका है खुदा तुही खुदावन्दा नेक ॥
बे बहा तू है समर बख्श समर बार किते ॥
आजिजको चखा लज्जते उल्फत ऐ गुल ॥
गोबुलबुलो सदा जानिबे हरचार किते ॥

बुलबुलो खिजां गया अब आया है दिनबहार ॥
गागीत चहचहे सदा कर खेल दिन बहार ॥
गुल्शनमें जाके मगज मुअत्तर कर अपनेको ॥