कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1337, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिसके प्रभावसे मूर्तितो पारसकी और मूर्तिके नीचेकी चौकी सोनेकी दीख पड़ी । सबेरा होनेपर पण्डालोग मंदिरमें गये । आश्चर्यमय कौतुक देख अचम्भित हो राजा आदि सबको दिखलाया पर किसीको यह ज्ञात नहीं हुआ कि, यह कौतुक किसका कर्तव्य है । अबभी राजाने सतगुरुको नहीं पहचाना ।
पश्चात् राजाने देश देशमें पत्र भेजकर साधुओंको निमंत्रित किया बड़ा भारी भण्डारा आरम्भ किया । साधुओंकी पंक्ति बंठी तो उनके मध्य कबीर साहब भी पूर्णचन्द्रके समान प्रकाशित पृथ्वीसे अधर बंठे हुये देख पड़े । ऐसी लीलाकी देख सब लोग चकित हो बारम्बार स्तुति करने लगे । राजाको पूर्ण विश्वास हुआ कि, इसी साधुसे मेरा उद्धार होगा । राजा रानी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो स्तुति करने लगे । राजाने विनय पूर्वक प्रार्थना करके पूछा कि, महाराज ! आप कौन हो ? कहाँसे एवं किसलिये पधारें हो ?
कबीर साहबने उत्तर दिया कि, हे राजन् ! हम अमर लोकसे आये हैं, जो हमारा उपदेश ग्रहण करेगा वह भी अमर हो जायेगा । यदि तुम्हें अमरलोक जाना है तो मेरे साथ चलो । राजाने सब संसारी राजवंश त्यागकर अपने साथ रानी और अनेक पुत्र तथा ( १७००० ) सत्रह हजार परिवार और प्रजाको साथ लेकर परम धामकी यात्रा की ।
१५ प्रश्न-संगका फल-सत्संग और कुसंगका फल कहिये ?
उत्तर - सत्संगके प्रतापसे बड़े पापी अधर्मी परम धामको गये । कुसंगसे बड़े २ तपस्वी महात्मा ज्ञानी नरकको अथवा नीच योनियोंको प्राप्त होगये ।
सत्संग अंगकी साखी ।
कबीर- संगति साधुकी, नित प्रति कीजे जाय ।
दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥ १ ॥
कबीर- संगतिसे सुख ऊपजे, संगतिसे दुख होय ।
कहैं कबीर जहाँ जाइये, साधू संगति होय ॥ २ ॥
कबीर- संगति साधुकी, कभी न निष्फल जाय ।
ज्यों पै बोवैं भूमिके, फूले फले अघाय ॥ ३ ॥
कबीर- संगति, साधुकी, हरे औरकी व्याध ।
संगति बुरी कुसाधुकी, आठों पहर उपाधि ॥ ४ ॥
कबीर- संगति कीजै साधुकी, जौकी भूसी खाय ।
खाँड भोजन मिले, साकर संग न जाय ॥ ५ ॥