भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1126, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1126

जाता है वह फिर वृक्षमें नहीं लगता इसी प्रकार संसाररूप वृक्षमें शरीररूप सब पत्ते लगे हैं। शरीर गिरा तो फिर कुछ शेष नहीं रहता। इस कारण शरीरको दुख देना महान् मूर्खता है। इस अपरोक्ष अज्ञानके दो प्रकार हैं—एक अपनी इच्छासे और दूसरा पर इच्छासे। जो अपनी अज्ञानतासे हो उसे विशेष अपरोक्ष-अज्ञान कहते हैं। जो दूसरोंकी इच्छासे अथवा दूसरोंके बचन पुस्तक आदियोंके सुनने और पढ़नेसे दृढ़ हो उसे समान अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं।

दूसरेका नाम परोक्ष अज्ञान है, इसको समानाधिकरण बोलते हैं। जो इस अज्ञानमें होता है वह ईश्वरको अपनेसे भिन्न जानकर नाना प्रकारके साधन और तप आदिक करता है, इसके भी दो प्रकार हैं, एक सांसारिक, दूसरा पारलौकिक पारलौकिक। प्रथममें—सांसारिक कामनाओंकी पूर्णताके लिये देवताओंकी पूजा और उपासना भक्ति करते हैं। मनमें यह आशा रखते हैं कि, स्त्री, पुत्र, लक्ष्मी मान बड़ाई आदि प्राप्त हो। दूसरा वह है कि, जो अपने उद्धारके लिये नानाप्रकारके यम नियम आदिको धारण करते हैं। मनमें आशा रखते हैं कि, मेरी मुक्ति हो जावे। यह दूसरे प्रकारका साधन करनेवाला पुरुष बड़ा भाग्यवान् है इसीमें सब साधुलोग लगे हैं। नानाप्रकारके संयमों और तपस्याओंमें निमग्न हो रहे हैं। त्वंपदमें सब आज्ञानी लोग फँसे हैं इस अज्ञानका कुछ पारावार नहीं, अनन्त हो रहा है। कर्म उपासना, योग, ज्ञान आदिक जो कुछ तीन लोकमें तो रहा है वो सब लौकिक पारलौकिक विचार अज्ञानकी दशामें है। इसी अज्ञानमें सब पड़े हुए डुब डुब कर रहे हैं।

तत्पदसे दो प्रकारके ज्ञानका कथन।

तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान समान और विशेष है। जो उपाधि और ऋद्धि सिद्धि सहित हो। जिसको विशेष ज्ञान होता है, उसीको ईश्वर कहते हैं। जिसको समान ज्ञान होता है वह ज्ञानी कहलाता है, वह अपने सब गुण दोषोंको जानकर दूसरोंके भी सुख दुःखको जानता है, सब बातका विवेक रखता है। तीनों अवस्थाएँ और सब विषय वासनाके कर्तव्योंको मिथ्या समझता है, सारे संसारको स्वप्नके समान नाममात्रका जानता है, सारे संसारको स्वप्न और सङ्कल्पके समान निश्चित करता है, अपने आपको सत्य और शेष समझता है, इस ज्ञानका नाम परोक्ष ज्ञान है। यह भी दो प्रकारका है। एक तो यह कि, जिसमें सब प्रकारकी शक्ति ऋद्धि सिद्धि आदि साथ हो; जिसमें ईश्वरके छः ऐश्वर्य हों दूसरे ज्ञानका नाम समान ज्ञान है, इस ज्ञानवाला सब प्रकारके ऐश्वर्यको तुच्छ मिथ्या और दुखदाई एवं उपाधिमात्र समझता है। उसका निश्चय होता है कि,