भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 503

फुटकर-कबीर-जेहि बेरियां साई मिले, ताहि न भावे और ।

सबको सुखदे शब्द कर, अपनी अपनी ठौर ॥

कबीर-मनुष बेचारा क्या करे, जाका हृदया सुन्न ।

श्वान चौक बिठायके, फिर फिर चारै चुन्न ॥

कबीर-अंकुर भखै सो मानों, मांस भखै सो श्वान ।

जीव बधे सो काल है, सदा सो नरक निधान ॥

जिसका सत्य पुरुष वा उसके प्यारे मिल गये उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि, अपने दिव्य शब्दसे सबको सुख देते हुए अपने सच्चे स्थान-पर कर देते हैं । जिस मनुष्यका हृदय सूना हो वो विषयलंपट न हो तो क्या करे? क्योंकि, कुत्तेको जब चाहो तब चौक बिठा देखो वो मोका मिलतेही चूनही चाटेगा । अंकुरोंका भोजन करनेवाला मनुष्य तथा गोशतखोर कुत्ता एवम् जीवघाती काल है जो जीव हत्या करता है उसे अवश्यही नरक होगा, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है । कहे हुए चारों तरहके पशुओंमेंसे किसीमें भी बुद्धि नहीं है इसी कारण वे सदा आवागमनके चक्करमें फँसे रहते हैं ।

निर्बुद्धिताके अङ्गकी साखियाँ ।

कबीर- 'अकलविहीना आदमी, जानै नहीं गँवार ।

जैसे कपि परवश परा, घर घर नाचै बार ॥

कबीर- अकलविहीना सिंह, ज्यो गया सत्यके संग ।

अपनो प्रतिमा देखके, भयो जो तनको भङ्ग ॥

कबीर- अकलविहीना अंधगज, पन्यों फंदमें आय ।

ऐसेही सब जग बंधा, कहा कहूँ समझाय ॥

कबीर- पछताता परवश परचो, सुवाके बुधनाहि ।

अकलविहीना आदमी, यों बन्धा जग माहि ॥

कबीर- अकल असँसे उत्तरी, विन्धों दीनी बाँट ॥

एक अभागी रह गया, एकन लीनी छौट ।

कबीर- बिना वसीले चाकरी, बिना बुद्धिकी देह ॥

बिना ज्ञानको जोगना, फिरे लगाए खेह ॥

कबीर- जल पर पावे मछली, कुलपर "भाते बुद्धि ।

जाको जैसा गुरु मिला, ताकी तँसी सुद्धि ॥


१ निर्बुद्धि, २ बंदर, ३ चमकना अस्त्र, ४ मदान्ध हाथी, ५ अयो, ६ ऊपर, ७ परमात्मा, ८ दूसरे बुद्धिमान, ९ जरिये, संसर्ग, १० शरीर, ११ विभूति या साधु व साधु १२ रदी, १३ धरानेके अनुसार, १४ होती है, १५ स्मृति या बुद्धि,