कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुझको हँसेगे और ठठुएँ उड़ावेंगे कि, गौनेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेआया है इस कारण तू इस बालकको फँकआ ।
“नीरू देख रिसावई, बालक दे तू डार ।
सब कुटुम्ब हँसी करे, हसि मारे परिवार ॥
इस बातको जब नीमाने नहीं माना; तब वह जोलाहा अपनी स्त्रीको मारने पीटने पर तत्पर हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । तब नीमा खड़ी २ अपने चित्तमें चिन्ता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, हे नीमा ! मैं तुम्हारे पूर्व जन्मके प्रेमके कारण तुम्हारे घर आया हूँ । तुम मुझको मत फँको और अपने घर ले चलो । यदि तुम मुझको अपना गुरु करके मेरा कहना मानोगे तो मैं तुम्हे आवागमनके झंझटसे छुड़ाकर मुक्त कर दूंगा और तुम्हारा समस्त दुःख संताप हर लूंगा । तुमको वह शब्द बतलाऊँगा कि, जिससे तुम कभी कालके फन्देमें नहीं पड़ोगे ।
“तब साहब हुँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति सन्देश सुनाइहौं, मैं आया यहि काम ॥
पूरब जनम तुम ब्राह्मण, सुरति बिसारी मौहि ।
पिछली प्रीतिके कारने, दरसन दीनो तोहि ॥”
जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी और अपने पतिसे नहीं डरी । तब नीरूभी फिर कुछ नहीं बोला ।
“कर गहि बेगि उठाइया, लीन्हो कंठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, रंक महा धन पाय ॥
वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर गये ।
सैतीसवाँ प्रकरण ।
बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना ।
काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेता आया है, तो लोग ठठटा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है और बालकका कुल विवरण कह सुनाया ।
फिर नीरू ब्राह्मणको बुलाकर पूछने लगा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? ब्राह्मण तो पत्रा लिये विचारही रहा था इतनेमें बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है । दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता