कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें चारोंखानमें समा रहा है । अहम् कम्मोंका आकर्षण है । जो एक योनिसे खींच कर दूसरीमें ढाल देता है जैसे कि, चूर्मक लोहेको खींच लेता है ।
तीसरा क्रियामाण कर्म वह है जो अब कर रहे हैं । यदि यह क्रियामाण कर्म बलवान् होकर शुभ वा अशुभकी ओर झुका तो वह अपना रङ्ग दङ्ग दिखला देता है । यदि वह शुक्कर्मकी ओर झुककर सुकम्मकी पूर्णता करले तो वह अपने स्वरूपको प्राप्त करा देता है । यदि अशुभकी ओर झुका तो जड़योनिमें जा समाता है, नरकके समस्त दुःखों तथा अत्यन्त कष्टोंमें अपनेको डालकर कंकड़ पत्थरकी तरह बेकाम कर देता है फिर उसको सुपथ नहीं मिलता । सुपुरुष महाकर्ता, महाभोगी और महात्यागी इन भेदोंसे तीन प्रकारके होते हैं । महाकर्ता उसको कहते हैं कि, जो कर्म करता है और अपनेको कर्ता नहीं मानता । महाभोगी उसको कहते हैं कि, जो सब भोग भोगता है और अपनेको भोगता नहीं मानता । महात्यागी उसको कहते हैं जो अहंकारको त्याग दे । इस त्यागका गुण तब जाना जाता है जब उसको अन्तरदृष्टि होती है । जबतक इन बातोंका गुण भली प्रकार नहीं जाना जाय तबतक वेद और पुस्तक पाठसे कोई लाभ नहीं होगा । अन्तर दृष्टिसे जाना जाता है कि, ये तीनों क्या बात हैं ।
महाकर्ता तो यह तब होता है कि जब यह अन्तर दृष्टिसे भली भाँति देखता है कि, मैं कुछ करही नहीं सकता, मैं किसी कार्य्यका कर्ता नहीं हूँ, केवल मैं अपनी मूर्खतावश आपको अपने कार्य्यका कर्ता समझ रहा हूँ । यह समस्त संसार कलके सद्गुण चल रहा है । मेरा और किसीका कोई वशही नहीं कि, कोई काम करे । न मालूम वह कौन है जो मुझको तथा समस्त संसारको चला रहा है । जब मैं कुछ करताही नहीं और न मेरा किया कुछ हो ही सकता है । ऐसी अवस्थामें यह अपनेको कम्मोंका कर्ता नहीं मानता, जब यह अपनी अंतर दृष्टिसे भलीप्रकार देख लेता है तब फिर यह दूसरी ओर ध्यान नहीं देता, जानता है कि, जब मैं किसी कार्य्यका कर्ता ही नहीं तो मैं व्यर्थही अपनेको क्यों कर्ता ठहराऊँ । तब वह इस अज्ञानतासे पृथक होता है । संसारी इसी अज्ञानतामें फँसा रहकर आपको अपने कम्मका कर्ता समझ कर दुःख सुखमें धक्के खाता है । मैं क्यों अहम् बोलता हूँ नहीं जाने मुझे कौन अहम् बुलाता है, कौन डोलाता है । अतः इससे जाना गया और प्रमाणित हुआ कि, मुझको मेरे कार्य्यके बन्धन अहम् बोलाते हैं और दूसरा कोई नहीं । जब मैं अपने कम्मोंके बन्धनसे छूट जाऊँगा तो मेरा अहम् बोलना भी छूट जायेगा । जबतक यह आपको कार्य्यका करनेवाला मानता है तब तक यह क्रियामें आपको स्वतन्त्र समझता है । जब यह