कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मोंकी बेडीने समस्त सृष्टिको बाँध लिया है। जो कोई शुभ कर्म करता है वो सांसारिक धन स्वर्ग वैकुण्ठ इत्यादि सब सुखकी सामग्री पाता है उस पुण्यका अन्तिमफल अन्तःकरणकी बुद्धि है। इससे अधिक नहीं। ऋषीश्वरोंने कठिन तपस्या की और योग समाधि तथा पूजादिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया। दाससे स्वामी बन गये तो भी कर्मक्षय न होनेके कारण बन्धन न छूटा आवागमनमें फँसे रहे। कालपुरषने सबको इन्हीं दोनों कर्मोंमें बाँध लिया है। इस कर्मके तीन भेद हुए हैं। कर्म, अकर्म, विकर्म। कर्म तो मनुष्यको करना उचित है। अकर्मसे दूर भागना और विकर्मसे मनुष्य अपनेको मुक्त और भाग्यवान् बनाता है। जो शास्त्रानुसार कर्म ईश्वर निमित्त किया जाता है वह विधि है। दूसरा अकर्म। जिससे लोक परकलौमें कहीं सुखकी प्राप्ति नहीं होती है, उसे शास्त्रसे निषेध कहते हैं, यह अकर्म ईश्वरके विरुद्ध है। विकर्म उसको कहते हैं जिसके करनेसे कर्मसे छूटे बंधनकी पाश टूटे और ज्ञान लाभ हो पहिले स्वर्ग आदिका लालच दिखाकर कर्म करवाते हैं। इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादिके सुखका त्याग है। जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़डू दिखाकर औषधि देता है उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिका लालच मनुष्योंको दिखाया गया है। फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ है। सञ्चित प्रारब्ध और क्रियमान। सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षा पूर्वक रखा हुआ हो। यह सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा। दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं। इसी प्रारब्ध कर्मके अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है अर्थात् अपने पूर्व कर्मानुसार शरीर बना है जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है। अहम्के अर्थ मैं हूँ। अहम् बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है। जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है जो वृक्षोंके पत्तों पर रहता है। जब यह एक पत्तेको छोड़कर दूसरे पत्ते पर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पँरोंको पत्ते पर जमा लेता है। जब उसके अगले पँर दूसरे पत्ते पर भली प्रकार जम जाते हैं तब वह अपने पिछले पँरोंको भी खींचकर दूसरे पत्ते पर जमा लेता है और अगले पत्ते पर भली प्रकार जमकर बैठ जाता है। पिछले पत्तेसे सम्बन्ध छोड़ देता है। इसी प्रकार उस जीवका भी आवागमन हुआ करता है। ब्रह्मासे लेकर सर्व जीवोंमें अहंकार भरा हुआ है। जिसमें अहंकार नहीं उसका आवागमन नहीं। अहम् बोलनेसे उसके आवागमनका सम्बन्ध बराबर जारी रहता है। वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावों