कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 721, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंलगी तो निश्चयही काट खावेगी जिससे मनुष्य मर जावेगा । जीवित रहनेकी आशा न रह जावेगी । केवल उसके विषका औषध यही है कि, तन मन धनसे साधु सेवा करे तो बचेगा नहीं तो अवश्यही मर जावेगा । अतः यह हथियारबन्द अस्त्री समस्त संसारको मारने तथा खानेके लिये बनी है ।
मनने तनको बनाया और तनने धनको बनाया । इस कारण तन और धन दोनोंका रचयिता मन है । तन और धन जब दोनोंको छोड़दे और परमेश्वरमें लीन होजावे तब वस्तुतः मन पर विजय पानेकी आशा देख पड़ती है । जबतक मनके सत्वका इच्छुक रहेगा तबतक अवश्यही मनका गुलाम बना रहेगा । कुण्डलिनी शक्ति और मनका मुंह नीचेकी ओर है । यह स्पष्ट प्रगट करता है कि, मेरे साथ प्रेम करनेवाले मनुष्य नीचेके स्थानोंको जायेंगे अर्थात् नरकको पावेगे और सदैवके लिये आवागमनके बखेड़ेमें फँसे रहेंगे मेरे विषकी औषध कदापि उनके हाथों न पड़ेगी । इस विषकी औषध तो केवल पारखगुरुकी दया है । पारखगुरु उसके विषको पृथक् कर सकता है दूसरा कोई नहीं कर सकता । पारखगुरु साधुसेवासे दयालु होता है । जब सुकृत अथवा सुकर्म पूर्णताको पहुँच जाते हैं तब उसकी कृपा प्राप्त होती है । इस नागिन तथा नागके भेदको केवल हंस कबीर जानते हैं दूसरा कोई जान नहीं सकता । इस नागिनीने सब जीवोंको डंक लगाया है सभी अचेत तथा बधिर हो रहे हैं । यह कुण्डलिनी महामाया वासनास्वरूप है । जिसका ध्यान उसकी ओर होता है वह कामनाओंसे भर जाता है ।
इसी इच्छा अथवा वासनास्वरूप स्त्रीका समस्त कारखाना है । जो वासनाओंसे भरा हुआ है वो सब इसी महामायाका खेल और कौतुक है । इसी बाजीगर और बाजीगरनीने अपना कौतुक दिखाके सब जीवोंको अन्ध कर रक्खा है । जो इस बाजीगरको पहचान सकेगा उसके बन्धनमें न आवेगा वही मन मायाके पार जानेका पथ पावेगा । जो कोई योग युक्तिसे कुण्डलिनीको जगाकर सुषुम्नाके द्वारको निरापद बना लेगा वही उत्तम योगीराज वासनाओंको जीतकर निष्कंटक हो जायगा ।
कच्चे गुरुवोंने इसको वेद तथा शास्त्रके यथार्थ अभिप्रायको तो न समझाया दूसरी रीति पर समझाकर भ्रममें डाल दिया है ।
कर्म
जब कालपुरषने सृष्टिकी उत्पत्ति की तब कर्मका जाल बनाया । वे कर्म दो प्रकारके हैं । एक शुभ दूसरा अशुभ । ये दोनों कर्म बड़ी बेड़ी हैं । इन दोनों