कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आद्या और कबीर नाम मालाका संक्षेप
लगी तो निश्चयही काट खावेगी जिससे मनुष्य मर जावेगा । जीवित रहनेकी आशा न रह जावेगी । केवल उसके विषका औषध यही है कि, तन मन धनसे साधु सेवा करे तो बचेगा नहीं तो अवश्यही मर जावेगा । अतः यह हथियारबन्द अस्त्री समस्त संसारको मारने तथा खानेके लिये बनी है ।
मनने तनको बनाया और तनने धनको बनाया । इस कारण तन और धन दोनोंका रचयिता मन है । तन और धन जब दोनोंको छोड़दे और परमेश्वरमें लीन होजावे तब वस्तुतः मन पर विजय पानेकी आशा देख पड़ती है । जबतक मनके सत्वका इच्छुक रहेगा तबतक अवश्यही मनका गुलाम बना रहेगा । कुण्डलिनी शक्ति और मनका मुंह नीचेकी ओर है । यह स्पष्ट प्रगट करता है कि, मेरे साथ प्रेम करनेवाले मनुष्य नीचेके स्थानोंको जायेंगे अर्थात् नरकको पावेगे और सदैवके लिये आवागमनके बखेड़ेमें फँसे रहेंगे मेरे विषकी औषध कदापि उनके हाथों न पड़ेगी । इस विषकी औषध तो केवल पारखगुरुकी दया है । पारखगुरु उसके विषको पृथक् कर सकता है दूसरा कोई नहीं कर सकता । पारखगुरु साधुसेवासे दयालु होता है । जब सुकृत अथवा सुकर्म पूर्णताको पहुँच जाते हैं तब उसकी कृपा प्राप्त होती है । इस नागिन तथा नागके भेदको केवल हंस कबीर जानते हैं दूसरा कोई जान नहीं सकता । इस नागिनीने सब जीवोंको डंक लगाया है सभी अचेत तथा बधिर हो रहे हैं । यह कुण्डलिनी महामाया वासनास्वरूप है । जिसका ध्यान उसकी ओर होता है वह कामनाओंसे भर जाता है ।
इसी इच्छा अथवा वासनास्वरूप स्त्रीका समस्त कारखाना है । जो वासनाओंसे भरा हुआ है वो सब इसी महामायाका खेल और कौतुक है । इसी बाजीगर और बाजीगरनीने अपना कौतुक दिखाके सब जीवोंको अन्ध कर रक्खा है । जो इस बाजीगरको पहचान सकेगा उसके बन्धनमें न आवेगा वही मन मायाके पार जानेका पथ पावेगा । जो कोई योग युक्तिसे कुण्डलिनीको जगाकर सुषुम्नाके द्वारको निरापद बना लेगा वही उत्तम योगीराज वासनाओंको जीतकर निष्कंटक हो जायगा ।
कच्चे गुरुवोंने इसको वेद तथा शास्त्रके यथार्थ अभिप्रायको तो न समझाया दूसरी रीति पर समझाकर भ्रममें डाल दिया है ।
कर्म
जब कालपुरषने सृष्टिकी उत्पत्ति की तब कर्मका जाल बनाया । वे कर्म दो प्रकारके हैं । एक शुभ दूसरा अशुभ । ये दोनों कर्म बड़ी बेड़ी हैं । इन दोनों
कर्मोंकी बेडीने समस्त सृष्टिको बाँध लिया है। जो कोई शुभ कर्म करता है वो सांसारिक धन स्वर्ग वैकुण्ठ इत्यादि सब सुखकी सामग्री पाता है उस पुण्यका अन्तिमफल अन्तःकरणकी बुद्धि है। इससे अधिक नहीं। ऋषीश्वरोंने कठिन तपस्या की और योग समाधि तथा पूजादिको उच्च श्रेणीपर पहुँचाया। दाससे स्वामी बन गये तो भी कर्मक्षय न होनेके कारण बन्धन न छूटा आवागमनमें फँसे रहे। कालपुरषने सबको इन्हीं दोनों कर्मोंमें बाँध लिया है। इस कर्मके तीन भेद हुए हैं। कर्म, अकर्म, विकर्म। कर्म तो मनुष्यको करना उचित है। अकर्मसे दूर भागना और विकर्मसे मनुष्य अपनेको मुक्त और भाग्यवान् बनाता है। जो शास्त्रानुसार कर्म ईश्वर निमित्त किया जाता है वह विधि है। दूसरा अकर्म। जिससे लोक परकलौमें कहीं सुखकी प्राप्ति नहीं होती है, उसे शास्त्रसे निषेध कहते हैं, यह अकर्म ईश्वरके विरुद्ध है। विकर्म उसको कहते हैं जिसके करनेसे कर्मसे छूटे बंधनकी पाश टूटे और ज्ञान लाभ हो पहिले स्वर्ग आदिका लालच दिखाकर कर्म करवाते हैं। इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादिके सुखका त्याग है। जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़डू दिखाकर औषधि देता है उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिका लालच मनुष्योंको दिखाया गया है। फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ है। सञ्चित प्रारब्ध और क्रियमान। सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षा पूर्वक रखा हुआ हो। यह सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा। दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं। इसी प्रारब्ध कर्मके अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है अर्थात् अपने पूर्व कर्मानुसार शरीर बना है जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है। अहम्के अर्थ मैं हूँ। अहम् बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है। जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है जो वृक्षोंके पत्तों पर रहता है। जब यह एक पत्तेको छोड़कर दूसरे पत्ते पर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पँरोंको पत्ते पर जमा लेता है। जब उसके अगले पँर दूसरे पत्ते पर भली प्रकार जम जाते हैं तब वह अपने पिछले पँरोंको भी खींचकर दूसरे पत्ते पर जमा लेता है और अगले पत्ते पर भली प्रकार जमकर बैठ जाता है। पिछले पत्तेसे सम्बन्ध छोड़ देता है। इसी प्रकार उस जीवका भी आवागमन हुआ करता है। ब्रह्मासे लेकर सर्व जीवोंमें अहंकार भरा हुआ है। जिसमें अहंकार नहीं उसका आवागमन नहीं। अहम् बोलनेसे उसके आवागमनका सम्बन्ध बराबर जारी रहता है। वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावों
में चारोंखानमें समा रहा है । अहम् कम्मोंका आकर्षण है । जो एक योनिसे खींच कर दूसरीमें ढाल देता है जैसे कि, चूर्मक लोहेको खींच लेता है ।
तीसरा क्रियामाण कर्म वह है जो अब कर रहे हैं । यदि यह क्रियामाण कर्म बलवान् होकर शुभ वा अशुभकी ओर झुका तो वह अपना रङ्ग दङ्ग दिखला देता है । यदि वह शुक्कर्मकी ओर झुककर सुकम्मकी पूर्णता करले तो वह अपने स्वरूपको प्राप्त करा देता है । यदि अशुभकी ओर झुका तो जड़योनिमें जा समाता है, नरकके समस्त दुःखों तथा अत्यन्त कष्टोंमें अपनेको डालकर कंकड़ पत्थरकी तरह बेकाम कर देता है फिर उसको सुपथ नहीं मिलता । सुपुरुष महाकर्ता, महाभोगी और महात्यागी इन भेदोंसे तीन प्रकारके होते हैं । महाकर्ता उसको कहते हैं कि, जो कर्म करता है और अपनेको कर्ता नहीं मानता । महाभोगी उसको कहते हैं कि, जो सब भोग भोगता है और अपनेको भोगता नहीं मानता । महात्यागी उसको कहते हैं जो अहंकारको त्याग दे । इस त्यागका गुण तब जाना जाता है जब उसको अन्तरदृष्टि होती है । जबतक इन बातोंका गुण भली प्रकार नहीं जाना जाय तबतक वेद और पुस्तक पाठसे कोई लाभ नहीं होगा । अन्तर दृष्टिसे जाना जाता है कि, ये तीनों क्या बात हैं ।
महाकर्ता तो यह तब होता है कि जब यह अन्तर दृष्टिसे भली भाँति देखता है कि, मैं कुछ करही नहीं सकता, मैं किसी कार्य्यका कर्ता नहीं हूँ, केवल मैं अपनी मूर्खतावश आपको अपने कार्य्यका कर्ता समझ रहा हूँ । यह समस्त संसार कलके सद्गुण चल रहा है । मेरा और किसीका कोई वशही नहीं कि, कोई काम करे । न मालूम वह कौन है जो मुझको तथा समस्त संसारको चला रहा है । जब मैं कुछ करताही नहीं और न मेरा किया कुछ हो ही सकता है । ऐसी अवस्थामें यह अपनेको कम्मोंका कर्ता नहीं मानता, जब यह अपनी अंतर दृष्टिसे भलीप्रकार देख लेता है तब फिर यह दूसरी ओर ध्यान नहीं देता, जानता है कि, जब मैं किसी कार्य्यका कर्ता ही नहीं तो मैं व्यर्थही अपनेको क्यों कर्ता ठहराऊँ । तब वह इस अज्ञानतासे पृथक होता है । संसारी इसी अज्ञानतामें फँसा रहकर आपको अपने कम्मका कर्ता समझ कर दुःख सुखमें धक्के खाता है । मैं क्यों अहम् बोलता हूँ नहीं जाने मुझे कौन अहम् बुलाता है, कौन डोलाता है । अतः इससे जाना गया और प्रमाणित हुआ कि, मुझको मेरे कार्य्यके बन्धन अहम् बोलाते हैं और दूसरा कोई नहीं । जब मैं अपने कम्मोंके बन्धनसे छूट जाऊँगा तो मेरा अहम् बोलना भी छूट जायेगा । जबतक यह आपको कार्य्यका करनेवाला मानता है तब तक यह क्रियामें आपको स्वतन्त्र समझता है । जब यह
अन्तर दृष्टिसे भली भाँति निगाह कर लेता है कि मैं अपने कर्म्मोंका कर्त्ता नहीं तब अपने शुभ अशुभ कामोंको परमेश्वरको सौंप उसके शरणमें होकर उससे सहायता माँगता है, जान लेता है कि, मेरे कार्य्य भुझको बचाने योग्य नहीं, मैं सत्यगुरुकी शरण लूँ, इसके अतिरिक्त और छुटकारेका कोई उपाय नहीं है। अपनी अज्ञानताके कारण मैं अपने कार्य्योंका कर्त्ता आपको जानता था परन्तु आगे ऐसा कदापि न करूँगा। यदि यह स्वतन्त्र होता तो सब कुछ कर लेता। फिर अपनेको दीनता तथा दुर्दशामें कदापि नहीं फँसाता। एक दिनका वृत्तान्त है कि, एक पादरी साहब आकर मेरे पास बैठे और बाद विवादपर प्रस्तुत हुये। उसने कहा कि, मनुष्य अपने कार्य्योँमें स्वतन्त्र हैं। इसपर मैंने उत्तर दिया कि, यह बात कदापि नहीं कर्म स्वतन्त्रता किसीको प्राप्त नहीं। सब कलके समान गतिमान हैं। सुतरां तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तक देखो जब आदम उत्पन्न हुआ खुदाने उसको मना किया कि, तू यह कार्य्य कदापि न करना और इस वृक्षके फलको न खाना। आदमने न माना और खाया। जिससे वह ऐसा दुर्दशा प्रस्त हुआ कि, फिर न संभला।
यदि आदम कर्म करनेमें स्वतन्त्र होता तो ऐसा कदापि न होता। फिर आदमके पुत्र काबील और हाबील हुए वे भी तो ऐसेही थे। क्योंकि दोनोंने एक दिवस परमेश्वरके समक्ष भेंट चढ़ाई। छोटे भाईकी भेंट तो स्वीकृत हुई पर बड़े काबीलकी अस्वीकृत हुई इस कारण काबील अत्यंत क्रुद्ध हुआ। परमेश्वरने कहा कि, ऐ काबील ! तू क्यों क्रोध करता है ? यदि तू अच्छे मनसे देता तो क्या तेरी भेंट स्वीकार न की जाती ? परन्तु तू अपने भाईपर जय पावेगा। काबीलने अपने भाईपर जय पाई उसको मार डाला। परमेश्वरने उससे पूछा कि, तेरा भाई हाबील कहाँ है ? तब उसने उत्तर दिया कि, मैं नहीं जानता क्या मैं अपने भाईका रख-वाला हूँ। इसपर खुदाने उत्तर दिया कि, तेरे भाईका खून मुझे पुकारता है। अब तू हत्यारा तथा दोषी हुआ यह कहकर खुदाने उसको श्राप दिया। भलाजी ! यह न्यायकी बात थी कि, खुदाने तो स्वयम् कहा कि तू अपने भाईपर जय पावेगा। उससे जय पाई और उसको मार डाला। फिर वह दोषी कैसे ठहरा ? यदि अपने भाईको न मारता तो खुदा झूठा होता और मारा तो दोषी हुआ, हजूरसे दूर किया गया। वह तथा उसकी सन्तान पापिष्ठी ठहरी।
ऐसाही नूहके विषयमें जानना चाहिये कि, नूह सिखाते सिखाते विवश हो गया। किसीने उसका कहना न माना। अन्तको बाढ़ आई और समस्त मनुष्य डूब मरे। कोई जीव सिवा उनके कि, जो नूहकी नावपर था नहीं बचा। फिर
सुकृत आदि भेदसे ग्रन्थ
नूहकी शिक्षा तथा खुदाकी चौकसी किस काम आयी । वह भी कर्ममें स्वतन्त्र न ठहरा । जब बाढ़से सबका सत्यानाशकर चूका तो नूहकी ओर खुदाने ध्यान दिया तब खेद करने और पछ्ताने लगा कि, मैंने सबको बाढ़से क्यों नष्ट किया । कारण यह कि मनुष्योंके ध्यान तो बचपनसेही बुरे हैं अब भविष्यमें मैं बाढ़से लोगोंको न मिटाऊँगा । इससे प्रमाणित हुआ कि, इस खुदाको भी स्वतन्त्रकार्याधिकार प्राप्त नहीं । यदि ऐसा होता तो जब वह आदमका पुतला बनाने लगा तब फिरीशतोंने मना किया कि, आदमका पुतला न बनाओ पाप करेंगे । फिर पृथिवी रोई और कहा कि, मुझसे मिट्टी मतलो मनुष्यका पुतला न बनाओ, मनुष्य बड़ा पाप करेंगे । पर खुदा साहबने किसीका कहना न माना । अपनी इच्छासे मनुष्यका पुतला बनाया । आगे मनुष्योंके पापोंसे रुष्ट होकर बाढ़ लाकर पछ्तताया । फिर मैं कैसे कहूँ कि खुदा साहबको कार्य स्वतन्त्रता प्राप्त थी । हजरत नूहके उपरान्त हजरत इबराहीम अच्छे और पवित्र खुदाके पैगम्बर हुये, वे भी स्वतन्त्र नहीं थे । क्योंकि उनकी शिक्षासे नमरुद बादशाह इत्यादि सभी विरुद्ध हो गये थे । इबराहीमके पीछे इसहाकको पैगम्बरी मिली । इसहाककी स्त्री रबका जब गर्भवती हुई, उसके पेटमें दो बालक थे, वे दोनों पेटके भीतर परस्पर लड़ते थे । तब रबकाने खुदाके निकट जाकर निवेदन किया कि, मेरे पेटके दोनों लड़के आपसमें क्यों फिसाद करते हैं ? तब खुदाने कहा कि, बड़ा छोटेकी सेवा करके बड़ाई पावेगा । फिर इसहाकने ज्येष्ठ पुत्र ईसूको बरकत देनी चाही पर उस बरकतको छोटा पुत्र याकूब ले गया । इसहाककी युक्तिने काम नहीं दिया । देखो मूसाकी पहली पुस्तक २५ बाबका २१-२२-२५ आयत । उसमें ये सब लिखा हुआ मिलेगा ।
इनके उपरान्त हजरत मूसा थे । वह भी अपने कार्योंमें स्वतन्त्र नहीं थे क्योंकि, परमेश्वरने मूसाको मिस्रमें फिर्तूनके लोगोंको सिखलानेके लिये भेजकर यह कह दिया था कि, फिर्तूनके मनको मैं कड़ा करूँगा । वह तेरा कहना न मानेगा । इसके विषयमें मूसाकी शिक्षा किसी काम न आयी । मूसाके पीछे हजरत ईसाने खुदासे बहुत प्रार्थना की कि, मैं सलीबसे बच जाऊँ पर नहीं बचे । इसके पीछे मुहम्मद मुस्तफाने बहुत कुछ बल लगाया । बहुतसा रक्तपात किया तो भी सबको मुसलमान नहीं कर सके । यह सब बात कहकर और लिखी दिखाकर फिर मैंने पादरी साहबसे कहा कि, इन महाशयोंमें तो कोई स्वतन्त्र नहीं ठहरा । कदाचित् आपके नाम अब खुदाई परवाना कार्य स्वतन्त्रताका उत्तर पड़ा हो तो क्या आश्चर्य है ? मेरी बातें सुनकर पादरी महाशय चुप हो रहे और मुखतारीके फेलका दावा छोड़ दिया ।
शरण
स्वतन्त्रता केवल कबीर साहबकोही है दूसरेको नहीं है। क्योंकि, जब वे मनसे जिसको छुटकारा दिलाना चाहते हैं उसको अवश्य छुड़ा ही लेते हैं जो कुछ करना चाहते हैं करही लेते हैं। उनको रोकनेवाला दूसरा कोई नहीं है।
जाग्रत अवस्थामें यह मनुष्य जैसा कुछ कार्य करता है वैसाही स्वप्नावस्थामें किया करता है। परन्तु स्वप्नावस्थाके कर्मोंको कोई नहीं कहता कि मैंने किया। यद्यपि जाग्रत अवस्थाके कर्मोंका करता यह स्वयम् बनता है कि यह कर्म मेरे हैं ज्ञान दृष्टिसे जाग्रत तथा स्वप्नावस्था दोनोंही समान हैं। केवल इतनीही विभिन्नता है कि, जाग्रत देरतक उसके साथ रहती है एवं स्वप्न थोड़ीही देरमें बीत जाता है। यदि स्वप्नके कर्म उसके नहीं तो जाग्रतके कर्म भी उसके नहीं हैं। इस कारण आपको स्वकर्ममें स्वतन्त्र समझना अज्ञानता है क्योंकि यह स्वतन्त्र कदापि नहीं है। ज्ञानकी दृष्टिसे यह अहंकार जाता रहता है। इस जीवकी चारों दशा स्वप्नके समान हैं।
दूसरा महाभोगी वह है जो कि समस्त भोगोंको भोगता है और आपको भोगनेवाला नहीं मानता। यह भी बिना अन्तर प्रकाशके जाना नहीं जा सकता कि, भोगनेवाला कौन है और मैं कौन हूँ। यदि मैं भोगने वाला होता तो जो मैं चाहता सो भोग भोग लेता। भोगोंसे कभी न भागता कोई भोग ऐसा नहीं है कि जो भोग भोगते भाग न जाय और थक न जाय। जो अपनेको भोगोंसे अलग जानता है उसके सामने अच्छा और बुरा समान है क्योंकि रानी द्रौपदीने श्वपच सुदर्शनके सामने भांति भांतिके स्वादिष्ट भोजनोंके थाल धरे, उन्होंने सब खट्टा, मीठा और नमकीन एकमें मिलाकर खाना आरम्भ किया। क्योंकि उनको स्वादों की कामना नहीं थी। एक साधुको एक मनुष्यने कड़ुई तुम्बेकी तरकारी बनाकर खिला दी, वह साधु कड़ुई तरकारीको बिना कुछ कहे सुने खागया, जब पीछे गृहस्वामी खाने लगा। तब उसको वह तरकारी कड़ुई जहर मालूम हुई। वह अपनी स्त्रीको डांटने लगा कि, तूने यह विष समान तरकारी साधुको खिला दी, उसको कितना दुख हुआ होगा। उसके मनमें बड़ा भय समाया और वह साधुके पास जाकर उससे क्षमा प्रार्थना करने लगा। एक साधुको एक गृहस्थने खीर खिलाई और चीनीके बदले भूलसे नमक डाल दिया। कारण यह कि, वह नमक चीनीके समान पीसा हुआ था। वह साधु बिना कुछ कहे खा गया। उसके भीतर जब नमककी आग लगी तब उस गृहस्थके घरमें आग लगी। जब घर में देखने लगे तब जान पड़ा कि, साधुको चीनीके भ्रमसे नमक दे दिया गया। लोगोंने कहा
शरणगतके धर्म
कि, उस साधुके हृदयमें ठण्ढक आवे तब घरकी आगभी बुझे । थलीमें कोई सरदार था उसके पास एक वैष्णव साधु आगया उसने नहा धोकर ठाकुर पूजा की । सरदारने साधुके लिये दूध और चीनी मँगवा दी । उस वैष्णवने ठाकुरको भोग लगाया । इसके पीछे जब वह आप दूध पीने लगा तब उस सरदारको याद आगयी कि, जहाँ चीनी थी वहाँ घोड़ेकी दवाईके लिये संखिया भी पीसा धरा था कहीं ऐसा न हुआ हो कि, साधुको संखिया दिया गया हो । दौड़के देखा तो संखिया दिया गया था । उस सरदारने पुकारकर कहा कि, महाराज ! यह दूध मत पीजिये इसमें संखिया पड़ गया है । उस वैष्णवने कहा कि, अब तो यह संखिया ठाकुरको * भोग लगाया जा चुका है । मेरे ठाकुर संखिया पीवें और मैं चीनी पीऊँ ? यह कभी
- मूर्तिके रूपमें विराजनेवाले भगवान् के अर्चावतारको ठाकुरजी कहते हैं । भक्तजन छोटे-छोटे भगवान् अपने साथ रखते हैं एवं परम भक्तिभावके साथ भजन पूजन करके नैवेद्य बना भगवान् ठाकुरजीके भोग धरकर पीले भोग लगी हुई वस्तुका आप भोजन करते हैं । वे बिना भगवान् के निवेदन किये किसी भी वस्तुको ग्रहण नहीं करते । यद्यपि वे ठाकुरजी अज्ञानियोंकी दृष्टिमें तो कंकर पत्थर ही हैं पर इन भक्तोंकी दृष्टिमें इनके प्यारे इष्ट देव ही हैं । उसमें और इस मूर्तिमें कोई भेद नहीं रहता । यदि विष्णुकी मूर्ति विष्णुके उपासकोंके लिये विष्णु नहीं तो संखियाका असर किसने आरोगतेही खींच लिया । वैष्णवके भोग धरतेही संखिया कहाँ चला गया ? यदि उपासकके लिये वो पत्थरही होती तो वैष्णवके ठाकुरजीके भोग धरतेही विषका चला जाना नितान्त कठिन था क्योंकि, पत्थरमें यह शक्ति कदापि नहीं है कि, समीपस्थके विषको हर ले एवं उसके भक्तोंपर विष भी असर न करे । स्वामी परमानन्दजीके इन अक्षरोंकी ओर ध्यान डालतेही हमारी दृष्टि अनुरागसागरकी-समालोचनात्मक भूमिकापर जाती है । इसमें कबीराश्रमाचार्य भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्द विहारी लिखते हैं कि, "भगताई तो बीजककोही अपना सर्वस्व समझकर सबसे अलग उसीके पठन पाठनमें लगे रहते थे और वैष्णवोंमें खपते थे, किन्तु बीजककी वाणीके प्रतापसे उनके और जड़ मूर्तिपूजक वैष्णवोंमें फेर पड़नेसे कबीरपन्थी कहलाने और कबीरपन्थियोंमें मिलने लगे ।" इस लेखके हमें इस कथनपर विचार होता है कि, जिस मूर्तिके भोग लगानेसे उसके सच्चे भक्त वैष्णवपर विष भी असर न करे तो फिर वो मूर्ति जड़ हुई या चैतन्योंकी भी चैतन्य ? बिहारीजी ! स्वामी परमानन्दजीके अक्षरोंपर गहरी दृष्टिसे विचार करेंगे तो एक हृदयके आनन्दका देनेवाला रहस्य ध्यानमें आ जायगा कि, वो मूर्ति जड़ भी कि, चैतन्योंकी भी चेतना उसीके अन्तर्हित थी । भारतके दर्शन शास्त्रके ध्रुन्धर पाश्चात्य देशवासी स्वर्गीय मोक्षमूलरने मरतीवार कहा था कि, भारतीयोंकी विज्ञान विज्ञताको देखो । उन्होंने जड़ पत्थरसे भी सत्यपुरुषको प्रकट कर लिया । जो मूर्ति पूजाका महत्त्व नहीं जानते । उन्हें तो सिवा पत्थरके और कुछ नहीं है, पर जो सच्चे भक्त हैं उनके लिये वो साक्षात् भगवान् हैं । उनके लिये संखिया के विषकी क्या ? संसारके विषको भी हर लेगा । वोही उसे मोक्ष धाम सत्यपुरुषके लोकको पहुँचा देगा । इसी कबीर मन्शूरमें स्वामी परमान्दजीने कहा है कि, "सत्यपुरुषकी भी मूर्ति इसीमें है ।" यह बात सत्य भी है । अपने भक्तोंके लिये यह सत्यपुरुष तथा भक्तोंके सतानेवालोंके लिये यही कालपुरुष है । अतः यह सुतराम् सिद्ध हो जाता है कि, विष्णुकी मूर्तिमें भी उपासकके लिये सत्यपुरुषही विराजमान है । फिर उसके पूजकोंके लिये जड़ मूर्तिपूजक शब्दका व्यवहार करना उचित नहीं मालूम होता । विज्ञ पाठक उस भूमिकाको इस टिप्पणीसे सुधार करके पढ़ें ।
शरणगतके नियम
नहीं हो सकता। वह वैष्णव वह दूध तथा संखिया सब कुछ पी गया और चङ्गन रहा। संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई। उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था। आप उस भोगसे अलग रहा। मीराकी भी तो यही बात थी। यह है मूर्तिपूजाका महत्त्व। फिर जो मूर्तियोंको कंकड़ पत्थर कहते हैं यह उनकी भूल है।
तीसरे महात्यागी तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े। जबतक देह का अभिमान न छूटे तबतक त्यागी नहीं। अभिमानही करके यह देह मिलता है और इसीसे स्थित हो रहा है। सहस्रों त्यागी हो गये परंतु देहका अभिमान न छोड़नेसे बन्धनमें रहे। बाहरसे तो उन्होंने सब छोड़ दिया पर भीतरसे न छोड़ सके न देहका अभिमान छूटा, देहका अभिमान छूटा तो तब जाने कि, किसी प्रकारकी आपत्ति तथा सहसाकी घटना संघटित हो तब स्थिरता न छूटे न किसी प्रकारकी घबड़ाहट हो। सुतरां ऋषि मुनिगण उजाड़ बनमें बसते हैं वहां उनको प्रत्येक प्रकारकी आपत्तियाँ आ घेरती हैं। शोर, सोंप, भेड़िये, रीछ और कानखजूर इत्यादि नानाप्रकारकी आपत्तियाँ दिखाई देती हैं। इस स्थानपर साधु अपने मनको बहुतही दृढ़ रखते हैं। कोई हिंसक जीव फाड़कर खाजावे तनिक भी नहीं समझते कि, यह मेरी देह है सब तपस्वियोंकी ऐसीही अवस्था होती है। जब भीतरी अथवा बाहरी अपने शरीरकी ओर ध्यान हुआ तब तो उनका कुछ भी त्याग नहीं। सुतरां सर्व त्यागियोंमें बड़े त्यागी शुक्देवजी थे जो कि, मायाके भयसे बारह वर्षतक माताके गर्भमें रहे थे, जब बाहर निकले तो उनको त्याग और वैराग रहा। उनका हाल बहुत प्रसिद्ध है जब राजा जनकके समीप गये तब उन्होंने एक कौतुक दिखाया कि, उनके समस्त नगरमें आग लगी सब कुंछ जलने लगा। राजा। जनक निभंय बैठे रहे और शुक्देवजी अपनी तूँबी लंगोटी लेने दौड़े। राजाने कहा कि बैठ किधर जाता है तू तो आपको बड़ा त्यागी समझता है अब लंगोटी और तूँबी लेने दौड़ा? मेरे राज्यका समस्त सामान जल रहा है मैं तनिक भी अधीर नहीं हुआ। तू कौनसा त्यागी है तुझे तो लंगोटी और तूँबीकी चिन्ता लगी हुई है। जिसकी तूँबी लंगोटीकी चिन्ता नहीं छूटी उसका देहका अभिमान कैसे छूट जायगा? अतः जबतक देहका अभिमान न छूटे, तबतक महात्यागी कैसे हुआ? यह सब प्रशंसा तथा गुण कबीर साहबहीके हैं दूसरेके नहीं हो सकते हैं। बनारस में कैसे कैसे कष्ट मिले परन्तु उनका तनिकभी ध्यान नहीं किया, न मनमें ही कुछ माना। महात्याग इसीका नाम है। सहस्रों साधु सन्तोंने अपनेको ईश्वरमें लीन कर दिया तो भी उनके मनमें देहका अभिमान और वासना रही ही, इस
कारण उनका भगवान्में लीन होना भी काममें न आया । जो लोग सत्यगुरुको पहचानकर भगवत्में लीन होते हैं वे धन्य हैं, उन्हींका भगवत्में लीन होना सफल है ।
वेद तीन भागोंमें विभक्त हुआ—कर्म, उपसाना, ज्ञान । कर्मोंमें दो भाग हुये—एक तो यज्ञ इत्यादि जो सांसारिक अर्थोंके लिये करते हैं, दूसरा योग जो अपनी मुक्तिके लिये करते हैं । इन कर्मोंद्वारा सांसारिक तथा पारलौकिक अभिप्राय सिद्ध होते हैं । जिसके जैसे पाप पुण्य होते हैं वैसेही अवस्थामें वे जाते हैं वैसेही उनका भोग मिलता है ।
दूसरी उपासना है । सांसारिक लोग उपासना करते हैं और उपासनाके निमित्त विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, चण्डी, सूर्य और गणेश आदि देवता ठहराये गये हैं ।
तीसरा ज्ञान काण्ड है । उसमें जीव परमात्मा और सत्य पुरुषका विचार है, इसकी सात भूमिका हैं । ये समस्त कर्मकाण्डी उपासक और ज्ञानी अपनी अपनी सीमाको पहुँच जाते हैं ।
मीमांसक और जैन कर्महीसे मुक्ति समझते हैं परन्तु यह नहीं जानते कि, यह कर्म कहाँसे उत्पन्न हुआ कहाँतक पहुँच सकता है । यह विधि निषेद दोनों शाखा निरञ्जननिमित्त हैं । वहाँही तक पहुँचानेकी सामर्थ्य रखते हैं । इन कर्मों द्वारा स्वर्ग तथा नरक सब कुछ प्राप्त होता है । जहाँतक कर्मोंकी पहुँच है वहींतक कालपुरुष हस्तक्षेप करता है । कर्मोंका सुविशाल बन है उसमें यह जीव भूलकर अपने घरसे बाहर हो गया है । यह बन हिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ है, सूर्य चन्द्र सितारे इत्यादि तनिक भी दिखाई नहीं देते । न कोई सड़क और न पगडण्डी है, जो पगडण्डी कहीं है सो पशुओंकी है मनुष्योंकी नहीं हो सकती । इस कारण इन कर्मोंके बनसे कोई बाहर हो नहीं सकता । कर्म करता है फिर २ कर्म करनेके लिये देह धारण करता है । इसको कुछ पता नहीं लगता कि, वह कौन कर्म है जिससे मेरे कर्मोंका बन्धन कटे । वह कर्म जिससे इसका बन्धन कटे केवल स्वसंवेदकी शिक्षा ही है । उससे तो यह जीव अज्ञान है । इन्हीं लौकिक कर्मोंसे सारी योनि ठहराई गई हैं ।
जैनी जिनका कि समस्त ध्यान कर्मोंपर है वे आठ प्रकारके कर्म कहते हैं वे कबीर सागर नं. ९ जैन धर्म बोधसे लिखे जाते हैं : १—ज्ञानावर्णी कर्म । २—दर्शनावर्णी कर्म । ३—वेदनी कर्म । ४—मोहिनी कर्म । ५—नाम कर्म । ६—आयु कर्म । ७—गौत कर्म । ८—अन्तराय कर्म । अब इन आठों कर्मों
का सुविस्तृत विवरण सुनो। आवरण नाम ढक्कनका है। १-ज्ञानावर्णी कर्म अर्थात्ज्ञानका ढाकेनवाला कर्म। इसके कारण ज्ञान नहीं होने पाता। यह ज्ञानके ऊपर परदा डाल देता है।
ज्ञान पाँच प्रकारका है। १-मतिज्ञान। २-श्रुति ज्ञान। ३-अवधि ज्ञान। ४-मनपरजय ज्ञान। ५-केवल ज्ञान। मति ज्ञान-बुद्धिका है। अर्थात् वह ज्ञान जो बुद्धि तथा सोचसे सम्बन्ध रखता है, इस मति ज्ञानमें समस्त संसारके हुनर तथा कारीगरियों आगई हैं। जिसको मतिज्ञान होता है वह कारीगरी और शिल्पकारीमें बड़ा चैतन्य रहता है। जिस किसीका मतिज्ञान आवर्णी कर्म उगता है, उसको गुणोंका पाण्डित्य प्राप्त नहीं होता। दूसरा श्रुति ज्ञान है, श्रुतिज्ञान समस्त शास्त्रोंके कण्ठस्थ करनेको कहते हैं। कुछ कागज तथा ग्रन्थ इत्यादि देखने की आवश्यकता न हो। सब बातें हृदयमें रहें। शास्त्रद्वारा तीनों कालोंकी बातों को जानता हो उसको श्रुति केवली अथवा श्रुतिज्ञानी कहते हैं। इस श्रुतिज्ञानको जो कर्म रोकले और न होने दे उसका श्रुतिज्ञान आवर्णी कर्मनाम होता है। तीसरा अवधिज्ञान है अवधिज्ञान उसको कहते हैं जिसके द्वारा लोग मनुष्योंके मनकी बातको जान लेते हैं। समस्त गुप्त बातोंको बतलात हैं और अस्तयर्मी कहलाते हैं। जो कर्म इस अवधिज्ञानपर परदा डाले और न होने दे उसको अवधि-ज्ञानावर्णी कहते हैं। चौथा मनप्रजय ज्ञान-मनप्रजय ज्ञान उसको कहते हैं कि, जो हृदयकी गतिको जाने। अर्थात् जहां हृदय दौड़े वह सब कुछ मालूम कर ले। हृदयकी समस्त चाल तथा स्थिरताको बूझले। जो कोई इस प्रकारकी विद्या रखता हो उसको मनप्रजय ज्ञानी जानते हैं। मनप्रजयज्ञानमें यह गुण है कि, जब जिसको यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है वो कभी नहीं जाता। मनप्रजय ज्ञानी अवश्य ही केवल ज्ञानका अधिकारी हो जाता है। पूर्वके तीन ज्ञानोंमें तो सन्देह रहता है क्योंकि वे होते हैं और जाते भी रहते हैं परन्तु मनप्रजयको स्थिरता तथा स्थिति है। मनप्रजयज्ञान अवधिज्ञानसे बहुत बढ़के है। जो कर्म इस मनप्रजय ज्ञानको छिपा लेता है और नहीं होन देता उसको मनप्रजय आवर्णी कर्म कहते हैं। पांचवीं केवल ज्ञान है? यह सबसे बढ़कर है। यह समस्त ज्ञानोंका राजा है, जैनी ऐसा मानते हैं कि, इस केवल ज्ञानसे कोई बात छिपी नहीं रहती। सबसे उच्चक्षेणी यही है। जैनके चौबीस तीर्थंकर सब केवल ज्ञानी हुए हैं। उनके अतिरिक्त और कितने दूसरे साधू भी केवल ज्ञान रखते हैं। इस केवल ज्ञानको जो छिपाये रखे और न प्रकाशित होनेदे उसका नाम केवल-ज्ञानावर्णी कर्म है। दूसरा दर्शनावर्णी कर्म है। जिसके कारण प्रत्यक्षमें दर्शन नहीं होता उसके परदेमें अलख
हंसोंको चलाना
करतार रहता है । उसकी चार शाखायें हैं । तीसरा वेदनी कर्म है जिसके कारण जीवको दुःख सुख होता है । उसकी दो शाखायें हैं । चौथा मोहिनी कर्म है । उसकी दो शाखायें हैं । पांचवाँ आयुकर्म है इससे आपदाका अन्दाजा होता है, इसकी चार शाखायें हैं । छठवें नाम कर्म है इसकी तिरानवें शाखायें हैं । यह नामकर्म जीवधारियोंकी मूर्ति और स्वरूप बनाता है । सातवाँ गौतकर्म है इस गौतकर्म की दो शाखायें हैं । एकसे नीची जगह और दूसरीसे ऊँची जगह जीव देह धरकरके उत्पन्न होता है । आठवाँ अन्तराय कर्म है उसकी दो शाखायें हैं । इस अन्तराय कर्मका यह काम है कि, जो ज्ञान होनेवाला है उसको न होने दे उसमें विभिन्नता डाल दे । आठों कर्मोंका विवरण में ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ जो चाहे सो देखले । इन्हीं आठ कर्मोंसे समस्त जीव चार खानि चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं कर्मोंपासना योग और ज्ञानभी सविस्तर रूपसे वहीँ लिखा गया है । जिससे स्पष्ट प्रगट होता है कि, इस जीवका आवागमन कैसे सुकार्य तथा कुकर्मोंसे हुआ करता है । ये समस्त कर्म तो भरम रूप हैं । इनसे कदापि छुटकारा नहीं होता । जिसका वेद धर्मके लोग और जैनी केवल ज्ञान कहते हैं । इस जीवके कर्मही उसका स्वरूप बनाते हैं । कर्मोंही करके इस जीवका आवागमन चारोंखानिमें बराबर बना रहता है । सत्यगुरु भेद बतलावें तो आवागनको सम्बन्ध टूटे नहीं तो दुख पाता रहता है ।
मुसद्दस—तू है करतार किञ्त्रिया बारी । तेरा हुकम सब जगह जारी ॥
तेरी तसबीर सुबुक और भारी । नकशहा सब शिंगरफो जङ्गारी ॥
आलमोका है सारे काम तुम्हें । ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही इनसान हुआ तूही हैवान । तूही रहबर हुआ तूही शैतान ॥
जिस्म सदहा व एकही है जानू । होवे क्योकर बयां तुम्हारी शानू ॥
लोक तीनों दिया इनाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
मालिक व आदम व जिन्नो परी । हबशी हिन्दी व खेबर और ततरी ॥
रङ्ग विरङ्ग ढङ्ग चार खान करे । अदलो इनसाफ साफ साफ करे ॥
दिया आलमका इन्तजाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाय तुम्हें ॥
बन्दःसाहब कहीं किया है जुदा । कहीं बन बैठे आप आप खुदा ॥
सारे आलममें तेरी सूतो सदा । तुझसे सारे शरीर शाहो गदा ॥
सिजहा करते हैं खासो आम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही वाचून और तुही बेचून । सूरत सब तुझीसे गूनागून ॥
तूही मकबूल औ तूही मलऊन । तूही खुद रम रहा है सारे जून ॥
दे जमीनो जमात आम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही जेरीन् दरमयों बाला । मनका मनका तुही माला ॥
तूही पैदा किया तुही पाला । तूही सबजा हुआ तूही जाला ॥
कौन पहचान अकल खाम तुम्हें । अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
इन्द्र ब्रह्मा व विष्णु भी भूले । अपने अमलोंके झोंकमें झूले ॥
कहीं पजमुरदा और कही फूले । हिसँ हैवों घर बघर डोले ॥
देरहीमो करीम नाम तुम्हें । ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
आशकोंको दिखाया राहे सवाब । फासिकों के लिये शहीद अजाब ॥
सारा आलम बना खयालो खाब । कोई न देरीना सारे नकश बरआब ॥
सारे जान्दार दे गुलाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
सारे जान्दारको फँसा मारा । नहीं इस जीवका रहा चारा ॥
करके तदबीर तुमसे सब हारा । जिन्दा कर करके फिर फिर मारा ॥
देमुकद्दर बदस्त दाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही बख्शिदा है अम नोअमाँ । मातहत तेरे सब हैं जिसभो जाँ ॥
तुझसे पैदा है वाणी वेदो कुराँ । अविदानो जाहिदाने जमाँ ॥
याद करते हैं सुबहो शाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
सारे मजहब जहामें जारी हैं । पीर मुरशिदकी राह दारी हैं ॥
अर्श फशोंकी सब तयारी है । आजिज इसरारसे सब आरी है ॥
पेशवा भी किये इमाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
कर्मोंके चिन्ह
कालपुरुषने जीवधारियोंके शरीरमें कर्मोंके चिन्ह हैं । इस जीवने पूर्वजन्ममें जैसे कर्म किये हैं उसकी देहमें वैसेही चिन्ह बने हैं । सब जीवोंके शरीरपर चिन्ह होते हैं परन्तु मनुष्यके शरीरपर भली भाँति स्पष्ट प्रगट होते हैं । इसी कारण मनुष्यकी देहहीसे इसके कर्मोंका भली प्रकार हिसाब किताब हो जाता है । मनुष्यके शरीरके चिन्ह देखनेसे भलाई बुराई जानी जासकती है । जिस समय स्त्री के गर्भमें वीर्य स्थिर होता है उसके भीतर जीव होता है उसजीवके साथ उसके पहलेके किये हुए कर्म बन रहते हैं उसके भाग्यके अनुसार उसका शरीर प्रस्तुत होता है, समस्त रंग डील डौल पूर्वकर्मोंके अनुसारही होता है । जब यह माता गर्भसे निकलता है तो उसके पूर्वजन्मके कर्मोंके चिन्ह उसके शरीर पर होते हैं, पाँच वर्षके भीतर ये चिन्ह स्पष्ट प्रगट नहीं होते, जैसे जैसे यह बड़ा होता जाता है वैसेही वैसे इसके पूर्व कर्मके चिन्हभी दिखाई देते जाते हैं । तिल और मत्सा
इत्यादि भी पूर्वकर्मानुसार ही प्रगट होते हैं, बहुतेरे चिन्ह छिपे रहते हैं। शिरसे लेकर पैरतक सुकर्म तथा दुष्कर्मके चिन्ह भरे हुये हैं, कहीं दुर्भाग्यके तो कहीं सौभाग्यके चिन्ह होते हैं। यदि एक स्थानपर दुर्भाग्य और दूसरे स्थानपर सौभाग्य का एकही बातपर चिन्ह हो तो उसका मध्यम फल होता है। जो सामुद्रिक जानते हैं ये बातें उनको मालूम होती हैं। सामुद्रिक विद्या अत्यन्त कठिन है। जो सामुद्रिकमें प्रवीणहो वह मनुष्यका आकार देखकर सब कुछ कह सकता है।
कबीर साहबने इस सामुद्रिकके विषयमें बहुत कुछ कहा है कर्मोंके चिन्ह देखकर सामुद्रिकका ज्ञाता सब कुछ कह सकता है। इसी विषयपर एक उदाहरण देता हूँ—मैंने किसी अंग्रेजी पुस्तकमें पढ़ा था कि, हकीम सुकरात एक पाठशालामें अपने शिष्योंको पढ़ा रहे थे। उसमें एक सामुद्रिक जाननेवाला आगया, जब सुकरातके शिष्योंने जान लिया कि, यह पुरुष इस प्रकारकी विद्या रखता है तो उसको वे अपने उस्तादके निकट लेगये और कहा कि, इस पुरुषके दोष और अवगुण कहो। वह सामुद्रिक जाननेवाला इस बातको नहीं जानता था कि, वही हकीम सुकरात है। उस समय उस सामुद्रिकीने सुकरातकी देहके सभस्त चिन्ह देखे पहचानकर बोला कि, यह मनुष्य बड़ा पाजी, दुष्ट व्यभिचारी, झूठा, ठग, दगाबाज और दुष्कर्मों है। यह बातें सुनकर सुकरातके शिष्योंने उसके ठट्ठे उड़ाये हँसते हँसते बोले कि, यह मनुष्य झूठा है। तब सुकरात जो स्वयम् सामुद्रिक विद्या जानता था कहने लगा कि, तुम लोग इसको झूठा मत समझो। यह मनुष्य जो कहता है वह सत्य कहता है। उसमें कोई सन्देह नहीं क्योंकि, उसने जो कुछ कहा उन सब बुराइयोंके चिन्ह मेरे शरीरमें परिलक्षित हैं। मेरे शरीरमें वे सब चिन्ह ज्योंके त्यों बने हुये हैं मेरा स्वभाव वैसेही था परन्तु मैंने अपनी विद्या और योग्यतासे अपनी वासनाओंको भलीप्रकार दमन किया है। अपने हृदयको दुष्कर्मोंकी ओर हिलने नहीं दिया है भली प्रकार दृढ़ कर लिया है जिसमें तनिकभी हलचल न हो। ऐसा वासना दमन किया है कि, वे मूरदेकी तरह होगई हैं। परन्तु ये चिन्ह जली हुई रस्सीकी ऐंठनके समान शेष हैं। तब सुकरातके शिष्योंको निश्चय हुआ कि, हमारा उस्ताद सत्य कहता है, इस प्रकार पुरुषार्थ प्रारब्धपर जय पाता है। मनुष्य के अतिरिक्त कितनेही हाथी, घोड़ा बैल इत्यादि पशुओंमें भी ये चिन्ह देखे जाते हैं कि, जो लोग उनको मोल लेते हैं उनके भले बुरे चिन्होंको पहचान कर दुर्भाग्य तथा सौभाग्य जान लेते हैं। उनके कर्मोंके चिन्ह साधारणतः जड़ स्थावर पदार्थ पर प्रगट नहीं होते, गुप्त रहते हैं, परन्तु कभी कभी किसी चिन्हसे उनके पूर्व जन्मोंका चिन्ह प्रगट होजाता है। सर्व साधारण देखकर जान लेते हैं। सुतरां
फुटकर उपदेश
लगभग पैंतालौस वर्ष होते हैं जब मैं चुनारगढ़ जो कि, काशीके समीप है वहाँ गया। वहाँके पर्वतपर जाके मैंने एक प्रकारका वृक्ष देखा। उस वृक्षके जड़से लेकर डालियोंतक नागरी अक्षरोंमें राम राम लिखा था। वहाँ इस प्रकारके अनेक वृक्ष थे। समस्त वृक्षोंकी यही दशा थी कि, सबमें राम राम लिखा हुआ था, जब सब वृक्षोंकी यही दशा देखी तब भली भाँति दृष्टि दौड़ाई जड़से ऊपरतक समानही देख पड़ा। अनुमान किया कि, इन वृक्षोंपर कोई आकर लिख गया होगा। इन वृक्षोंमेंसे एक वृक्षकी छाल हटाकर देखा तो छालके भीतर भी वही राम राम सुन्दरताके साथ लिखा हुआ था। तब निश्चय होगया कि, यह किसी मनुष्यके हाथोंका लिखा हुआ नहीं बरन् प्राकृतिक लिखावट है। उसके उत्पत्ति कालसेही यह गुण उसमें आगया है। उन वृक्षोंकी यह दशा देखकर मैं गांवमें गया, लोगोंसे पूछा इस वृक्षका क्या नाम है? तब लोगोंने कहा कि, इसे रामनामी वृक्ष बोलते हैं। उस वृक्षकी जड़में जो अक्षर थे उनकी स्याही बहुत काली थी और जैसे जैसे वे ऊपर जाते थे वैसेही वैसी स्याही फीकी पड़ती जाती थी। पतली डालोंकी स्याही बड़ी फीकी थी परन्तु पत्तोंके नाम तो अत्यन्त फीकी स्याहीमें होंगे कि, वे दिखाई भी न दे। उस वृक्षका वह रङ्ग ढङ्ग देखकर मैंने जाना कि, पूर्वकालका यह कोई भक्त है और किसी दोषवश वृक्ष हो गया है।
उस समय यमलार्जुन कुबेरके पुत्र याद आये जो नारद मुनिके शापसे वृक्ष हो गये थे। श्रीकृष्ण जीने उनका उद्धार किया था। उस वृक्ष की अवस्थासे उन्हें छुड़ाकर उनको यथार्थ स्वरूप प्रदान किया था। इसी प्रकार गौतम ऋषि की स्त्री (अहिल्या) गौतमके शापसे पत्थर हो गयी थी, श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी पूर्वावस्थामें, प्राप्त हुई। इसी प्रकार सब जीव कर्मके बन्धनमें पड़े हैं, जड़ और चैतन्य सब फँसे हुये हैं। कदापि किसी योग यत्नसे नहीं छूटते, उलटा दिन प्रतिदिन और अधिक फँसते जाते हैं। इसी विषयपर कबीर साहबने रमैनी कही हैं उन्हें यहीं लिखे देता हूँ।
कर्मखण्डका सत्यकबीर वचन
रमैनी-कर्म कथा अब कहूँ बखानी। जौन फाँस अटके नर प्राणी ॥
चारों खानि कर्म अधिकाई। चहूँ खानि मिलि कर्म दृढ़ाई ॥
कम्महि धरती पवन अकासा। कर्महि चन्द सूर परकासा ॥
कम्महि ब्रह्मा विष्णु महेश। कम्महि भये गौरि गणेश ॥
सातबार पन्द्रह तिथि साजा। नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥
कम्महि रामकृष्ण औतारा। कर्महि रावण कंस संहारा ॥
कर्महि ले बसुदेव घर आवा । कर्म यशोदा गोद खिलावा ॥
कर्महि ते बन गऊ चराई । कर्म ते गोपी कोलि कराई ॥
कौशल्य तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥
कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह बनबासा ॥
कर्म जाय जब धनुष चढ़ावा । कर्महि जनक सुता सिरनावा ॥
कर्म रेखते कोई न मुक्ता । लछिमन राम करम फल भुगता ॥
कर्म हरी सीता कहैं आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥
कर्म सागर बाँधेउ बन्ध कहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥
रुद्र राम की कीन्ह लडाई । भल मिलाप हनू भेंट चढ़ाई ॥
कर्म रेख नहिं मिटे मिटाई । जिव पपील लंका होय आई ॥
कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति बिभीषण भयो ॥
कर्म रेख सबहिन पर छाजा । कहाँ राम कहाँ रावण राजा ॥
कर्म रेख सबहिन पर होई । देखो शब्द बिलोय बिलोई ॥
कर्म रेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हें चीन्हा ॥
साखी—कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।
बिन अक्षर कोई ना छुटे, अक्षर अगम अगाध ॥
रमैनी—सागर भव सागर की धारा । नहिं कुछ सूझे वार न पारा ॥
तहवां बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥
कर्म रेख बँधा सब कोई । खानी बानी देखि बिलोई ॥
वेद कितेब करम कहि गाया । कर्महि को निःकर्म बताया ॥
सद्गुरु मिले तो भेद बतावें । कर्म अकर्म मध्य दिखलावें ॥
कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥
अक्षर सागर निर्भय वाणी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥
गोरख भरथरि गोपीचन्दा । कर्म फाँस सबही पुनि फन्दा ॥
नौ औ सात चौदह एककीसा । ब्रह्मा के चौरासी भेसा ॥
कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहँ लग वेदव्यास कछु भाखा ॥
दस औ द्वादस कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥
कर्म अकर्म भूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥
अक्षर सागर मूल भँडारा । अक्षर मूल भेद उँजियारा ॥
अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥
साखी—कबीर—कर्म डोर चारों युगनि, सुनो सन्त सब दास ॥
तत्वभेद निःतत्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥
गोरखजीका प्रश्न
रमैनी—सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारन कर्म नन्द घर गाजा ॥
एक नांरि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपि निरमावा ॥
कारन कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥
जहँ तहँ गोरस जाय चुरावा । जहँ जहँ कर्म तहाँ ले खावा ॥
कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥
कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥
कर्म कारण जो तहाँ सिधारा । कारन कर्म पीव विषधारा ॥
मारि तासु कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोन्यो संसारा ॥
कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्यो हाथा ॥
कर्महि मारि विध्वंस जो कीना । कर्म फाँस सबही आधीना ॥
कुबजा कछु कर्म जो कीन्हा । कारन कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥
कर्म पाताल कालेश्वरनाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥
अश्वमेध यज्ञ करत बलिराजा । कर्म ते जाय पाताल विराजा ॥
कर्महि बावन रूप बनाया । बलि राजापै दान दिवाया ॥
कर्म अहूठ नापि पग लीन्हा । तीनैं पग तीनों पुर कीन्हा ॥
आधा पाँव कर्म अधिकारी । बाँधि नृपति पातालहि डारी ॥
जहँ लगि जीव जन्तु उत्पानी । तहँ लगि कर्म राय परबानी ॥
कर्म फाँसते कोई न छूटे । कर्म पाँस सबहिन घर लूटे ॥
साखी—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतौ करो उपाय ।
सद्गुरु मिले तो ऊबरै, नहीं तो परलय जाय ॥ ३ ॥
रमैनी—जो कुछ कर्म जगतमें करई । करि करि कर्म बहुरि भवपरई ॥
एक न होय यज्ञ व्रत ठाना । एक न पाप पुण्य पहचाना ॥
एक कर्म कुल लीन्ह उठाई । कर्म अकर्म न जानै भाई ॥
एक छापा और तिलक बनावै । पहिरि मेखला साधु कहावै ॥
वैष्णव होय करे षट् कर्मा । वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥
कथा पुराण सुनै चितलाई । कर्महि सुमिरै बहुविधि भाई ॥
विष्णु सुमिरि तब बहुविधिकियो । सो निःकर्म विष्णु नहीं भयो ॥
कर्मकी डोरि बँधा संसारा । क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥
एक अभङ्ग एकादशी करई । तन छूटे वैकुण्ठहि तरई ॥
यह वैकुण्ठ न स्थिर होई । अन्त कर्मगति परलय सोई ॥
करै कर्म वैकुण्ठहि जाई । कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥
योगी योग कर्मको साथे । किरिया कर्म पवन आराधे ॥
योगी कर्म पवनको किरिया । भुगतै कर्म देहु पुनि धरिया ॥
संन्यासी जो बन बन फिरही । होय निःकर्म कर्म फिर परही ॥
जीयत दग्ध देहको करई । जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥
कोई नगन कोई वज्र कछोटा । भरमत फिरै सहे पग ढोटा ॥
राजद्वार पावै औतारा । भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥
पण्डित जन सब कर्म बखानी । नख शिख कर्म फाँस अरुझानी ॥
कर्म धर्मकी युक्ति बतावे । दान पुण्य बहुविधि अरथावे ॥
वज्र दानले जन्म गँवावे । होई ऊँट बहु भार लदावे ॥
एक जो करे बरत अवतारा । होइहै शूकर स्वान सियारा ॥
शूकर श्वान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होईहैं मुकता ॥
साखी-कबीर-बहुबन्धनसे बांधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी-शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस मुकताओं ॥
निरालम्ब अवलम्ब न जाने । शब्द निरन्तर भेद बखाने ॥
पाप पुण्यकी छोड़े आशा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥
रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निःतत्त्व समाई ॥
तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको दर्ई बडाई ॥
सुख सम्पति नहिं विपत्तिविचारे । काम क्रोध तृष्णा परचारे ॥
क्रिया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरवारे ॥
सो ग्रहै जो निग्रह काया । अभि अन्तरकी मेटै माया ॥
शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥
ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरन परछाले ॥
गहै तत्व निःतत्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥
सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥
धन योवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥
चहुँ दिशि मंसा पवन ककोले । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोले ॥
उन मुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्वभेद निःतत्वहिं लहई ॥
जो कोई आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥
मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरु गम लूटे ज्ञान मँडारा ॥
भरा होय सो सन्मुख जूझै । भोदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥
कबीरजीका उत्तर प्रासांगिक
दुखिया होय रैन दिन रोई । भोगी भोग करे सुख सोई ॥
दुर सुख भोग सोग सम जाने । भली बुली कछु मन नहि आने ॥
भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय पावै पर बैरागा ॥
सोंगी अक्षय रैन दिन बाजै । सिद्ध साधु तहैं आसन छाजै ॥
साखी—आसन साधे आपमें, आपा डारै खोय ।
कहैं कबीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥
भावार्थ—इस प्रकार सब जीव बन्धनमें पड़े हैं । कर्मकी फौसी सब जीवों को लगी हुई है । इससे छूटना असम्भव हुआ है । सहस्रों युक्तियाँ करता है परन्तु प्रतिदिन बँधा जाता है । ये तीनों लोक भवसागर (उत्पत्ति सागर) कर्मने बनाये हैं, इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है । यही कर्म उस पर अधिकार कर रहा है । कर्मसे ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी कि, सीमाही नहीं है । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नानाप्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण हैं । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है । कि, जिनका कुछ विवरण हो ही नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है । कोई ऐसे हैं कि, एक बार स्वोंसके आने जानेसे बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्डे हैं ये सब जीव वासनासे भरे हुए हैं । इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुखी सुखी हुआ करते हैं चारों खानिके जीवोंमें न कोई सुखी और न सन्तुष्ट हैं, कर्मोंके बन्धनसे इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है, इसमें प्रायः सच्चे मनुष्यका अभाव है, जीवोंके ही कर्मोंसे प्रेरित होकर ईश्वरको अवतार धारण करना पड़ता है, जीवोंके सुख दुखोंकी व्यवस्था उनके कर्मोंके अनुसार ही होती है, गोपियोंको गोपियोंके कर्मोंके अनुसार तथा कंसको कंसके कर्मोंके अनुसार फल मिला है । साहिबका हंस वही है जो कर्म जालको कच्चे धागेकी तरह काट दे क्योंकि, जबतक अपनेको कर्मोंके बखेड़ेसे नहीं बचाता उस समयतक साहिबके हंसोंमें नहीं संभाला जा सकता इस कारण कर्मोंपर विजय पाना प्रत्येक मुमुक्षुका कार्य होना चाहिये ।
नौ कोष
१ अन्नमयी कोष । २ शब्दमय कोष । ३ प्राणमय कोष । ४ आनन्दमय
१ दर्शनशास्त्रमें, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय ये पाँच कोष प्रसिद्ध हैं । कबीर सागर नं. ११ बोध सागर जीव धर्म बोधमें लिखा है कि—“पंचकोष यहि-
कोष । ५ मनोमय कोष । ६ प्रकाशमय कोष । ७ ज्ञानमय कोष । ८ आकाशमय कोष और ९ विज्ञानमय कोष । ये नौ कोषोंके नाम हैं ।
अब इनका संक्षेप विवरण सुनो :-
१. जो अन्नसे उत्पन्न हो और अन्नहीमें फँसा रहे वह अन्नमय कोष कहाता है ।
२-जो शब्दसे उत्पन्न हुआ और शब्दहीमें बन्द रहे वो शब्दमय कोष है ।
३-जो प्राणसे उत्पन्न होकर प्राणमें ही फँसा रहा वह प्राणमय कोष है ।
४-जो आनन्दसे उत्पन्न हो आनन्दमें ही फँसा रहा वह आनन्दमय कोष है ।
५-जो मनसे उत्पन्न हो मनमें ही बन्द रहे वह मनोमय कोष है ।
६-जो प्रकाशसे उत्पन्न होकर प्रकाशमेंही बन्द रहे वह प्रकाशमय कोष है ।
७-जो ज्ञानसे उत्पन्न हो एवं ज्ञानकेही बन्धनमें रहे वह ज्ञानमय कोष है ।
८-जो आकाशसे उत्पन्न हुआ होकर आकाशमेंही बन्द रहा हो वह आकाशमय कोष है ।
९-जो विज्ञानसे उत्पन्न हुआ विज्ञानमेंही बँधा,रहा वह विज्ञानमय कोष है ।
इन नौ कोषोंमें फँसा हुआ पारख पद नहीं पासकता, शरीर छूटतेही पुनः मातृगर्भमें प्रवेश करेगा । ये नौ कोष इस जीवके संकल्पसे हुए हैं । इन नौ कोषों को भली भाँति पहचानकर इन्हें छोड़ दे । पारखगुरुको पहचानकर उसकी ओर झुके, अपनेको पारखगुरुकी कृपाके योग्य बनावे तब पारखगुरु उसपर कृपा करके सब कोषोंके दोष गुण दिखा करके पारखपदपर स्थिर कर देंगे ।
अन्नमय तथा प्राणमयके बीच शब्दमय कोष है प्राणमय तथा मनोमयके बीचमें आनन्दमय कोष है । मनोमय और ज्ञानमयके बीचमें प्रकाशमय कोष है । ज्ञानमय और विज्ञानमय के बीचमें आकाशमय कोष है ।
मनुष्य जब समस्त उद्योग जप, तप, पूजा वन्दना योग समाधि, तीर्थ व्रत, आचार क्रिया इत्यादि जितनी युक्तियाँ हैं उनके और गुरुवोंके द्वारा दृढ़कर थक गया, छुटकारेका कोई पथ नहीं मिला तब इन नौ कोषोंमें उसने अपनी स्थिति की । इन घरोंके अतिरिक्त और किसी घरका पता नहीं लगा तब विवश होकर इन नौ कोषोंमें ही रहने लगा । इसकी कोई युक्ति काम न आई कि, जिससे कि आवागमनकी राह बन्द हो, इसमें किसका दोष है ॥
—विधि पहिचानी । प्रथम, अन्नमय, कोष बखानी ॥” इस तरह पाँचों कोषोंको पहिचान ले, सबसे पहिले अन्नमय कोषका वर्णन करते हैं । इस तरह कबीरपन्थके भी सांप्रदायिक ग्रन्थोंमें ५ ही कोष मिलते हैं । ये शब्दमय, प्रकाशमय, ज्ञानमय और आकाशमय चार और कहाँसे और कैसे बढ़ गये ? यह कबीरपन्थी और दार्शनिकजन अवश्य विचार करेंगे ।
नौ कोषोंका विवरण
१-अन्नमय कोष देह स्थूल । २-शब्दमय कोष देह विराट् । ३-प्राणमय कोष देह लिङ्ग । ४-आनन्दमय कोष देह हिरण्यगर्भ । ५-मनोमयकोष देह कारण । ६-प्रकाशमय देह अव्याकृत । ७-ज्ञानमय देह महाकारण । ८-आकाशमय देह मूल प्रकृति । ९-विज्ञानमय देह कैवल्य ।
१ अन्नमय कोष-जाग्रित अवस्था । क्षिमाभूमिका । पपील मार्ग । पृथ्वी-तत्त्व । रजोगुण । मुद्रा खेचरी । त्रिकुटी स्थानके जठराग्नि । घट आकाश काम जल । प्रध्वंसाभाव । ये इस कोषको हैं ।
२ शब्दमय कोष-स्वयं सिद्धि अवस्था । विराट् देह । पृथ्वी तत्त्व । गुण ब्रह्मा । मुद्रा सम्मुखी । कण्ठस्थान । विविध भूमिका । निर्मर्ग । महद अन-घट । जलपर्व । विम्बाकाश । सत्यलोक स्थान । महाप्रध्वंसाभाव । महाजल । ये इस कोशके हैं । अपना शरीर छोड़कर * योगी लोग दूसरे शरीरमें घर बना लेते हैं । सो शब्दमय कोष है ।
३ प्राणमय कोष-श्रीहठ स्थान । स्वप्नावस्था । सूक्ष्म जल तत्त्व । सतो-गुण । मुद्रा भूचरी । कामाग्नि । मठ आकाश । उद्यान वायु । विहङ्ग मार्ग । लिङ्ग देह ।
४ आनन्दमय कोष-आनन्दमय कोष-हिरण्य गर्भ देह । विशिष्टाद्वैत-भाव । गोलाहठस्थान । विष्णुलोक । मनभूमिका । तुरिया अवस्था (स्वप्न और सुषुप्तिके मध्य) योग अग्नि । रेचक वायु जल मार्ग । चाचरी मुद्रा । विष्णु-गुण । अभराकाश ।
५ मनोमय कोष-कारण देह । हृदय स्थान । सुषुप्ति अवस्था । स्वलिष्टा भूमिका । मन्दाग्नि । महदाकाश । अनन्य भाव कपिमार्ग । मुद्रा उत्मोलिनी । अग्नि तत्त्व । तमोगुण । प्राण वायु ।
६ प्रकाशमय कोष-हेठ पीठस्थान । अव्याकृत देह । शिवलोक । शिवगुण । चित्त भूमिका । प्रातः सन्धि अवस्था । ज्ञान अग्नि । अहम्भाव । पोहर्ष वायु । सूर्य मार्ग । शाम्भवी मुद्रा । चिद् चिद् विशिष्टाकाश । अनिमादिक आठ सिद्धि ।
७ ज्ञानमय कोष-नाभिस्थान । महाकारण देह । शुद्ध सतोगुण । तुरिया अवस्था । सुलिष्टता भूमिका । अत्यन्ताभाव । बड्वाग्नि । समान वायु । मन मार्ग । अगोचरी मुद्रा । चिदाकाश । सविकल्प समाधि ।
- योग शास्त्र विभूति पादके ३८ वें सूत्रमें तो यह लिखा हुआ है कि, चित्तके बन्धनके जो शरीरमें कारण हैं उनके ढीला करनेसे एवं चित्तके जाने आनेके मार्गके साक्षात्कारसे चित्त दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है इसके साथ सभी दूसरे शरीरमें घुस जाते हैं ।