भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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का सुविस्तृत विवरण सुनो। आवरण नाम ढक्कनका है। १-ज्ञानावर्णी कर्म अर्थात्ज्ञानका ढाकेनवाला कर्म। इसके कारण ज्ञान नहीं होने पाता। यह ज्ञानके ऊपर परदा डाल देता है।

ज्ञान पाँच प्रकारका है। १-मतिज्ञान। २-श्रुति ज्ञान। ३-अवधि ज्ञान। ४-मनपरजय ज्ञान। ५-केवल ज्ञान। मति ज्ञान-बुद्धिका है। अर्थात् वह ज्ञान जो बुद्धि तथा सोचसे सम्बन्ध रखता है, इस मति ज्ञानमें समस्त संसारके हुनर तथा कारीगरियों आगई हैं। जिसको मतिज्ञान होता है वह कारीगरी और शिल्पकारीमें बड़ा चैतन्य रहता है। जिस किसीका मतिज्ञान आवर्णी कर्म उगता है, उसको गुणोंका पाण्डित्य प्राप्त नहीं होता। दूसरा श्रुति ज्ञान है, श्रुतिज्ञान समस्त शास्त्रोंके कण्ठस्थ करनेको कहते हैं। कुछ कागज तथा ग्रन्थ इत्यादि देखने की आवश्यकता न हो। सब बातें हृदयमें रहें। शास्त्रद्वारा तीनों कालोंकी बातों को जानता हो उसको श्रुति केवली अथवा श्रुतिज्ञानी कहते हैं। इस श्रुतिज्ञानको जो कर्म रोकले और न होने दे उसका श्रुतिज्ञान आवर्णी कर्मनाम होता है। तीसरा अवधिज्ञान है अवधिज्ञान उसको कहते हैं जिसके द्वारा लोग मनुष्योंके मनकी बातको जान लेते हैं। समस्त गुप्त बातोंको बतलात हैं और अस्तयर्मी कहलाते हैं। जो कर्म इस अवधिज्ञानपर परदा डाले और न होने दे उसको अवधि-ज्ञानावर्णी कहते हैं। चौथा मनप्रजय ज्ञान-मनप्रजय ज्ञान उसको कहते हैं कि, जो हृदयकी गतिको जाने। अर्थात् जहां हृदय दौड़े वह सब कुछ मालूम कर ले। हृदयकी समस्त चाल तथा स्थिरताको बूझले। जो कोई इस प्रकारकी विद्या रखता हो उसको मनप्रजय ज्ञानी जानते हैं। मनप्रजयज्ञानमें यह गुण है कि, जब जिसको यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है वो कभी नहीं जाता। मनप्रजय ज्ञानी अवश्य ही केवल ज्ञानका अधिकारी हो जाता है। पूर्वके तीन ज्ञानोंमें तो सन्देह रहता है क्योंकि वे होते हैं और जाते भी रहते हैं परन्तु मनप्रजयको स्थिरता तथा स्थिति है। मनप्रजयज्ञान अवधिज्ञानसे बहुत बढ़के है। जो कर्म इस मनप्रजय ज्ञानको छिपा लेता है और नहीं होन देता उसको मनप्रजय आवर्णी कर्म कहते हैं। पांचवीं केवल ज्ञान है? यह सबसे बढ़कर है। यह समस्त ज्ञानोंका राजा है, जैनी ऐसा मानते हैं कि, इस केवल ज्ञानसे कोई बात छिपी नहीं रहती। सबसे उच्चक्षेणी यही है। जैनके चौबीस तीर्थंकर सब केवल ज्ञानी हुए हैं। उनके अतिरिक्त और कितने दूसरे साधू भी केवल ज्ञान रखते हैं। इस केवल ज्ञानको जो छिपाये रखे और न प्रकाशित होनेदे उसका नाम केवल-ज्ञानावर्णी कर्म है। दूसरा दर्शनावर्णी कर्म है। जिसके कारण प्रत्यक्षमें दर्शन नहीं होता उसके परदेमें अलख