भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 738

दुखिया होय रैन दिन रोई । भोगी भोग करे सुख सोई ॥

दुर सुख भोग सोग सम जाने । भली बुली कछु मन नहि आने ॥

भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय पावै पर बैरागा ॥

सोंगी अक्षय रैन दिन बाजै । सिद्ध साधु तहैं आसन छाजै ॥

साखी—आसन साधे आपमें, आपा डारै खोय ।

कहैं कबीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥

भावार्थ—इस प्रकार सब जीव बन्धनमें पड़े हैं । कर्मकी फौसी सब जीवों को लगी हुई है । इससे छूटना असम्भव हुआ है । सहस्रों युक्तियाँ करता है परन्तु प्रतिदिन बँधा जाता है । ये तीनों लोक भवसागर (उत्पत्ति सागर) कर्मने बनाये हैं, इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है । यही कर्म उस पर अधिकार कर रहा है । कर्मसे ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी कि, सीमाही नहीं है । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नानाप्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण हैं । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है । कि, जिनका कुछ विवरण हो ही नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है । कोई ऐसे हैं कि, एक बार स्वोंसके आने जानेसे बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्डे हैं ये सब जीव वासनासे भरे हुए हैं । इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुखी सुखी हुआ करते हैं चारों खानिके जीवोंमें न कोई सुखी और न सन्तुष्ट हैं, कर्मोंके बन्धनसे इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है, इसमें प्रायः सच्चे मनुष्यका अभाव है, जीवोंके ही कर्मोंसे प्रेरित होकर ईश्वरको अवतार धारण करना पड़ता है, जीवोंके सुख दुखोंकी व्यवस्था उनके कर्मोंके अनुसार ही होती है, गोपियोंको गोपियोंके कर्मोंके अनुसार तथा कंसको कंसके कर्मोंके अनुसार फल मिला है । साहिबका हंस वही है जो कर्म जालको कच्चे धागेकी तरह काट दे क्योंकि, जबतक अपनेको कर्मोंके बखेड़ेसे नहीं बचाता उस समयतक साहिबके हंसोंमें नहीं संभाला जा सकता इस कारण कर्मोंपर विजय पाना प्रत्येक मुमुक्षुका कार्य होना चाहिये ।

नौ कोष

१ अन्नमयी कोष । २ शब्दमय कोष । ३ प्राणमय कोष । ४ आनन्दमय

१ दर्शनशास्त्रमें, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय ये पाँच कोष प्रसिद्ध हैं । कबीर सागर नं. ११ बोध सागर जीव धर्म बोधमें लिखा है कि—“पंचकोष यहि-