कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 735, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्महि ले बसुदेव घर आवा । कर्म यशोदा गोद खिलावा ॥
कर्महि ते बन गऊ चराई । कर्म ते गोपी कोलि कराई ॥
कौशल्य तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥
कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह बनबासा ॥
कर्म जाय जब धनुष चढ़ावा । कर्महि जनक सुता सिरनावा ॥
कर्म रेखते कोई न मुक्ता । लछिमन राम करम फल भुगता ॥
कर्म हरी सीता कहैं आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥
कर्म सागर बाँधेउ बन्ध कहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥
रुद्र राम की कीन्ह लडाई । भल मिलाप हनू भेंट चढ़ाई ॥
कर्म रेख नहिं मिटे मिटाई । जिव पपील लंका होय आई ॥
कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति बिभीषण भयो ॥
कर्म रेख सबहिन पर छाजा । कहाँ राम कहाँ रावण राजा ॥
कर्म रेख सबहिन पर होई । देखो शब्द बिलोय बिलोई ॥
कर्म रेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हें चीन्हा ॥
साखी—कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।
बिन अक्षर कोई ना छुटे, अक्षर अगम अगाध ॥
रमैनी—सागर भव सागर की धारा । नहिं कुछ सूझे वार न पारा ॥
तहवां बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥
कर्म रेख बँधा सब कोई । खानी बानी देखि बिलोई ॥
वेद कितेब करम कहि गाया । कर्महि को निःकर्म बताया ॥
सद्गुरु मिले तो भेद बतावें । कर्म अकर्म मध्य दिखलावें ॥
कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥
अक्षर सागर निर्भय वाणी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥
गोरख भरथरि गोपीचन्दा । कर्म फाँस सबही पुनि फन्दा ॥
नौ औ सात चौदह एककीसा । ब्रह्मा के चौरासी भेसा ॥
कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहँ लग वेदव्यास कछु भाखा ॥
दस औ द्वादस कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥
कर्म अकर्म भूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥
अक्षर सागर मूल भँडारा । अक्षर मूल भेद उँजियारा ॥
अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥
साखी—कबीर—कर्म डोर चारों युगनि, सुनो सन्त सब दास ॥
तत्वभेद निःतत्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥