भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 725

नूहकी शिक्षा तथा खुदाकी चौकसी किस काम आयी । वह भी कर्ममें स्वतन्त्र न ठहरा । जब बाढ़से सबका सत्यानाशकर चूका तो नूहकी ओर खुदाने ध्यान दिया तब खेद करने और पछ्ताने लगा कि, मैंने सबको बाढ़से क्यों नष्ट किया । कारण यह कि मनुष्योंके ध्यान तो बचपनसेही बुरे हैं अब भविष्यमें मैं बाढ़से लोगोंको न मिटाऊँगा । इससे प्रमाणित हुआ कि, इस खुदाको भी स्वतन्त्रकार्याधिकार प्राप्त नहीं । यदि ऐसा होता तो जब वह आदमका पुतला बनाने लगा तब फिरीशतोंने मना किया कि, आदमका पुतला न बनाओ पाप करेंगे । फिर पृथिवी रोई और कहा कि, मुझसे मिट्टी मतलो मनुष्यका पुतला न बनाओ, मनुष्य बड़ा पाप करेंगे । पर खुदा साहबने किसीका कहना न माना । अपनी इच्छासे मनुष्यका पुतला बनाया । आगे मनुष्योंके पापोंसे रुष्ट होकर बाढ़ लाकर पछ्तताया । फिर मैं कैसे कहूँ कि खुदा साहबको कार्य स्वतन्त्रता प्राप्त थी । हजरत नूहके उपरान्त हजरत इबराहीम अच्छे और पवित्र खुदाके पैगम्बर हुये, वे भी स्वतन्त्र नहीं थे । क्योंकि उनकी शिक्षासे नमरुद बादशाह इत्यादि सभी विरुद्ध हो गये थे । इबराहीमके पीछे इसहाकको पैगम्बरी मिली । इसहाककी स्त्री रबका जब गर्भवती हुई, उसके पेटमें दो बालक थे, वे दोनों पेटके भीतर परस्पर लड़ते थे । तब रबकाने खुदाके निकट जाकर निवेदन किया कि, मेरे पेटके दोनों लड़के आपसमें क्यों फिसाद करते हैं ? तब खुदाने कहा कि, बड़ा छोटेकी सेवा करके बड़ाई पावेगा । फिर इसहाकने ज्येष्ठ पुत्र ईसूको बरकत देनी चाही पर उस बरकतको छोटा पुत्र याकूब ले गया । इसहाककी युक्तिने काम नहीं दिया । देखो मूसाकी पहली पुस्तक २५ बाबका २१-२२-२५ आयत । उसमें ये सब लिखा हुआ मिलेगा ।

इनके उपरान्त हजरत मूसा थे । वह भी अपने कार्योंमें स्वतन्त्र नहीं थे क्योंकि, परमेश्वरने मूसाको मिस्रमें फिर्तूनके लोगोंको सिखलानेके लिये भेजकर यह कह दिया था कि, फिर्तूनके मनको मैं कड़ा करूँगा । वह तेरा कहना न मानेगा । इसके विषयमें मूसाकी शिक्षा किसी काम न आयी । मूसाके पीछे हजरत ईसाने खुदासे बहुत प्रार्थना की कि, मैं सलीबसे बच जाऊँ पर नहीं बचे । इसके पीछे मुहम्मद मुस्तफाने बहुत कुछ बल लगाया । बहुतसा रक्तपात किया तो भी सबको मुसलमान नहीं कर सके । यह सब बात कहकर और लिखी दिखाकर फिर मैंने पादरी साहबसे कहा कि, इन महाशयोंमें तो कोई स्वतन्त्र नहीं ठहरा । कदाचित् आपके नाम अब खुदाई परवाना कार्य स्वतन्त्रताका उत्तर पड़ा हो तो क्या आश्चर्य है ? मेरी बातें सुनकर पादरी महाशय चुप हो रहे और मुखतारीके फेलका दावा छोड़ दिया ।