कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
फाखता या पण्डुक कबूतर प्लेनीका मत
जंगम कर सकता है वो स्थावरोंको जंगमोंकेसे गुण देता है सब उसके हाथ है वो मनुष्यको पशु तथा पशुको मनुष्य बना सकता है ।
पहाड़से ऊँटिनी—कुरानमें लिखा है कि, किसी जातिके लोगोंने साले-दनबीकी सिद्धि देखनी चाही नबीने उनसे कहा कि, खुदा चाहे तो पहाड़से ऊँटिनी पैदा कर दे, उसी समय पहाड़से ऊँटिनी उत्पन्न हुई उसी समय उसने बच्चे दिये । होते ही वे बराबरके हो गये ये सब बाबुलके पास बहुत दिनों तक चरते फिरे थे ।
यह अपनी शक्तिमात्रसे सबकी रक्षा कर सकता है, उसकी शक्तिका कोई ठिकाना नहीं है उसी शक्तिसे सबकी समभावसे रक्षा करता है ।
उपसंहार—अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उसमें अनन्त प्रकार की उत्पत्ति है, उत्पत्तिके अनन्त प्रकारके रूप और स्वभाव हैं उसका हाल किसीको मालूम नहीं। केवल ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । केवल ब्रह्मज्ञानी वहाँ पहुँच सकते हैं ब्रह्मज्ञानीही एक पलमें करोड़ों योजन उड़ जाते हैं, अपनी सामर्थ्यसे दूसरे को भी अपने साथ ले जा सकते हैं । ब्रह्मज्ञानी जिसकी सहायता करते हैं उसका काम पूरा कर देते हैं । ब्रह्मज्ञानी सब कौतुक देख दिखला सकते हैं जैसा कि, नानकसाहब भिन्न २ लोकों द्वीपों ब्रह्माण्डों और पृथिवीको सँर करते फिरते थे, उस समय एक ऐसे स्थानपर पहुँचे जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई पुरुष, न था। उनकी उत्पत्ति आश्चर्य रीतिसे है । यह बात नानकसाहबके सफरनामे में कहीं लिखी हुई हैं । ज्ञानीलोग बड़े उड़नेवाले हैं, जहाँ चाहें वहाँ उड़कर चले जावें पर कोई २ ऐसे सुकर्मों भी संसारमें हैं जिनमें उड़नेकी सामर्थ्य नहीं ईश्वरकी कृपा उनको आसमान पर ले जाती है, जैसे कबीर साहब मुहम्मद साहबको ले गये। वाइबुलमें लिखा है कि, एक अरेशा नामक पुरुष शरीर सहित आसमान पर उठाया गया हजरत ईसा भी देहसहित आसमान पर गये, ऐसे सहस्रों पुरुष, परमात्माकी कृपासे देहसमेत ही जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हैं ।
राजा युधिष्ठिर भी देह सहित धर्मलोक गये । यह कथा महाभारत आदिमें प्रसिद्ध है, कबीरपन्थके उपग्रीता नामक ग्रन्थमेंभी लिखी है ।
यह तो पुरानी बातें हुई, अब आजकलकी बात सुनो, १८९७ ई० में फरीदकोटमें गेंदाराम नाम का एक अन्धा ब्राह्मण रहता था । तब मैं भी भ्रमण करता हुआ फरीदकोट आकर ठहरा, वह सत्संग का बड़ा अभिलाषी था, मेरे पास नित्य आया करता था ठाकुरजीकी पूजा बड़े प्रेमसे किया करता था । वो अन्धा होनेपर भी अच्छा पंडित था, उसके पास अनेकों विद्यार्थी पढ़ते थे । वो
हुद हुदपर कुरान, कप्तान वाउन जर्मनी और फ्रांसके कबूतर मैना
जाति स्मर था. अपने अन्धे होनेके बारेमें कहा करता कि, मैं दक्षिण भारतमें एक अच्छी रियासतका दीवान था राजाको राजनीतिकी शिक्षा देता था, बिना राजा-जाके कोई काम न करता था। एक दिन एक बलात्कारका अपराधी आया-राजाके पूछने पर मैंने कहा कि, उसे आँखोंसे अन्धा कर दो. वो पापी अन्धाकर दिया गया. उसी दिनसे मैं अन्धा हो गया हूँ क्योंकि, ऐसा दण्ड अनुचित था।
एक बार वो तीन दिनतक गायब रहा चौथे दिन प्रकट होनेपर उसने कहा कि, मुझे विष्णुके पारषद विष्णुलोक को लिये जाते थे मैंने पूछा कि, कहाँ लिये जाते, हो तो उत्तर मिला कि, वैकुण्ठ लिये जाते हैं, मैंने अपने घरवालोंसे मिलनेकी इच्छा प्रगट की दूतोंने मुझे सवासन जानकर लौटा दिया।
इस घटनाके बाद वो ब्राह्मण तीन माह और जीवित रहा पीछे वैकुण्ठ चला गया।
इस प्रकरणके लिखनेका मेरा यही अभिप्राय है कि, जो लोग पशु पक्षी आदिको अर्किचित्कर मानते हुये अपने मनुष्य होनेपर इतराते हैं। वे जान लें कि. जो बातें उनमें हैं वो जानवरोंमें भी पाई जाती है। सबमें इश्वरीय बातें समान हैं जो काम मनुष्य देहसे करते हैं वेही काम पशु पशुतनसे कर लेते हैं आकृतियाँ जुदी २ हैं बस्तु एकही है सबमें आत्मा है तथा परमात्माकी दृष्टिमें सब समान हैं।
दूसरा मेरा यह भी प्रयोजन है कि, जो लोग आवागमनको न मानकर अनेकों पापोंमें लगे हुये हैं, वे जानलें कि, वे कर्मवश हैं जैसे कम्मेंने मानवीशरीर प्रस्तुत कर दिया है उसी तरह कीड़ा मकोड़ा भी बना देगा इसमें कयामत आदिकी आवश्यकता नहीं है केवल कर्मही कारण है. यदि लोगोंने मेरे लेखसे लाभ उठाया तो मैं मेरे भ्रमको सफल होऊँगा जो अपनेको आवागमनके फन्देसे बचावेगा वही श्रेष्ठ है नहीं तो आवागमनके फन्देमें फसे रहनेवाले सभी समान हैं।
अध्याय २०.
अथ आदि मंगल।
दोहा— प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥
दूजा केहि विधि ऊपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥
आदि मंगलका अर्थ।
धर्मदासजी कबीर साहिबसे पूछते हैं कि, प्रथमै-चैतन्याकाशमें पड़े हुये साहिबके लोकके प्रकाश स्वरूप जो समष्टि जीव हैं। उनके संसारी बननेके
चोर मैना, रोम सेन साहिब तोता
पहिले, आप-सभोंके गुरु, समरथ-सर्वेश्वर सत्य पुरुष ही रहे-थे । सत्य पुरुष अथवा उसके पूर्वोक्त प्रकाशके सिवा, दूजा-दूसरा, कोई-कोई, न-नहीं, रहा-था । दूजा पूर्वोक्त समष्टि जीव, केहि-किस, विधि-तरहसे, ऊपजा-संसारी हुआ । गुरु-हे गुरुजी महाराज ! सोइ-वही, मैं पूछत हूँ-पूछता हूँ ।
यानी सत्यपुरुष भगवान् रामका लोक और वहांके पार्श्व आदि निवासी भगवान् रामही हैं उनसे भिन्न नहीं हैं, उनके लोकका जो प्रकाश चैतन्याकाशमें है वही समष्टि जीव है । यह किसी तरह भिन्न तथा व किसी तरह एक है । धर्मदासजीका कबीर साहिबसे यही प्रश्न है कि, भगवान्का ऐसा प्रकाश यह जीव संसारी कैसे होगया यह मुझे बताइये । वेदान्तकी दृष्टिसे तात्पर्य-सृष्टि रचनाके पहिले एक अद्वितीय सत्यपुरुषही था ये सब जीव उपकरण रहित पड़े थे, नामरूपात्मक जगत् नहीं था यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ मैं आपसे यही पूछता हूँ ॥ १ ॥
तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ॥
आदि अन्तकी परिचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥
तब-शिष्यका प्रश्न सुनकर, सतगुरु-सच्चे गुरु कबीर साहिब मुख-मुंहसे, बोलिया-बोले कि, सुजान-ऐ परम बुद्धिमान्, सुकृत-संस्कारी-जीव धर्मदास, सुनो-सुन लो । मैं तोसों-तुमसे, आदि-संसारी नाना जीव होनेसे पहिलेकी और अन्तकी, सबसे पीछेकी, पारचै-परखी हुई बात, कहौं-कहता हूँ ।
कबीर साहिबने धर्मदासजीका प्रश्न सुनकर बताना आरम्भ किया कि, आदिमें क्या था और कैसे संसारी हुआ किस तरह इसका उद्धार हो सकता है यह सब मैं तुम्हें सुनाये देता हूँ तुम सावधानीके साथ सुन लो ॥ १ ॥
प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ॥
ताते जामन दीनिया, सात करी विस्तार ॥ ३ ॥
समरथ—भगवान् रामचन्द्रजीने, प्रथम-पहिले, समष्टि जीवको अचेत पड़ा देखकर उनके कल्याणके लिये, घटमें-जीवके भीतर, सुरति-चैतन्यताका, सहज-अपने आपही, उच्चार-संचार, कियो-कर दिया, ताते इस सुरतिके कारणही, जामन-जीवपना जमानेवाली वस्तु, दीनिया-दे दी, इसके बाद जीवने, सात-इच्छा आदिक सातका, विस्तार-फैलाव, करी-दिया ।
अपने अंशरूप जीवोंकी दशा देखकर उनके उद्धारके लिये भगवान्ने उन्हें चैतन्यता दे दी साधन तो उद्धारका था पर इसने अपनेको संसारका पथिक
निशानेबाज और लिपिके जानकारी राजा रसालुके तोता मैना
बना डाला, यही इसमें जामन लग गया तब इस समष्टि जीवने सातोंका विस्तार किया। वे सात वस्तु कौनसी हैं इन्हें अगिले वचनमें बताते हैं ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चित्त मन सातों कीन्ह ॥
सात रूपनि रमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
घट-जीव समष्टिमें, दूजे-सुरति होनेके बाद, इच्छा-में एक हूँ, अनेक हो जाऊं यह इच्छा, भई-होगई। इसके बाद, चित्त-चित्त, मन-मन तथा बुद्धि-अहंकार, मैंही ब्रह्म हूँ यह अनुभव और जीव ये, सातों-सात, कीन्ह-किये। सात रूपनि-इन्हीं सातों रूपोंमें, रमाइया-सब रम गये, काहु-किसीने भी, अविगत-नहीं जाननेवाला समर्थ, न-नहीं, चीन्ह-जाना।
जीव समष्टिको सुरति मिलनेके बाद अनेक होनेकी इच्छा हुई। इसके बाद उसे क्रमशः चित्त, मन बुद्धि, अहंकार और मैं ब्रह्म हूँ यह अनुभव हुआ। तथा उसीसे जीव भी हो गया ॥ ४ ॥
तब समरथके श्रवणते, मूलसुरति भइ सार ॥
शब्द कला ताते भई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
तब—उसके बाद, समरथके—भगवान् राम के, श्रवणते—रामनाम सुननेके कारण, यही, मूल सुरति—राम नामकी सुरति, सार (मुख्य रूप), भइ-हुई। ताते—इसी राम शब्दसे पाँच-पाँच, ब्रह्म-ब्रह्मोंके, अनुसार-अनुकूल, शब्दकला-शब्दके टुकड़ोंसे नाम, भई-हुए।
चैतन्यता देनेके बाद समष्टि जीवसे कहा कि, राम नामको जपिके मुझे पहिचान ले, मेरे हंसोंमें हो जानेके बाद मैं तुझे अपने लोकमें बुला लूंगा पर समष्टि जीवने इसका विपरीत अर्थ समझा उसके असली अर्थ छोड़कर र् का परा १ आद्या शक्ति, अ का ओम् २ अक्षर, आ का ३ नारायण, ४ म् का संकर्षण, आदि पुरुष, विराट्, हिरण्यगर्भ और अ का-५ महाविष्णु मतलब निकाल लिया एवम् इसका वास्तविक र्-जानकी, र-राम, आ-भरत, म्-लक्ष्मण और अ-शत्रुघ्न तथा रं का-हंस अर्थ होता है यह न समझ सका। तथा उसकी बुद्धिमें यही आया कि, मेरे किये अर्थ असली अर्थके अंश मात्र हैं अंशी नहीं हैं ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचें अंड धारे, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइ इच्छा तहें गुप्त हैं, सो सुकृत चित चीन्ह ॥ ६ ॥
पाँच-पाँच, अण्ड-स्वरूप, धरि-बनाकर, एक एकमा—एक एकमें, एक एक करके, पाँच-पाँचौ ब्रह्म, कीन्ह-कर दिये। तहें-तहां, दुइ-दो, इच्छा-
रसालुका अन्तर्दृष्टि तोता
एक तो कारणरूपा इच्छा जो समष्टि जीवमें सुरत देनेसे पहिले थी जिसने कि, इसे जगत् मुख किया । दूसरी वह इच्छा जिससे कि, सुरति पाकर अनुभव ब्रह्म खड़ा किया यही माया परा शक्ति है इस प्रकार ये दो इच्छाएं हैं ये, गुप्त-छिपी हुई, हैं-हैं । कृत-हे धर्मदास । सो उन्हें, चित-दिलमें, चीन्ह-जान लो ।
पांचों ब्रह्मोंके लिये पांच स्वरूप तयार करके एक २ को एक २ में स्थापित कर दिया उसमें दो इच्छाएं गुप्त हैं हे धर्मदास ! तुम उन्हें जानलो । संकर्षण, परा योगमाया, शब्द ब्रह्म, नारायण और महा विष्णु ये पांच ब्रह्म हैं इनमें उक्त दोनों इच्छाएं छिपी हुई हैं ॥ ६ ॥
योगमाया यकु 'कारण, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥
या अविगति समरथ करी, ताहि गुप्त करि दीन्ह ॥ ८७ ॥
योग माया-एक तो योग माया, और यकु-एक, कारणे-एक कारण जगत्मुख करनेवाली इच्छा ये दो इच्छाएं हैं । ऊजे-उन्होंनेही, अक्षर-ब्रह्म, कीन्ह-किया, अविगति-समझने न पानेवाले, समरथ-समर्थ श्री रामचन्द्रजीने, या-यह, करी-किया, ताहि-उस इच्छाको, गुप्त-तिरोहित, करि-कर, दीन्ह-दिया ।
एक तो परा आद्यायोगमाया तथा दूसरी कारणरूपा इच्छा है जिसके कारण समष्टिजीव संसारी बनता है इन्होंनेसे उक्त पांचों ब्रह्म बने हैं । भगवान् रामने इन इच्छाओंको गुप्त कर दिया है । इस कारण ये भी नहीं समझ पाये ॥७॥
शवासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ सन्त सुजान ॥ ८ ॥
सोहम्-अनुभव गम्य ब्रह्म मैं हूं यह, शवासा-समष्टिजीव आदि पुरुषके श्वाससेही, ऊपजे-उत्पन्न होता है इसीने, अमी-अमृत जैसे प्यारा लगनेवाली वस्तुका, बन्धन-बन्धान, कीन- किया । उसके आठ अंश-आठ भाग निरमाइया-बनाये, सुजान-हैं परमबुद्धिमान्, सन्त-महापुरुषो, चीन्हो-पहिचानो ।
समष्टिजीव आदि पुरुष हिरण्य गर्भके श्वाससे सोहंकी उत्पत्ति होती है इसीने मीठी वस्तुका बन्धन कर दिया कि, इनके बन्धनमें लोग बन्धे रहें उसके अणिमा आदिक आठ भेद किये । ए सत्य सुजानो ! यह जान लो इनके बखेंडेमें मत पड़ो । ये आठों सिद्धियां योगशास्त्रमें प्रसिद्ध हैं । ये बड़ी सिद्धियां थोड़ेही समयमें नष्ट हो जाती हैं ॥ ८ ॥
लंगड़े तोतेकी बातें
तेज अण्ड आचिन्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अण्ड शिखा पर बैठिके अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
आचिन्त्यका—चिन्तनमें न आनेवाले रामका, तेज, अण्ड—अण्डेकी सूरतमें कल्पित किया गया जो तेज रेफ उसका माया मुख अर्थ जो पराशक्ति है उसने, सकल-सारा, पसार—फँलाव, दीन्हों—कर दिया, वही अण्ड-ब्रह्माण्डकी, शिखापर—चोटीपर, बैठिके—बैठकर, अधर—नीचेकी ओर, दीप—प्रकाशका, निरधार—निर्माण किया ।
रके जगत मुख अर्थ पराआद्या शक्तिने सारे संसारको बनाकर खड़ा कर दिया वही इस ब्रह्माण्डकी चोटीपर बैठकर नीचेके लोकोंको प्रकाशित कर रही है ॥ ९ ॥
ते अचिन्तके प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
ते-उस, अचिन्तके—भगवान् रामके नाम, प्रेमते—प्रेमके कारण, सार—सबमें प्रधान, अक्षर-ओम्, उपज्यो-उत्पन्न हुआ, उसके, चारि-चार, अंश—भाग, निरमाइया—निरमाण—किये, उसीसे चारि-चार, वेद-वेदोंका, विस्तार—निर्माण हुआ ।
रामनामके जानने की चिन्तासे इसीसे ओम् शब्द प्रकट हुआ, यही सार अक्षर है इसके अ, उ, म् और बिन्दुसे चार वेद उत्पन्न हुए ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वे समरथ अविगति करी, मर्म कोई नहिं जान ॥ ११ ॥
तब—इसके बाद, योगमायाने, अक्षरका ओम् शब्दवाच्य ईश्वरको नींद—निद्रा, मोह-असावधानी, और अलसान—आलस्य, दीनिया—देदिये वे वेदोंने, अविगति—नहीं समझमें आनेवाले, समरथ—समर्थ भगवान् रामकी स्तुति, करी—की है, पर कइ—कोई, मर्म—इस तात्पर्यको, न-नहीं, जान-जानता ।
योगमायाने ईश्वरको नींद मोह और आलस्य देदिया, वेदोंने भगवान् रामकी बड़ी प्रशंसा की है पर इसे कोई समझ नहीं सकता सब माया मुख अर्थ करके भूल रहे हैं ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींद गै, देवी सुरति निरवान ॥
श्यामवरण यक अंड है, सो जलमें उत्तरान ॥ १२ ॥
एक चालाक तोता हृष्य देशका तोता, झिङ्कीकी नकल तोतेकी ईर्ष्या
जब—जिस समय, अक्षरके—अक्षरपदवाच्य नारायणकी, नींद—निद्रा गे—चली गई, तब, निरबान्-निराकार, सुरति—चैतन्य, दबी—सबमें प्रविष्ट हुआ, श्याम वरण-श्याम रंगका चतुर्भुजी, यक—एक, अण्ड रूप, है— होकर—सो, वह, जलमें—पानीमें, उतरान—रहने लगा ।
अक्षरपदवाच्य नारायण भगवान्को योगमायाने जगा दिया वह श्यामल कोमलांग चतुर्भुजी होकर पानीमें निवास करने लगा ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
अक्षर—नारायणके, घटमें—नाभिमें, ऊपजे—कमल उत्पन्न होता है, उससे अण्डा—यह ब्रह्माण्ड, किन—किसने, निरमाइया—बनाया, अण्डका—इस, अण्डेका, मूल—जल, कहाँ कौनसी जगह है. इस, संशय—सन्देह रूपी, शूल कांटेसे व्याकुल—घबरा गया ।
नारायणकी नाभिके कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ उसे सन्देह हुआ कि, इस ब्रह्माण्डको किसने बनाया, एवं इसकी जड़ कहाँ है ॥ १३ ॥
तेही अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दश द्वारे कढ़ि बाप ॥ १४ ॥
तेही—उसी, अण्डके—ब्रह्मारूपी पिण्डके, मुखपर—मुंहपर, शब्दकी—वेदोंके सारका, छाप—चिह्न, लगी—लगा, अक्षर—समष्टि जीवकी, दृष्टिसे—जगत् मुख, दृष्टिसे, बाप—मायाशबलित ब्रह्म, दश—दश, द्वारे—इन्द्रियोंसे, कढ़ि—निकलकर, फूटिया—फँल गया ।
नारायणने ब्रह्माको ओम्का उपदेश दिया ब्रह्माने उसका जप किया उसीसे चारों वेदोंका प्राकट्य हुआ । वेदोंका भी जगत् मुख अर्थ देखा गया उस समय माया शबलित ब्रह्म दशों इन्द्रियोंका विषय और इन्द्रिय बनकर बाहिर निकल संसार बन गया ॥ ४ ॥
तेहिंते ज्योति निरज्जनौ प्रकटे रूपनिधान ॥
काल अपरबल वीर भा, तीन लोक परधान ॥ १५ ॥
तेहिंते—उसी, रामनामसे, रूपनिधान—रूपके खजाने, निरंजनौ—माया रहित ज्योति महाविष्णु, प्रकटे—उत्पन्न हुए येही, तीन—तीनों, लोक—लोकोंमें, परधान—मुख्य, अपरबल—अमित बलवाले, वीर—बलवान्, काल—काल, भा—हुए ।
इसी नामसे विरजा पार निवासी श्री महाविष्णु भये ये मायासे परे हैं
ईर्ष्यसि हत्या, स्वाद तोतेकी चोरी पर आश्चर्य सरायका तोता
माया तो विरजाके इसी पार रह जाती है तीनों लोकोंमें येही मुख्य हैं इनके बलकी कोई तुलना नहीं है ये यमोंके भी यम हैं काल भी इनके भयसे काम करता रहता है ॥ १५ ॥
ताते तीनों देवभय', ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारि खानि तिन सिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
ताते-उससे, ब्रह्मा-ब्रह्माजी, विष्णु-विष्णुजी, महेश-महादेवजी, ये तीनों-तीन, देव-देवता, भे-हुए, तिन-इन्होंने, मायाके-मायाके, उपदेश-बलसे, चारि-चारों, खानि-स्वेदज आदि, सिरजिया-रचा दिये ।
काल पायकर ब्रह्मा विष्णु और महेश उत्पन्न हुए इन्होंने मायाके बलसे चारि खानि चौरासी लाख जीव बना दिये ॥ १६ ॥
चारि वेद षट् शास्त्रउ, औ दश अष्ट पुरान ॥
आशा दै जग बांधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
चारि-चारों वेद-वेद, औ-और, दश-दश, अष्ट-आठ, पुरान-पुराण, और षट्शास्त्र-छओ शास्त्रोंने, ऊ-भी, आशा-आश, दै-देकर, जग-संसारको, बांधिया-बांध दिया, उसमें, तीनों-तीनों, लोक-लोक, भुलान-भूल गये ।
चारि वेद, अठारह पुरान और छओ शास्त्रोंकी मायाने जीवोंको आशा देकर बांध दिया इसीमें तीनों लोकोंके प्राणी भूल रहे हैं ॥ १७ ॥
लख चौरासी धारमाँ, तहाँ जीव दिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारि वेद विश्वास ॥ १८ ॥
लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धारमाँ-धारामें, तहाँ-उस जगह, जीव-जीवोंको, बास-निवास, दिया-दिया, जहाँ कि, चौदह-चौदह, यम-यमराज, रखवारिया-निगरानी करते हैं, और चारि वेद-चारों वेदोंका, विश्वास-विश्वास है ।
इस चौरासी लाख योनिकी धारावाले संसारमें इस जीवको उस जगह निवास दिया गया है कि, जहाँ चौदह यम इसकी निगरानी करते हैं एवम् यह चारों वेदोंका यथार्थ अर्थ न समझकर इतस्ततः विश्वास करते हैं ॥ १८ ॥
आपु आपु सुख सब रमें, एक अंडके माहिं ॥
उत्पत्ति परलय दुःख सुख, फिरि आवहिं फिरि जाहिं ॥ १९ ॥
एक एकही, अण्डके-ब्रह्माण्डके, माहिं-भीतर, आपु आपु-अपने अपने, सुख-आनन्दमें, सब-सारे जीव, रमें-रम रहे हैं, इस कारण इसीमें, उत्पत्ति-
अभ्यागतोंसे बात ट्रापर बातें, विलीयमका तोता तोता नामा बुलबुल
सृष्टिकी रचना होती है, इसीसे, परलय-प्रलय होता है, सुख-आनन्द और दुःख-कष्ट, इसीमें हैं, फिर वारंवार, आवै-जन्म लेते हैं, फिर-वारंवार, जाहि-मरते हैं ।
एकही ब्रह्माण्डके भीतर अनेक तरहके प्राणी अपने २ सुखके लिये आप प्रयत्न कर रहे हैं । उत्पत्ति, प्रलय, सुख, दुःख, जन्म और मरण सब इसीमें हैं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसो कहिदेत ॥ २० ॥
तेहि-उसके, पीछे-पीछे, हम-मैं, सत्य-साचे, शब्दके-रामनामके, हेत-कारन, आइया-आये । आदि अन्तकी सर्व प्रथम रामनामके जगत् मुख अर्थसे संसारकी तथा रामनामके यथार्थ अर्थ जानकर साहिबके लोकमें गमन की । उत्पत्ति-प्राप्ति, जैसे हुए, सो-वही, तुमसों-तुमसे, कहि-कहे, देत-देत है ।
उद्धारके लिये दिये गये रामनामका उलटा अर्थ देखकर हमें भगवान्ने भेजा जिस तरह जगत् हुआ एवं जैसे हमारे बताये हुए अर्थका अनुसंधान करनेसे साहिबके लोकको चला जाना होता है यह सब बात हम तुमसे कहे देते हैं ॥ २० ॥
सात सुरति सब मूल है, प्रलयहु इनहीं माहि ।
इनहीं मासे उपजे, इनहीं माहि समाहि ॥ २१ ॥
सब-सबका, मूल-मुख्य कारन, सात सुरति-पहिले बताई हुई सात सुरति हैं, प्रलयहु-प्रलय भी, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर है, इनहीं-इन्हींके, मासे-भीतरसे, उपजे-उत्पन्न होता है, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर, समाहि-लय हो जाते हैं ।
दोनों इच्छाएं तथा पांचही सबके मूल कारण हैं इन्हींसे उत्पत्ति होती है एवम् प्रलय भी इन्हींमें हो जाता है ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथ कर, रहे सो अछप छपाई ॥
सोई संधि लै आइया, सोवत जगहि जगाई ॥ २२ ॥
सोई-वही यह समष्टि जीवने, समरथ-अपनेको समर्थका, ख्याल-ध्यान, कर-कर लिया । सो-वे, अछप-न छिपनेवाले, इसकी दृष्टिसे, छपाइ-छिप, रहे-गये । सोई-उसी, सन्धि-बीचके, समाधानको, लै-लेकर, आइया-आया, सोवत-सोते हुए, जगहि-संसारको, जगाइ-जगानेके लिये ।
समष्टि जीवने अपनेको सब कुछ मान लिया इस कारण व्यापक राम इसकी दृष्टिसे ओझल हो गये । जिस सन्देहमें जीव पड़ गया है मैं उसीका
बुलबुलोंकी मानुषी वाचा चण्डूल और सांप
समाधानको लेकर मैं आया हूँ कि, संसारी प्राणियोंको असली अर्थ बता दूँ जिससे सबका उद्धार हो जाय ॥ २२ ॥
सात सुरतिके बाहिर, सोरह संखिके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥ २३ ॥
सात-सातों, सुरतिके-सुरतियोंके, बाहिर-बाहिर, और सोरह-सोलह, संखिके-संख्यक कलाओंके, पार-किनारेपर, तहैं-वहाँ, समरथको-समर्थ श्रीराम भगवान्का, बैठका-बैठनेकी जगह है, वही हंसनकेर-हंसोंका, अधार-आधार है ।
जहां सातों सुरति नहीं पहुँच सकती, जहां सोलहों कलाओंकी कोई कहानी नहीं है वहां भगवान् राम विराजते हैं वही भगवान्के हंसोंका आधार है ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनै हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
हम-हमने, सबसों-सभीसे, घर घर-घर घर जाकर, कही-कह दी, पर, हमार-हमारा, शब्द-रामनामका अर्थ कोई, न-नहीं, सुने-सुनता, ते-वे, लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धार-धारावाले, भवसागर-संसार सागरमें, डूबहीं-डूबेंगे ।
हमने घरघर जाकर रामनामका असली अर्थ बताया है पर हमारे कहेंको कोई नहीं सुनता इस कारण न सुननेवाले अज्ञानी चौरासी लाख योनियोंकी धारवाले संसार सागरमें अवश्य डूबेंगे ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥
इति आदि मंगल ।
उत्पत्ति आदिका-उत्पत्तिकी आदिके, मङ्गल-मङ्गलको, ऐ सुजान-ज्ञानवान, सन्त-महात्माओ, सुनियो-सुन लीजिये । कबीर-कबीर साहिब, कह-कहते हैं कि, गुरु-सबके गुरु, जाग्रत-निभ्रान्त, समरथ-समर्थ श्री राम-चंद्रजीका, फुरमान-कहन है ।
कबीरसाहिब कहते हैं कि, हे ज्ञानवान महात्माओ ! मैं उत्पत्तिकी आदिके मंगलको कहता हूँ यह कोई मेरी ओरसे बना हुआ नहीं है किन्तु मायारहित सबके गुरु श्रीरामचन्द्रजी महाराजका ही यह कथन है वही मैंने आपको सुना दिया है ॥ २५ ॥
सार-भगवान् रामने जीवोंके उद्धारके लिये समष्टि जीवको चैतन्यता दी पीछे उसे उपदेश दिया कि, तुम रामनामका अर्थ समझ लो इसीसे मेरे हंसोंमें हो जाओगे मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा । राम शब्दके 'र' का जानकी 'र'
विचित्र कर्तव्य
का श्रीराम, 'आ' का भरत, 'म्' का लक्ष्मण, 'अ' का शत्रुघ्न, हंस यह असली अर्थ है पर समष्टि जीवमें जो कारणरूपा इच्छा थी, उससे इसने इन नामका कुछका कुछ अर्थ समझा । 'र' का परा आद्या योगमाया, 'अ' का अक्षर, 'आ' का नारायण 'म्' का संकर्षण और 'अ' का महाविष्णु अर्थ समझा । यही समस्तकर यह संसारी हो गया । वास्तवमें असली अर्थोंके भ्रामिक अर्थ अंश हैं जो अंशीके रूपमें समझे जा रहे हैं । कारणरूपा अविद्याने इतनाही कार्य नहीं किया किन्तु चित्त मन बुद्धि तथा मैं ब्रह्म हूँ इस अहङ्कार को भी पैदा किया, इसी अहङ्कारने एकसे अनेक होनेकी इच्छा प्रकट की । इस तमास बखेड़में दो इच्छाएं काम कर रही हैं, पहिली तो कारणरूपा इच्छा जिसे कह चुके हैं, दूसरी योगमाया है इसीने संसारको रच दिया यही प्रकाशित कर रही है । मैं ब्रह्म हूँ उस अनुभवसे होने वाला ब्रह्म समष्टि जीवके श्वासके पैदा हुआ । उसीने अष्ट सिद्धियाँ तथा काली आदि आठ ईश्वरोंको उत्पन्न किया । सत्यपुरुषने उद्धारके पथका जगत् मुख अर्थ देखकर मुझे भेजा कि, रामनामका सन्ध्या अर्थ बताकर संसारका कल्याण करूँ मैं रामनामका सन्ध्या अर्थ समझाकर लोगोंका कल्याण करने आया हूँ जो मेरा कहना मान लेगा उसका उद्धार हो जायगा जो न मनेगा वो संसारमें भटकता फिरेगा ॥ ॥ इति आदि मङ्गल ॥
जीव हत्या और मांस मदिराका निषेध ।
निकृष्ट घृणित पदार्थोंसे मन लगानेवालेको कभी भी प्रकाशका मार्ग न मिलेगा । जिस प्रकार कालिससे जल काला हो जाता है उसी प्रकार घृणित पदार्थोंके ग्रहणसे अन्तःकरण अशुद्ध एवं शुद्ध पदार्थोंके खानेसे स्वच्छ और ज्ञानमय हो जाता है । जो लोग अपने अन्दर घृणित वस्तुओंको डालते हैं, उनके अन्तःकरणकी शुद्धि होनी असम्भव है, वे कभी भी सत्यगुरुके मार्गको नहीं पा
१ इस आदि मंगलमें कबीर साहिबके अवतार धारण करनेका प्रयोजन एवं कबीर दर्शन अत्यन्त सावधानीके साथ कहा गया है तथा इतना गूढ़ कि, कबीर साहिबके आज्ञाकारी हंस श्री विश्वनाथजी देव महाराज रीवाँकी टीकाके बारम्बार पथ्यालोचन करनेसे भी जलदी ध्यानमें नहीं आता इस कारण अनुवादकने इसका अर्थ साथही साथ कर दिया है ।
यद्यपि अनुवादक कबीर साहिब तथा साहिबके हंसोंकी वाणीको समझनेकी कोई शक्ति नहीं रखता पर यह इस तुच्छ हृदयमें उन्हींकी प्रेरणा हुई है जिससे उक्त अर्थ किया गया है । यदि कोई चूक हो तो भी भक्तजन केवल श्रद्धापर ध्यान देकर क्षमा कर देंगे । केवल इतनाही लक्ष्य है कि, कबीर साहिब के अक्षरों की और कबीर पन्थी तथा दूसरों भावुकों का पूरा ध्यान हो ।
समझदार चिड़िया थसकी बोली, मुर्ख सीना, बड़ी आवाबील सांप निकालनेवाली, रेल
सकते, न उनका मनही कभी निश्चल हो सकता है। मनुष्यके खाने पीनेके लिये जो शुद्ध पदार्थ नियत किये गये हैं, उनको खाने पीनेसे अन्तःकरण शुद्ध होता है। यद्यपि जड़ और चैतन्यमें एकही आत्मा है तो भी अङ्गुरजका भक्षण शुद्ध है। पाशुविक भोजनसे मन शुद्ध नहीं हो सकता पशु और मनुष्य दोनों भाई हैं, इस कारण, अपने भाईका मांस मत खाओ, भाईको मत मारो, उसका रक्त पात न करो, उसको दुःख देनेसे नरककी राह खुलेगी, सुख शांतिका मार्ग एकदम बन्द हो जावेगा; सत्यगुरु कभी कृपा भी न करेंगे।
मांस खाना और शराब पीना, अपने भाइयोंके रक्तपात करनेके बराबर है इसका बदला अवश्य देना पड़ेगा। जिस प्रकार मां, बहन, बेटो और स्त्री चारोंका रूप एकही है पर उनमें अपनी विवाहिता स्त्रीहीसे सम्भोग करनेकी आज्ञा है। दूसरीकी ओर दृष्टि उठाना भी महापाप है तब जो कोई अपनी विवाहिता स्त्रीके अतिरिक्त दूसरोंपर दृष्टि करेगा, वह अवश्य घोर नरकका वासी होगा। इसी तरह मनुष्यके खाने योग्य अंकुरज पदार्थ, भक्षण किये जाय तो अन्तःकरण अशुद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि, वे मनुष्यके मुख्य भोजन हैं, भोजन किये बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। इस कारण भोजनको कुछ चाहिये। अशुभ कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ेगा, फल भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता। कबीर साहिबने कहा है कि
साखी—कबीर कमाई आपनी, कभी न निषफल जाय।
सात समुन्दर आडा पड़े, मिले अगाऊं धाय ॥
संस्कृतके अनेक योग्य पुरुषोंके वचन है कि—“अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्” किये कर्म अवश्य भोगने पड़ेंगे चाहे सात समुद्र बीचमें आजाय पर भोग नहीं टाल सकता।
बदलेपर दृष्टान्त—एक अङ्ग्रेजी समाचार पत्रके १८७९ के दिसम्बरके परचेमें लिखा था कि, अमेरिका देशका एक कसाई बहुत बीमार पड़ा, समस्त शरीरमें सूइयां चुभानेके समान कष्ट, होने लगा वह बहुत कुराने लगा। कष्टके मारे बहुत दुःखी हुआ, पर प्राण न निकले, उसी दशामें उसने जिनका बध किया, था, उन जीवधारियोंकी बहुत भयानक स्वरूपसे अपना बदला लेने उपस्थित देखा। उनके भयानक दृश्यको देखकर बहुत भयभीत हुआ. अनुमानकर लिया कि जिन जीवधारियोंका मैंने बध किया है वह मुझसे बदला लेने आये हैं।
वह उनसे बचनेका उपाय शोचने लगा. पर कोई न सूझा, अन्तमें अपने कमाईके दो लाख रुपयोंके नोटोंको इस विचारसे जला दिया कि, यह मेरे
पफन, कासबीक, भुजंगा
पापकी कमाई है। यदि इनको छोड़ जाऊगा वा किसीको दे जाऊगा तो भोगने-वाला भी मेरेही समान कष्टमें पड़ेगा, उस समय उसका प्राण निकल गया ।
अभक्ष्यपर कबीर साहिब ।
अभक्ष्य निषिद्ध एवं घृणित पदार्थोंके विषयमें कबीर साहबकी अनगिनित साखिया तथा अनन्त शब्द प्रचलित हैं उनमेंसे थोड़ासा यहां भी लिख देता हूँ जिससे लोग जान जायें कि, कबीर जैसे निष्पक्षपातीभी इसको कितनी बुरी दृष्टिसे देखते थे ।
कबीर— मांस अहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जानि ।
ताकी सङ्गति मति करो, होय भगतिमें हानि ॥ १ ॥
कबीर— मांस खायते ढेर सब, मद पिये ते नीच ।
कुलकी दुरमति परिहरै, राम भजेतेँ ऊँच ॥ २ ॥
कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर नरकहिं जायंगे, माता पिता समेत ॥ ३ ॥
कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर जड़से जायँगे, ज्यों मूलीका खेत ॥ ४ ॥
कबीर— मांस खाय अरु मद पिये, धन विपसा जो खाय ।
जुआ खेल चोरी करे, अन्त समूला जाय ॥ ५ ॥
कबीर— मांस मांस सब एकही, मछली हिरनी गाय ।
आँख देखि जो खात हैं, सो नर नरके जाय ॥ ६ ॥
कबीर— ब्राह्मण राजा चार वरणके, और कौम छत्तीस ।
रोटी ऊपर माछली, सभी वरण गये खीस ॥ ७ ॥
कबीर— कलियुग केरे ब्रह्मणा, मांस मछरिया खाँय ।
पाय लगे सुख मानही, राम कहे मर जाँय ॥ ८ ॥
कबीर— पाँव पुजावैं वैठिके, भखें मांस मद दौय ।
तिनकी दीक्षा मुक्ति नहीं, कोट नरक फल होय ॥ ९ ॥
कबीर— सकल वर्ण एकत्र है, शक्ति पूजि मिलि खाहिं ।
हरिदासनकी भ्रान्ति कर, केवल यमपुर जाहिं ॥ १० ॥
कबीर— विष्ठाकी चोका दिये, हांडी सीझे हाड़ ।
छूत बरावे चामकी, इनहुँका गुरु रौड़ ॥ ११ ॥
कबीर— जिव हिंसा किये, प्रगट पाप शिर होय ।
निगम पुण्य स्थाप ते, देखि न आया कोय ॥ १२ ॥
गोड स्क्रिउ, कुंज, इनी
कबीर— जीव नहीं हिंसा करे, प्रगट पाप शिर होय ।
पाप सभी सो देखिया, पुण्य न देखा कोय ॥ १३ ॥
कबीर— तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान ।
काशी करवट ले मरे, तौ भी नरक निधान ॥ १४ ॥
कबीर— हँसा हो सोही हँसे, गावे जान खजान ।
कर गहि चोटा तानसी, साहबके दीवान ॥ १५ ॥
कबीर— काटा कूटी जे करें, ते पखण्डको भेस ।
निश्चय राम न जानि हैं, कहैं कबीर सँदेस ॥ १६ ॥
कबीर— बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल ।
जो बकरीको खात है, तिनको कौन हवाल ॥ १७ ॥
कबीर— आठ वाट बकरी गई, मांस मुल्ला गा खाय ।
अजहूँ खाल खटिक घर, विहिश्त कहाँ को जाय ॥ १८ ॥
कबीर— अण्डा किन बिसमिल किया, घुन कीस किया हलाल ।
मछली किन जब्बह किया, सब खाने क्या ख्याल ॥ १९ ॥
कबीर— काजी तुझे करीमका, कब आया परमान ।
घट फोरा घर घर किया, साहब केर निशान ॥ २० ॥
कबीर— काजीका बेटा मुआ, उरमें साले पीर ।
वह साहब सबका पिता, भला न माने बीर ॥ २१ ॥
कबीर— पीर सबनकी एकसी, काजी जाने नाहि ।
अपना गला कटायके, विहिश्त बसे क्यों नाहि ? ॥ २२ ॥
कबीर— मुरगी मुल्लासे कहे, जबह करत हैं मोहि ।
साहब लेखा मांगसी, शङ्कट परेगा तोहि ॥ २३ ॥
कबीर— काजी जीहू स्वाद वश, जीव हनत हैं, आय ।
चढ़ि मसजिद एके कहैं, क्यों दरगह सच होय ॥ २४ ॥
कबीर— काजी मुल्ला मरमियां, चले दुनीके साथ ।
दिलसे दीन निवारिया, करद लयी जब हाथ ॥ २५ ॥
कबीर— काला मुंह कर करदका, दिलसे दुई निवार ।
सब सूरत सुभानकी, अहमक मुल्ला मार ॥ २६ ॥
कबीर— जोर कर जो जबह करे, मुँहसे कहे हलाल ।
साहब लेखा मांगसी, तब होई कौन हवाल ॥ २७ ॥
कबीर— जोर किया सो जुलुम है, माँगे जबाब खुदाय ।
हजार दास्तान बुलबुल
खालिक दर खूनी खड़ा, मार मुंहे मुंह खाय ॥ २८ ॥
कबीर— गला काटि कलमा पढे, किया है कहै हलाल ।
साहब लेखा मांगिहै, तब हो कौन हवाल ॥ २९ ॥
कबीर— गला गुस्सेका काटिये, मियां कहको मार ।
जो पांचोंको बस करे, तो पावे दीदार ॥ ३० ॥
कबीर— यह सब झूठी बन्दगी, बेरिया पांच निमाज ।
सांचे मारे मुंहपर, काजी करै अकाज ॥ ३१ ॥
कबीर— दिनको रोजा धरत हैं, रातको हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्योंकर खुशी खुदाय ॥ ३२ ॥
कबीर— चाला जाय था, आगे मिले खुदाय ।
मारो तुझसे किन कही, किन फरमाई गाय ॥ ३३ ॥
कबीर— शेख सबूरी बाहिरा, हाँका यमपुर जाय ।
जिनका दिल साबित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥ ३४ ॥
कबीर— तेई पीर हैं, जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानहीं, ते काफिर बेपीर ॥ ३५ ॥
कबीर— खूब खाना है खीचड़ी, जामें अमृत लोन ।
मांस पराई खायके, गला कटावे कौन ॥ ३६ ॥
कबीर— कहता हूँ कह जात हूँ, कहा जो मान हमार ।
जिसका गला तु काटि है, सो फिर काटि तुम्हार ॥ ३७ ॥
कबीर— हिन्दूके दाय़ा नहीं, मेहर तुर्कको नाहिं ।
कह कबीर दोनों गये, लख चौरासी मांहि ॥ ३८ ॥
कबीर— मुसलमान मारे करदते, हिन्दू मारे तलवार ।
कहें कबीर दोनों मिले, जैहें यमके द्वार ॥ ३९ ॥
तात्पर्य—कबीर साहब चारों युगसे पुकारते आये हैं कि, हिंसा मत करो, मांस न खाओ, अभक्ष्य पदार्थोंको न खाओ, शराब न पियो, मादक पदार्थोंका सेवन न करो, यह सब महान् पाप हैं, इनका बदला न छूटेगा । महान् कष्टमय अधम अवस्थाकी प्राप्ति ही इनका फल है । इनसे अलग रहनेसेही तुमसे योग्य कर्म हो सकेंगे ।
इस विषयमें कबीर साहबकी बहुत वाणी है, मनुष्य पशु इत्यादि किसी प्रकारके प्राणधारीको दुःख देना, मारना पापके महान् परिणामको प्राप्त कराने-
जेकड़ा जे डेडुबर्ड, अनल पंख किंगा फिसर
वाला है। भक्ति मुक्ति चाहते हो तो जीवहत्या और घृणित पदार्थोंका त्याग कर दो, जो मान लेगा वह सुखी होगा जो न मानेगा दुःख पायेगा।
नज्रम—रहीमो खुदाबन्द रहमा वही। जुल्म जन्न न जिसके नफरमाँदही
सिफतसारी है उसकीही शानमें। जिसे देखिये इल्म उरफानमें ॥
मद्य मांसके निषेधमें कबीर साहिबकी आज्ञा लिखी है कि, वे इनके खानेवालोंको नर्कका पथिक बताते हैं।
वेद।
अब वेद शास्त्रको सुनो। वे भी स्वसंवेदके समानही मांस मदिरा आदि अभक्ष्यका ग्रहण तथा किसीके दुःख देनेको महापाप बतलाते हैं।
अथर्व—“अस्तितु तस्माद् ओ जीयो यद् विहव्ये न ईजिरे।” जीवहत्याके कर्म गन्दे हैं उनका उत्तम फल नहीं। बोही भगवान्की उपासना सर्वश्रेष्ठ है जिसमें जीवहत्या नहीं होती। “मुग्धा देवा उत शुना यजन्त उत गो रङ्गैः पुरुधा यजन्त” वे एक तरहके पागल हैं जो कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणियोंतकके मांसको भी नहीं छोड़ते तथा गऊओंके अङ्गोंको काट काटकर खाने खिलानेसे परमात्माको प्रसन्न हुआ मानते हैं। वो मार्ग उनके कल्याणका नहीं है, किन्तु नरक देनेवाला है। कोई कोई यह कहते हैं कि, यज्ञ आदिमें की गई हिंसा हत्या नहीं है, बाकी सब हत्याएं हैं। यदि विचार करके देखा जाय तो इसमें भी कोई सार नहीं है। क्योंकि, अथर्व वेदमें लिखा हुआ है कि, ‘इष्टापूर्तस्य व्यभजन्त यमस्य अभी षोडशं सभापदः’ यदि यज्ञ आदिमें भी हत्या करोगे तो तुमें पुण्य यज्ञका मिलनेवाला था उसमें सोलहवें हिस्सेका पाप भी भोगना पड़ेगा। स्वर्गके अमृत कुण्डोंमें स्नान करनेवालोंको अपनी जीव हत्याके पापोंके कारण भयंकर आगकी तपिस भी सहनी पड़ेगी इससे यह बात सिद्ध होजाती है कि, वेद हत्यामें कभी भी पुण्य नहीं मानता, यज्ञके नामकी हत्यामें भी पाप होता है पुण्य नहीं होता।
ऋग्वेद—स्तोमास स्त्वा विचारिणि, प्रतिष्ठोभन्त्यक्तुभिः।
प्रयावाजं न हेषन्तं पेरुमस्यस्यर्जुनि ॥
अर्थ—जो कोई मांस खाता है वह नरकी होता है सर्वदा दुःखमें पड़ा रहता है उसका देखना भी महा पाप है इस तरहके पापियोंके दर्शन करना ही महापाप है बहुत अच्छा हो कि, ऐसे पापी नारकी स्थानोंमें ही पड़ा रहें।
वेदमें एक स्थलमें लिखा है कि—घास चौपायोंके लिये बनाया गया है, और अनाज मनुष्योंके लिये है जैसे स्त्री पुरुषके लिये वैसेही पशु पशुके लिये हैं। मानुषी स्त्री पशुके लिये नहीं है, उसी प्रकार मांस मनुष्यके लिये नहीं है।
मृत्युकी सूचना देनेवाली, विशेष वक्तव्य
पुरुष सूक्त—यजुर्वेद पुरुष सूक्त उपनिषद पद्धो, लिखा है सर्व जीवधारी उस विराट् पुरुषके हाड़ चाम और मांस हैं, इस कारण मांस खानेवाले विराट् पुरुषके शत्रु हैं। क्योंकि, वे जीवधारियोंके ही मांसोंको खाते हैं। जो विराट् पुरुषके केशोंको खाते हैं वे उसके शत्रु नहीं हैं, क्योंकि बालोंको तोड़ने काटनेसे किसीको दुःख नहीं होता, किन्तु किसी अशमं सुखही होता है।
सूत्र—मद्यं न पिबेत् मांसं न भक्षयेत् असत्यं न वदेत् परदारान् न स्पृशेत् ॥
अर्थ—मदिरा मत पीओ मांस मत खाओ। झूठ मत बोलो। व्यभिचार न करो।
यज्जीर्वाहिंसायामनुवर्तते तस्य जीवस्य नरकं क्रीडते ॥
अर्थ—जो कोई जीर्वाहिंसाका विचार करता है, वह जरूर नर्कमें जाता है और नाना प्रकारके कष्टोंको प्राप्त होता है।
अहिंसाके विषयमें सर्व वैष्णव लोग और कबीर साहब सहमत हैं। जैन और बौद्धधर्म लोग तो अहिंसाको अपना परमधर्मही समझते हैं पातञ्जलिकी भी यही आज्ञा है। मीमांसा और न्याय भी यही कहता है।
ऊपर जो प्रमाण दिये थे वेद सूत्रादिकोंके थे उनमें परिष्कृत रूपसे जीव हिंसाका निषेध किया गया है, एवं इन कामोंके करनेवालोंको नरककी प्राप्ति बताई है तथा मनुष्यको क्या खाना चाहिये यह भी बता दिया है। अब स्मृतियों तथा ऋषीश्वरोंके वचन दिखाते हैं कि, स्मृतिकारोंने भी इसका निषेध किया है।
ऋषीश्वरोंके वचन ।
ब्रह्मा—ये भक्षयन्ति मांसानि सत्त्वानां जीवितैषिणाम् ।
तैदंयो भक्षितैः सर्वैरिति ब्रह्मात्रवीदृञ्ज ॥
अर्थ—जो जीव जीवनेकी इच्छावाले हैं उनके मांसको जो भक्षण करते हैं वे जीव भी परलोकमें अपने मांसके खानेवालोंके मांसको खाते हैं अर्थात् जो किसीका मांस खावेगा वह दूसरे जन्ममें अवश्य बदला देगा।
अहिंसा परमो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः ।
परम धर्महां अहिंसा है जहां यह अहिंसारूप है वहां अवश्यही जय होती है।
नारद—स्वमांसं परमांसेन यो वद्वयितुभिच्छति ।
नारदः प्राह धर्मात्मा नारकैः सह पच्यते ॥
अर्थ—जो कोई दूसरेके मांसको खाकर अपना मांस बढ़ाया चाहता है वह नरकमें अवश्य पड़ेगा।
मक्खियाँ, मक्खियों पर विश्व डाक्टर वाटयार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर
व्यास—योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।
कृष्णद्वैपायनः प्राह स्थावरत्वं स गच्छति ॥
अर्थ—जो अहिंसक पशु हिरन, शशा आदि इनको कोई अपने खानेके हेतु मारता है वह स्थावर योनिमें जावेगा ।
बृहस्पति—सन्तप्यते ततोऽजसं भजते च ददाति सः ।
मधुमांसनिवृत्तो यः प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥
अर्थ—जो आदमी मांस नहीं खाता, वह सर्वदा तप करता है यज्ञ और दान भी करता रहता है ।
वसिष्ठ—यावज्जीवति यो मांसं विषवत्परिवर्ज्यं येत् ।
वसिष्ठो भगवानाह स्वर्गलोकं स गच्छति ॥
अर्थ—आदमी जबतक जीवे तबतक मांस न खावे, विष जान कर त्याग दे. उसको स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी ।
जमदग्नि—यो भक्षयित्वा मांसानि स्वतश्चापि निवर्तते ।
जमदग्निर्महाहैनं सोऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥
अथ—जो कोई मांस खाता हुआ स्वयं विचार कर अथवा किसीके कहनेसे मांस भक्षण छोड़ दे मृत्यु पर्यन्त न खावे, वह अवश्य स्वर्गको जावेगा ।
शुक्र—रूपमारोग्यमैश्वर्यं कान्तिं स्वर्यानमेव च ॥
प्राप्नोत्यहिंसः पुरुषः प्राहैवमुशना मुनिः ॥
अर्थ—जो हिंसा नहीं करता वह संसारमें सुन्दरता, लक्ष्मी, आरोग्यता, विद्या आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न होता है, मृत्युके बाद स्वर्गको जाता है ।
पराशर—सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च ।
नोत्तमं प्राणदानाच्छ पराशरवचो यथा ॥
अर्थ—सोनादान, पृथिवीदान, गोदान ये सब श्रेष्ठ दान हैं, पर “जीवको न मारकर उसे प्राणदान देना” सबोंमें उत्कृष्ट है । यह पराशरजीका वचन है ।
इसी बातपर मार्कण्डेयजीकी भी साक्षी है —
स्वयंभू मनु—कर्मणा मनसा वाचा यो हंति न हि कश्चन ।
स मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
अर्थ—जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे किसी प्रकार हिंसा नहीं करता, वह सब प्राणियोंका मित्र कहलाता है ।
हत्याके दोषी—हन्ता' चैवनुमन्ता' च विश्वस्ता' 'कयविक्रयी' ।
संस्कर्ता' चोपहन्ता च खादकश्चाष्ट' घातकाः ॥
धनेन क्रियको हन्ति द्युभोगेन च खादकः ।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं भवि धेनुषः ॥
अर्थ—'मारनेवाला, 'मारनेका विचार करनेवाला, मारनेकी 'सम्मती देनेवाला, मांसका' बेचनेवाला, मांसका' मौल लेनेवाला, मांसको' पकानेवाला पकेहुये मांसका' परोसनेवाला, और मांसका' खानेवाला ये आठ घातक हैं ।
विशेष, करके हिंसा तीन प्रकारसे होती है । १—जो मांस मौल लेता है । वह तो दाम देकर जीवोंको मराता है क्योंकि, यदि मौल लेनेवाला न होता तो जीव न मारे जाय इससे मौल लेनेवाला पूरा पापी है । २—खानेवाला, खानेके स्वादके लिये मारता है, यदि वह न चाहे न मांसको खावे तो, जीव हत्या कौन करे ? । ३—हत्यारे वह हैं जो स्वयं जीवधारीको बाँधकर अथवा हथियारसे मारते हैं, सब भी एकही बात है, चोर और चोरके साथी न्यायमें तुल्यही है ।
जैसे स्वयंभू मनु कइयोंको हत्याका दोषी बताया है उसी तरह कबीर साहिबने भी अपनी साखीमें कई दोषी बनाये हैं कि—
आठ बाट बकरी गई मांस मुल्ला गयो खाय ।
अजहूँ खाल खटीकघर, विहिश्त कहो क्या जाय ॥
बकरी उपरोक्त आठ राहमें गई, उसका मांस मुल्ला खा गया अब तक उसकी खाल खटीकके घर है । वह खटीक निरञ्जन है उसीके हाथ उसकी खाल है, उसके कर्म तो उसके घरही है जिस मारनेवालेको बकरीकी योनिमें आवागमन अवश्य होगा तो बकरीके मारनेवाली विहिश्त क्योंकर जायगी, अपने कर्म के बीजसे फिर फिर देह धरेगा, जबतक उसकी खाल खटीकके घर रहेगी तबतक उनका विहिश्त प्राप्त न होगा । मारनेवालोंको वह खाल ओढ़नी पड़ेगी ।
मांस त्यागका फल ।
शाकमूलफलैर्मध्येः योवाऽदन्नेव भोजनम् ।
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्ज्जनात् ॥
अर्थ—उपवास तथा शाक, कन्द, मूल, फल आदि भक्षोंके खानेसे इतना फल नहीं मिलता, जितना कि, मांसको छोड़ देनेसे होता है ।
मधु मांसं च ये नित्यं वर्ज्जयन्तीह मानवाः ।
जन्म प्रभृति मद्यं च सर्वं ते मुनयः स्मृताः ॥
अर्थ—जो लोग मांस और मदिरासे आयु भर बचे रहते हैं; वे साधुओंके तुल्य हैं। अवश्यही सद्गतिको पावेंगे ।
मधु मक्खियोंकी तीन जातियाँ हिउबर
शतं समा यः पुरुषः तपस्तेषु सुदारुणम् ।
न भक्षयन्ति ये मांसं सममेतदुदाहृतम् ।
अर्थ—जो सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक तपस्या करे, दूसरा मांसका निरंतर त्यागी ही दोनोंका एक समान फल है ।
यथा हृस्तिपदे यानि पदानि पदगामिनः ।
सर्वे धर्मास्त्वहिंसायां प्रविशन्ति तथा ध्रुवम् ॥ १ ॥
सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थविगाहनम् ।
सर्वयज्ञफलं चैव नैव तुल्यमहिंसया ॥ २ ॥
अहिंसा परमो यज्ञो अहिंसा परमं तपः ।
अहिंसा परमाक्षय्यमहिंसो यजते सदा ॥ ३ ॥
अहिंसा सर्वलोकस्य यथा माता पिता तथा ।
स्वमांसात्परमांसानि परिपाल्य दिवं गतः ॥ ४ ॥
तमेव परमं धर्ममहिंसां संप्रचक्षते ।
एवं परो महात्मा यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ५ ॥
अर्थ—जैसे सब जीवधारियोंके पग हाथीके पगमें आजाते हैं उसी प्रकार अहिंसामें सर्वे धर्म समा जाते हैं ॥ १ ॥ अहिंसा अर्थात् किसी भी जीवधारियोंको दुःख न देना ही वेद पाठ है, तीर्थटन है, सर्वे यज्ञ, है, जीवधारियोंकी रक्षाके तुल्य कोई धर्म नहीं है ॥ २ ॥ अहिंसा परम यज्ञ है, जो हिंसा नहीं करता है वह यज्ञ और तप करता है ॥ ३ ॥ जो कोई जीव हिंसा नहीं करता, वह सबका ऐसा प्यारा होता है जैसे कि, माता पिता । जो अपने प्राणका लालच छोड़कर, अपना मांस देकर बच्चेकी जान बचाते हैं ऐसे परोपकारी लोग स्वर्ग जाते हैं ॥ ४ ॥ जिसमें जीव हिंसा न हो वही धर्म बड़ा है जो लोग इस धर्मको धारण करते हैं वे महात्मा लोग विष्णु लोकको चले जायेंगे ।
जग जाओ ।
आकाश और विष्णु सत्तोगुण रूप हैं, पृथिवी, और ब्रह्मा रजोगुण रूप हैं, पाताल और शिव तमोगुण रूप हैं । फारसीमें इनको तमीज शहवत और गजब कहते हैं । जो कोई सत्तोगुणका आश्रय करता है वह देवता है, जिसमें सत्तोगुण और रजोगुण हो वह मनुष्य है, जिसमें रजोगुण और तमोगुण हो वह राक्षस तथा नारकी जीव है, सत्तोगुण ऊपरको रजोगुण पृथिवीमें और तमोगुण नरकमें डालेगा । मांस खाना तमोगुणी है, अवश्य नरक ले जावेगा जीवकी जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ये तीन अवस्था हैं, जाग्रत अवस्था मनुष्यकी, स्वप्न पशुकी