कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 975, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंका श्रीराम, 'आ' का भरत, 'म्' का लक्ष्मण, 'अ' का शत्रुघ्न, हंस यह असली अर्थ है पर समष्टि जीवमें जो कारणरूपा इच्छा थी, उससे इसने इन नामका कुछका कुछ अर्थ समझा । 'र' का परा आद्या योगमाया, 'अ' का अक्षर, 'आ' का नारायण 'म्' का संकर्षण और 'अ' का महाविष्णु अर्थ समझा । यही समस्तकर यह संसारी हो गया । वास्तवमें असली अर्थोंके भ्रामिक अर्थ अंश हैं जो अंशीके रूपमें समझे जा रहे हैं । कारणरूपा अविद्याने इतनाही कार्य नहीं किया किन्तु चित्त मन बुद्धि तथा मैं ब्रह्म हूँ इस अहङ्कार को भी पैदा किया, इसी अहङ्कारने एकसे अनेक होनेकी इच्छा प्रकट की । इस तमास बखेड़में दो इच्छाएं काम कर रही हैं, पहिली तो कारणरूपा इच्छा जिसे कह चुके हैं, दूसरी योगमाया है इसीने संसारको रच दिया यही प्रकाशित कर रही है । मैं ब्रह्म हूँ उस अनुभवसे होने वाला ब्रह्म समष्टि जीवके श्वासके पैदा हुआ । उसीने अष्ट सिद्धियाँ तथा काली आदि आठ ईश्वरोंको उत्पन्न किया । सत्यपुरुषने उद्धारके पथका जगत् मुख अर्थ देखकर मुझे भेजा कि, रामनामका सन्ध्या अर्थ बताकर संसारका कल्याण करूँ मैं रामनामका सन्ध्या अर्थ समझाकर लोगोंका कल्याण करने आया हूँ जो मेरा कहना मान लेगा उसका उद्धार हो जायगा जो न मनेगा वो संसारमें भटकता फिरेगा ॥ ॥ इति आदि मङ्गल ॥
जीव हत्या और मांस मदिराका निषेध ।
निकृष्ट घृणित पदार्थोंसे मन लगानेवालेको कभी भी प्रकाशका मार्ग न मिलेगा । जिस प्रकार कालिससे जल काला हो जाता है उसी प्रकार घृणित पदार्थोंके ग्रहणसे अन्तःकरण अशुद्ध एवं शुद्ध पदार्थोंके खानेसे स्वच्छ और ज्ञानमय हो जाता है । जो लोग अपने अन्दर घृणित वस्तुओंको डालते हैं, उनके अन्तःकरणकी शुद्धि होनी असम्भव है, वे कभी भी सत्यगुरुके मार्गको नहीं पा
१ इस आदि मंगलमें कबीर साहिबके अवतार धारण करनेका प्रयोजन एवं कबीर दर्शन अत्यन्त सावधानीके साथ कहा गया है तथा इतना गूढ़ कि, कबीर साहिबके आज्ञाकारी हंस श्री विश्वनाथजी देव महाराज रीवाँकी टीकाके बारम्बार पथ्यालोचन करनेसे भी जलदी ध्यानमें नहीं आता इस कारण अनुवादकने इसका अर्थ साथही साथ कर दिया है ।
यद्यपि अनुवादक कबीर साहिब तथा साहिबके हंसोंकी वाणीको समझनेकी कोई शक्ति नहीं रखता पर यह इस तुच्छ हृदयमें उन्हींकी प्रेरणा हुई है जिससे उक्त अर्थ किया गया है । यदि कोई चूक हो तो भी भक्तजन केवल श्रद्धापर ध्यान देकर क्षमा कर देंगे । केवल इतनाही लक्ष्य है कि, कबीर साहिब के अक्षरों की और कबीर पन्थी तथा दूसरों भावुकों का पूरा ध्यान हो ।