कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 974, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाधानको लेकर मैं आया हूँ कि, संसारी प्राणियोंको असली अर्थ बता दूँ जिससे सबका उद्धार हो जाय ॥ २२ ॥
सात सुरतिके बाहिर, सोरह संखिके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥ २३ ॥
सात-सातों, सुरतिके-सुरतियोंके, बाहिर-बाहिर, और सोरह-सोलह, संखिके-संख्यक कलाओंके, पार-किनारेपर, तहैं-वहाँ, समरथको-समर्थ श्रीराम भगवान्का, बैठका-बैठनेकी जगह है, वही हंसनकेर-हंसोंका, अधार-आधार है ।
जहां सातों सुरति नहीं पहुँच सकती, जहां सोलहों कलाओंकी कोई कहानी नहीं है वहां भगवान् राम विराजते हैं वही भगवान्के हंसोंका आधार है ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनै हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
हम-हमने, सबसों-सभीसे, घर घर-घर घर जाकर, कही-कह दी, पर, हमार-हमारा, शब्द-रामनामका अर्थ कोई, न-नहीं, सुने-सुनता, ते-वे, लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धार-धारावाले, भवसागर-संसार सागरमें, डूबहीं-डूबेंगे ।
हमने घरघर जाकर रामनामका असली अर्थ बताया है पर हमारे कहेंको कोई नहीं सुनता इस कारण न सुननेवाले अज्ञानी चौरासी लाख योनियोंकी धारवाले संसार सागरमें अवश्य डूबेंगे ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥
इति आदि मंगल ।
उत्पत्ति आदिका-उत्पत्तिकी आदिके, मङ्गल-मङ्गलको, ऐ सुजान-ज्ञानवान, सन्त-महात्माओ, सुनियो-सुन लीजिये । कबीर-कबीर साहिब, कह-कहते हैं कि, गुरु-सबके गुरु, जाग्रत-निभ्रान्त, समरथ-समर्थ श्री राम-चंद्रजीका, फुरमान-कहन है ।
कबीरसाहिब कहते हैं कि, हे ज्ञानवान महात्माओ ! मैं उत्पत्तिकी आदिके मंगलको कहता हूँ यह कोई मेरी ओरसे बना हुआ नहीं है किन्तु मायारहित सबके गुरु श्रीरामचन्द्रजी महाराजका ही यह कथन है वही मैंने आपको सुना दिया है ॥ २५ ॥
सार-भगवान् रामने जीवोंके उद्धारके लिये समष्टि जीवको चैतन्यता दी पीछे उसे उपदेश दिया कि, तुम रामनामका अर्थ समझ लो इसीसे मेरे हंसोंमें हो जाओगे मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा । राम शब्दके 'र' का जानकी 'र'