भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 974

समाधानको लेकर मैं आया हूँ कि, संसारी प्राणियोंको असली अर्थ बता दूँ जिससे सबका उद्धार हो जाय ॥ २२ ॥

सात सुरतिके बाहिर, सोरह संखिके पार ॥

तहैं समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥ २३ ॥

सात-सातों, सुरतिके-सुरतियोंके, बाहिर-बाहिर, और सोरह-सोलह, संखिके-संख्यक कलाओंके, पार-किनारेपर, तहैं-वहाँ, समरथको-समर्थ श्रीराम भगवान्का, बैठका-बैठनेकी जगह है, वही हंसनकेर-हंसोंका, अधार-आधार है ।

जहां सातों सुरति नहीं पहुँच सकती, जहां सोलहों कलाओंकी कोई कहानी नहीं है वहां भगवान् राम विराजते हैं वही भगवान्के हंसोंका आधार है ॥ २३ ॥

घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनै हमार ॥

ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥

हम-हमने, सबसों-सभीसे, घर घर-घर घर जाकर, कही-कह दी, पर, हमार-हमारा, शब्द-रामनामका अर्थ कोई, न-नहीं, सुने-सुनता, ते-वे, लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धार-धारावाले, भवसागर-संसार सागरमें, डूबहीं-डूबेंगे ।

हमने घरघर जाकर रामनामका असली अर्थ बताया है पर हमारे कहेंको कोई नहीं सुनता इस कारण न सुननेवाले अज्ञानी चौरासी लाख योनियोंकी धारवाले संसार सागरमें अवश्य डूबेंगे ॥ २४ ॥

मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥

कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥

इति आदि मंगल ।

उत्पत्ति आदिका-उत्पत्तिकी आदिके, मङ्गल-मङ्गलको, ऐ सुजान-ज्ञानवान, सन्त-महात्माओ, सुनियो-सुन लीजिये । कबीर-कबीर साहिब, कह-कहते हैं कि, गुरु-सबके गुरु, जाग्रत-निभ्रान्त, समरथ-समर्थ श्री राम-चंद्रजीका, फुरमान-कहन है ।

कबीरसाहिब कहते हैं कि, हे ज्ञानवान महात्माओ ! मैं उत्पत्तिकी आदिके मंगलको कहता हूँ यह कोई मेरी ओरसे बना हुआ नहीं है किन्तु मायारहित सबके गुरु श्रीरामचन्द्रजी महाराजका ही यह कथन है वही मैंने आपको सुना दिया है ॥ २५ ॥

सार-भगवान् रामने जीवोंके उद्धारके लिये समष्टि जीवको चैतन्यता दी पीछे उसे उपदेश दिया कि, तुम रामनामका अर्थ समझ लो इसीसे मेरे हंसोंमें हो जाओगे मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा । राम शब्दके 'र' का जानकी 'र'