कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 980, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाला है। भक्ति मुक्ति चाहते हो तो जीवहत्या और घृणित पदार्थोंका त्याग कर दो, जो मान लेगा वह सुखी होगा जो न मानेगा दुःख पायेगा।
नज्रम—रहीमो खुदाबन्द रहमा वही। जुल्म जन्न न जिसके नफरमाँदही
सिफतसारी है उसकीही शानमें। जिसे देखिये इल्म उरफानमें ॥
मद्य मांसके निषेधमें कबीर साहिबकी आज्ञा लिखी है कि, वे इनके खानेवालोंको नर्कका पथिक बताते हैं।
वेद।
अब वेद शास्त्रको सुनो। वे भी स्वसंवेदके समानही मांस मदिरा आदि अभक्ष्यका ग्रहण तथा किसीके दुःख देनेको महापाप बतलाते हैं।
अथर्व—“अस्तितु तस्माद् ओ जीयो यद् विहव्ये न ईजिरे।” जीवहत्याके कर्म गन्दे हैं उनका उत्तम फल नहीं। बोही भगवान्की उपासना सर्वश्रेष्ठ है जिसमें जीवहत्या नहीं होती। “मुग्धा देवा उत शुना यजन्त उत गो रङ्गैः पुरुधा यजन्त” वे एक तरहके पागल हैं जो कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणियोंतकके मांसको भी नहीं छोड़ते तथा गऊओंके अङ्गोंको काट काटकर खाने खिलानेसे परमात्माको प्रसन्न हुआ मानते हैं। वो मार्ग उनके कल्याणका नहीं है, किन्तु नरक देनेवाला है। कोई कोई यह कहते हैं कि, यज्ञ आदिमें की गई हिंसा हत्या नहीं है, बाकी सब हत्याएं हैं। यदि विचार करके देखा जाय तो इसमें भी कोई सार नहीं है। क्योंकि, अथर्व वेदमें लिखा हुआ है कि, ‘इष्टापूर्तस्य व्यभजन्त यमस्य अभी षोडशं सभापदः’ यदि यज्ञ आदिमें भी हत्या करोगे तो तुमें पुण्य यज्ञका मिलनेवाला था उसमें सोलहवें हिस्सेका पाप भी भोगना पड़ेगा। स्वर्गके अमृत कुण्डोंमें स्नान करनेवालोंको अपनी जीव हत्याके पापोंके कारण भयंकर आगकी तपिस भी सहनी पड़ेगी इससे यह बात सिद्ध होजाती है कि, वेद हत्यामें कभी भी पुण्य नहीं मानता, यज्ञके नामकी हत्यामें भी पाप होता है पुण्य नहीं होता।
ऋग्वेद—स्तोमास स्त्वा विचारिणि, प्रतिष्ठोभन्त्यक्तुभिः।
प्रयावाजं न हेषन्तं पेरुमस्यस्यर्जुनि ॥
अर्थ—जो कोई मांस खाता है वह नरकी होता है सर्वदा दुःखमें पड़ा रहता है उसका देखना भी महा पाप है इस तरहके पापियोंके दर्शन करना ही महापाप है बहुत अच्छा हो कि, ऐसे पापी नारकी स्थानोंमें ही पड़ा रहें।
वेदमें एक स्थलमें लिखा है कि—घास चौपायोंके लिये बनाया गया है, और अनाज मनुष्योंके लिये है जैसे स्त्री पुरुषके लिये वैसेही पशु पशुके लिये हैं। मानुषी स्त्री पशुके लिये नहीं है, उसी प्रकार मांस मनुष्यके लिये नहीं है।