कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कि, उस साधुके हृदयमें ठण्ढक आवे तब घरकी आगभी बुझे । थलीमें कोई सरदार था उसके पास एक वैष्णव साधु आगया उसने नहा धोकर ठाकुर पूजा की । सरदारने साधुके लिये दूध और चीनी मँगवा दी । उस वैष्णवने ठाकुरको भोग लगाया । इसके पीछे जब वह आप दूध पीने लगा तब उस सरदारको याद आगयी कि, जहाँ चीनी थी वहाँ घोड़ेकी दवाईके लिये संखिया भी पीसा धरा था कहीं ऐसा न हुआ हो कि, साधुको संखिया दिया गया हो । दौड़के देखा तो संखिया दिया गया था । उस सरदारने पुकारकर कहा कि, महाराज ! यह दूध मत पीजिये इसमें संखिया पड़ गया है । उस वैष्णवने कहा कि, अब तो यह संखिया ठाकुरको * भोग लगाया जा चुका है । मेरे ठाकुर संखिया पीवें और मैं चीनी पीऊँ ? यह कभी
- मूर्तिके रूपमें विराजनेवाले भगवान् के अर्चावतारको ठाकुरजी कहते हैं । भक्तजन छोटे-छोटे भगवान् अपने साथ रखते हैं एवं परम भक्तिभावके साथ भजन पूजन करके नैवेद्य बना भगवान् ठाकुरजीके भोग धरकर पीले भोग लगी हुई वस्तुका आप भोजन करते हैं । वे बिना भगवान् के निवेदन किये किसी भी वस्तुको ग्रहण नहीं करते । यद्यपि वे ठाकुरजी अज्ञानियोंकी दृष्टिमें तो कंकर पत्थर ही हैं पर इन भक्तोंकी दृष्टिमें इनके प्यारे इष्ट देव ही हैं । उसमें और इस मूर्तिमें कोई भेद नहीं रहता । यदि विष्णुकी मूर्ति विष्णुके उपासकोंके लिये विष्णु नहीं तो संखियाका असर किसने आरोगतेही खींच लिया । वैष्णवके भोग धरतेही संखिया कहाँ चला गया ? यदि उपासकके लिये वो पत्थरही होती तो वैष्णवके ठाकुरजीके भोग धरतेही विषका चला जाना नितान्त कठिन था क्योंकि, पत्थरमें यह शक्ति कदापि नहीं है कि, समीपस्थके विषको हर ले एवं उसके भक्तोंपर विष भी असर न करे । स्वामी परमानन्दजीके इन अक्षरोंकी ओर ध्यान डालतेही हमारी दृष्टि अनुरागसागरकी-समालोचनात्मक भूमिकापर जाती है । इसमें कबीराश्रमाचार्य भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्द विहारी लिखते हैं कि, "भगताई तो बीजककोही अपना सर्वस्व समझकर सबसे अलग उसीके पठन पाठनमें लगे रहते थे और वैष्णवोंमें खपते थे, किन्तु बीजककी वाणीके प्रतापसे उनके और जड़ मूर्तिपूजक वैष्णवोंमें फेर पड़नेसे कबीरपन्थी कहलाने और कबीरपन्थियोंमें मिलने लगे ।" इस लेखके हमें इस कथनपर विचार होता है कि, जिस मूर्तिके भोग लगानेसे उसके सच्चे भक्त वैष्णवपर विष भी असर न करे तो फिर वो मूर्ति जड़ हुई या चैतन्योंकी भी चैतन्य ? बिहारीजी ! स्वामी परमानन्दजीके अक्षरोंपर गहरी दृष्टिसे विचार करेंगे तो एक हृदयके आनन्दका देनेवाला रहस्य ध्यानमें आ जायगा कि, वो मूर्ति जड़ भी कि, चैतन्योंकी भी चेतना उसीके अन्तर्हित थी । भारतके दर्शन शास्त्रके ध्रुन्धर पाश्चात्य देशवासी स्वर्गीय मोक्षमूलरने मरतीवार कहा था कि, भारतीयोंकी विज्ञान विज्ञताको देखो । उन्होंने जड़ पत्थरसे भी सत्यपुरुषको प्रकट कर लिया । जो मूर्ति पूजाका महत्त्व नहीं जानते । उन्हें तो सिवा पत्थरके और कुछ नहीं है, पर जो सच्चे भक्त हैं उनके लिये वो साक्षात् भगवान् हैं । उनके लिये संखिया के विषकी क्या ? संसारके विषको भी हर लेगा । वोही उसे मोक्ष धाम सत्यपुरुषके लोकको पहुँचा देगा । इसी कबीर मन्शूरमें स्वामी परमान्दजीने कहा है कि, "सत्यपुरुषकी भी मूर्ति इसीमें है ।" यह बात सत्य भी है । अपने भक्तोंके लिये यह सत्यपुरुष तथा भक्तोंके सतानेवालोंके लिये यही कालपुरुष है । अतः यह सुतराम् सिद्ध हो जाता है कि, विष्णुकी मूर्तिमें भी उपासकके लिये सत्यपुरुषही विराजमान है । फिर उसके पूजकोंके लिये जड़ मूर्तिपूजक शब्दका व्यवहार करना उचित नहीं मालूम होता । विज्ञ पाठक उस भूमिकाको इस टिप्पणीसे सुधार करके पढ़ें ।