भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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योनिके जीवोंमें सिरसे पाँव तक व्याप रहा है । इस सोंप तथा सोंपिनके वशमें सारा संसार है । इन्हींके विषसे सब जीव मृतक हैं । मृतकोंको जो चाहे सो करे वे क्या कर सकते हैं । यह नाग और नागिन पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों पर अधिकार किये हुए और सर्व शक्तिमान् कहलाते हैं । इन दोनोंक जालसे निकलकर कोई जीव बाहर जा नहीं सकता । इस कुण्डलिनीके विषने सबको अन्धा कर रखा है ।

शङ्खल

कहाँ मैं कहाँ दिलवर रहा यह नागिनी जब डस गयी ।
नहीं मैं नहीं वह घर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
जादू नहीं मंतर कोई अफसूँ नहीं यंतर कोई ।
उस डंक मारा मर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
यह दम्बदम लहरा गया तनमें जहर जब छा गया ।
इस जिन्दगीका खतरः रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
घेरे अँघेरी रात है और सद बला आफात है ।
शामका न सेहर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
अपना व बेगाना कहीं पहचानमें आवे नहीं ।
न बसर रहा न हजर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
इनसान सुम्-बकुम हुआ होशो हवासो गुम हुआ ।
दायम दिले मुजतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
नहीं इल्म असर पजीर है कुछ ऐसीही तकदीर है ।
तदबीर कर बदतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
आवे नहीं कोई काम जब आजिज जपो सतनाम तब ।
जारी न जोरो जद रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥

ये नाग नागिनी एक है समस्त संसारको इन्होंने काट खाया है । जो कोई सच्चा साधु होकर गुरुकी सेवा करेगा उसपर इस सोंपका विष असर न न करेगा । साधु सेवा अवश्यही सत्यपथपर आरूढ़ कर देगी । कभी भटकने न देगी । जहाँ साधु और गुरुकी सहायता न होगी वहाँ कदापि जीवका छुटकारा न होगा ।

जितने शब्द, नाद और वाक्य इत्यादि हुये और होते हैं सब इन्हीं दोनोंसे हैं । कोई वाक्य और शब्द इत्यादि बिना इन दोनोंके नहीं हैं । केवल इस एक सोंपिनीने अपनीही मूर्तियाँ बनाईं । इस मनको मनु अथवा स्वयम्भु मनु कहो