भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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शरीरकी व्याधि तो औषधी तथा पुण्य करनेसे दूर हो जाती है। जन्म मरणकी बीमारी, (आधि) मनकी स्वच्छतासे दूर होती है।

इस सौपिनीसे यह मन बड़ा बलिष्ठ तथा विबैला सर्प बना हुआ है। इसने समस्त संसारको ऐसा डंक मारा है कि, सबके सब मर गये। किसी को चेत नहीं होता। इस मन सौपके विषसे सब अचेत हो रहे हैं, इसी सर्पका विष तीनों लोकोंमें भरा हुआ है। इसी सर्पिणीके विषकी द्वारसे सर्व जीव ऐसे अचेत हो रहे हैं कि, जगानेसे भी नहीं जाग सकते। संसारमें जितने रोग शोक, दुःख, दरिद्र, कष्ट और आपत्ति हैं सब इस कुण्डलिनीसे हैं। प्राण अपान दोनों वायुको योगेश्वर लोग सुषुम्ना नाड़ीके मार्गसे ब्रह्माण्डमें पहुँचाते हैं। एक क्षणभर उस स्थानपर वायुके ठहरानेसे सिद्धोंका दर्शन हो जाता है।

नाभिके मूलमें सूर्य तथा तालुके मूलमें चन्द्रकी स्थिति है इस शरीरमें दो और कमल हैं एक नीचे और दूसरा ऊपर है। नीचेके कमलमें सूर्य रहता है। ऊपरके कमलमें चन्द्रका वास है चंद्रसे अमृत च्युता है सूर्य शोष लेता है। स्वाधिष्ठान चक्रके आगे महामाया कुण्डलिनी रहती है। जैसे मोतियोंका भण्डार हो ऐसेही कुण्डलिनी लक्ष्मी बड़ी सुन्दरताके साथ रहती है। जैसे डण्डेके साथ हिलानेसे सर्पनी शब्द करती है ऐसेही इस कुण्डलिनीसे सोहम्का शब्द वहिर्गत होता है। यही आदि शक्ति समस्त संसारका कार्य करती है। उससे आपसे आप जो वायु निकलती है वह वायु बहुत मुलायम है। वह वायु जो छूटती है फिर दो सूरतोंमें स्थिर होती है। एकका नाम प्राण तथा दूसरेका नाम अपान है। ये दोनों वायु आपसमें टक्कर खाती हैं। इसीको (हरारत गरीजी) कहते हैं। उसीसे हृदय कमलमें सूर्य समान महान् प्रकाश होता है। इस हृदय कमलमें सुवर्ण रङ्गका एक भौरा है। इस भौराके दर्शन करनेसे योगीकी दृष्टि लाख योजनाकी हो जाती है। पेटमें जो अग्नि रहती है उसको जठराग्नि कहते हैं। ऐसी ही वडवाग्नि समुद्रमें रहती है। यह दोनों अग्नि जलको शोषण करती हैं। हृदय कमलसे जो शीतल वायु निकलती है उसको चन्द्रमा कहते हैं। प्राण-वायु जो गर्म वायु है वह सूर्य है। इन दोनों अर्थात् सूर्य और चन्द्र करके यह समस्त सृष्टि स्थित हैं। कुण्डलिनीकी अचेतावस्थामें जीव वासना करके दुःखी सुखी होता रहता है। इसीसे भूख, प्यास, आलस्य, नींद, जरा, मरण आदि भीतरी और वाहरी दुःख हैं। इस कुण्डलिनीका विष समस्त संसार पर छाया हुआ है। जो इस कुण्डलिनीके भेदको जानता है वा इस सर्पके विषसे बचकर अमृत पीवे और युगयुग जीवे। इस नागिनका विष चारखानि चौरासी लाख