भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मूसा धर्म

सुनै वह तेरी दुहाई तू राम बोल बकरी ॥
क्रातिल तुझे जो काटै और मांस तेरी बाटै ।
सब हो तेरी सुनाई तू राम बोल बकरी ॥
बदला कभी न छूटे धर २ के काल कूटै ।
वह दाद गर कहाये तू राम बोल बकरी ॥
सो सबसे है सयाना आजिज वह मिहरवाना ।
मुन्सिफ़ है बे अददाई तू राम बोल बकरी ॥

हाथीका शब्दल ।

ऊँचा जो सिर उठाया, नीचे तुझे बैठया ।
आंकुसकी मार खाया, सुन कान देके हाथी ॥
गुरुको न सिर झुकाया, ऊपरको सिर टिकाया ।
झुकना मुहाल आया, सुन कान देके हाथी ॥
गुरु संतको झुकता, ऊपर न सिर तो रकता ॥
दुख द्रन्द होय मुक्ता, सुन कान देके हाथी ॥
संधे अतर लेला, दिन रात रंग मेला ।
हौ बेकरार डोला, सुन कान देके हाथी ।
तेरी नाक सो बढ़ाया, इसके वसीले खाया ।
आजिज तुझे बनाया सुन कान देके हाथी ॥

गुरुमहात्म्यका शब्दल ।

तीरथ हजार जाओ पुष्कर गया नहाओ ।
तीरथ न ऐसी पाओ, सद गंग गुरु चरणमें ॥
तीरथ न और ऐसी, गुरु सेव जगमें जैसी ।
क्या क्या कहूँ मैं कैसी, सतसङ्ग गुरु चरणमें ॥
गुरु सेव हरिको पावे, सब युक्ति मुक्ति हाथ आवे ।
राह रास्तको दिखावे, गुण ढंग गुरु चरणमें ॥
गुरु बिन न हरिको मेला, सो पन्थ है दुहेला ।
फिर क्या करेगा चेला, सरहंग गुरु चरणमें ॥
गुरु पूजले तू अपना, जगत जात सबना ।
नाहकके मन खपना, सब रंग गुरु चरणनमें ॥

दौलत दुनियाका शब्दल ।

जीव अन्ध कर दिया है, जम बन्ध कर दिया ।
सब फन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥

ईसाई धर्म

दौलत जहाँ पर जावे, अन्धा उसे बनावे ।
दुख दन्दः कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
इसको जा छोड़ भागे, तब राम रंग लागे ।
दिल गन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
दौलत करे जो घेरा, वहाँ होवे तेरा मेरा ।
जम बन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
इससे है देहका सुख, जाय तो हो दिगर दुख ।
दह चन्द्र कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
यह भगतीको नसावे, फिर नरकमें बसावे ।
बुद्धि मन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
दुनियासे कार दुनियाङ्क आज़िज और न गहना ॥
फर फन्द कर दिया है, यह दौलतो दुनिया ॥

तरजीअ बन्द ।

सब जाय खुद खुदाय, और नहीं है ।
नहीं ढूँढ़े उसे पाय, हर पूर नहीं है ॥
तदबीर करो लाख, वहाँ दौर नहीं है ।
वह दौरमें शीशः बिल्लौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ १ ॥
अन्धे बचार चश्म, साधु निन्दक चेत ।
सो दोज़खमें जाय, खाँय गीते केते ॥
जब्बार धरमराय, पकड़ लेखा लेते ॥
हैबान बशकल नर, जो फ़िक्र गौर नहीं कीते ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ २ ॥
साहबको देख बेशक, है वह साधु जंगलमें ।
इस अस्लको ढूँढ़, देख जाय नकलमें ॥
पहचानता तू नहिं, न आवे तेरी अकलमें ।
न इल्म है इनसानकी, यह तौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ ३ ॥
साधु साहब हैं एक फ़र्क नहीं है ।
हर जा में वही गर्ब और शर्क नहीं है ॥
इस वृक्षमें फल फूल, कोई नूर नहीं है ।
बिन साधु गुरु ज्ञानी, ध्यान गर्क नहीं है ॥

साधुके निन्दकको कहीं ठौर नहीं है ॥ ४ ॥
साधुकी निन्दासे धरम करम नाश हो ।
साधुकी निन्दा से घोर नरक बास हो ॥
साधुकी निन्दा न मिहर रब्ब की आस हो ॥
साधुकी मिहर, आजिज, जम जौर नहीं है ॥
साधुके निन्दक को कहीं ठौर नहीं है ॥ ५ ॥

मुरब्बा भौरा ।

पिया परदेस क्या भौरा भयोरी ।
तु गाफिल होके सोई क्यों है बारी ॥
तु हरदम ताक बैठी अपनी पूरी ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ १ ॥
कोई पायक पिया की खबर दे ।
विरहिनि जिसके बदले अपना सिरदे ॥
मेरी प्रीतमकी पाती आन धरदे ॥
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ २ ॥
कोई मोहि प्राण प्यारेसे मिला दो ।
कि मुझ मुर्दा विरिहिनीको जिला दो ॥
जो गुल कुम्हालाया है सो फिर खिला दो ।
तु सतगुरुसे न करती क्यों चिरौरी ॥ ३ ॥
उसी सतगुरुकी सब कुदरत जहाँमें ।
वही हाजिरो दंरपरदः निहॉयें ॥
वही देखते जमीन् और आस्मोंमें ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ ४ ॥
मेरे साहब, मैं तेरे पायलागी ।
तेरी कृपासे मेरी भाग जागी ॥
तेरेही मिहर आजिज हो सुभागी ।
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ ५ ॥

तरजीयबन्द खम्सः कौआ ।

होके नाकारा तो पड़ते भूलौआ । दवें आराम हाड़ और चाम चौआ ॥
बनावे बात क्या वक़्ते चलौआ । अमरफल छोड़कर क्यों हो कोह कौआ ॥
तुझे हरिनामसे क्या काम कौआ ॥

पढ़ाकर वेद और काँकौ किया कर । खोरिशे नापाक खा करके जिया कर॥
कुतुब ख्वानीसे अपना दिलदिया कर । किधर आदम गया है और हौआ॥ तुझे
कि जिसने तुझको यह पोशिश दिया । न उस फर्माबरी कोशिश किया है ॥
तेरी खोरिश और आदत सब छिया है । कहेगा क्या जब आवे बुलौआ ॥ तुझे
सीखा तूने जो हुशियारी जहाँकी । खबर तुझको न इसरारे निहाँकी ॥
न परवाह तुझको आजिजके ब्यौकी । पड़े सिरके ऊपर तेरे ो पौआ॥ तुझे०

तरजिअ बन्द खम्साः (गुरुसेवा) ।

बना आदमका पुतला आवे वतीसे । खबर क्या इसको है नफते आपसीसे ॥
यह घेरा चार सू शैताने लयोसे । निगहकर अपनी इल्ममें दूरबीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥

पयम्बरपीर सदहा जो गुजरते । ऋषि मुनि ओलिया सब कहते मरते ॥
न गलती अपनी पर जो ध्यान धरते । खबर जिनको न बिलकुल कालकी से ॥

हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥

हरीसे मप्स हैं बे इल्मानी । न इनको कुछ खबर घर जावेदानी ॥
हुई उनपर न मुशिद मिहरबानी । उठाले हाथ तू दुनिया वदीसे ॥

हैं सब ने अमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

खबर नहीं जो खबर दारान आलिम । कहाँसे है नुमाँया नफत जालिम ॥
जो पैदा जग बचा कोई न सालिम । खबर तू पूछ अज्ज गोशेः गुजीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

कोई दिलगीर दिलबरकी खबर दे । कि जिसके बदले आशिक अपना सिरदे ॥
हैं जिनसे बात होती है न परदे । खबरको पूछले खातिर हजीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

न जाने भेद जो बातें बनाते । न भूले साधु लुच्चोंके भुलाते ॥
न आशिक कान उनके रख लगाते । तुझे क्या काम कोई नुकतः चीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

तू अपने रङ्गमें रंगा सदा रह । जगतसे पीठरु खुदबा खुदा रह ॥
फिराके यारके गमसे लदारह । तुझे क्या काम आजिजई व आँसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

गञ्जल (चींटी) ।

ज्वलीरा क्या जमा करती है चिउँटी । तु किसके वासते धरती है चिउँटी ॥
नहीं जब तू ज्वलीरा यह कहाँ है । बिला गाहकमें क्यों मरती है चिउँटी ॥

विशेष कथन

न यह घर है तेरा घरकी न तू है । तो फिर घर किसलिये भरती है चिउँटी ॥
जब यक दिन आनकर तुझको लताडें । न तू उस रोजको डरती है चिउँटी ॥
सिखाया तूने यक दिन शह सुलेमों । आजिज बात रख रखती है चिउँटी ॥

गजल (साथ)

जर सीमसेकी जो प्यार ऐ सोंप । है तेरा वह घर वह बार ऐ सोंप ॥
आकरके खजाना पर तू बैठा । यह तेरा था दिल फ़िगार ऐ सोंप ॥

जिस दिलवरसे दिल लगाये । उस जामे तेरा क्रार ऐ सोंप ॥

जर सीम जहाविरात महबूब । उनसेही तेरा था प्यार ऐ सोंप ॥

माशूकके घर तुझे बैठाला । मिल शौकसे अपना यार ऐ सोंप ॥

कर दूर दफ़ीनः से आजिज । पावेगा तू हक्क दीदार ऐ सोंप ॥

गजल—जगतके आदमी हैं डोंगर ढोर । धरम धरधरके मारे डोंगर ढोर ॥

शमअ परवानः आदमोन कोई । हिर्स हैवान प्यारे डोंगर ढोर ॥

काल काबूमें कोई नहीं इन्साँ । मंरते खपते बिचारे डोंगर ढोर ॥

है बरी आदमी सब दुख द्रन्द । हाय तोबः पुकारे डोंगर ढोर ॥

पहन इन्सान लवास आजिज । जान घरको हमारे डोंगर ढोर ॥

तरजिय बन्द खमसः ।

यह कुल मखलूक आतशमें जले हैं । जो मरहम हाथ हसरतसे मले हैं ॥

गुनः करनेमें हरगिज नहीं टले हैं । जो रोराँ संगपर उनको तले हैं ॥

क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ॥

हरीसे दुनियवी हों ग़र्क दुनिया । गुरु और साधु जो बातें न सुनिया ॥

जो बोया तूने सोई तुझको लुभिया । न दुनिया आक़बत यमजीऊ छले हैं ॥ क०

जो सीखे होशियारी कुछ जहाँकी । कहाँ जाना था सोली रह कहाँ की ॥

न जाना भेद इसरारे निहाँकी । सो हराराते जमीं मआदिन रले हैं ॥ क०

लगे इस बाग़ सद्दा बेल व बूटे । दरखतां वे अदद हर जाय फूटे ॥

जो हो फ़लदार सो मालीसे टूटे । सो काटे जायेंगे जो न फले हैं ॥ क० ॥

सदाजो साधुगुरुको सर झुकाये । भजन सुमिरनसे अपना दिल लगाये ॥

दया दान और धरमकी राहबनाये । गुरु और संत फरमांसमे चले हैं । क० ।

हुये जो खाके मोटे मस्त मग़रूर । हमेशः साधु गुरुसे सो रहे दूर ॥

ज़र्क और बर्क पोशिश ताज सुमबूर । सोहों बलिदान मोटे ो पले हैं ॥ क० ॥

नहीं दिलमें जिनके रब्ब रहमान । न उनपर होवे हरगिज रहम सुवहान ॥

सोई आजिज पड़े चौरासीकी खान । न पावें राह सो मर मर गले हैं ॥

क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ।

मुसलमानी धर्म

गजल ।

लगे सब स्वान इस मुर्दार दुनिया । न कोई इनसान मुर्दार दुनियाँ ॥
है कूकरो शूकरो खर सियार पियारी । सो सब हँवान इस मुर्दार दुनिया ॥
जो मुर्दार लगे सो सब हैं मुर्दः । न उनमें जान न इस मुर्दार दुनिया ॥
न ईसमें कोई मजहब है न मिल्लत । सो चारो खानि इस मुर्दार दुनिया ॥
नहीं यह जिन्दगीकी जा है आजिज । यह सब समसान इस मुर्दार दुनिया ॥

कुत्ताका गजल ।

तू घर बघर भूंकता फिरता है कुत्ते । न तू हर्गिज सन्न करता है कुत्ते ॥
दिया था दान और किया था खैरात । जो नंग और भूख से मरता है कुत्ते ॥
जो दुर दुर सब करे और भूखा मारे । कहीं तेरा उदर भरता है न कुत्ते ॥
दिया नहीं फिर पावे तू कैसे । इसी से भूख दुख भरता है कुत्ते ॥
अगर आजिज बचन सुन सन्न करतू । तो फिर क्यायों भूखसे डरता है कुत्ते ॥

तो गाओ गीत सबमिली कहो सुहागिन । जो पाया है अमरबराय सुहागिन ॥
तुम्हें हरिनामसे है काम बरनः । तू बैठ आरामसे घर ऐ सुहागिन ॥
तेरा मालिक निगह वान है । जबरदस्त तुझे कुछ अब नहीं डर ऐ सुहागिन ॥
तुझे हरदो जहाँमें खुशनसीबी । तु पाया अपना घर ऐ सुहागिन ॥
तु है जुग ग अटल तेरी सब औलादा । जमीमें और जमाँ भर ऐ सुहागिन ॥
अगर आजिज पिया का प्यार तुझको । तो यकमूदीदः दिलधर ऐ सुहागिन ॥

खसम जो मर गया है ऐ रॉड । तुझे सब दुखने घेरा है ऐ रॉड ॥
तू चक्की पीस खा दीवार परदे । जो अपने चर्खाको फेरा है ऐ रॉड ॥
तू मिहनत व मजदूरी किया कर । तुझे दिन रात झक झरा है ऐ रॉड ॥
तुझे कहाँ पलंग और कहाँ बिछौने । तुझे गमके कुए गेरा है ऐ रॉड ॥
अब आजिज कहना सुन हरिनाम जपना । तू टूटी झोपडी धरा है ऐ रॉड ॥
खसम तेरे बहुत हरफि कसबी । न हो हरगिज कभी तू साफ कसबी ॥
लदी तू सद गुनाहो से है दिन रात । पहेन दिन चार तू जर बाफ कसबी ॥

खोरिशों पोशिश हैं यह दो चार दिनको ।
हंसी और मसखरी और लाफ कसबी ॥
तेरा देरा हो दोजख आग में जब ।
न फिर हो जूर्म तेरा मुआ कसबी ॥
न आजिज व आज रख तू कान करती ।
कहेंगे तुझको लामो काफ कसबी ॥

किया करता है तू गट गू, समझा नहीं तू मजंमूं ।
दिन चारमें कहाँ तू, हरिध्यान कर कबूतर ॥
ऐसी गिरह जो मारी, ऊपरको ले उडारी ।
वह जा नहीं तुम्हारी कुछ कानकर कबूतर ॥
आकासमें चढ़ाया हम जिन्स में बढाया ।
नहीं इल्म वह पढाया, गिरी आनकर कबूतर ॥
अपनी दिखाके बाजी लोगोंको करता राजी ।
यक दिन पकड़ ले क्राजी क्या मान कर कबूतर ॥
आजिजकी बात सुनले और मनमें अपने गुणले ।
सत्तनाम सबमें चुनलें पहचान कर कबूतर ॥
सुन सतगुरुकी वैना और समझ उनकी सैना ।
दिन चारमें तु हैना, सत्तनाम बोल मैना ॥
सीखी जबाँ केती, थी अकल तुझमें जेती ।
अबतक पकी न खेती, सत नाम बोल मैना ॥
बोली अजब बोला, सर काल कर कलोल ।
तब जाब कौन टोला, सत नाम बोल मैना ॥
पढ़ पढ़ जबाँ खपना, माने बिगानः अपना ।
दिन दो तीन होवे सपना, सत नाम बोल मैना ॥
आजिज तू छोड़ पिंजर, और रिश्तः तोंड़ पिबर ।
फिर फिर न जोड़ पिंजर, सत नाम बोल मैना ॥

तू तन मन धन लगाकर अपना गुरुपूज । क्रदमपर सिर झुकाकर अपना गुरुपूज ॥
न गुरु बिन हरिको पावे तु हरगिज । तू उस फर्मा बजाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको मिहर पावेगा हरिको । सो साम्ना बनाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको छोड़ हरिको ढूँढ अहमक । जहां पावे बुलाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरु गोविन्दसे बढकर है बेशक । यही ईमान लाकर अपना गुरु पूज ॥
वचन कबीर साहबका यह आजिज । जहां होवे तू जाकर अपना गुरु पूज ॥
तु शमसे अपने रोयाकर विरिहिनी । मुंह आँसूसे तु धोया कर विरिहिनी ॥
उठें जब दर्द भारी तेरे अन्दर । कलेजा अपना टोयाकर विरिहिनी ॥
प्यारे बिन तेरा दुख कौन मेटे । तु अपनी जान खोयाकर विरिहिनी ॥
पपीहा ज्यों रटो अपना पिया पीय । मगुफ़लत ख़्वाब सोयाकर विरिहिनी ॥

लिखाकर और किया कर वस्फ उसकी । जबों अपनोको गोया कर विरिहिनी ॥
तुही तुही तुही तू देख हर रुख । तु दिल दरिया बिलाया कर विरिहिनी ॥
तुयक रुख हो नजर कर अपने आजिज । भरम दरिया डुबोयाकर विरिहिनी ॥

रोतेही शामसे सेहर आया । यार अबतक न मेरे घर आया ॥
आह व नालोंमें सारी गुजरी रात । मेरी महरू न मन मिहर आया ॥
करूँ तदबीर कौन है चारा । किस लिये उसके दिल क्रहर आया ॥
मेरी भिन्नत सुना मेरे क्रासिद । अब तलक नहीं प्यामबर आया ॥
नहीं आसूँके तार टूटेंगे । अबतो दिल दीद अपना भर आया ॥
तुही तू तूही तू नजर आवे । हमः मौजब सर बसर आया ॥
नहीं तुझसे है खाली कोई जाय । हर जगह एकसा नजर आया ॥
किस लिये वस्लसे किया महरूम । शोम बद मेरा काम कर आया ॥
हो गया सख्त क्यां तेरा दिल मोम । क्या करूँ अबतो उससे दर आया ॥
तेरा दामन न छोड़ेगा आजिज । जान लग तक मेरा अगल आया ॥
नहीं तेरा जो मुशिद मिहरवों है । तो एकही ढंग जाहिलो वेद ख्वों है ॥
अगर तिशनःसे तू होवे जो बेताब । तो साक्री हाथ प्याला हरजमाँ है ॥
अगर प्यासा नहीं तो क्या पिलावे । वह दायम दूर तुझसे बेगुमाँ है ॥
जहां चाहे तु पीय प्याले इश्क । तुझ क्या खौफ पीले दमाँ है ॥
तुझे मिलनेकी जब हो बेकरारी । तू पीव उसकी जहाँ दूढे वहाँ है ॥
दरू भी वह बेरुसे तुझको देखे । वह जाहिर और परदः निहाँ है ॥
नहीं पहचानता उसको वह तकसीर । अब उस पहचान आँख एसी कहाँ है ॥
नहीं दिलगीर माल और जानदेखुद । करशमये नाजका शेवः बुताँ है ॥
कि, तेरा आह व नाला गिरियः जारी । कशीदः दिल करे दिलबर जहाँ है ॥
कि, तू नाचीज व नालायक है आजिज । और वह बसके ऊपर शहनशाहूँ है ॥

तेरा खुशतर जमाल ऐ पाक दामन । तु खुश खुल्क और ख्याल ऐ पाक दामन ॥
सितारोंमें है जैसे बन्द रौशन । तु सब सखियोंमें लाल ऐ पाक दामन ॥
है तू जो अपने पीतमकी प्यारी । तेरा खुश वक्त हाल ऐ पाक दामन ॥
तेरे हुसनो नमक नाजो अदाके । मुकाबिल न जमाल ऐ पाक दामन ॥
फटे कपड़े व मैली गर तेरी भेस । तेरा बरतर जलाल ऐ पाक दामन ॥
इधर और उधर हरगिज तू न ताके । तेरा फजलो कमाल ऐ पाक दामन ॥
खसम अपनेकी तू फर्मा बर्दारि । मिलेंगी लागजाल ऐ पाक दामन ॥
तेरा खाविन्द हक तुझसे मिलादे । तू आजिज हो बहाल ऐ पाक दामन ॥

शक्ति धर्म

समझ कर ऐसा दूँढो वर कुमारी । सदा सुखसे रह अपने घर कुमारी ॥
जो आसेबसे तुझको बचावे । रहे बाकी न कोई डर कुमारी ॥
हया और शरम तेरी रख रख जहाँमें । वही भर्तार अपना कर कुमारी ॥
यह तीनों लोक है भरपूर नारी । है सबमें एकता एक नर कुमारी ॥
उसी नरको तू पहचाने जो आजिज । वही है एक तेरा वर कुमारी ॥

तु क्या बैठ लगाकर ध्यान बगला । तू अन्दरसे कपटकी खान बगला ॥
तेरे नजदीक मच्छी कोई न आवे । जो उनमें अकल हो पहचान बगला ॥
दशाकी हाट यह तूने जो खोला । न आवे कोई तेरी दूकान बगला ॥
खबर जिसने न गुरुसे अपने पाया । फँसेंगे सो तेरे जाल आन बगला ॥
खबरदारोंको आजिज क्यों फँसावे । फँसेंगे आनकर वे ज्ञान बगला ॥

तरकीब बन्द ।

हुई यह आग सत पुरुषसे पैदा । हुआ जिसपर है कुल आलम यह शैदा ॥
उसीसे तीन गुन और पांच तत्त्व है । उसीसे चौदहो प्झन्दी हवैदा ॥
है उसका कारखाना कुल जहाँमें । उसीसे खलकको की पीस मैदा ॥
सभी सुरनर मुनीश्वर उसको पूजें । यही गुरु सिख है रोगी व बँदा ॥
जहां सत पुरुषकी भगती न पावे । वहां ऐ आग तू डेरा बनावै ॥ १ ॥
उसी आतशसे पैदाइश वका है । उसीसे फेर कुल आलम फन्ना है ॥
उसी आतशकी पूजा कुल जमींमें । उसी आतशको देखो जा बजा है ॥
उसे पूजे फिरिश्ते आसमोंमें । उसीको देख कुल अर्जों समों है ॥
उसीका कारखाना सब नमूदार । वही ब्रह्माण्ड और पिण्डो बना है ॥
जहां गुरु साधुकी सेवा न होवे । वहां तू आग इल्मो अकल खोवे ॥ २ ॥
जलाया उस आगने सारा जमानः । ठगे सबको किया सदहा बहानः ॥
ठगे ब्रह्मा व विष्णु शिव भवानी । ठगे सिद्ध साधु पैगम्बर जमानः ॥
ठगे सब औलिया पीरों फ़क़ीरों । ठगे सब अस्ल दुनिया मुजरिमानः ॥
ठगे चौरासी लाख जानदार सारे । पड़ सब जालमें मुर्गी ब दानः ॥
जहां तू देख होवे साधु निन्दा । वहां ऐ आग हैं सब तेरे बन्दः ॥ ३ ॥
जहां मयनोशी व शहवत परस्ती । जहां क्रस्साब खाना और बस्ती ॥
जहांपर गोशत ख्वारी, किन्न कीनः । जहां बेखबरी बेहोशी व मस्ती ॥
हैं जो कोई झूठ जुल्मो जब्र आदी । तेरी खातिर हैं उनकी जान सस्ती ॥
हैं जो तहक़ीर करते साधु गुरुकी । उन्हीको दीन दुनियामें पस्ती ॥
जहां गुरु साधुमें हो जाय खाली । वहां ऐ आग तूने आग डाली ॥ ४ ॥

देवी और आसुरी संप्रदाय

तुही ऐ आग खालिक है जहाँकी । तुही महरम है इसरारे निहाँकी ॥
तुही ऐ आग सब जाँदार मामूर । तुही मालिक जमीन और आस्माँकी ॥
तुही देती है सबको खौफ अल्लाह । तु देवे फेर अकल राजदोंकी ॥
जहां आजिज न पण्डित स्वसंवेदी । तु बैठी अकल पर हर वेद ख्वाँकी ॥
जहां सत गुरु न कोई हंस उसके । वहां ऐ आग तू रह बैठ घुसके ॥५॥

यथा ।

नहीं दर्वेश सा कोई जहांमें । कि जिनको फिक्क हक्क दिल और देहों हैं ॥
जितने दुनिया सलातीन और गनी हैं । न कोई हक्क शनास इन जेरकोंमें ॥
न जिनको अपने अपने हक्कसे खबर है । सो हैवान सूरत आदम वहाँ में ॥
जिन्हें हक्कसे खबर सूर्य शहदो आलम । उनहीसे हक्क इनसानी अदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ १ ॥

जिन्हें शबो रोज अशरतमें गुजरते । न जो गुरु साधुओंका संग करते ॥
पचे निसिदिन ब आफातेन जमाना । तमअ हिसों हवस शहवतसे मरते ॥
हसद कीनः व बुगजो पुर अदावत । कभी जिकरो फिक्क हक्क दिल न धरते ॥
कुछ नहीं होश जिसको आखरतकी । सरापा सद् गुनाहोंसे लदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ २ ॥

हैं फुकरा बावशाहों आलिमोंके । सोई रहबर है मुफनसि जालिमोंके ॥
वहीं हैं जाबना बरते खुदाई । वहां बखशिन्दः हैं सब तालिमोंके ॥
वही हैवानको इनसान करते है । कायम उनसे ईमों सालिमोंके ॥
यही सुलतान यही सुलतान यही हैं । जमीं और आप्तमोंमें यह सदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ३ ॥

तु दिलमें देखले अपने दिवाने । अदमके मुल्क जब आदम समाने ॥
न तू तब है न में और है न दुनिया । न हशमत जाहका कोई कोई कारखाने ॥
फैना सब हों रहे कोई न बाकी । पलट जावेंगे जब कुछ जिस जमाने ॥
रहेंगे बाकी आशिक अल्लाह आजिज । वही बदबखत जो हक्कसे जुदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ४ ॥

नज़म ।

तू कैसी खूब अरबी बोलता ऊंट । पकड़ लैवेगा तौभी जब तेरा घूंट ॥
जो झींगर हैं यह पण्डित सामवेदी । सो दाऊदी लहनका खूब भेदी ॥
बतक बोले अलेमानी व युनानी । रहे बाकी व तेरी भी कहानी ॥
कबूतर तीतरो बोल अरबी तुर्की । तुम्ही कह क्या खबर उस धाम धुरकी ॥

सिंहावलोकन

जो बोले संस्कृत मीठी तु मोरा । तेरा गर्दन भी धरकर काल तोरा ॥
तु अंगरेज़ी ो बोले बोल मैना । तेरा भी टूटेगा यकरोज़ डैना ॥
जो शिरीं बोल तूती फारसी है । पकड़ पिंजरेमें तुझको ड़रासी है ॥
ऐ मँढक तू सिलंगी बोल बोला । तेरे सरके ऊपर जमकर कलौला ॥
फ़रासीसी लातीनी सिख वैरा । तेरी गर्दन ऊपर भी छुरी फ़ेरा ॥
जो मेगपयी बोलयी सदहा जवानों । तुझे मारेंगे धर कहरवानों ॥
ज़ीलतसे रज़ीलत घरमें जावे । अगर सदहा जवानें सीख आवे ॥
हुआ हैवान तू इनसान मूरत । न पहचाना जो अपनी अस्ल सूरत ॥
किया था किसलिये आदमको पैदा । हुआ तू किसके ऊपर आनके शैदा ॥
तू खालिक याद कर अपना ऐ नादों । शबोरोज़ो शाम बाम दादों ॥

॥ ल-यह मान मड़क तेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।

यह भीड़ भड़क डेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।

यह शान और शौकत इधर उधरका सैर ।

हर चार सिम्त फेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥

यह माल मुल्क जाह और हशमत व कुलाह ।

यह दुनअबी उरझेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥

इससे न बड़ी नेमत है यह देह बशरकी ।

कागज़का दुनी बेरा सो दिनमें गुज़रजा ॥

सत नाम यक साहब सच पकडले आजिज़ ।

यह तेरा और मेरा दो दो दिनमें गुज़रजा ॥

छिपाया यारको ऐ शोर बखते । लखाया ग़ारको ऐ शोर बखते ॥

किया दिलने मेरे दिलबरसे परदः । जताया नाज़को ऐ शोर बखते ॥

रहे रहमां तू कर दिया बन्द । बताया मारको ऐ शोर बखते ॥

जहर धरदी हेयाते आबकर दूर । कियाबन्द कारको ऐ शोर बखते ॥

नहीं नेमत सरासर गन्दगाकी । लगा अम्बारको ये शोर बखते ॥

गया जब भूल आजिज़ ठग भूलाया । दिया दारको ऐ शोर बखते ॥

साधुसेवा जो त्याग दुनियादार । हर तरफ देख आगदुनियादार ॥

देख आतश जिधरको जावेगा । फिर किधर जावे भागदुनियादार ॥

साधुगुरु बिनकहां ठिकाना और । है पड़ा पीछे नाग दुनियादार ॥

कुछ कर सोच दिलमें ऐ नादां । अब तू उठ और जागदुनियादार ॥

तेरे दिलदीलः भी मुकदर है । मोडले अपनी बाग दुनियादार ॥
संत सेवा बिना न पावे राह । उनकी खिदमतमें लाग दुनियादार ॥
संतके जा पकड़ कदम आजिज । देख तब राग रँग दुनियादार ॥

साधु सेवा करो भला होवे । इससे तन मन जो निर्मला होवे ॥
साधु सेवा जो करे मुवारक सो । इससे दूर अपनी बला होवे ॥
संत गुरु बिन फ़तह न पावेगा । गर तेरे हाथ रह कला होवे ॥
संतकी, रोशनीसे तब कुछ देख । होवे जों रातदिन जो ढला होवे ॥
संत बिन हो न तू रहा आजिज । कौसाही गर तू दिलचला होवे ॥

मुरब्बा ।

दुनिया पड़े वनाम खुदा जो कमायेगा । गर पेटभरने अपनेसे ज्यादा तू पायेगा ॥
देनावहक जरूर तेरे हकमें आयगा । खुमस जकात भूल बनी मार खायगा ॥
हरगिजन भूल दुनिअबी खुमसजकातको । जिसने तुझको दिया उसलाय मौतको ॥
तकसीम करता है सोई हरयकके कूबतको । खुमसजकात भूल घनी मार आयगा ॥
देना तुझे जो कुछ है सो दहीके छुटेगा । गर देनेको न देवेतो घर काल कूदेगा ॥
दौलत मताअमाल सबयकरी रोज लूटेगा । खुमस जकात भूल घनी मार आयगा ॥
यह तुही शाही शहनशाह आलमी । छुटे नहीं बहुनिपान छुटेगा सो वहीँ ॥
जाहिरकी आखदेख वातिनकी भी बबी । खुसम जकात भूल घना मार खायगा ॥
खुमसबजकातदी नहीं कारूँ होहलाक । जिनको नहीं है वौफ खुदाबर तरी पाक ॥
करतेबसर रहे जिन्दगी अपनी वाक । खुमसजकात भूल घनी मार खायगा ॥
खुमः जकातजितने हैं जमीपरमुनकराँ । बेशक तू उनको जानलेकारूँ विरादराँ ॥
भड़केगायका जगज्रबरब्वेकहरमां । न खुमसजकातभूघनीमार खायगा ॥
सनतौसिपाहसाहबफिरते जहाँ तहाँ । उनके हवालेकर जो देना बहकसुबहों ॥
पीछेखजाना खासनआजिजहैशकवहाँ । खुमसजकातभूलघनीमार खायगा ॥

तर्जियाबन्दखम्सः ।

सूझता तुमको है नहीं अन्धा । इसलिये काल कैदमें बन्धा ॥

पावेगा भेद शब्दके सन्धा । कौन कह भेद तुझ उस रब्बकी ॥

संत सूरत हैं सांच साहबकी ॥

होवे साहब वहाँ हों संत । संत बिन तु कभी न पावे कंत ॥

मुनता लीलाअपार और बेअन्त । उनकी बातें हैं कुछ जुदेढबका ॥

संत सूरत हैं साँचे साहबकी ।

हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण

सन्त महिमा अकथ सो जाने कौन । सन्त जावें जहाँ न पानी पौन ॥

निःअंगमनिःनिगम हैं साधुके भौन । आजिज वह बात और कहों तबकी॥

संत सूरत हैं सब सौंचे साहबकी ॥

यथा-ज्वरो जन व वेद बानी । है । यह गिर तारकी निशार्नी है ॥

इनसे हो जा अलग सो ज्ञानी । है मौतके तीरकी सोई गांसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ॥

गुल खिल हैं यह तीन मायारूप । डालदे आदमी अंधेरे कूप ॥

सूझे उसको न कोई साया धूप । है यह माया मायाके तीनहूँ हाँसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ।

इनको जब छोडदे सो होवे फ़क़ीर । ज़हर आलूद इनकी है तासीर॥

आजिज इनसेही मिल है पुर तक्कसीर । है सोई धर्मरायकी हँसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ॥

ग़ज़ल ।

करदिया आके अन्ध धन विद्या । कोई न मुक्ता हो पाके धन विद्या ॥

इल्मो अमलसे खबर न रही । वेखबर दिल लगाके धन विद्या ॥

जहां जाकर क्या भये दोनों । मूक उसको बनावे धन विद्या ॥

जगहमें सो नेकबख्त कहलावे । हक्कको बातिल बातवे धनन विद्या ॥

फंस मेरे कार दुनियवी दिनरात । याद हक्कको भुलावे धन विद्या ॥

तब कहाँ गुरु है और कहाँ है साधु । रहे दोजख दिखावे धन विद्या ॥

हक्को चाहे तो दोनों छोड़ आजिज । हवस दिलमें न आवे धन विद्या ॥

कारमें दुनियवी हुआ अन्धा । है तेरे वासते हुआ अन्धा ॥

डालदेवें अज़ाबमें तुझको । तब कहाँ खाला बुआ अन्धा ॥

कौन तब काम तेरे आवेगा । आके जम नाग जब छुआ अन्धा ॥

याद हकबिन जो होगया तू बैल । मोठेपर अपने धर जुआ अन्धा ॥

वेद पढ़ पढ़के क्यों हुआ नादां । मैनाही काका और तब अन्धा ॥

रहन पावें बेगैर सतगुरुके । राम क्या बोले तर सुआ अन्धा ॥

तूने उमीदकी जो समरसे । आखिर उससे उड़ा छुआ अन्धा ॥

आजिज आखिरको उस सेहो नाउमीद । देख उसमें तू था रवा अन्धा ॥

रख न उमीद बेवफा दुनिया । है यह बेसिदक़ और सफ़ा दुनिया ॥

तनको यह पालती व रूह ऊपर । करती है जोर और जफ़ा दुनिया ॥

धर्म रक्षक हिन्दू धर्मकी दुर्दशा

पहले तरगीब देकेलेवे फँसा । पीछेसे होवे फिर ख । दुनिया ॥
तेरा इनसानी बामाकर बरबाद । फेर देवेंगे यह दशा दुनिया ॥
इससे किसको है बरखोरी आजिज । पावे हरगिज न रह बका दुनिया ॥

दुनिया जो कुछ सो तेरा तन है । हेच जान इसको सोई साधन है ॥
हेच इसको जो कर तो सब कुछ हेच । फिर न दुनियाके बीच पागन है ॥
प्यार इस तनसे प्यार दुनिया है । देह दुनियाको छोड भागन है ॥
देह दुनिया नहीं तो सतगुरु देख । आखड़ा होवे तेरे आँगन है ॥
जबतलक देह दुनियासे है प्यार । तबतलक वह लगन न लागन है ॥
मारसे तुझको व्यार हो आजिज । तो मुहब्बत ये दोनों त्यागन है ॥
जो गुलामां इश्क शह आया । कुल आलमका क़िबले गह आया ॥
अर्श और फर्श सब हुये रौशन । अब मेरे घरमें मेरा मेह आया ॥
भटका फिरता था जो व्यावामें । खाके ठोकरको अपने रह आया ॥
इश्क हजरत जहां नहीं रहबर । रहमें उसके ग़ार वह छह आया ॥
इश्कसे भागजा किधर आजिज । यह अमानत जो रखने कह आया ॥

क्या हमलमें करार कर आया । उससे अब तू फिरार कर आया ॥
उसका अब तुझको नहीं कुछ होश । घेर अब अन्धकार कर आया ॥
नहीं सुनता न सूझता है कुछ । धुन्ध गर्द व गुब्बार कर आया ॥
याद अब तुझको है नहीं अपना कौल । सत्यसाहब पुकारकर आया ॥
होश करता नहीं तू ऐ बेहोश । ख्याब गुफलत खुमार कर आया ॥
होगये जीव अन्धे और बहरे । बाज़ वह हर दयार कर आया ॥
अपने बन्धनके वासते आजिज । काम तू बेशुमार कर आया ॥

जहां जाओ वहां यह नागिन है । कहरबान मिइरबान यह नागिन है ॥
सीम व ज़र वेद बानी औरत जो । भरी सारी जहां यह नागिन है ॥
जितेदुतिवाके तालिब और मतलब । ज़हर पुर दर्द यहाँ यह नागिन है ॥
काट खावें सब अहल दुनियोंको । रह बरो हमरहों यह नागिन है ॥
यही आशिक हुई वही माशूक । सब पै शहनशाह यह नागिन है ॥
लोग और वेद आजिज इसका है । साथ हरदो ज़बान यह नागिन है ॥

जगतको अन्धकार दिया उलमा । अपना घर अज्ञान भर दिया उलमा ॥
न इबादत न जोहर है तक्वा । खोल राह सक़र दिया उलमा ॥
कहां रहमान रब्ब न साध गुरु । हिर्स हैवान समर दिया उलमा ॥

हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता

अहल दुनिया दब मरे सारे । सरपर भारी हिजर दिया उलमा ॥
पेटके वासते नचे दिनरात । ख्वाब गुफलत खुमर दिया उलमा ॥
कोई न वेडार सब हुये ग्राफल । राह दिखला देहर दिया उलमा ॥
आब हैवों प्याला को कर दूर । हवस हैवों चर दिया उलमा ॥
रास्ती सूझी और न वृझ कोई । तलक्रीन शैतां सर दिया उलमा ॥

खुलक इनसानसे सब हुये महरूम । राह बतला दिये हरदिया उलमा ॥
अपने खालिकको छोडकर बतला । उन्स जोरु व जर दिया उलमा ॥
होके आदम न पावे सीधी राह । शर सद हरबशर दिया उलमा ॥
दी छिया रास्ती और खोल दरोग । राह उमीद व डर दिया उलमा ॥
कुत्ब और किससा और शरआशीरी । सबक करे व फर दिया उलमा ॥
हर बरारको सो मांगना सिखलाये । भीख रह दर बदर दिया उलमा ॥
सारे टिडी हुये उड़े आस्मां । सबको परवाज पर दिया उलमा ॥
वहां जाकर करार पावे । कौन । जाने चौरासी धर दिया उलमा ॥
कीच कसरत खबर न वहदतकी । मौज मेल मकर दिया उलमा ॥
गोता खावे हजार निकले किधर । वहरमें सद चक्र दिया उलमा ॥
पेटके काममें पचे परपंच । फिक्क व फाका फुक्क दिया उलमा ॥
ऐश व अशरतमें फँस गये आदम । ख्याबखोरिस व जहर दिया उलमा ॥
आजिज अब क्या तू आह व नालःकरे । डाल खौफ़ व खतर दिया उलमा ॥

पार जावेंगे आलिम आमिल । राह दिखावेंगे आलिम आमिल ॥
सुखरु सोई हैं दरदो जहां । दुख न पावेंगे आलिम आमिल ॥
आफ़्ररीं सद है उनको और शावास । रह लगावेंगे आलिम आमिल ॥
आप किसती चढ़े चढ़ावें और । फिर न आवेंगे आलिम आमिल ॥
आलिम आमिलकी खूबी यह आजिज । मत सिखावेंगे आलिम आमिल ॥

लिया मायाने खा चतुर व चिकनिया । गये दोजख समा चतुर व चिकनिया ॥
मिली उनको सतगुरु दस्तगीरी । रहे तारीक्या चतुर व चिकनिया ॥
न उनपर साधु गुरुकी मिहरबानी । अँधेर दिल छुटा चतुर चिकनिया ॥
वह घर आजिज फिरातन सादः लौहों । वहां कोई न जा चतुर चिकनिया ॥
भजन भगवान कर मीत प्यारे । लगा शैतान है ऐ मीत प्यारे ॥
है दिनमें काम सब जौर व सोच । कहाँ रहमान है ऐ मीत प्यारे ॥
तो जल्दी सोच जप हरी नामसे लग । यह तन इनसान है ऐ मीत प्यारे ॥

मुसलमानोंके अत्याचार

कहां फिर पावे तू यह आदमी देह । हुआ हैवान जब ऐ मीत प्यारे ॥
किधर दौलत किधर दुनिया यह जावे । कहां इरकान है ऐ मीत प्यारे ॥
नहीं मैं तू नहीं संसार आजिज । हुआ जब ज्ञान है ऐ मीत प्यारे ॥

जग डुबाते हैं पण्डितो मुल्ला । मत सिखाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
चण्डी हनुमान भैरौ पूजा कबर । रह भुलाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जबह व खून कल्ल व कुरबानी । गल काटे हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अबिन आदम पड़े ब बहरे अमीक । धर दबाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अपने लोभ और अपने मतलबको । दिल डोलाते हैं पण्डितो जो मुल्ला ॥
आदमी सो नहीं जो डंगर ढोर । पशु चराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जुल्म और जब और नाहक खून । सो कराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
रास्ती दुश्मनी और दोस्त दरोग । हक छिपाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
दोस्त हक क्यों हों दुश्मने दर्वेश । लोग भाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां मारनेको दरियामें । जाल पाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां फँसती हैं नहीं आदम । धर फँसाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
ढोल मृदङ्ग झांझ व मजीरा । टमटमाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
आजिज यह जगमें जाहिरा डग दूत । मार खाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥

यथा

खबर उस यारकी कहिये फकीहो । अकलके पारकी कहिये फकीहो ॥
जहां पहुंच न विद्या वेद वाणी । वह न गुफातारकी कहिये फकीहो ॥
कहां है जिन्दगी दारु कहां मौत । वह मुहरा मारकी कहिये फकीहो ॥
हुआ हँकारसे आलम हवैदा । वहना हँकारकी कहिये फकीहो ॥
वह साहब सारेका जो वरतरी है । बड़े सर्कारकी कहिये फकीहो ॥
जहांपर अकल कुलकी अकल गुम है । रह उस दर्बारकी कहिये फकीहो ॥
अलख जिसको कहे सब सिद्धि साधू । कुनह इसरारकी कहिये फकीहो ॥
जहां नाकारा हैं सब कारबारी । वहांके कारके कहिये फकीहो ॥
शरीअत न वहां न मारफत है । वह शब्द सारकी कहिये फकीहो ॥
यह सब संसार जो दर गुप्तगू है । वह बे संसारकी कहिये फकीहो ॥
हैं सदहा खालिको मखलूक जिससे । कुछ उस कर्तार की कहिये फकीहो ॥
जहोंसे आत्मोंमें गुल खिले सब । ढब उस गुलजारकी कहिये फकीहो ॥
बना जो बागबौ और बाग सदहा । वह कुल मुख्तारकी कहिये फकीहो ॥

हिन्दुओंकी दृढ़ता, हकीकत राय

कौनसीराह व रहबर क्या सबारी । सिफत रहवारकी कहिये फ़कीहो ॥
किधर यूसफ मेरा हैं कहाँ जलीखा । वह नौ तिफसारकी कहिये फ़कीहो ॥
हुआ जिस सोचमें आजिज यह आजिज । अब उस निकायकी कहिये कीहो ॥

मुरब्बा ।

खुद ज़लो कमाल पर हैं नाजा । दिलपर है मुनतिक एतराज़ों ॥
पढ़ कुत्ब जो फरहान और शादों । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
कहते हैं जो फिलसिफे जमानः । जाने नहीं नामका निशानः ॥
जाहिद न बशकल जाहिदानः । दानादुनी हक जूहूर नादों ॥
बिन सतगुरु सारे बेखबर हैं । सब खाम ख्याल उनके सिर हैं ॥
वेद वकुत्ब उनके रहापर हैं । दानादुनी हक हुज़ूर नादों ॥
जी रूह नहीं हैं बद बानी । क्या कहसकें राहे जावेदानी ॥
बनाते जो कुछ सो सब है फानी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
पुर होगया दिल जे वह्य बातिल । मनमस्तहो याद हकसे गाफ़िल ॥
हरगिज न सूझे राह साहिल । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
मामूर व मक़ न फितनः रोबाह । भूले हैं पढ़ अस्ल अपनीकी राह ॥
क्या खूब है अकल कहिये वाह वाह । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
करते है दावा जो हक शतासी । दुनियासे हैं खुशदिल उदासी ॥
अनगैब है जो काल फांसी । दाना दुनी हक हुजू नादों ॥
इन बेखरों मत खबर कह । जो चढ़ते न साधु सैतकी रह ॥
जावें वह जिधर सो देखें सो छः । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
गर पूछो कहाँ वह हक पियाँजी । बतलाते यहाँ है और वहाँजी ॥
क्यों करसकें आजिज वह ब्याँजी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥

गज़ल ।

मरेगा भूख दुखमारा तू ऐ सूम । न पावे अपना जब चारा तूरे सूम ॥
फिर दर दर भूखा मुँह पसारे । जो धन अपना जुये हारा तूऐ सूम ॥
दिया कुछ न व सेवा साधु गुरुकी । उठा इफ़लासका भारा तूऐ सूम ॥
बिहिश्ती हों न हरगिज बखीलों । किया बर्बाद धन सारा तूऐ सूम ॥
जुहद तकबान आबकाम आजिज हो जब इमसाक बधन प्यारा तूऐ सूम ॥
होवे बेशक तू सरफ़राज सखी । गिरह दिल की होवे बाज सखी ॥
हकका महबूब और तू फ़रजन्दा । उसके आगे है तेरा नाज सखी ॥

भूत पूजे जहाँ न गुरु पूजा । हक हैं पूजे जहाँ न गुरु पूजा ॥
चारों आँखोंसे अँधसो सरे । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें हैं कुछ न अकल और न तमीज । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें भक्ति गरीबीकी कहाँ बू । कुत्र सूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
सो तो हैवान सर बसर आजिजाकाम अरुझे जहाँ न गुरु पूजा ॥

देख दुनियामें यार आग लगा । मैं जाना कि मेरा भाग लगा ॥
जलते ब्रह्मा विष्णु व शिव शंकर । सारे सिद्ध साधु नाग लगा ॥
लाख चौराशी छूट पिचकारी । तीन और पाँच खेल फाग लगा ॥
होवे मक्खन बने दही मही कैसे । जबतलक गुरु न अपनी जाग लगा ॥
रोना वाजिव है और नालःआह । अहमक आदम जो रंग राग लगा ॥
कौन पावे उसे किधर आजिज । जो न दिलजानसे अपने लाग लगा ॥

बैल पर पोथियाँ लदी देखा । राहमें उसके एक नदी देखा ॥
बोझसे मरता है वह बिचारा । सर बसर मगज् पुर खुदी देखा ॥
खा खली भूस समझ न सोच उसमें । चाल इनसानसे जुदी देखा ॥
दे डुबा बहरमें किताबोंको । करता रुह अपनेसे बदी देखा ॥
बैलसे खेत चर लिया आजिज । साधु संगतिमें सरमदी देखा ॥

आगया जब ज़मानः तारीकी । खोलदी जब धाना तारीकी ॥
हर बशर खाली रोशनीके चिराग । भर गई सारे खानःतारीकी ॥
देखहर सिम्त है न नूर कहीं । कर दिया सद महानःतारीकी ॥
फँस गये कार दुनियबी आदम । रोक रह जाहिदानः तारीकी ॥
उन्सकी तू वेगानः से आजिज । परदःमें करेगा न तारीकी ॥

जिसे मैं चाह बे नामो निशों है । कि मेरा माँह बे नामो निशों है ॥
किधर जाऊँ किधर दूँ द कहाँ है । यहाँकी राह बे नामो निशों है ॥
हैं कुलफानी जोहैं दरअकल और बहम् । वह क्रिबलें गाह बे नामो निशों है ॥
बहर जानिब गुलामों हुकमरों है । वह शाहनशाह बे नामो निशों है ॥
तअम दुनियामें सारे लगरहे हैं । वह बेपरवाह बे नामो निशों है ॥
हैं सवदरबन्द जो नाम और नामी । मेरा अल्लाह बे नामो निशों है ॥
हुआ आजिज अब आजिज यह किधर लाये ।

मेरा दिल ख्वाह बे नामो निशों है ॥

मुरब्बा ।

कहने सुननेमें जो कुछ आया है । वेद और कुत्ब खाने जो बतलाया है ॥
सिद्ध साधु पैगम्बरों जो गाया है । दुनियाका गुरु व पीर खुदा माया है ॥
ज्ञान ध्यान इलहाम वही और सलाम । मुतकलिम मुखातिब शब्द कलाम ॥
सामान हैं दुनियामें जितने नामी नाम । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
अकल और ख्याल ब्रह्मसे जो है पार । हरगिज़ न महसूस न सोदर गुफ्तार ॥
क्या जाने खबर वेखवरों शब्द सार । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥
दुनियाकी जो कुछ चाहसो दुनिया की कहिये । जानदार दुनि दरिया २ में हैं ॥
दरियाय जाँदार सगर धार है । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
आकिलाँ हलके अकल पेच कहा रह हैं कहाँ । जो बाहर अकल उसका माहिर है ॥
अकलके पार जो आजिज़ कहो सो जाहिर है कहाँ । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥

मुरब्बा फकीहोंपर ।

फखर दौलत दुनी देहों पर । चश्म बर खुद न किज्वजेहोंपर ॥
नजर ख्वाब व खुर मलीहोंपर । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
पढ़ गये वेद न भागवत गीता । कुत्ब ख्वानीमें उमरों बीता ॥
नफ्त अम्मारःने इन्हें जीता । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
बाअज और पन्द बात बकते हैं । माल बीयोंकी तरह तकते हैं ॥
गली कूचा न फिरते थकते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जिसनेकी आदमीका दिलकाला । जोहद व तकवाको दूरकर डाला ॥
टुक दम भी न याद हकतआला । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
रात दिन कारमें जो मरते हैं । हज्जो फुकरा खुशीसे करते हैं ॥
बैल हैं घास पर चरते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
गुज़रा दिन कारबारमें सारा । रात आई हुआ जो अँधियारा ॥
बादः गुलरु हैं महफिल आरा । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
शरआकी टट्टी जो धरते हैं । कुत्ब ख्वानीमें दिन गुजरते हैं ॥
टट्टी घोखे शिकार करते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
आप भटकते हैं औरको भटका । आबिन आदम अदमकी रह अटका ॥
होश न, पाँव गारमें लटका । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जानते लोग यह तो आलिम है । दर हकीकत सोरूस जालिम है ॥
सदहा गुमराह करते फिरते हैं । रोजोशव फिक्क मआश मरते है ॥
हकके खौफसे न डरते हैं । हाय अफसोस इस फकीहोंपर ॥

खुद फफीहत नजीहत औरोंको । बेल रह बर हुआ सतूरों को ॥
क्या तू आजिज सिखावे बूरोंको । हाय अ सोस इन कीहोंपर ॥
तरजीआ बन्द ।

जबाँ मेरी तु जबतक है दिहनमें । न हो गाफिल मदह मुशिदे कोहनमें ॥
गुरुका शुक्र और अहसान कर याद । रह उसबरमां बरी खिदमत चहनमें ॥
कभी अहसान शुक्र उसका तू मत भूल । कि, पहुँचे तू अमरपुरके सिहनमें ॥
गुरु सा और तेरा है न मददगार । बचाया शोर दरियाके बहनमें ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दोआसे ॥
खुदाने खुदाको दर परदः छिपाया । गुरुने खोलकर उसको दिखाया ॥
खुदाने कर दिया आलम अँधेरा । गुरुने इल्मका सूरज उगाया ॥
खुदाने हर तरफ झगड़ा पसारा । गुरुमे सुलहकुलकी रह बताया ॥
खुदाने आग आलममें भड़काई । गुरु बारा न रहमतकालें आया ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥
गुरु खिदमतसे ईमानकी करारी । उसीकी मिहर करमां फ़ज़ल बारी ॥
समझ और सोच किसने उतारा । गुनहका बोझ तेरे सिरसे आरी ॥
गुरु गोविन्दसे बढ़कर है साहेब । गुरु बिन कुल जहाँमें ग्रियः जारी ॥
अँधेरे जंगलिस्तानमें पड़ा था । बचाया होगया जब आजिज आरी ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । बकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥

शज़ल ।

दुनियवी गंदगी भरा निगुरा । प्यास और भूखसे मरा निगुरा ॥
रह न पावे जरूर हो गुमराह । कालुके फन्दमें पड़ा निगुरा ॥
जहाँ जावे उसे वहाँ ठोकर । खोरिश जमराजका खर निगुरा ॥
पशु पंछीसे ख्वार बत्तर है । सूरत इनसान गरधरा निगुरा ॥
पानी पीना रवा न हाथ उसके । जोनि चौरासीमें फिरा निगुरा ॥
बन्दगीकर न होवेसो मक्बूल । आग दोज़खमें जा गिरा निगुरा ॥
सीख सदहा ज़बान फनून उलूम । होवे हासिल न मुद्दोआ निगुरा ॥
है पशु गर बसूरत आदम । न दुम सींग चारपा निगुरा ॥
होता हैवान तो यह भला होता । सूरत आदम तू क्यों हो निगुरा ॥
हैं भले तुझसे अरजके हशरात । तू किधर जायगा बता निगुरा ॥
जंगल जग अँधेरेमें तू पड़ा । कौन मशअल तुझे दिखा निगुरा ॥
फड़ा खावे दरिन्दः जाओ जिधर । कौन तुझ दस्तगीरी आ निगुरा ॥