कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1228, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंन यह घर है तेरा घरकी न तू है । तो फिर घर किसलिये भरती है चिउँटी ॥
जब यक दिन आनकर तुझको लताडें । न तू उस रोजको डरती है चिउँटी ॥
सिखाया तूने यक दिन शह सुलेमों । आजिज बात रख रखती है चिउँटी ॥
गजल (साथ)
जर सीमसेकी जो प्यार ऐ सोंप । है तेरा वह घर वह बार ऐ सोंप ॥
आकरके खजाना पर तू बैठा । यह तेरा था दिल फ़िगार ऐ सोंप ॥
जिस दिलवरसे दिल लगाये । उस जामे तेरा क्रार ऐ सोंप ॥
जर सीम जहाविरात महबूब । उनसेही तेरा था प्यार ऐ सोंप ॥
माशूकके घर तुझे बैठाला । मिल शौकसे अपना यार ऐ सोंप ॥
कर दूर दफ़ीनः से आजिज । पावेगा तू हक्क दीदार ऐ सोंप ॥
गजल—जगतके आदमी हैं डोंगर ढोर । धरम धरधरके मारे डोंगर ढोर ॥
शमअ परवानः आदमोन कोई । हिर्स हैवान प्यारे डोंगर ढोर ॥
काल काबूमें कोई नहीं इन्साँ । मंरते खपते बिचारे डोंगर ढोर ॥
है बरी आदमी सब दुख द्रन्द । हाय तोबः पुकारे डोंगर ढोर ॥
पहन इन्सान लवास आजिज । जान घरको हमारे डोंगर ढोर ॥
तरजिय बन्द खमसः ।
यह कुल मखलूक आतशमें जले हैं । जो मरहम हाथ हसरतसे मले हैं ॥
गुनः करनेमें हरगिज नहीं टले हैं । जो रोराँ संगपर उनको तले हैं ॥
क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ॥
हरीसे दुनियवी हों ग़र्क दुनिया । गुरु और साधु जो बातें न सुनिया ॥
जो बोया तूने सोई तुझको लुभिया । न दुनिया आक़बत यमजीऊ छले हैं ॥ क०
जो सीखे होशियारी कुछ जहाँकी । कहाँ जाना था सोली रह कहाँ की ॥
न जाना भेद इसरारे निहाँकी । सो हराराते जमीं मआदिन रले हैं ॥ क०
लगे इस बाग़ सद्दा बेल व बूटे । दरखतां वे अदद हर जाय फूटे ॥
जो हो फ़लदार सो मालीसे टूटे । सो काटे जायेंगे जो न फले हैं ॥ क० ॥
सदाजो साधुगुरुको सर झुकाये । भजन सुमिरनसे अपना दिल लगाये ॥
दया दान और धरमकी राहबनाये । गुरु और संत फरमांसमे चले हैं । क० ।
हुये जो खाके मोटे मस्त मग़रूर । हमेशः साधु गुरुसे सो रहे दूर ॥
ज़र्क और बर्क पोशिश ताज सुमबूर । सोहों बलिदान मोटे ो पले हैं ॥ क० ॥
नहीं दिलमें जिनके रब्ब रहमान । न उनपर होवे हरगिज रहम सुवहान ॥
सोई आजिज पड़े चौरासीकी खान । न पावें राह सो मर मर गले हैं ॥
क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ।