भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1243

खुद फफीहत नजीहत औरोंको । बेल रह बर हुआ सतूरों को ॥
क्या तू आजिज सिखावे बूरोंको । हाय अ सोस इन कीहोंपर ॥
तरजीआ बन्द ।

जबाँ मेरी तु जबतक है दिहनमें । न हो गाफिल मदह मुशिदे कोहनमें ॥
गुरुका शुक्र और अहसान कर याद । रह उसबरमां बरी खिदमत चहनमें ॥
कभी अहसान शुक्र उसका तू मत भूल । कि, पहुँचे तू अमरपुरके सिहनमें ॥
गुरु सा और तेरा है न मददगार । बचाया शोर दरियाके बहनमें ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दोआसे ॥
खुदाने खुदाको दर परदः छिपाया । गुरुने खोलकर उसको दिखाया ॥
खुदाने कर दिया आलम अँधेरा । गुरुने इल्मका सूरज उगाया ॥
खुदाने हर तरफ झगड़ा पसारा । गुरुमे सुलहकुलकी रह बताया ॥
खुदाने आग आलममें भड़काई । गुरु बारा न रहमतकालें आया ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥
गुरु खिदमतसे ईमानकी करारी । उसीकी मिहर करमां फ़ज़ल बारी ॥
समझ और सोच किसने उतारा । गुनहका बोझ तेरे सिरसे आरी ॥
गुरु गोविन्दसे बढ़कर है साहेब । गुरु बिन कुल जहाँमें ग्रियः जारी ॥
अँधेरे जंगलिस्तानमें पड़ा था । बचाया होगया जब आजिज आरी ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । बकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥

शज़ल ।

दुनियवी गंदगी भरा निगुरा । प्यास और भूखसे मरा निगुरा ॥
रह न पावे जरूर हो गुमराह । कालुके फन्दमें पड़ा निगुरा ॥
जहाँ जावे उसे वहाँ ठोकर । खोरिश जमराजका खर निगुरा ॥
पशु पंछीसे ख्वार बत्तर है । सूरत इनसान गरधरा निगुरा ॥
पानी पीना रवा न हाथ उसके । जोनि चौरासीमें फिरा निगुरा ॥
बन्दगीकर न होवेसो मक्बूल । आग दोज़खमें जा गिरा निगुरा ॥
सीख सदहा ज़बान फनून उलूम । होवे हासिल न मुद्दोआ निगुरा ॥
है पशु गर बसूरत आदम । न दुम सींग चारपा निगुरा ॥
होता हैवान तो यह भला होता । सूरत आदम तू क्यों हो निगुरा ॥
हैं भले तुझसे अरजके हशरात । तू किधर जायगा बता निगुरा ॥
जंगल जग अँधेरेमें तू पड़ा । कौन मशअल तुझे दिखा निगुरा ॥
फड़ा खावे दरिन्दः जाओ जिधर । कौन तुझ दस्तगीरी आ निगुरा ॥