कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1244, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता हैवान कौन लेता हिसाब । हुआ नरलेख अब चुका निगुरा ॥
खावे ठोकरं इधर उधर फिरते । नहीं कोई तुझे जता निगुरा ॥
हुआ बेहोश होश कुछ न तुझे । कोई हरगिज नहीं जता निगुरा ॥
कुचः दिलदारकी दिखावे कौन । यार अपनेसे रह चला निगुरा ॥
बेटा ब्रह्मा जो आलिम आमिल था । नाद नापाक होगया निगुरा ॥
ऐसा ज्ञानी ऋषी जो था शुक्रदेव । फेर वैकुण्ठसे दिया निगुरा ॥
बारहा यह पुकार सत् कबीर । नहीं ठिकाना नहीं ठौर जा निगुरा ॥
कँजरीके हैं यार गार घने । सत् पर हरगिज नहीं चढ़ा निगुरा ॥
बाप है कौन पूत वैस्याका । पकड़ेबह किसका कहपला निगुरा ॥
जिसका न पीर वह दस्तगीर आजिज । पावे क्या ठौर और थरा निगुरा ॥
साखी - निगुरा ब्राह्मण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार ।
देवतनसे कुत्ता भला, जो नित उठ भुँके द्वार ॥
तरजीअ बन्द ।
क्या फसीह व बलीग जिनकी जबों । चलती तेजी तब आब वस्फ सुबहाँ ॥
मन मती खुद पसन्द व खुदबी । कुत्ब और फिका वेद बानी ख्यों ॥
गली कचःमें करते हैं बाज और पन्द । आप अन्धा है मुदई उरफों ॥
बे खबर खुद खबर सुनाते हैं । करते गुमराह सादए लोहों ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःके तौरपर कर गौर ॥
हुये केती जबोंसे माहिर । इल्म दुनियामें होगया जाहिर ॥
मैं हूँ ज्ञानी व दानया दौरों । नुत्क कर गैर गर्द दिल साहिर ॥
महरबा हर चहार सूसे हो । दिल दिमाग आपसे हुआ बाहिर ॥
होश जब यह गुरूमें भूला । फौज सरपर है मौतकी काहिर ॥
आप निगुरा बनावें गुरुमुख और । इस जमानेकी तौर पर कर गौर ॥
कहते क्या खूब है हमारी राय । हमने पहचाना अकलसे ो खुदाय ॥
मेरे वहम व ख्यालको शाबास । जान अकल व गुमानसे अस्ल जाय ॥
मैं हूँ दानाये सबकते सबपर । जिसने असली बसूलका घर पाय ॥
इन ख्यालोंसे दिलपर जो आजिज । रास्ती राह सो न हर्गिज आये ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःकी तौरपर कर गौर ॥
मुसद्दस ।
निरञ्जन दिल हिर्से हैवोंसे पूरा । है जिससे खल्लकका यह सब जहूरा ॥
हुआ इल्मों अमल उसका जो दौरा । चलाया उसको दूर अज्जक़िबलेगाही ॥