भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1242

मुरब्बा ।

कहने सुननेमें जो कुछ आया है । वेद और कुत्ब खाने जो बतलाया है ॥
सिद्ध साधु पैगम्बरों जो गाया है । दुनियाका गुरु व पीर खुदा माया है ॥
ज्ञान ध्यान इलहाम वही और सलाम । मुतकलिम मुखातिब शब्द कलाम ॥
सामान हैं दुनियामें जितने नामी नाम । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
अकल और ख्याल ब्रह्मसे जो है पार । हरगिज़ न महसूस न सोदर गुफ्तार ॥
क्या जाने खबर वेखवरों शब्द सार । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥
दुनियाकी जो कुछ चाहसो दुनिया की कहिये । जानदार दुनि दरिया २ में हैं ॥
दरियाय जाँदार सगर धार है । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
आकिलाँ हलके अकल पेच कहा रह हैं कहाँ । जो बाहर अकल उसका माहिर है ॥
अकलके पार जो आजिज़ कहो सो जाहिर है कहाँ । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥

मुरब्बा फकीहोंपर ।

फखर दौलत दुनी देहों पर । चश्म बर खुद न किज्वजेहोंपर ॥
नजर ख्वाब व खुर मलीहोंपर । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
पढ़ गये वेद न भागवत गीता । कुत्ब ख्वानीमें उमरों बीता ॥
नफ्त अम्मारःने इन्हें जीता । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
बाअज और पन्द बात बकते हैं । माल बीयोंकी तरह तकते हैं ॥
गली कूचा न फिरते थकते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जिसनेकी आदमीका दिलकाला । जोहद व तकवाको दूरकर डाला ॥
टुक दम भी न याद हकतआला । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
रात दिन कारमें जो मरते हैं । हज्जो फुकरा खुशीसे करते हैं ॥
बैल हैं घास पर चरते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
गुज़रा दिन कारबारमें सारा । रात आई हुआ जो अँधियारा ॥
बादः गुलरु हैं महफिल आरा । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
शरआकी टट्टी जो धरते हैं । कुत्ब ख्वानीमें दिन गुजरते हैं ॥
टट्टी घोखे शिकार करते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
आप भटकते हैं औरको भटका । आबिन आदम अदमकी रह अटका ॥
होश न, पाँव गारमें लटका । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जानते लोग यह तो आलिम है । दर हकीकत सोरूस जालिम है ॥
सदहा गुमराह करते फिरते हैं । रोजोशव फिक्क मआश मरते है ॥
हकके खौफसे न डरते हैं । हाय अफसोस इस फकीहोंपर ॥