भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1225, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1225

दौलत जहाँ पर जावे, अन्धा उसे बनावे ।
दुख दन्दः कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
इसको जा छोड़ भागे, तब राम रंग लागे ।
दिल गन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
दौलत करे जो घेरा, वहाँ होवे तेरा मेरा ।
जम बन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
इससे है देहका सुख, जाय तो हो दिगर दुख ।
दह चन्द्र कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
यह भगतीको नसावे, फिर नरकमें बसावे ।
बुद्धि मन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
दुनियासे कार दुनियाङ्क आज़िज और न गहना ॥
फर फन्द कर दिया है, यह दौलतो दुनिया ॥

तरजीअ बन्द ।

सब जाय खुद खुदाय, और नहीं है ।
नहीं ढूँढ़े उसे पाय, हर पूर नहीं है ॥
तदबीर करो लाख, वहाँ दौर नहीं है ।
वह दौरमें शीशः बिल्लौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ १ ॥
अन्धे बचार चश्म, साधु निन्दक चेत ।
सो दोज़खमें जाय, खाँय गीते केते ॥
जब्बार धरमराय, पकड़ लेखा लेते ॥
हैबान बशकल नर, जो फ़िक्र गौर नहीं कीते ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ २ ॥
साहबको देख बेशक, है वह साधु जंगलमें ।
इस अस्लको ढूँढ़, देख जाय नकलमें ॥
पहचानता तू नहिं, न आवे तेरी अकलमें ।
न इल्म है इनसानकी, यह तौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ ३ ॥
साधु साहब हैं एक फ़र्क नहीं है ।
हर जा में वही गर्ब और शर्क नहीं है ॥
इस वृक्षमें फल फूल, कोई नूर नहीं है ।
बिन साधु गुरु ज्ञानी, ध्यान गर्क नहीं है ॥

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 1225, कुल 1367 में से · BharatKosha