भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1239

कहां फिर पावे तू यह आदमी देह । हुआ हैवान जब ऐ मीत प्यारे ॥
किधर दौलत किधर दुनिया यह जावे । कहां इरकान है ऐ मीत प्यारे ॥
नहीं मैं तू नहीं संसार आजिज । हुआ जब ज्ञान है ऐ मीत प्यारे ॥

जग डुबाते हैं पण्डितो मुल्ला । मत सिखाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
चण्डी हनुमान भैरौ पूजा कबर । रह भुलाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जबह व खून कल्ल व कुरबानी । गल काटे हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अबिन आदम पड़े ब बहरे अमीक । धर दबाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अपने लोभ और अपने मतलबको । दिल डोलाते हैं पण्डितो जो मुल्ला ॥
आदमी सो नहीं जो डंगर ढोर । पशु चराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जुल्म और जब और नाहक खून । सो कराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
रास्ती दुश्मनी और दोस्त दरोग । हक छिपाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
दोस्त हक क्यों हों दुश्मने दर्वेश । लोग भाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां मारनेको दरियामें । जाल पाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां फँसती हैं नहीं आदम । धर फँसाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
ढोल मृदङ्ग झांझ व मजीरा । टमटमाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
आजिज यह जगमें जाहिरा डग दूत । मार खाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥

यथा

खबर उस यारकी कहिये फकीहो । अकलके पारकी कहिये फकीहो ॥
जहां पहुंच न विद्या वेद वाणी । वह न गुफातारकी कहिये फकीहो ॥
कहां है जिन्दगी दारु कहां मौत । वह मुहरा मारकी कहिये फकीहो ॥
हुआ हँकारसे आलम हवैदा । वहना हँकारकी कहिये फकीहो ॥
वह साहब सारेका जो वरतरी है । बड़े सर्कारकी कहिये फकीहो ॥
जहांपर अकल कुलकी अकल गुम है । रह उस दर्बारकी कहिये फकीहो ॥
अलख जिसको कहे सब सिद्धि साधू । कुनह इसरारकी कहिये फकीहो ॥
जहां नाकारा हैं सब कारबारी । वहांके कारके कहिये फकीहो ॥
शरीअत न वहां न मारफत है । वह शब्द सारकी कहिये फकीहो ॥
यह सब संसार जो दर गुप्तगू है । वह बे संसारकी कहिये फकीहो ॥
हैं सदहा खालिको मखलूक जिससे । कुछ उस कर्तार की कहिये फकीहो ॥
जहोंसे आत्मोंमें गुल खिले सब । ढब उस गुलजारकी कहिये फकीहो ॥
बना जो बागबौ और बाग सदहा । वह कुल मुख्तारकी कहिये फकीहो ॥