कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1240, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौनसीराह व रहबर क्या सबारी । सिफत रहवारकी कहिये फ़कीहो ॥
किधर यूसफ मेरा हैं कहाँ जलीखा । वह नौ तिफसारकी कहिये फ़कीहो ॥
हुआ जिस सोचमें आजिज यह आजिज । अब उस निकायकी कहिये कीहो ॥
मुरब्बा ।
खुद ज़लो कमाल पर हैं नाजा । दिलपर है मुनतिक एतराज़ों ॥
पढ़ कुत्ब जो फरहान और शादों । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
कहते हैं जो फिलसिफे जमानः । जाने नहीं नामका निशानः ॥
जाहिद न बशकल जाहिदानः । दानादुनी हक जूहूर नादों ॥
बिन सतगुरु सारे बेखबर हैं । सब खाम ख्याल उनके सिर हैं ॥
वेद वकुत्ब उनके रहापर हैं । दानादुनी हक हुज़ूर नादों ॥
जी रूह नहीं हैं बद बानी । क्या कहसकें राहे जावेदानी ॥
बनाते जो कुछ सो सब है फानी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
पुर होगया दिल जे वह्य बातिल । मनमस्तहो याद हकसे गाफ़िल ॥
हरगिज न सूझे राह साहिल । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
मामूर व मक़ न फितनः रोबाह । भूले हैं पढ़ अस्ल अपनीकी राह ॥
क्या खूब है अकल कहिये वाह वाह । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
करते है दावा जो हक शतासी । दुनियासे हैं खुशदिल उदासी ॥
अनगैब है जो काल फांसी । दाना दुनी हक हुजू नादों ॥
इन बेखरों मत खबर कह । जो चढ़ते न साधु सैतकी रह ॥
जावें वह जिधर सो देखें सो छः । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
गर पूछो कहाँ वह हक पियाँजी । बतलाते यहाँ है और वहाँजी ॥
क्यों करसकें आजिज वह ब्याँजी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
गज़ल ।
मरेगा भूख दुखमारा तू ऐ सूम । न पावे अपना जब चारा तूरे सूम ॥
फिर दर दर भूखा मुँह पसारे । जो धन अपना जुये हारा तूऐ सूम ॥
दिया कुछ न व सेवा साधु गुरुकी । उठा इफ़लासका भारा तूऐ सूम ॥
बिहिश्ती हों न हरगिज बखीलों । किया बर्बाद धन सारा तूऐ सूम ॥
जुहद तकबान आबकाम आजिज हो जब इमसाक बधन प्यारा तूऐ सूम ॥
होवे बेशक तू सरफ़राज सखी । गिरह दिल की होवे बाज सखी ॥
हकका महबूब और तू फ़रजन्दा । उसके आगे है तेरा नाज सखी ॥