भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1234

जो बोले संस्कृत मीठी तु मोरा । तेरा गर्दन भी धरकर काल तोरा ॥
तु अंगरेज़ी ो बोले बोल मैना । तेरा भी टूटेगा यकरोज़ डैना ॥
जो शिरीं बोल तूती फारसी है । पकड़ पिंजरेमें तुझको ड़रासी है ॥
ऐ मँढक तू सिलंगी बोल बोला । तेरे सरके ऊपर जमकर कलौला ॥
फ़रासीसी लातीनी सिख वैरा । तेरी गर्दन ऊपर भी छुरी फ़ेरा ॥
जो मेगपयी बोलयी सदहा जवानों । तुझे मारेंगे धर कहरवानों ॥
ज़ीलतसे रज़ीलत घरमें जावे । अगर सदहा जवानें सीख आवे ॥
हुआ हैवान तू इनसान मूरत । न पहचाना जो अपनी अस्ल सूरत ॥
किया था किसलिये आदमको पैदा । हुआ तू किसके ऊपर आनके शैदा ॥
तू खालिक याद कर अपना ऐ नादों । शबोरोज़ो शाम बाम दादों ॥

॥ ल-यह मान मड़क तेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।

यह भीड़ भड़क डेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।

यह शान और शौकत इधर उधरका सैर ।

हर चार सिम्त फेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥

यह माल मुल्क जाह और हशमत व कुलाह ।

यह दुनअबी उरझेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥

इससे न बड़ी नेमत है यह देह बशरकी ।

कागज़का दुनी बेरा सो दिनमें गुज़रजा ॥

सत नाम यक साहब सच पकडले आजिज़ ।

यह तेरा और मेरा दो दो दिनमें गुज़रजा ॥

छिपाया यारको ऐ शोर बखते । लखाया ग़ारको ऐ शोर बखते ॥

किया दिलने मेरे दिलबरसे परदः । जताया नाज़को ऐ शोर बखते ॥

रहे रहमां तू कर दिया बन्द । बताया मारको ऐ शोर बखते ॥

जहर धरदी हेयाते आबकर दूर । कियाबन्द कारको ऐ शोर बखते ॥

नहीं नेमत सरासर गन्दगाकी । लगा अम्बारको ये शोर बखते ॥

गया जब भूल आजिज़ ठग भूलाया । दिया दारको ऐ शोर बखते ॥

साधुसेवा जो त्याग दुनियादार । हर तरफ देख आगदुनियादार ॥

देख आतश जिधरको जावेगा । फिर किधर जावे भागदुनियादार ॥

साधुगुरु बिनकहां ठिकाना और । है पड़ा पीछे नाग दुनियादार ॥

कुछ कर सोच दिलमें ऐ नादां । अब तू उठ और जागदुनियादार ॥