कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भीतरके अन्धे
हैं। पर जो वेदके सच्चे ज्ञाता होते हैं, वे बड़े भावुक हैं। उन्हें किसीसे द्वेष नहीं होता, न वो लुछचोंकी तरह मूर्तिकी निन्दा ही किया करते हैं।
साखी कबीर — वेद हमारा भेद है, हम वेदोंके माहिं।
जौन भेदमें मैं वसूँ, सो वेदौ जानत नाहिं ॥
कबीरजी कहते हैं कि, मेरा पता वेदसे मिल सकता है कि, मैं कौन हूँ। क्योंकि, हम वेदोंमें हैं, पर अपने आप पता नहीं लग सकता। कहना यह कि, पारखी गुरुकी आवश्यकता है। जिस भेदमें मैं रहता हूँ उसको वेद भी नहीं जानते। केवल नेति नेति कहकर इसकी ओर इशारा ही करते हैं।
यह वेदपशु अज्ञानावस्थामें सब कुछ करता है। मिथ्या तथा सत्यकी उसको तनिक भी सुध नहीं। यह वेदपशु वेद पाठकर घमण्डी होता है। कहता है कि, वेदमें यह बात लिखी है वेदमें वह बात लिखी है। यद्यपि वह पूर्णतया अनभिज्ञ है कि, वेद क्या है तथा किस निमित्त है? उसका वेद और वेद पाठपर इतना घमंड करना और इतराना पाशविक अवस्थामें है। समस्त वेदोंकी आत्मा केवल एक शब्द 'ओम्' है। जो कोई वेदकी आत्माको न पहचान, वेदपाठी होनेका प्रण करे वो कदापि वेदका विद्वान् न होगा। अतः अर्थानुसंधानके साथ वेद पाठ हो। उससे आत्माके जाननेकी चेष्टा करे।
त्रियापशु।
त्रियापशु उसको कहना चाहिये जो स्त्रीका पशु हो। वैसे वो स्त्रीका पशु यह सारा संसार है। स्त्री समस्त जीवोंको नचाया करती है। इस स्त्रीने अपनी गुलामीका फंदा सबके गलेमें डाला है। कामबाण सबके हृदयोंको भेद गया। इस कारणही समस्त मनुष्य मर गए। सांसारिक मनुष्योंकी तो गणनाही क्या है। यह बड़े बड़े सिद्ध साधुओंके हृदयको भी टुकड़े टुकड़े कर देती है। सन्तोष तथा धैर्य मनसे पृथक् हो जाता है। इस स्त्रीका नाम वासना तथा इच्छा है। उसने सबको बांध रक्खा है। इसीके कारण सबका आवागमन हो रहा है इसीके कारण भवसागरकी स्थिति है। यह मनुष्य तथा देवता किसीको भी नहीं छोड़ती। जबसे स्त्री पुरुषके साथ होती है उसी दिनसे तपस्या तथा व्रतसे मनुष्य वञ्चित रहता है। केवल स्त्रीकेही कारण बंधनमें रहता है। उसको उसी स्त्रीने अंधा कर दिया है। समस्त झगड़ों तथा बखेड़ोंकी जड़ स्त्री है। अनगिनती लोगोंके इसने मस्तक कटवाये, कटवाएगी और कटवा रही है। समस्त विद्या तथा कार्यकी वैरिन है, समस्त सांसारिक मनुष्य इसके ही प्रेममें फँसकर अपने सर्जन कर्तासे दूर हो गए हैं। जो कोई इससे प्रेम करेगा उसमें सर्जन कर्ताका
प्रेम तथा उसकी भक्ति न हो सकेगी । इस त्रियापशुमें तनिक भी मानुषिक बुद्धि नहीं होती । पर जब उसको मानुषिक शिक्षा मिले तो वास्तवमें वह मनुष्य बनजावे, नहीं तो सदैव इसी प्रकार फँसा रहेगा । इसको तनिक भी पहुँच, समझ तथा बुद्धि नहीं है कि, अपनी मुक्ति तथा छुटकारेकी युक्ति कर सके । उसके पास तनिक भी औषध नहीं कि बच सके ।
उद्धारकी दवा ।
उसके निमित्त केवल यही एक युक्ति है कि, यह साधु तथा गुरुकी सेवा करे । यदि यह साधु तथा गुरुकी सेवा न करेगा तो इसका बेड़ा कदापि पार न होगा । अवश्यही वह कालका भोजन बनेगा । इस संसारमें दो प्रकारके गुरु हैं—एक पाशविक तथा दूसरा मानुषिक । यदि इस सांसारिकको पाशविक शिक्षा मिलेगी तो उसके हृदयपर बुद्धिका कदापि विकास न होगा । इस संसारमें दोनों प्रकारोंके शिक्षक फिरते हैं । जो कोई उन दोनों गुरुओंमें पहचान करे, उन्हें पृथक् करके पहचाने, एकको छोड़कर दूसरेको ग्रहण करे वो सांसारिक बड़ा ही भाग्यवान् होगा । एक तो कपटी भेष बनाए कूट पुस्तकें लेकर हाथमें खप्पर लिए फिरते हैं । यह तो कालपुरुषका समाचार देते हुए उसकी सूचना चारों ओर फैलाते फिरते हैं । दूसरे श्वेत वस्त्र पहने हाथमें सूक्ष्म वेद तथा कमण्डलु लिये सत्यपुरुषके नामका प्रचार करते घूम रहे हैं । अतः जो कोई सत्यपुरुषके समाचारदाताओंके समाचारको स्वीकृत करेगा वह निश्चयही उत्पत्ति नदीके पार चला जावेगा । जिसने इस गुरुको पहचाना वह उनका चरणरज बन गया ।
मुहम्मद साहिबकी भाँग ।
मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक बार मुहम्मद साहबको जिब-राईल महाशय एक उद्यानमें ले गए । उसमें चालीस साधु बिलकुल नगन बैठे हुए थे । तब संध्याका समय निकट आया वे साधु सब भाँग घोटने लगे । जब भङ्ग घोंट चुके तब भङ्ग छाननेके निमित्त कोई वस्त्र नहीं था । उस समय मुहम्मदसाहबने अपने शिरसे साफा उतारकर दिया कि, इससे भंग छानो । तब उन साधुओंने मुहम्मदसाहबके साफेमें भाँग छानकर पीली । मुहम्मदसाहब पर प्रसन्न होकर नौ घूंट भङ्ग मुहम्मदसाहबको दीं उस नौ घूंट भङ्गके पीने से मुहम्मदसाहबको देवलोककी सुध मालूम हो गई । जो पदार्थ तथा आश्चर्यमय शक्तियाँ आपको मिलीं वह केवल उन्हीं नौ घूंट भङ्गसे थीं । तभीसे इस भङ्गके रङ्गसे मुहम्मदसाहबका साफा हरा हो गया । तबसे हातिमी जातिके श्रेष्ठोंने
कालपुरष किससे डरता है, माया (जगत और देह) चक्र निरूपण
हरे वस्त्रोंको पहनना उचित समझा । मुहम्मदसाहबके श्रेष्ठका नाम हातिम था इस कारणही यह हातिमी वस्त्र कहलाता है ।
ग्रन्थल
ऐ आदम तेरे लिए जञ्जीर यह आई ।
तिफ्ली व जवानी व बुढापामें फँसाई ॥
लारेव सरासर यह हलाहल है हलाकू ।
तेरे लिए तो जान शकर शीर यह आई ॥
अब तेरा कहाँ साहब और सदगुरु साचा ।
सिखलाने सबक सिलसिला गुरु पीर यह आई ॥
शाही जिसे कहते वही बरबादी है अजिज ।
दिनकी नहीं उमीद शबे तीरह यह आई ॥
भावार्थ—ए मनुष्य ! तेरे लिये यह जँजीर आई है यही तुझे बाल्य जवानी और बुढापेमें फँसा रही है । यह सरासर पीते ही प्राण लेनेवाला, लव-लवाता भयंकर विष है, जिसे कि, तू अपनी अत्यन्त प्यारी वस्तु समझ रहा है । अब तेरे साचे सदगुरु कहाँ है यही तुझे नरकका सबक सिखलानेके लिये गुरु पीर चली आ रही है । जिसे तू शाही समझे बैठे है यही बरबादीकी जड़ है इसमें दिनकी उम्मेद नहीं है यही स्त्री रूपी रात है ।
ये चारों पशु इस भवसागरमें रहते हैं । एक दूसरे से बँर मंत्रो रखते हैं । इनकी बुद्धि तथा इनका विश्वास शुद्ध नहीं । ये इस भवसागरके कोड़े हैं । इनका इस नदीके पार जाना असम्भव है । पर सत्यगुरुकी दया सन्तसेवा और चाकरीसे छुटकारेका पथ मिल सकता है । चारों पशु इस और तो पिताके सिंहासन और राज्य तथा श्रेणीको चाहते हैं । उस ओर सांसारिक वासनाओंके आनन्दका उपभोग भी किया करते हैं । इन चारों पशुओंकी बुद्धि तथा विश्वास बड़ाही विचित्र है । उनकी बुद्धि तथा विश्वासमें तनिकभी स्थिरता नहीं है, उनकी बुद्धि तथा उनको विश्वास सदैवही डामाडोल रहा करते हैं ।
ये लोग सहस्रों प्रकारका पहनाव पहनते और भौंति भौंतिके भोजनोंसे अपने चित्तको प्रसन्न करते हुए आपको बहुत बड़ा तथा प्रतिष्ठित समझते एवं घमंडमें मस्त फिरा करते हैं । कोई वस्त्र पहने कोई नङ्गे कोई हरा पीला नीला नानाप्रकारके वस्त्र पहने रहते हैं । कोई अनाज छोड़कर दूध पीता है कोई फलाहार करता है । कोई मांस खाता है मदिरा पीता है कोई स्नान किया करता है कोई शीशपर जटा रखते हैं । कोई भभूत लगाकर बना फिरता है । कोई वस्त्र छोड़कर
चक्रादिकोंका मान चित्र
हिरन तथा बाघकी खाल पहनता है । कोई विष्ठा खाता है एवं मूत्र पीता है । कोई अपनी जूजी छेदकर कड़ा पहन लेता है कोई उसको काटकर फँक देता है । कोई कोई ऐसे कार्य करते हैं कि, जो ऐसे घृणित हैं कि, जिनके लिखनेमें मुझको लज्जा आती है केवल इतना इज्जित कर देनाही यथेष्ट है कि, कोई परस्त्रीगमन करनाही अपना परम धर्म जानते हैं कोई सहस्र स्त्रियोंके साथ संभोग करने तथा उनके भगको देखनेहीसे अपनी मुक्ति समझते हैं, कोई उलटी खानेको बड़ी बात समझते हैं । कोई धूनी लगाकर बैठता है, कोई मौनी बन गया है ॥ कोई तीर्थमें नहाता फिरता है, कोई उलटा लटकता है, कोई धूँवा पीता है । कोई सदा सुहागिन बनकर स्त्रियोंका वस्त्र तथा उनके आभूषण पहनता है कोई घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह कुण्ड खोदकर दाल भात रोटी तथा माँस और भौंति भौंतिके भोजनोंसे भर देता है । चेले और सांसारिक तथा साधु और ब्राह्मण शूद्र चमार सब एक साथ बैठकर इसी कुण्डमें से सब भोजन करते हैं । एक प्याले से मदिरा पान किया करते हैं इससे अपनी मुक्ति समझते हैं । कोई कहते हैं हम अमुक गुरु अथवा धर्मके अगुवा पर भरोसा रखते हैं उसके द्वारा हमारी मुक्ति निश्चय है यहाँतक कि, इस अगुवाको परमेश्वर समझते हैं । यद्यपि वह गुरु नितान्तही विवश तथा पराधीन हैं । कोई कहता है हमारे धर्मके अगुवामें मनुष्यता तथा परमेश्वरी दोनोंही हैं । उन्हें तनिक भी सुध भी नहीं कि, मनुष्य कहाँ ? तथा परमेश्वर एक साथ कहाँ, कहाँ अंधा, कहाँ आखोंवाला, कहाँ साधु कहाँ और चोर कहाँ झूठा कहाँ और सच्चा एकही समयमें कहाँ दिन और कहाँ रात । कोई योग समाधि लगाकर बैठता हुआ अपनेको अमर समझता है । कोई कहता है कि, मैं ब्रह्मा हूँ । अनगिनती ध्यान तथा अनगिनती रङ्ग ढङ्ग इन चारों पशुओंके हैं कि, जिनके विवरणका बल मुझमें नहीं है; जब मैं उनकी यह दशा यानी अवस्था देखता हूँ तो मुझको वह काशीका पागलखाना याद आ जाता है कि, इस आकाश छतके नीचे जो ये सब पशु रहते हैं वे कैसे कैसे कौतुक दिखाते हैं । हर एक अपनेको योग्य तथा श्रेष्ठ समझते हैं । कोई उनमें अपनेको परमेश्वर तथा कोई अपनेको शिष्य समझते हैं । समस्त सांसारिक मनुष्य साधुओंका अनुसरण करके मुक्तिपथसे वञ्चित रहे । उनको सच्चा सत्यगुरु नहीं मिलता । इन चारों प्रकारके लोगोंमें कोई गुरुमुख नहीं है, सब मनमुख हैं । यदि दैवात् इनमेंसे कोई गुरुमुख हो तो उसको अवश्यही आकाशी सहायता मिलेगी । उसको सत्य-
गुरुका दर्शन प्राप्त होगा वह इस गुरुमुखको अपनी ओर खींच लेगा। सत्यगुरु संसारमें आकर समझाते फिरते हैं कि, ए मनुष्यो ! तुम मेरी बात मानों, मैं तुमको वही रङ्ग रूप प्रदान करूँगा जो कठिनसे कठिन तपस्या करनेपर भी ऋषि मुनिगण नहीं पाते हैं। जैसे कीड़ेको भूङ्गी अपने रूपका बनाता है, इस प्रकार तुम मेरे स्वरूपके समान होगे। अनुरागसागर पृ ८ में मृतकभावके वर्णनमें भूङ्गीका दृष्टान्त आया है स्वामी परमानन्दजीने उसीको अति सुन्दर कविताके साथ कयहूँ रख दिया है।
भूंगी कीटका दृष्टान्तकी कविता ।
भूङ्गी जो आन कीटको खुद रङ्ग लगावे ।
आवाज अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥
वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।
गुरु शब्दसे फिलफौर रङ्ग पटल सो जावे ॥
कोई और क्रिस्म कर्मको जिनदार न देखे ।
भूङ्गी जो अपने ढङ्ग कीट टूँढके लावे ॥
वह टूँढ काम अपनेही हम रङ्ग हमेशा ।
दिलदेके उसको तवही अपने रूप बनावे ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
भावार्थ—भौरा स्वयं ही आकर कीड़ेको रंग लगाता है बारबार अपनी आवाजको कीड़ेके कानमें डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि, कीड़ेका पहिला रूप रंग बाकी नहीं रह जाता। गुरुके शब्दसे उसका रूपरंग शीघ्रही बदल जाता है। वो कीड़ा भौरोंके ध्यानके या उसके शब्दके दूसरी बात नहीं देखता, भूंग भी उसे आप ही टूँढकर अपने पास लाता है, अपनी ही इच्छासे सदा अपने रंगका बनानेकी चेष्टा करता है वो अपना दिल देकर अपने रूपका बना लेता है। उसे दिलदे जो दिलदार हो। वो चाहें हिन्दू हो या मुसलमान हो, पर उसका खरीदनेवाला हो ॥
हैं कोट लाख सदमें कोई एकही मेरा ।
जहाँ जाके बारबार भूङ्ग करता है फेरा ॥
वही कीट जेहल अपनेसे गुरुबात न माने ।
तब जाके पास उसके भूङ्ग करता है डेरा ॥
कहता है कीट तुझको लगी आन खराबी ।
नहिं अकल ठिकाने रही नहिं इल्म है तेरा ॥
तू बात मेरी मान अबकी बार कान धर ।
हो मेरी तू दमशकल तेरा होवे निबटेरा ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
भावार्थ—हजारों लाखोंमें कोई एक ऐसा होता है जहाँ वो भौरा जाता जाता है । जब वो कीट गुरु भृंगके बार २ के कहे सडुपदेशोंको भी नहीं मानता तो फिर भौरा उसीके पास अपना आसन जमा देता है, कहता है कि, ए कीड़े ! तुझे बड़ी खराबी लगी हुई है न तो तेरी बुद्धिही ठिकानेपर रही है एवं न तुझे इसका इल्म ही है, तू अबकी मेरी, बातको अपने कान धर ले इससे तू मेरी सूरतका हो जायगा । ए शिष्य ! मेरे उपदेशके सुनते ही गोबररूपी विषयोंसे तेरा पीछा छूट जायेगा । उसेही दिल देना चाहिये जो कोई दिलदार हो वो चाहे हिन्दू हो भले ही मुसलमान हो, परदिल दे दिलको खरीद ले ॥
मुरशिद जो मेहबान जिसे आन जगाया ।
भूले जो जीव जगत् भगत फेर लगाया ॥
जो अन्ध जीव जगमें कोई बात न माने ।
रही घेर उपर उनके महाकालकी माया ॥
फरमान मानबाज्ज कोई जीव अंकूरी ।
सत पुरुष भगत भाव बहुत बार बताया ॥
समझाए सबको जाय जगमें आपही ज्ञानी ।
आजिज्ज न माने जीव जिसे जमने फँसाया ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
जो जीव जगतके फेरमें पड़कर सबको भुलाये बैठा था उसे सदगुरुने कृपा करके जगा दिया पर जो अन्धा सदगुरुके वचन न माने तो समझना चाहिये चाहिये कि, उसे काल पुरुषकी माया घेर रही है । जिसके दिलमें मुक्त होनेके अंकुर हैं वोही अनुशासनमें श्रद्धा रखनेवाला अनुशासनको मानेगा । ज्ञानीजी सबके समझानेके लिये आते हैं एवम् सत्यपुरुषकी भक्ति अनेक बार वचा चुके हैं । पर जिसे अज्ञानसे घेर रखा है वो किसी तरह भी नहीं मानता । उसे दिल देना चाहिये जो दिलदार हो, वो चाहे हिन्दू मुसलमान कोई भी क्यों न हो ॥
मनुष्यताका उपदेश ।
मनुष्य कहिए आदमी । पहले पाशविक गुणोंका विवरण किया था अब मनुष्यके गुण लिखता हूँ कि, मनुष्य उसको कहते हैं जिसमें मानुषिक बुद्धि हो । मनुष्यकी मूर्ति होनेमात्रसे ही मनुष्य कभी समझा नहीं जा सकता ।
बैत — जो असल काँच कहते हैं गौहर बनामको ।
विन वासनाको फूल कहो कौन कामको ॥
कांचके मोती नाममात्रके मोती होते हैं वास्तवमें बेकाँच हैं । इसी तरह बिना वासनाके फूल, किस कामका होता है ? यानी वो किसी कामका नहीं होता । जिसमें मानुषिक बुद्धि हो वही मनुष्य कहलाता है । बाकी सबी पूरे पशु हैं । खाना, पीना, सोना, विषयसम्भोग इत्यादि सब कुछ पशु तथा मनुष्योंमें समानही हैं । जिसमें मानुषिक बुद्धि नहीं वह वस्तुतः पशु है । मिथ्यावादी गुरुगण झूठे भेष धर, सांसारिकों को धोखा देते फिरते हैं । मनुष्यको उनसे भागना तथा बचते रहना उचित है । जब मनुष्यकी पाशविक चालें दूर हो जावें तथा मानुषिक ढङ्ग आजावें तब मनुष्य बनेगा नहीं तो बनना बड़ा कठिन है । मनुष्यतासे ही मुक्ति हुआ करती है । भौति भौतिके भेष बनाने और राख मलनेसे कदापि मनुष्यता नहीं आती । जब मनुष्य मनुष्यताको ग्रहण करता है तब उसको सत्यगुरु मिलता है उसको मनुष्यताका वस्त्र पहनाता है वे मानुषिकवस्त्र पहनाने-वाले गुण ये हैं—धीरज, दया, शील, विचार और सत्य ।
जब सत्यगुरु देखता है कि 'यह मनुष्य अब, मनुष्य हुवा । तब यह पाँचों वस्त्रका उपहार प्रदान करता है । इन वस्त्रोंको पहनकर मनुष्य अमर तथा अजर हो जाता है । उसके आवागमनका बन्धन टूट जाता है । इन सब भली आदतोंको मनुष्य ग्रहण करता है । १—माँस नहीं खाता है । २—किसी नशेको व्यवहारमें नहीं लाता है । ३—विषयसम्भोगमें लिप्त नहीं होता है । ४—सांसारिक कष्टोंको ध्यानमें नहीं लाता है । ५—अचेत होकर सोया नहीं करता है । ६—मोह उसमें प्रवेशित नहीं होता है । ७—सत्य बोलता है । ८—बिना विचारके कोई काम नहीं करता है । ९—प्रत्येक जीवपर दया करता है । १०—सब कार्योंको बीरताके साथ करता है । ११—सिवाय उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरके और किसीसे कोई आशा न करे । १२।मिथ्या तथा सत्यगुण तथा अवगुणको फभलीप्रकार पहचानकर स्वीकार करे । १३—भ्रम तथा धोखेमें न पड़े । १४—बुद्धि और ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बन जावे । १५—अपने गुरुपर विश्वास
करे । १६-गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञता करे । १७-कुल फलदायक वस्तुओंको तुच्छ जाने । १८-स्वच्छरूपसे विचार करे ।
समस्त मानषिक गुण हों, जो तीन गुण हैं-काम, क्रोध और बुद्धि सो उस बुद्धिसेही समस्त देवतागण हैं, काम क्रोधसे समस्त पशुगण हैं । क्रोधसे नार-कियोंका शरीर है । मनुष्य तीनों गुणोंसे विभूषित है । यदि यह बुद्धिकी ओर, ध्यान दे तो देवता है । यदि यह काम क्रोधही को ओर झुके तो पशु है, क्रोध को ओर झुके तो नारकी है । इस कारण इसको उचित है कि, बुद्धिकी ओर ध्यान देकर मनुष्यताकी श्रेणीपर अधिकृत होकर हंसस्वरूप हो जावे उसीको मनुष्य कहते हैं ।
बीजक साखी ।
कबीर - मानुष जन्म पायके, चूके अबकी घात ।
जाय परे भवचक्रमें, सह्यो घनेरी लात ॥ ११२ ॥
कबीर साहिब कहते हैं कि, मनुष्य जन्म पाकर जो अबकी चूक गये तो फिर भवचक्रमें पड़ो वहाँ अनेको लाते खाओ यानी अपने उद्धारके बिना किये मर जायेंगे तो भव सागरमें पड़ जाओगे वहाँ अनेकों देहोंको धरकर सुख दुख भोगते फिरों ॥ ११२ ॥
कबीर - दुर्लभ मानुष जन्म है, होय न दूजी बार ।
पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुर न लगै डार ॥ ११४ ॥
मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, दुवारा नहीं होता यह जानते हो कि, फल पककर जब पेडसे गिर जाता है तो फिर वो डार पर नहीं लग सकता ॥
कबीर - मानुष हो कोई मुवा नहीं, मुवासो डंगर धूर ।
कोई जीव ठौरन लागियो, भयो सो हाथी घोर ॥ १०८ ॥
जो मनुष्य बनकर अमर बन गया वही मनुष्य है, जिसने मनुष्य होकर भी अपना बचाव नहीं किया मरा ही वो मनुष्य नहीं निरा पशु है । जो अपने ठिकाने पर नहीं पहुँच सका वो चँटीसे लेकर हाथी तक बनता चला जाता है । कभी छुटकारा नहीं पाता ॥ १०८ ॥
कबीर - पाँच तत्त्वको पूतला, मानुष धरिया नाम ॥
एक तत्त्वके बिचले, व्याकुल भया सब ठाम ॥ २३ ॥
पृथिवी, पानी, तेज, वायु आकाश इन पाँचों तत्वोंका बना हुआ पुतला यह देह है जिसका मनुष्य नाम रख छोड़ा है । एक तत्त्वके विछुरते ही सब जगह व्याकुल हुआ फिरता है यानी इसे राम तत्त्वका भान नहीं रहा इस कारण भटकता फिरता है ॥ २३ ॥
कबीर—मानुष वेचारा क्या करे, कहै न खुलै कपाट ।
श्वान चौक बैठायके, फिर फिराय पन चाट ॥ ११० ॥
जब उसे कहनेपर भी बोध नहीं हो तो वो क्या करे ? क्योंकि, कुत्तेको चौकपर बिठानेपर भी वो बारंबार चौकेके चूनको ही चाटता है यानी समझानेपर भी मनुष्य नहीं समझते बारंबार कुत्तेकी तरह विषयोंमें ही मरते हैं ॥११०॥
कबीर मनुष वेचारा क्या करे, जाको शून्य शरीर ।
जूझ झॉक नहि ऊँचिए, कहें पुकार कबीर ॥ १११ ॥
वो मनुष्य क्या करेगा जिसके दिलमें धोखा ही ब्रह्म बनकर बैठो हुआ, है, जिसके कि, हृदयमें अणु मात्र भी प्रकाश नहीं है वो यह समझता हुआ भी कि, इनमें कुछ भी सार नहीं है फिर भी फँसा रहता है वो छुटकारेका उपाय नहीं करता ॥ १११ ॥
कबीर—पूरब उग पच्छिम अयै, भखै पवनको फूल ।
ताहू राहू ग्रासिए, नर काहे को भूल ॥ २३१ ॥
जो सूर्य पूर्वसे उदय होकर पश्चिममें छिप जाता है खानेके लिये भी पवनका ही लहरिया है पर उसको भी राहू ग्रसता है फिर मनुष्य क्यों भूल रहा है कि, मैं ऐसाही रहा आऊँगा ॥ २३१ ॥
कबीर—राम सुमिरिए क्यों फिरे, और की डौल ।
मानुष केरी खालड़ी, ओढे देखा बैल ॥ २७५ ॥
राम राम भी कहते सुनते हैं दूसरोंसे शास्त्रार्थ भी करते फिरते हैं, बिना सोचे समझे दूसरोंके पीछे फिर रहें हैं वे बैल मनुष्यकी खालको ओढें फिरते हैं ॥ २७५ ॥
कबीर—मानुष तेरा गुण बड़ा, माष न आवे काज ।
हाड़ न होते मरनको, त्वचा न बरजत पाज ॥ १९५ ॥
ए मनुष्य ! तू देहाभिमान क्यों कर रहा है, क्या यही तेरा बड़ा गुण है कि, तेरा मांस भी निकम्मा है, हाड़ भी किसी कामके नहीं, उनके भी आभरण नहीं बनाये जाते । न चामसे बाजे ही मढे जाते हैं ॥ १९५ ॥
कबीर—मानुष तेई बड़ पापिया, अच्छर गुरुहि न मान ।
बारबार बनको कहे, गर्भधरे चौखान ॥ १०८ ॥
एक मनुष्य ? तू बड़ा पापी है तूने अकाल पुरुष अक्षरका कहना भी न माना, जैसे बनकी मुर्गी चारों ओर अण्डे देती फिरती है उसी तरह तू भी जनता जन्माता रहा चौरासी लाखमें भ्रम २ करके दुख पा रहा है ॥ १०८ ॥
फुटकर-कबीर-जेहि बेरियां साई मिले, ताहि न भावे और ।
सबको सुखदे शब्द कर, अपनी अपनी ठौर ॥
कबीर-मनुष बेचारा क्या करे, जाका हृदया सुन्न ।
श्वान चौक बिठायके, फिर फिर चारै चुन्न ॥
कबीर-अंकुर भखै सो मानों, मांस भखै सो श्वान ।
जीव बधे सो काल है, सदा सो नरक निधान ॥
जिसका सत्य पुरुष वा उसके प्यारे मिल गये उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि, अपने दिव्य शब्दसे सबको सुख देते हुए अपने सच्चे स्थान-पर कर देते हैं । जिस मनुष्यका हृदय सूना हो वो विषयलंपट न हो तो क्या करे? क्योंकि, कुत्तेको जब चाहो तब चौक बिठा देखो वो मोका मिलतेही चूनही चाटेगा । अंकुरोंका भोजन करनेवाला मनुष्य तथा गोशतखोर कुत्ता एवम् जीवघाती काल है जो जीव हत्या करता है उसे अवश्यही नरक होगा, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है । कहे हुए चारों तरहके पशुओंमेंसे किसीमें भी बुद्धि नहीं है इसी कारण वे सदा आवागमनके चक्करमें फँसे रहते हैं ।
निर्बुद्धिताके अङ्गकी साखियाँ ।
कबीर- 'अकलविहीना आदमी, जानै नहीं गँवार ।
जैसे कपि परवश परा, घर घर नाचै बार ॥
कबीर- अकलविहीना सिंह, ज्यो गया सत्यके संग ।
अपनो प्रतिमा देखके, भयो जो तनको भङ्ग ॥
कबीर- अकलविहीना अंधगज, पन्यों फंदमें आय ।
ऐसेही सब जग बंधा, कहा कहूँ समझाय ॥
कबीर- पछताता परवश परचो, सुवाके बुधनाहि ।
अकलविहीना आदमी, यों बन्धा जग माहि ॥
कबीर- अकल असँसे उत्तरी, विन्धों दीनी बाँट ॥
एक अभागी रह गया, एकन लीनी छौट ।
कबीर- बिना वसीले चाकरी, बिना बुद्धिकी देह ॥
बिना ज्ञानको जोगना, फिरे लगाए खेह ॥
कबीर- जल पर पावे मछली, कुलपर "भाते बुद्धि ।
जाको जैसा गुरु मिला, ताकी तँसी सुद्धि ॥
१ निर्बुद्धि, २ बंदर, ३ चमकना अस्त्र, ४ मदान्ध हाथी, ५ अयो, ६ ऊपर, ७ परमात्मा, ८ दूसरे बुद्धिमान, ९ जरिये, संसर्ग, १० शरीर, ११ विभूति या साधु व साधु १२ रदी, १३ धरानेके अनुसार, १४ होती है, १५ स्मृति या बुद्धि,
ब्रह्माण्ड
कबीर- मनहीको परमोद ले, मनहीको उपदेश ।
जो योमन 'परमोद ले, तो सुख हो सब देश ॥
कबीर- बात बनाए जग ठगा, मन 'परमोद्यो नाहिं ।
कहैं कबीर मन लेगया, लख चौरासी माहिं ॥
कबीर औरनके उपदेशसे, मुखमें पड़ गई रत ।
रास' बेगाने राखिके, खायो अपना खेत ॥
कबीर पण्डितसे तैं कह रहा, भीतर' बेघे' नाहिं ।
औरनको परमोदता', गया 'मेहरकी बाह ॥
कबीर 'अजहूं तेरा सब मिटे, जा माने गुरुसीख' ।
जवलग तू घरमें रहे मत कहूं मागे भीख ॥
बुद्धि तथा विश्वास सब शरीरसे संबंध रखता है । सो शरीर झूठा है और उसका कोई समान सच्चा नहीं है । यह समस्त विश्वासके अधीन है । यदि बुद्धि मान न लेतो किसी नियमका विश्वास न हो । इस शरीरके साथ बुद्धिही झूठी ठहरी फिर विश्वास कैसे सत्य ठहर सकते हैं । यदि यह शरीर मिट जानेवाला न हो तो सदैव एकही समान स्थिर रहे जो कुछ है वो अस्थिर तथा अल्पस्थायी है । यदि उसपर मैं विश्वास करूँ तो अंधकारसे कदापि न निकलूँ । जितनी विद्या कार्य और पुस्तक पाठसे हैं सो सब स्थूल शरीरसे ठहराए हुए हैं । समस्त अस्थिर शरीरकी भाँति हैं इस कारण इस संसारके पढ़े लिखे तथा अपढ़ सब एक समान हैं । क्योंकि, अपनी यथार्थतासे दोनों समान रूपसे अनभिन्न हैं । स्थिरता मृत्युके समय नाश हो जाती है पर उसके कर्मका संबंध उसके साथ रहता है । वह नरक वैकुण्ठके समीप जिस योनि एवं अवस्थाके योग्य होता है वहाँही खींच ले जाता है दूसरी योनिमें प्रविष्ट करा देते हैं । स्थिरताकी मृत्युमें न उसका वेद अथवा पुस्तकोंका पाठ काम आता है न उसकी विद्या कार्य उसको आवागमनसे छुडा सकते हैं वैकुण्ठनरक उसके आसपासकी जगह और चौरासी लाख योनि सब इसी स्थूल शरीरके ठहराए हुए इसीके समान नाश होनेवाली हैं, कोई बची नहीं रह सकती । आन्तरिक ज्ञान बाहरी विचार कार्य करनेका बल ये सब जब मिथ्या ठहरे तो बुद्धि और विश्वास कैसे सत्य माने जा सकते हैं । मृत्युके समय जहाँ इस जीवका ध्यान दौड़ जाता है उसीके अनुसार यह शरीर पाता है । मृत्युके बाद जब मनुष्यका
शरीर पाता है तब अपनी पूर्व करनीके अनुसार ही पाता है । सूरत तथा ज्ञान भी वैसाही होता है । यदि पशु योनिमें जावे तो भी अपने पूर्व काय्योंके अनुसार यह दुःख सुख पाता है । कितने पशु शिक्षाग्राही होते हैं । कितने पशुओंको भविष्यका वृत्तान्त मालूम रहता है इसका कारण यह है कि, उन लोगोंमें जो पूर्वकालमें विद्याकी ज्योति थी उसके प्रभावसे वर्तमान शरीरमें भी कुछ विकास करती है । मनुष्योंके समान कोई कोई पशु भी भविष्यत्का हाल जानते हैं एवं शिक्षाग्राही होते हैं । यह जीव समस्त गुण तथा हुनरोंकी जननी है, पर जबलों यह दूषित है तबलों कर्मोंका गुलाम है । यह पढ़े लिखे तथा अपढ़ दोनोंको एक समान है, दोनोंका विश्वास एकसा है क्योंकि, जिस देशमें वेद तथा पुस्तकें हैं उस देशके लोग तो उन्हींके अनुसार विश्वास करते हैं जहाँ वेद तथा पुस्तक कुछ नहीं है, वहाँके लोग जैसा कुछ अपनी बुद्धिसे ठहराते हैं वही करते हैं, कितनेही टापू हैं जहाँके लोग अक्षरतक भी नहीं पहचानते वहाँके लोग जैसा कि, कुछ उन लोगोंने अपनी बुद्धिसे ठहराया, वही मृत्युतक उनको दिखाई दिया करता है । इसी प्रकार एम्रिकादेशके प्राचीन निवासी ऐसा अनुमान किया करते थे कि, जो वस्तु अथवा जो जीव इस पृथ्वीपर नष्ट होते हैं उसी सूरतमें दूसरे जीव प्रगट हो जाते हैं । उसका एक विचित्र उदाहरण में ग्रंथ कबीर भानु-प्रकाशमें लिखा जा चुका है । देखलो जैसा जिसको गुरु मिला वैसीही उसकी बुद्धि तथा वैसाही उसे विश्वास हो गया है ।
पारकारनलकी साखी ।
कबीर बेड़ा सारका, ऊपर लादा सार ।
पापीका पापी गुरु, यों बड़ा संसार ॥
कबीर जाका गुरु है अँधरा, चेला खरा निरंधर ।
अन्ध अंधको ठेलियाँ, परे कालके फंद ॥
कबीर कौंचे गुरुके मिलनसे अगली मिलगई ।
चाल थे हारे मिलनकों, "दूनी विपत" पड़ी ॥
कबीर अंधा गुरु अंधा जगत्, अंधे हैं सबदीन ।
गगनमंडलमें बजरही, सुवनि अनहद बीन ॥
कबीर झूठे गुरुके पक्षको, तजत न कीजे बार ।
द्वार न पावे शब्द नहीं, भटकें बारम्बार ॥
१ नाव आदिका समूह, २ सत्यपुरुष, ३ डूबगया, ४ पूरा, ५ अज्ञानी, ६ ढकेला,
७ अघूरे, ८ अगाडीकी, ९ डूबगई १० दुगुनी, ११ विपत्ति, १२ दुखी, १३ आकाशी नक्कारे
१४ छोड़ते, १५ देर, १६ मार्ग ।
जो कोई पागल हो जाता है वो सदैव कुछका कुछ काम करता रहता है। वो अपनी जानसे पागल नहीं है पर दूसरोंके देखनेमें वह विक्षिप्त जान पड़ता है। जितने पागल हैं वे सब निराले हैं उनका एक तौरसे भिन्न ढङ्ग नहीं है जितने बुद्धिमान् ज्ञानी और अपने यथार्थको जान चुके हैं सबका एकही मत है, अतः जिसको वह ज्ञानी गुरु मिले वही भाग्यवान् होगा जितने सिद्ध साधु ऋषि पीर पैगम्बर, वली नबी होते हैं सभी ब्रह्माण्डके भीतरका समाचार देते हैं। नरक वैकुण्ठ तथा उसके आसपास, समस्त विद्या और कहानी किस्से हैं जो वेदपुराण आदि थे भी उसके बाह्यान्तरका समाचार देते हैं, यहाँही लों उसके विवरणके वृत्तान्त तथा कामधाममें समस्त मनुष्य फँस रहे हैं, ये पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंही शिरसे परंपर्यन्त मिथ्या हैं। इन दोनोंमें कोई सचाई एवं दृढ़ता नहीं है।
पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंका मिथ्यात्वप्रतिपादन।
पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या हैं उसके सब साक्षान झूठे हैं। क्योंकि, जल की बूंद भूमिपर गिरते ही भूमि उसको सोख लेती है इससे उत्पत्ति होती है। शरीर बनकर क्रमशः बड़ा होता है फिर घटने लगता है फिर मर जाता है, इस कारण यह मिथ्या है। जब कोई जीव मर जाता है तब भूमितत्त्व सूक्ष्म है उसका स्थान हृदयमें है वह गलकर जलमें मिल जाता है। जलका वास पेटमें है जल शुष्क होकर अग्निमें समा जाता है इस सूक्ष्म अग्निका स्थान पित्तमें है, उस पित्तको अग्नि समस्त शरीरके जलको सुखाकर आप वायुमें समा जाती है। इस वायुका वास नाभिमें है। इस नाभिकी वायु समस्त अग्निको समेट लेती है। यह अग्नि जल वायु आदि सब मिलकर आकाशमें समाजाते हैं। पाँच तत्त्व तीन गुणसे, तीन गुण अहंकारसे, अहंकार महातत्त्वसे, महातत्त्व ब्रह्मसे। इसी प्रकार ब्रह्माण्डकी प्रलय होती है। पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंकी एकही ढङ्गसे प्रलय होती है, जब समस्त रचना निरञ्जनमें समाजाती है तो वह शून्य स्वरूप होकर शून्यमें फिरता रहता है। जब निरञ्जनको शून्यमें फिरते २ सत्तर युग बीत जाते हैं तब उसके मनमें अकेले रहनेके कारण घबराहट उत्पन्न होती है। इस घबराहटके कारण अपने एकान्तके निवासको भला नहीं समझता। तब सत्यलोकके आसपास जाकर सत्यपुरुषसे निवेदन करता है कि, अब मैं एकान्तके रहनेको अच्छा नहीं समझता हूँ। सृष्टि रचना किया चाहता हूँ, तब सत्य पुरुषकी आज्ञा ज्ञानीजीको होती है कि, निरञ्जनसे जाकर कहो, अब सृष्टिको उत्पन्न करो। तब सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार ज्ञानीजी शून्यमें निरञ्जनके पास जाकर कहते हैं कि,
ए निरञ्जन ! अब तुम रचना करो । निरञ्जनजी आकर कर्मजीकी पीठपर पृथ्वीको बनाते हैं, वे अपने मुंहसे आद्याको उगल देते हैं । दोनोंके संयोगसे तीनों गुण तथा समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । पहले जब उत्पत्ति होती है तब सत्यस्वरूपी ही उत्पन्न होती है । सब निर्दोष होते हैं । वह सत्या अनेक कालपर्यन्त निर्दोष चली जाती है । फिर कुछ कालोपरान्त उनमें पाप लगता है, तब क्रमशः मनुष्य पापोंमें फँसते हैं और जप तप तथा भक्ति मुक्तिकी ओर ध्यान देते हैं तब आचार्य और गुरुलोग मनुष्योंको उपदेश करते फिरते हैं । पर सारे गुरु ब्रह्माण्डके भीतरकी सुध रखते हैं, ब्रह्माण्डके भीतरकी विद्या रखते हैं । पारख गुरुके अतिरिक्त दूसरेमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, ब्रह्माण्डके पार पहुँचा सके कारण यह कि, किसी अन्य गुरुको इसकी तनिक भी सुध नहीं कि, भवसागर पार जानेके निमित्त कौनसा मार्ग और कौनसा उपाय आवश्यक है ? सहस्रों ऋषि मुनि कहते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों झूठे हैं पर वे लोग जान बूझकर फिर क्यों मिथ्यासे लग रहे हैं ? झूठ छोड़कर सत्यसे क्यों नहीं मिलते ? कारण यह कि, जो कोई जानबूझकर झूठसे संबंध रखता है सो वास्तवमें मनुष्यतासे पृथक् हैं ।
प्रत्यक्ष में यह देह मिथ्या दिखाई देती है तो भी पाशविक बुद्धिको विश्वास नहीं होता । जब कोई जीव मरता है, तब उसको काटो तो उसमें एक बूंद जलका भी नहीं रहता, अग्निकी उष्णता और वायुका नाम चिह्न बचा रहता है और कुछ नहीं जाना जाता कि, वे कहाँसे आये और कहाँ चले गये । वास्तवमें वे इतःपूर्व भी कुछ नहीं थे और फिर भी कुछ बचे न रहे । इसी प्रकार साधु सिद्ध लोग होते हैं जिन्हें कि अपना शरीर पलट लेनेकी और अन्य प्रकारकी सिद्धियाँ तथा सामर्थ्य प्राप्त हो चुका है, वे तुरन्त अपनी देह पलट लेते हैं । तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । मनुष्य किसी पशुकी सूरत हो जावें, अन्तर्धान हो जावें, उपस्थित रहें, एक रहें, अथवा अनगिनती हो जावें । यदि यह देह सत्य होती तो एक देह छोड़ दूसरी स्वीकार करनेके समय पूर्वकी देह कहीं दिखाई देती वह पूर्व देह कहीं रखनेकी चिन्ता करलेता तब दूसरी स्वीकार करता, जब वह पहलेकी शरीरको छोड़कर बिना झंझट और चिन्ताके दूसरी स्वीकार कर लेता है कहीं अन्य शरीरका चिह्नतक भी नहीं दीखता इससे निस्संदेह जान लेना चाहिये कि, ये दोनों शरीर पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड कुछ नहीं । अज्ञानसे मनुष्य उसको सत्य मान रहा है । झूठको सत्य जान रहा है । इस कारण यह शरीर
नितान्तही भ्रम और शून्य है, नितान्तही तुच्छ है, इसको प्यार करनेवाले सदैव आवागमनके बन्धनमें पड़े रहेंगे।
ग्रन्थल—सब 'जाबजा वत'लान है मुख'बिर न 'रब रह'मान है।
नहि मुक्तिका 'सामान है बुतलान है बुत'लान है ॥
जो देख बेजावी कुरह सो भर्म अँधेरी है पुरा।
ह'रसि'न्त खींच और तान है बुतलान है बुतलान है ॥
कल्लाश ओ शाहो गदा अलहाम वही कलमः निदा।
तह'दतकी नहि "शायान है बुतलान है बुतलान है ॥
जो गुप्त और शुनीद है और "दीदनी और "दीद है।
जो हेच इल्म उरफान है बुतलान है बुतलान है ॥
जानाना "असल इसरारको सब पूजते करतारको।
"बरपा जो चारों खान है बुतलान है बुतलान है ॥
"आदम न सच पहचानता झूठेहीसे मन मानता।
क्या ज्ञान और क्या ध्यान है बुतलान बुतलान है ॥
अँधेर'पुरमें है खड़ा 'कदमें तेरे आजिज पड़ा।
धोखेमें इत्र इनसान है बुतलान है बुतलान है ॥
शब्दका विषय।
प्रारम्भमें एक शब्द निकला, वह शब्द जिससे निकला उसको कोई नहीं पहचानता, व्यर्थही लोग आपसमें झगड़ते चले आते हैं, यह शब्द एक सत्य है, पर दूसरे व्यवहारी शब्द और वाक्य बहुतायतमें होते हैं एकमें कदापि नहीं। कारण यह कि, पहले शब्दका कर्ता होगा, इसके उपरान्त शब्द होगा। बिना शब्द करनेवालेके शब्द सुनाई नहीं देता। यदि पहले शब्द करनेवाला न होता तो शब्द न होता। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँचों तत्त्व तथा तीनों गुण मिथ्या हैं। समस्त धर्म और मत प्रगट हैं फिर शब्द कैसे सत्य माना जावे? कोई शब्द बिना जोड़ेके नहीं। जब स्थिर वायुको चलानेवाली वायु चीरकर महावेगसे चलती है तब भौंति २ के शब्द होते हैं। इस विषयपर ऋषीश्वरोंका पुराना वाद विवाद चला आता है। न्यायदर्शन और सांख्यमें इसका भलीभाँति निर्णय किया है। इसके भली प्रकार लत्ते उड़ाए
१ प्रत्यक्ष २ कथन, ३ कहनेवाला, ४ ईश्वर, ५ कृपालु, ६ साधन, ७ शकलमात्र, ८ प्रत्येक, ९ दिशा, १० परमात्मा, ११ योग्यता, १२ देखनेलायक, १३ देख भाल, १४ मुख्य १५ व्यापक, १६ मनुष्य, १७ अँधेर नगर, १८ चरणोंमें।
हैं। पूर्णतया काटा छोटा है देखो न्यायदर्शनमें गौतम इस विषयपर इस प्रकार विवाद करते हैं न्यायसूत्रवृत्ति २-२-१३ वैखरीका शब्द अनादि नहीं हो सकता। क्योंकि, प्रथम तो उसका आरम्भ है। यह बोलके समय ही सुना जाता है, तीसरे वह बनावटी कहा गया है। अगले सूत्रोंमें विस्तार पूर्वक कहा गया है जो चाहे सो देखले। न्याय दर्शनके सूत्रोंमें वे परिणाम निकालते हैं कि, वैदिक शब्दको छोड़कर बाकी अनादि नहीं, सदैव वायुद्वारा कानोंमें आता है यहाँ तक कि, कितने ही सूत्रोंमें दृढ़ प्रमाणोंद्वारा उसका खण्डन किया है।
कपिलजी शब्दके अनादि होनेकी बातको मानते हैं। उनका कथन है कि, वैदिक शब्द अनादि है दूसरे प्रत्यक्षमें बनावटी जान पड़ते हैं। फिर यह परिणाम निकालते हैं कि, वेदोंके अनादि होनेकी बात सर्वथा सत्य है, सम्भव भी है। इस शब्दको लोग उत्पन्न करता और उसीसे उत्पत्ति मानते हैं।
कारण यह है कि केवल एक शब्द ओम् द्वारा तीनों लोक और चारों वेद बने हैं। वही उत्पतिकर्ता तथा उत्पत्ति बनकर अनगिनती दिखाई दे रहा है।
छन्द झूलना।
झूठही नाद है झूठही बुंद है, झूठही झूठको खेल सारा।
झूठ मूरत बनी झूठ सूरत बनी, झूठही झूठको स्वैग धारा ॥
झूठ दर्शन कहे झूठ परसन कहे, झूठ निराकार और शब्द सो है।
झूठ अंधकार है झूठ झंकार है, झूठही झूठको चित्त मो है ॥
झूठ गुण तीन और पाँचही तत्त्व हैं, झूठकी कथन यह जगत कर्ता।
झूठही योग है झूठही भोग है, झूठके फँदमें झूठ परता ॥
झूठ जञ्जालते काल धर खात है, झूठके पारखे कौन जाए।
झूठही जगत है झूठही भगत है, झूठ विस्तार चहुँ ओर छाया ॥
झूठ और सत्य दोऊ मिला यह जगतमें, भगत है सोई जो जान सकता।
परम अनन्द जिन झूठ जगमें खेला, सत्य कबीर एक सत्यवक्ता ॥
छः गुरुकी शिक्षाके भीतर जितनी बातें हैं यहाँ तक मायाके सम्बन्धमें वार्तालाप रहता है। पर जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है, तब मायाके सभी संबंध टूट जाते हैं। फिर किसी प्रकारका संदेह नहीं रहता। जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है वह अवस्था किसीसे कही नहीं जाती। इन सातों गुरुके उपर स्वयम् कबीर साहब सत्यपुरुष हैं। उसके वाक्य पवित्र है उसमें कोई संदेह नहीं। यदि उसके वाक्यमें कोई संदेह करे तो उसके भाग्यका दोष है। विज्ञान
देहपय्यंत तो विवाद है। पर इस देहमें कोई विवाद नहीं रहता। वह कबीर साहबकी दयासे प्राप्त होती है।
तरजीअ बन्द ।
देख हालत वह खुर्द सालीका । फ़िक्रकर सूरत कमालीकी ॥
नेको बंद फ़ेलके जो कैंदमें थे । आई रहमत जो लायंजालीकी ॥
ख्वाब गफ़लतमें खूब सोए थे । क्या खबर नेको बंदके चालकी ॥
रहम रहमान जब हुई नाजिल । दूरकी दर्द जाँ बवालीकी ॥
पावे अबदी हयाततो दरगोर । मेह्नुकर जब कबीर बन्दिछोर ॥
जानते दास उसकी शौकतो शान । आदमी जन्नतजनान क्या जान ॥
आलम अंधा जो सारे हैं मुरदार । नहीं पहचान कादिर रहमान ॥
भूलकर मरत सब हैं भडी चाल । कोई दाना है बाकी सब नादान ॥
दूसरे पैरवी करें खुदपीर । चार है वान एक है इनसान ॥
फिर न बाकी रहे कोई शरशार । मेह्नुकर जब कबीर मन्दिछोर ॥
जुहद सदाह जन्म कमाया था । रस्तगारीको राह न पाया था ॥
वेद ख्वानी तिहारतो तकवा । योगयुक्तिसे दिल लगाया था ॥
आप महर्मन बातनी इसरार । और को आनकर सिखाया था ॥
बेखबर सब जो अपनी बखबरी । अंधको अंधराह दिखाया था ॥
पावे आजिज पकड़तू अपना चोर । मेह्नुकर जब कबीर बन्दिछोर ॥
यथा— है जो हर दोहरजहाँ का गुरु पीर । जगमें ऐसे मिलाशकर जा शीर ॥
देखना चार कर न कुछ ताखीर । वह मेहरबां हो देखकर दिलगीर ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
कलके साहबकी वस्फ गाओगे । इससे बेहद अजरको पाओगे ॥
फिर न दरियामें गोता खाओगे । और सदहाको रह दिखाओगे ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
चल जिधरको उधर है यमका जाल । सारे जाँदारको फँसाए काल ॥
लैपकड़ जान दिलसे सतकी चाल । तेरा कोई न बीका होवे बाळ ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध सार जपो कबीर कबीर ॥
रहम रब्बानी तब हवीदा हो । गैबका नूर दिलपे पैदाहो ॥
हुम्बे महबूबमें जो शैदा हो । नफ़स गुरिन्दः पिसक पैदा हो ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
जमके जञ्जीरसे यह जकड़ा था । हाथपों हिलनेसे जो अकड़ा था ॥
गोया आदम नहीं यह लकड़ा था । डूबे, आजिजको उसने पकड़ा था ॥
टूट जावैगी कालकी जंजीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
मुखम्मस तर्जीअ बंद ।
सच है जो छिपा झूठके तस्वीर अयों ।
झूठका खेल खुला सब है जो बानिए ध्यान ॥
झूठ हर जायमें मामूर यहाँ और वहाँ ।
झूठसे दीप सभी लोक व नौखंड हुवा ॥
साँच को ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ।
अकल और कयास वहम दिल दूर जहाँ ॥
सो सब है बहलकए झूठदरपरदहनेहाँ ।
सब झूठ है जानलीजे जो नामो निशों ॥
इसमें न सफा सूरत भरभण्ड हुवा ।
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जा परचण्ड हुवा ॥
झूठमें लगरहे और झूठको ढूँढ सारे ।
सब चाल चले भेडको काजिब प्यारे ॥
झूठकी किश्ता चढे झूठको काजिबतारे ।
झूठका खेल जा सब पिण्ड व ब्रह्मण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
झूठके है सारे पैरू नहीं सच ढूँढ कोई ।
झूठके बीचमें सच सूरत पोशीदा दोई ॥
पावे आजिज सच सो तर्क जो कर दिलकी हुई ।
जानते कोई न सच इसलिए यमदण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
गञ्जल ।
यह सब कुछ खेल है बीराट नटका । कुतुब औ वेद पढ़ पढ़ जीव भटका ॥
निरञ्जन नटके जादू कौन जाने । यह तीनों लोक इसमें यौही अटका ॥
न पहचानै हुए सब ज्ञान अंध । न हरगिज छूटता है दिलका खटका ॥
भरभौडम सबको कैंद करते । सके क्यों तोड़ सुनिये मोह भटका ॥
बरोनी सब तमाशा यह जो देखे । न जाने यह दखनी खेल घटका ॥
है भूले साधु और पीरो पैगम्बर । नहीं कुछ भेद इस जादूकी हटका ॥
जो जाने भेद इसरारे नेहानी । तो फिर आदम न इस नजदीक फ़टका ॥
जो मुरशिद मेहूँवाँ रह बरहो उसका । तो वह जीव फिर न भवसागरमें अटका ॥
यही तदवीर आजिज है न कोई और । लगा एकतार धुन सतनाम रटका ॥
समस्त धर्मोंका वृत्तान्त ।
समस्त धर्म जो अभीतक पृथ्वीपर प्रचलित हुए तथा होंगे वे सब केवल एक ओम् शब्दके आधार पर हैं । इसी ओम्द्वारा चार वेद तथा तीनों लोकोंकी स्थिति है तीन वेद अर्थात् ऋग, यजुः, साम, अथर्व ये चारों असल हैं । इन चारोंकी पहुँच सत्यपुरुषके सत्यलोकतक है । देखो अथर्वण वेद प्रश्नोपनिषद्-सत्यकाम ऋषि अपने गुरु पिप्पलाद ऋषिसे प्रश्न करता है यह पाँचवाँ प्रश्न और ५९ मंत्र है ।
ऋग्निरेतंयजुर्भिरन्तरिक्षंसाम्भिर्यत्कवयो वदन्ति ।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्यत्सच्छान्तमजरममृतमभयंपरञ्चेति ॥
जैसे समस्त पृथ्वीके मनुष्य पूजते तो विष्णुको हैं पर अपनी अविद्याके कारण दूसरा परमेश्वर समझकर एक दूसरेसे लड़ते झगड़ते हैं । इसी प्रकार समस्त संसारके निमित्त चलन इस वेदमें लिखे हैं । शब्द अथवा ओम्हीपर समस्त संसारको उपदेश दे दिया है । समस्त बैरागी ब्राह्मण और संन्यासी तो प्रत्यक्षमें विष्णुपूजा किया करते हैं पर दूसरे लोग अपने अज्ञानवश कोई अन्य परमेश्वर ठहरा रहे हैं । छः दर्शन और छियानवें पाखण्ड और समस्त संसारके अच्छे बुरे मनुष्य इसी परमेश्वर के अधीन हैं । वही ब्रह्म जीव और माया है । वही तीनों परमेश्वर हैं । वही पुरुष और प्रकृति है । वही ब्रह्म और माया है । बौद्ध धर्मों अथवा चीनवालाका योग और यज्ञ है । योग पुरुष चिह्न तथा यज्ञ स्त्रीत्वका चिह्न है । वही आद्या, निरञ्जन, ब्रह्म और शक्ति कहो सब एक बात है । योगी और संन्यासी शिवको पूजते हैं । उनका गुरु शिव है । इस कारण शिवलिंगकी पूजामें संलग्न हुए, वेदान्ती अद्वैत ब्रह्मका समाचार देते हुए द्वैतको पूजते हैं । इसका कारण यह है कि, समस्त संसारमें द्वैतका हुल्लड है । अद्वैत तो छिपा हुवा तथा विलोपित है, वह तो कहने सुननेमें आता नहीं, समस्त काय्योंसे मनुष्य अनभिज्ञ हैं, अज्ञानावस्थामें उसकी बीतती है, समस्त आज्ञाएँ वेदकी हैं । प्रत्यक्षमें दो मत संसारमें वेदको विरुद्ध माने जाते हैं—जैन तथा बौद्ध । सो ये दोनों भी वेदके ही हैं, अज्ञानसे उससे उसमें अन्तर दिखाई देता है । बौद्ध तो अब भारतवर्षमें नहीं हैं, पर जैन तो अनेक हैं ये लोग पञ्च परमेष्ठी मानते हैं । परमेश्वर कोई नहीं सो उनके पञ्च परमेष्ठी यह हैं । १ अरहन्त—२ सिद्ध—३—
पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड
आचार्य-४ धर्मशास्त्र-५ पढ़ाने तथा सिखानेवाले साधु । इन्हींको जैन ईश्वर करके पूजते हैं, दूसरा कोई परमेश्वर नहीं, इन्हींको परमेश्वर कहो अथवा कुछ कहो । सो ये इनमें भी समस्त मनुष्योंके समान लोग विवश हुए हैं । इन पाँचोंमें प्रथम श्रेणी अरहंत अर्थात् तीर्थङ्करकी है, इनकी मूर्ति बनाकर जैनी लोग मन्दिरमें रखते हैं । इस मूर्तिके आगे गाते नाचते औ ढोल बजाते हैं । समस्त तीर्थङ्कर केवल ज्ञानी कहलाते हैं । उनका नाममात्रके लिये कैवल्य ज्ञान है । उसमें अंधेरा है, अंधेरा न होता तो वे सब कुछ जान सकते । कारण यह कि, ये लोग ज्ञान उत्पत्तिके उपरान्त अपनी अज्ञानताके कारण अठारह दोषोंमें फँसते हैं । अपने पापोंका प्रायश्चित्त करते हैं । यदि उनमें कैवल्य ज्ञान होता तो न उनको पापोंमें पड़ता पड़ता एवं न उनको प्रायश्चित्त करना पड़ता । कारण यह कि, कैवल्य ज्ञान वही है, जो कि, समस्त दोष गुण बुराइयोंसे विज कर दे । इस प्रकार समस्त मनुष्य खराबियोंमें लगे हैं उनमें तनिक भी सोच विचार नहीं है ।
परमेश्वरकी प्रशंसा तो सब कर रहे हैं । गुणभी सभी गाते हैं, पर उन लोगोंके मनमें तनिक भी सोच समझ नहीं कि, वे विचार करें कि हम किसकी प्रशंसा करते हैं तथा किसको पूजते हैं ? जिनका पूजन वे करते हैं उनमें ये गुण हैं या नहीं, वे अनभिज्ञ अनभिज्ञोंके साथ लड़ते झगड़ते हैं । समस्त पृथ्वीके मनुष्योंकी यही दशा है । तीन वेद तथा तीन अक्षरोंसे यह समस्त संसार दिखाई देता है । सो तीन वेद किस स्थान तक पहुँचा सकते हैं । चौथा स्थान किसी ज्ञानीके निमित्त नियक्त है । उस श्रेणीका ज्ञान जिसे हो वह वहाँ पहुँचे वेद-पाठियोंमें से थोड़े लोग इस पुरुषका समाचार देते हैं । इस कारण ब्रह्माण्डके चित्रमें इस पुरुषका चित्र नहीं बनाया । उस सर्वश्रेष्ठ स्थानके केवल मन्दिरका चित्र बना दिया । इस सर्वोच्च स्थानमें अक्षर पुरुष रहता है इस अक्षर पुरुषको महायश कहते हैं । महा ब्रह्माभी कहते हैं । यह अक्षर पुरुष इस स्थान पर विराजमान है, उसकी अधोद्भिनी योगमाया उसके साथ है । यहाँ बड़े चमक दमकके साथ वह रहता है । उसकी मूर्ति श्वेत और बड़ीही सुन्दर है उसका चित्र प्रारंभके चित्रोंमें है ।
यही योगमाया अक्षर माया कहलाती है इससे आगे वेद तथा पुस्तकोंको तनिक भी सुध नहीं, क्षर तथा अक्षरतक वेद और पुस्तकें कह सकती हैं । निरक्षरका समाचार कोई नहीं जानता इस निरअक्षर पुरुषको जो जाने सो मुक्ति मार्ग पावे । क्षर तथा अक्षर में सब भूल रहे हैं । यह चित्र ब्रह्माण्डके ऊपरकी