कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 511, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोया आदम नहीं यह लकड़ा था । डूबे, आजिजको उसने पकड़ा था ॥
टूट जावैगी कालकी जंजीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
मुखम्मस तर्जीअ बंद ।
सच है जो छिपा झूठके तस्वीर अयों ।
झूठका खेल खुला सब है जो बानिए ध्यान ॥
झूठ हर जायमें मामूर यहाँ और वहाँ ।
झूठसे दीप सभी लोक व नौखंड हुवा ॥
साँच को ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ।
अकल और कयास वहम दिल दूर जहाँ ॥
सो सब है बहलकए झूठदरपरदहनेहाँ ।
सब झूठ है जानलीजे जो नामो निशों ॥
इसमें न सफा सूरत भरभण्ड हुवा ।
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जा परचण्ड हुवा ॥
झूठमें लगरहे और झूठको ढूँढ सारे ।
सब चाल चले भेडको काजिब प्यारे ॥
झूठकी किश्ता चढे झूठको काजिबतारे ।
झूठका खेल जा सब पिण्ड व ब्रह्मण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
झूठके है सारे पैरू नहीं सच ढूँढ कोई ।
झूठके बीचमें सच सूरत पोशीदा दोई ॥
पावे आजिज सच सो तर्क जो कर दिलकी हुई ।
जानते कोई न सच इसलिए यमदण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
गञ्जल ।
यह सब कुछ खेल है बीराट नटका । कुतुब औ वेद पढ़ पढ़ जीव भटका ॥
निरञ्जन नटके जादू कौन जाने । यह तीनों लोक इसमें यौही अटका ॥
न पहचानै हुए सब ज्ञान अंध । न हरगिज छूटता है दिलका खटका ॥
भरभौडम सबको कैंद करते । सके क्यों तोड़ सुनिये मोह भटका ॥
बरोनी सब तमाशा यह जो देखे । न जाने यह दखनी खेल घटका ॥
है भूले साधु और पीरो पैगम्बर । नहीं कुछ भेद इस जादूकी हटका ॥
जो जाने भेद इसरारे नेहानी । तो फिर आदम न इस नजदीक फ़टका ॥