भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आचार्य-४ धर्मशास्त्र-५ पढ़ाने तथा सिखानेवाले साधु । इन्हींको जैन ईश्वर करके पूजते हैं, दूसरा कोई परमेश्वर नहीं, इन्हींको परमेश्वर कहो अथवा कुछ कहो । सो ये इनमें भी समस्त मनुष्योंके समान लोग विवश हुए हैं । इन पाँचोंमें प्रथम श्रेणी अरहंत अर्थात् तीर्थङ्करकी है, इनकी मूर्ति बनाकर जैनी लोग मन्दिरमें रखते हैं । इस मूर्तिके आगे गाते नाचते औ ढोल बजाते हैं । समस्त तीर्थङ्कर केवल ज्ञानी कहलाते हैं । उनका नाममात्रके लिये कैवल्य ज्ञान है । उसमें अंधेरा है, अंधेरा न होता तो वे सब कुछ जान सकते । कारण यह कि, ये लोग ज्ञान उत्पत्तिके उपरान्त अपनी अज्ञानताके कारण अठारह दोषोंमें फँसते हैं । अपने पापोंका प्रायश्चित्त करते हैं । यदि उनमें कैवल्य ज्ञान होता तो न उनको पापोंमें पड़ता पड़ता एवं न उनको प्रायश्चित्त करना पड़ता । कारण यह कि, कैवल्य ज्ञान वही है, जो कि, समस्त दोष गुण बुराइयोंसे विज कर दे । इस प्रकार समस्त मनुष्य खराबियोंमें लगे हैं उनमें तनिक भी सोच विचार नहीं है ।

परमेश्वरकी प्रशंसा तो सब कर रहे हैं । गुणभी सभी गाते हैं, पर उन लोगोंके मनमें तनिक भी सोच समझ नहीं कि, वे विचार करें कि हम किसकी प्रशंसा करते हैं तथा किसको पूजते हैं ? जिनका पूजन वे करते हैं उनमें ये गुण हैं या नहीं, वे अनभिज्ञ अनभिज्ञोंके साथ लड़ते झगड़ते हैं । समस्त पृथ्वीके मनुष्योंकी यही दशा है । तीन वेद तथा तीन अक्षरोंसे यह समस्त संसार दिखाई देता है । सो तीन वेद किस स्थान तक पहुँचा सकते हैं । चौथा स्थान किसी ज्ञानीके निमित्त नियक्त है । उस श्रेणीका ज्ञान जिसे हो वह वहाँ पहुँचे वेद-पाठियोंमें से थोड़े लोग इस पुरुषका समाचार देते हैं । इस कारण ब्रह्माण्डके चित्रमें इस पुरुषका चित्र नहीं बनाया । उस सर्वश्रेष्ठ स्थानके केवल मन्दिरका चित्र बना दिया । इस सर्वोच्च स्थानमें अक्षर पुरुष रहता है इस अक्षर पुरुषको महायश कहते हैं । महा ब्रह्माभी कहते हैं । यह अक्षर पुरुष इस स्थान पर विराजमान है, उसकी अधोद्भिनी योगमाया उसके साथ है । यहाँ बड़े चमक दमकके साथ वह रहता है । उसकी मूर्ति श्वेत और बड़ीही सुन्दर है उसका चित्र प्रारंभके चित्रोंमें है ।

यही योगमाया अक्षर माया कहलाती है इससे आगे वेद तथा पुस्तकोंको तनिक भी सुध नहीं, क्षर तथा अक्षरतक वेद और पुस्तकें कह सकती हैं । निरक्षरका समाचार कोई नहीं जानता इस निरअक्षर पुरुषको जो जाने सो मुक्ति मार्ग पावे । क्षर तथा अक्षर में सब भूल रहे हैं । यह चित्र ब्रह्माण्डके ऊपरकी

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