कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै जहाँ पहले चित्र नहीं बनाया गया यहाँही पर्य्यंत वेद और पुस्तकोंकी पहुँच है, आगेकी सुध किसीको नहीं है। वेद तथा पुस्तकोंके श्रेष्ठ विद्वान्गण इस स्थानतक पहुँचते हैं। जो कोई इस स्थानपर्य्यन्त पहुँचे वो सबका राजा है, यह श्रेणी उर्फान द्वारा प्राप्त होती है। जिसके पहुँचसे यह श्रेणी प्राप्त होती है वह विद्या किसी किसी योगीमें होती है। वेद और पुस्तकोंकी तो यहाँतक सीमा है। आगेका समाचार सूक्ष्म वेद देता है, स्थानोंका विवरण विस्तारपूर्वक लिखता है। सबका ठीक ठीक विवरण करता है।
जब कालपुरुषने चार खान चौरासी लाख योनि बनाई। तब इसी चार वेद छः शास्त्र छः दर्शन और छानवें पाखण्ड समस्त धर्म इत्यादि स्थिर किए, इसीसे नरक बैकुण्ठ तथा उसके आस पासका स्थान सब कुछ नियत हुवा। जिस योनिमें जिस स्थानपर और जिस अवस्था, स्वरूप, गुण तथा धर्ममें उसके कार्य्य उसको दृढ़ करते हैं वही उसको अच्छा लगता है। अपनी करनीका खिंचा हुआ जीव जिस अवस्थामें पैठ जाता है उसीसे उसको प्रेम हो जाता है, उसीसे प्रसन्न तथा दूसरोंसे दुःखी होता है। जिस धर्म रीति और व्यवहारको स्वयम् स्वीकार करता है। वही दूसरोंको सिखलाता भी है। उसको भले बुरेकी तनिक भी सुध नहीं। वह अपने जातिका अगुवा बनकर अन्यान्य लोगोंको भी वही सिखाता, दूसरे सब उसका पीछा करते हैं। जैसे एक काग बोलता है कान, तब समस्त काग कान कान करने लगते हैं। सब गीदड़ोंका अगुवा पहले बोलता है कि, मैं राजा हूँ तब समस्त गीदड़ बोलते हैं, तू हो, तू हो, तू हो, ऐसेही समस्त कीड़ोंका अगुवा आगे निकलकर चलता है। उसके पीछे समस्त कीड़े मकोड़े चलते हैं। सारे मकोड़ोंकी फौज उस अगुवाका चूतड़ देखते और सुंघते चली जाती है। समस्त दुर्बुद्धि अपने पथदर्शकके पीछे होते हैं। इसी प्रकार सारे भेड़ोंके पीछे भेड़े चलती हैं। यही हाल सारे आदमियोंका है। इस कारण वह सब मनुष्यतासे न्यारे हैं। उनमें कोई मनुष्य नहीं सब पशु हैं। कारण यह कि, इन सबमें पाशविक बुद्धि है। जो कोई मनुष्य होगा सो कदापि ऐसी आदत अपनी न बनावेगा मिथ्यासे सर्वतोभावसे पृथक् होकर सत्यको ग्रहण करेगा परमेश्वरको सत्य भला जान पड़ता है मिथ्या नहीं।
कबीर साहबकी आज्ञा है कि, मनुष्यको उचित है कि, परमेश्वरके स्थानमें अपने गुरुका भी पूजन किया करे। जो ध्यान ज्ञान गुरु बतावे उसीके अनुसार चला करे। कारण यह है कि, परमेश्वरको कोई देख नहीं सकता, गुरुके दिखानेसे देखने तथा जाननेका बल प्राप्त करता है। इस कारण गुरुकी श्रेष्ठता गोविंदसे