भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बढ़कर है । जो कोई गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञताका कर्तव्य पूर्णतया प्रतिपालन करेगा वह निश्चय परमेश्वरसे संयुक्त हो जावेगा । गुरुको गोविंदकी मूर्ति जान, उसमें संदेह न करेगा तो उसका कार्य पूरा होगा । कञ्जूस तथा दुर्बुद्धि मनुष्यसे गुरुसेवा कदापि नहीं हो सकती, वे इससे दूर भागते हैं । इस कारण उनको सीधी राह नहीं मिलती ।

जितने ऋषि मुनि और पीर पैगम्बर इत्यादि हुए हैं, सबमें किसी सीमा तक प्रकाश हुआ है । उसके द्वारा उन लोगोंने अपने धर्म प्रचलित किए । आकाशवाणी, इलहाम, बही शब्द इत्यादि सब भायाके आयोजन हैं । वहाँ एकाई नहीं यह सब बातें विशेषतामें होती हैं, जो एक तथा बेजोड़ कहलाता है, वहाँ कोई कुछ नहीं कह सकता । इस कारण जो बहुत ज्यादा है सो मिथ्या है । चारों स्थानसे इस संसारका समस्त काम धाम धर्म सांसारिक प्रगट हो रहा है । जिवरूतसे तो समस्त कृत्योंकी आज्ञा है लाहूत अर्थात् अक्षर पुरुषकी उत्तेजना भी संयुक्त है । जैसे कि, मैं पहले लिख आया हूँ कि, मुहम्मद साहबने कहा कि, मुझको लाहूत स्थानसे आज्ञा मिली । इस शरीरके भीतर और भी कितनी मूर्तियाँ हैं जिसके गुरुने जिस स्थान तथा जिस मूर्तितक पहुँचनेका आदेश किया वह वहीं पहुँचा, उसीको वह अपना परमेश्वर तथा उपजानेवाला समझने लगा । जो कुछ पिण्ड तथा ब्रह्माण्डके भीतर दिखाई देता है, जो कहा सुना जाता है वो सब मिथ्या है । कहने सुननेसे पृथक् है । वह बिना सत्यगुरुके जाना नहीं जाता । वेद तथा पुस्तकोंकी पहुँच वहाँतक नहीं ।

यह समस्त संसार अंधा है । वेदको छोड़ सब पुस्तकें अंधेकी लकड़ियाँ हैं । समस्त विद्वान् लकड़ियोंके पकड़ानेवाले हैं । पढ़े लिखे तथा बिना पढ़े दोनों गर्भहीसे अंधे हैं । किसीको कुछ भी नहीं सूझता । दोनों सांसारिक वासनाओंमें फँसे हुए हैं । वासना तथा काम क्रोधदिने सारे संसारको अंधा बना दिया है । इस कारण, वासनासे कोई रहित नहीं हो सकता । जब उसको उचित पथकी शिक्षा दी जाती है तो यह पसंद नहीं करता है, उससे भागता है । साधु सदैवसे पुकारतें आते हैं । कोई नहीं मानता, जैसे जन्मान्धको दर्पण दिखानेसे कोई लाभ नहीं इस कारण जो लोग काम क्रोध लोभ मोहादिकके प्रपञ्चोंमें फँसकर अंधे हो रहे हैं, उनको कुछ नहीं सूझता और सत्य शिक्षा किसीके चित्तपर प्रभाव नहीं डालती जितने धर्म इस पृथिवीपर हैं जितने धर्मके अगुवा हुए हैं तथा अब हैं, सबकी यही शिक्षा है कि, जो कोई सत्यपथ चाहै तो मृतजीवित हो । पर इस बातपर कोई विचार नहीं करता कि, जीवन तथा मृत्यु किसे कहते हैं ?