भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सब धर्ममें तो उसीका तेज फैल रहा है। पर मुक्ति तो कहीं नहीं केवल कबीर पन्थमें है। इसी कारण इस धर्ममें थोड़े लोग हैं। और अन्य समस्त धर्मोंमें विष तथा अमृत दोनों मिलाये गये हैं। पर स्वच्छ अमृत तो केवल एकही धर्ममें है, मेलसे कुल संसार बना है, मुबितसे नाश है। जब उसकी वासना पृथक् होगई तो जगत् कहीं? जिसने स्वच्छ अमृत पी लिया उसके निमित्त यह जगत् तुच्छ है। सनत्कुमारको पार्वतीजीने दो बार शाप दिया, एक बेर आशीर्वाद दिया। आप शापसे अप्रसन्न तथा आशीर्वादसे प्रसन्न भी न हुए क्योंकि, उनका मन सांसारिक कामनाओंसे पृथक् था, उनका कोई भिन्न वैरी न था, दोनों अवस्था दुःख सुख राज्य तथा फकीरी नरक और त्रिविष्टय तथा उसके निकटवर्ती स्थान सब एकसे हैं कहीं किसीको चैन तथा सुख नहीं है।

अध्याय १३।

ज्ञानीजी महाराज।

जब तीन लोककी रचना हो चुकी तब कालपुरुषने असंख्य युगपर्यंत तीन लोकपर वेखटके, राज्य किया, समस्त मनुष्योंको लवेद तथा पुस्तकोंके बंधनमें फँसाया सत्यपुरुषका नाम छिपाकर अपनेको उत्पन्न कर्ता तथा समस्त संसारका मालिक ठहराया, अवर्णनीय तथा अनिर्वचनीय सत्यपुरुषने इस विषयकी ओर तनिक ध्यान भी न दिया। परमात्माका ध्यान पृथ्वीकी ओर मुड़ा देखा कि, कोई जीव सत्यलोकको नहीं आया, किसी मनुष्यने मुक्तिमार्ग नहीं पाया, समस्त जीवोंको कालपुरुष फँसाकर खा रहा है। तब ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ए ज्ञानीजी! आप अब पृथ्वीपर जाओ, कालपुरुषके फन्देसे मनुष्योंको छुड़ाकर मेरे लोक पहुँचा दो। तब ज्ञानीजी पृथ्वीपर आए, भिन्न भिन्न नामोंसे प्रख्यात हुए। पर आपके चार नाम चारों जगमें खूब प्रख्यात हुए। यद्यपि आपके अनगिनती नाम हैं, पर पूर्वलिखित चारों नाम अधिक प्रसिद्ध हैं।

सत्य पुरुषके जितने जीव हैं, सबमें ज्ञानीजी महाराज श्रेष्ठ हैं, सूक्ष्म वेदका कथन है कि, ज्ञानीजी आपही सत्यपुरुष हैं। सत्यपुरुष तथा ज्ञानीजीमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है। सत्य सुकृतजी, मुनीन्द्रजी, करुणामय स्वामी, कबीर ज्ञानीजी, इन चारों नामोंसे चारों युगोंमें प्रसिद्ध होते हैं, अनगिनती मनुष्योंको पथ दरशाकर परम धामको पहुँचाते हैं। कबीर साहब स्वयम् सत्यपुरुष हैं, आपकी दया दृष्टि समस्तजीवोंपर एकसी हैं, आपके गुण कहने सुननेके बाहर हैं। जो गुण सत्यपुरुषमें हैं वे ही गुण कबीर साहबमें हैं, केवल

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