कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
दाऊदका पुनर्जन्म मतीकी इज्जल में आवागमन
हो जाता है जिससे वह ज्ञान नहीं होता कि, आत्मा किधरसे आती है कहाँ जाती है कहाँ रहती है । मैंने यहाँ थोड़े ही प्रमाण इसके लिये लिखे हैं । जो ध्यानपूर्वक यहूदी, ईसाई और मुसलमानोंकी पुस्तकें देखेगा वो सहस्रों प्रमाण दे सकेगा । इस देशमें मुसलमानोंकी हदीस मिल सकती है । उनकी पुस्तकोंसे भली प्रकार आवागमन ऐसा प्रमाणित होगा जिससे तनिक भी सन्देह न रहेगा । जितना हम लिख चुके हैं वही उनके धर्मग्रन्थोंसे आवागमन सिद्ध करनेके लिये पर्याप्त है । किन्तु जागते हुये सोनेवालोंको कोई जगाने वाला भी नहीं है ।
अध्याय १९.
जानवर ।
अब विचारना चाहिये कि, आत्माका स्वरूप कैसी है जो चौरासी लाख योनिमें आवागमन करती हुई समस्त स्थानोंपर वर्तमान है । उसका स्वरूप बतानेमें भी असमर्थ है । वह कहने सुनने और देखनेमें नहीं जाती । मनुष्य तथा पशुके पास जितने यन्त्र हैं उनसे वह कभी पकड़ी भी नहीं जा सकती । वही सबमें है तनिक विभिन्नता भी नहीं है । सबको एकसा दुःख सुख हो रहा है । पर जिसमें बुद्धि है जो सत्य मिथ्याको पहचान, झूठसे अलग होकर सत्य धारण करता है वही मनुष्य है बाकी सब मनुष्य हों या पशु, पशुसमान ही हैं । पशु मनुष्योंसे किसी विषयमें भी कम नहीं है इसी कारण मैं यहाँ पशुओंकी बुद्धिके विषयमें कुछ लिखता हूँ ।
बन्दर
अब मैं पशुओंमें पहले बन्दरका हाल लिखता हूँ । बन्दर मनुष्यके स्वरूपके होते हैं । उनका सब ढङ्ग मानुषिक होता है, इसी कारण उसे वानर यानी विकल्पसे मनुष्य कहते हैं पर उनके पाँवके अँगूठे उँगलियोंके सदृश होते हैं उनकी एड़ी बहुत छोटी होती है उनका सब आकार मनुष्योंकासा होता है । वे मनुष्योंकी सब नकल कर सकते हैं । वे नाना प्रकारके होते हैं । यहाँ बन्दरोंकी बुद्धि को कुछ कहानियाँ लिखता हूँ ।
चोर पकड़नेवाला बन्दर—पञ्जाब फीरोजपुर धर्मकोट गाँव के समीप मैंने सुना था कि, एक कलन्दर चला जाता था । उसके पास तीन चार बन्दर थे । कुछ जमा जथा भी था । उसी लालचसे उजाड़में उसको तीन चार चोरोंने घेर लिया, मारकर सब असबाब छीन उसके बन्दरोंको भी मार डाला पर उनमेंसे एक बन्दर बच निकला । वह भागकर एक वृक्षपर चढ़ गया । चोरोंने
कलन्दर और बन्दरोंको मिट्टीमें दबा सब माल असबाब लेकर अपनी राह ली। उनके हाथसे बचा हुआ वह बन्दर चोरोंके चले जानेपर बूक्षसे उतरा। चुपचाप दूर दूर तीनों चोरोंके पीछे २ चला गया। वे तीनों अपने गाँवमें पहुँच घर दाखिल हुये। तब उसने उस गाँवको भलीप्रकार पहचान लिया। उसकी राहपर अपने हाथसे चिह्न करता हुआ लट आया। वह बन्दर तहसीलदारके पास पहुँचा। तहसीलदारसे अपने हाथ और सिरसे इशारा करने लगा। तहसीलदारने बन्दरके इशारेसे बन्दरको दुःखी समझ चपरासियोंको आज्ञा दी कि, तुम बन्दरके साथ जाके देखो कि, वह क्या चाहता है। तहसीलदारने चपरासियोंको आज्ञा दी उस बन्दरने अपना शिर हिला दिया कि, चपरासियोंको मत भेजो। तहसीलदारने जमादारको आज्ञा दी। इसपर भी बन्दर प्रसन्न न हुआ। फिर तहसीलदार घोड़े पर सवार होकर जमादार चपरासियोंको साथ लेकर बन्दरके साथ चला। वह बन्दर तहसीलदारके आगे आगे चला। उस स्थानपर पहुँचा जहाँ वह कलन्दर दबाया हुआ था, वहाँ पहुँचा तो बन्दर उस भूमिपर हाथ मारने लगा। तहसीलदारने उस स्थानको खुदबाया। उससे कलन्दर तथा बन्दरोंकी लाशें निकल पड़ीं। फिर बन्दर इशारा करता हुआ तहसीलदारके आगे आगे चला सबको उस गाँवमें ले गया जहाँ कि, वे खूनी रहते थे। तहसीलदारने आज्ञा दी कि, गाँवके सब मनुष्य उपस्थित हों सब मनुष्योंको खड़ा कराके उस बन्दरसे कहा कि, तुम पहचानों इनमें तुम्हारा कौन चोर है। बन्दरने सबको देखकर शिर हिलाया कि, इनमें कोई नहीं है। तब तहसीलदारने पूछा कि, इस गाँवका कोई मनुष्य बाहर गया है? लोगोंने कहा कि, हाँ अमुक अमुक मनुष्य उपस्थित नहीं हैं। तब तहसीलदारने कहा कि, उन्हें शीघ्रही उपस्थित करो। वे भी सब मनुष्य उपस्थित किये गये। उस समय चोरोंने अपने मुँहपर राख इत्यादि मलकर अपना चेहरा बदल लिया कपड़े बाँध लिये जिसमें चेहरा न पहचाना जाय। जब वे तीनों चोर बन्दरके सामने आये तो उसने तुरन्त पहचान लिया। इशारा किया कि, चोर तथा हत्यारे ये ही हैं। बन्दरने अपनी उँगलियोंसे इशारा किया। तहसीलदारने तुरन्त ही उनको पकड़ लिया। उनका इजहार लिया गया, उनपर हत्या तथा चोरी प्रमाणित हो गयी। उस बन्दरके साथ न्याय हुआ। हत्यारोंको फांसी दी गई।
जर्मीनदारका बन्दर—एक जर्मीनदारके पास एक बन्दर था। वह एक दिन सो गया तो उसकी अपानबायु खुली। उसने जर्मीनदारकी चादर फाड़कर उसके मलमार्गके निकट चिल्लाना आरम्भ किया। जर्मीनदार जाग पड़ा। बन्दरकी
तात्पर्य
यह अवस्था देखकर रुष्ट हुआ । उस बन्दरको तीन जूते मारे । जूतोंकी मार खाकर वह बन्दर अलग जा खड़ा हुआ एवं सलाम करके चला गया । जमीनदार बन्दरको बुलाता एवं खुशामद करता ही रह गया । पर वह उसके पास नहीं आया चला ही गया ।
बच्चेको निकाला—तिलोकरामजी उदासीने अपनी आँखसे देखा था कि, गङ्गाके किनारे पर एक पीपलका वृक्ष था । उसपर एक बँदरी बैठी थी । उसका बच्चा दैवात् कुएँमें गिर पड़ा । वह उस वृक्षकी जड़से लग रहा था । वह बच्चा कुएँमें गिरा तब उसने चीख मारी, उससे अनेक बन्दर एकत्रित हो गये । उनमें एक बन्दर बड़ा ही दृढ़ तथा मोटा और भयानक था । उसने उस वृक्षकी जड़को दृढ़ताके साथ दोनों हाथोंसे पकड़कर अपने दोनों पाँव कुएँमें लटका दिये । दूसरा बन्दर उसकी टाँग पकड़कर लटक गया । फिर तीसरा बन्दर उस दूसरे बन्दरकी टाँग पकड़कर लटक गया । इसी प्रकार फिर चौथा, पाँचवाँ, छठवाँ, सातवाँ सभी क्रमशः एक दूसरेकी टाँग पकड़कर लटकते गये । जब जलतक पहुँच गये, ऊपरसे नीचेतक बराबर सीढ़ी लग गई । गिरा हुआ बच्चा उसी सीढ़ीपर चढ़कर बाहर निकल आया । इसके पीछे सबसे नीचेवाला बन्दर ऊपर चढ़ आया । फिर उस नीचेवालेके बाद जो था वह निकला इसी प्रकार सब बन्दर जैसे लटके थे वैसेही ऊपर चढ़ आये । उन्होंने अपनी बुद्धिमानीसे अपने सजातीय बच्चेकी प्राण रक्षा की ।
गाडी हॉकनेवाला—सन् १८५६ ई. में पञ्जाब देशके फिरोजपुर नामक स्थानमें मनोहरदास वैरागी फिरा करता था उसके साथ गाडी रहती थी । वह प्रत्येक गांवमें जाया करता था उसके पास कितनेही जानवर थे उसने बन्दरको गाडी हॉकना सिखाया था । उसके साथ एक छोटी तोप थी वह बन्दर तोप भी चलाया करता था । कितनेही आश्चर्यमय कार्य किया करता था । उसके पास गायें थीं वे दूकान दूकानपर जाकर भीख मांग लाया करती थीं । उसने तोता मेंना और कुत्ते आदिको भली प्रकार काम करना सिखाया था । वे सब उसकी शिक्षानुसार काम किया करते थे ।
बुद्धिमती वानरी—मैंने सुना था कि, अमृतसरके समीपकी बस्ती रविदासपुरमें एक वैरागी था, चमार जातिवाले उसके बहुतसे शिष्य थे । उसके पास एक बँदरी थी । उसका सेवक एक वृद्ध था जो अफीम खाया करता था । उस स्थानपर दर्शनार्थ जो कोई जाता वह बँदरी उसका कपड़ा अथवा पाँव पकड़ लेती । जब वह उससे पूछता कि, तू क्या पैसा कौड़ी चाहती है ? तो वह
सिर हिलाती कि, हों। जब कोई पैसा कौड़ी देता तो वह उसका पाँच छोड़ देती, सारे पैसे कौड़ियों लेकर अपने सेवा करनेवालेको सौंप देती थी। यदि वह मनुष्य कह दे कि, इसकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं है तो वह उन्हें जिनसे लेती उन्हींको वापस कर देती उस साधुसे मिलकर जितने दर्शनाभिलाषी पलटते थे उन सबको वह पहचानकर उनकी कौड़ी वापस कर दिया करती थी। किसीके पैसा कौड़ीमें तनिक भी हेरफेर न पड़ता था। वह बंदरी बुद्धिके बहुतेरे आश्चर्यजनक कार्य किया करती थी।
सेवक बन्दर—एम. आर. एस. ली महाशयकी अंग्रेजी पुस्तकसे पशुओंकी बुद्धिके विषयकी कुछ कहानियाँ लिखता हूँ। फ्रांस देशकी राजधानी पेरिसमें एक मनुष्यने एक बन्दरको शिक्षा दी। वह बन्दर अनेक आश्चर्य और बुद्धिके कार्य किया करता था। लिखनेवाला लिखता है कि, जब मेरा उस बन्दरसे साक्षात् हुआ तब वह मेरी राह छोड़कर अलग हो गया। मैंने उससे कहा सलाम-तब उस बन्दरने अपनी टोपी उतार झुककर मुझे सलाम किया। मैंने उससे पूछा कि, तुम कहाँ जाते हो? तुम्हारे पास कोई पथ चलनेका आज्ञापत्र है? तो उसने अपनी टोपीमेंसे एक चौकोर कागज निकाला मुझे खोलकर दिखाया। उसके स्वामीने कहा कि, इन महाशयका कपड़ा मैला है। उस बन्दरने अपने मालिककी जेबसे तुरन्तही एक छोटा ब्रश निकाला। मेरे कपड़ेके किनारेको पकड़कर झाड़ दिया फिर मेरे जूतेको साफकर दिया। वह बड़ा ही शिक्षित तथा कृतज्ञ था। जब उसको भोजन दिया जाता था तो वह अन्यान्य बन्दरोंकी तरह तरह खानेको गालोंमें नहीं भरता था। किन्तु मनुष्यकी तरह उसी समय खा जाया करता था जब हम लोग उसको रुपये पैसे देते थे तो वह लेकर उन्हें अपने मालिकके हाथ पर धर दिया करता था।
चंपेन—एक प्रकारका बन्दर है जिसका मुख गम्भीर होता है, वह सब बन्दरोंकी अपेक्षा मनुष्यकी अच्छी तरह नकल कर सकता है। सारे कांध्य गम्भीरता सहित करता है। कभी कभी उसको बहुतही थोडा क्रोध आया करता है। अंग्रेजी भाषामें इस बन्दरको चम्पनजी कहते हैं। इसमें एक छोटी जाति और एक बड़ी जाति होती है। इसकी छोटी जातिका एक बन्दर प्यरिस नगरमें रहता था। उसकी बुद्धिके विषयमें अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। वह कुरसी पर बैठता था। ताला खोलता था फिर बन्द कर देता था। छोटा चमचा लेकर चाय पीता था। छुरी काटेसे भोजन किया करता था। अपना भोजन अलग रख देता था। जब अकेला होता था तब चिल्लाता था अपने को
योहन्नाकी इज्जीलमें आवागमन
अपने मालिकके लड़केवालोंके समान माने जानेसे अत्यन्त हर्षित होता था ।
हन्शका बन्दर—हन्शदेशका एक प्रकारका बड़ा बन्दर होता है जो चार फीटसे लेकर पाँच फीट तक ऊँचा होता है । वह मनुष्योंकी तरह दोनों पाँवसे चलता फिरता है, प्रायः सारे कार्य मनुष्योंके ही समान करता है । जहाँ कहीं हाथी दांतोंको पाता है उठा लेता है उसको सुरक्षित जगह रखनेकी युक्ति न जाननेसे हाथमें ही लिये फिरता है । यदि वह आपसे गिर पड़े तो गिर पड़े । अथवा उसको लिये बोझसे थक जाय तो छोड़े । यह मनुष्यकी तरह झोपड़ी बनाता है । बच्चा मरने पर माँ मुरदा बच्चा लिये फिरती है । यहाँ तक कि, वह सड़ गलकर टुकड़े २ होकर उसकी गोदसे गिर जाता है । यह बन्दर बड़ा क्रोधी और बलिष्ठ होता है । मनुष्य उसके एक थप्पड़से मर जाता है ।
रंग कायम—एक प्रकारका बन्दर है, वह स्याही चूसता है तथा लेखिनी चुरा लेता है जहाँ कहीं मदिरा इत्यादि पावे तो पी जाता है शीघ्रही अपने नामको जान लेता है, जो उसका नाम लेकर पुकारे तो उसके पास चला जाता है । वह बच्चोंके साथ खेला करता है, जैसे लड़के लड़कियाँ करती हैं इसी प्रकार वह अपनी लम्बी भुजा लड़कों की गरदनके चारों ओर डालकर खेलता है । लड़कोंकी रोटीसे भाग लेता है, इसके पीछे उनके साथ खेलना आरम्भ करता है भाँति भाँतिकी नकलें तथा कौतुक किया करता है । छोटे छोटे लड़कोंकी तरह क्रीड़ा कौतुक किया करता है । लड़के इसके साथ खेला चाहें वह न चाहता हो तो उनकी उँगली अपने दांतोंसे दबाकर खेलनेमें अपनी अरुचि प्रगट किया करता है । दूसरे छोटे छोटे बन्दर उससे धूँछता करते हैं तो वह उनकी दुम पकड़ खींचता हुआ उन्हें दण्ड दे देता है, जब वे चिल्लाते हैं, तो उनको छोड़ देता है । वह गम्भीरतासे रहता है । पथिकोंके खानेके समय टेबुलके समीप जा बैठता है । उसके भोजनके समय कोई हँसे तो उसपर फूँकता गाल फुलाता हुआ ठठठा करनेवालेकी ओर क्रोधकी दृष्टिसे देखता है । जबतक भोजन न कर चुके तबतक एकान्तमें रहनेको अच्छा नहीं समझता । यदि चाहे वस्तु न मिले तो हाथ पसार कर लौटता फिरता है । जो वस्तु उसके सामने आवे उसको तोड़ ताड़कर बिगाड़ डालता है और (रा-रा-रा-के शब्दसे) चिल्लाया करता है ।
शव लेनेवाला—फारबस साहबका वर्णन है कि, मेरे मित्रोंमें से एकने एक बेंदरीको बन्दूकसे मार दिया उसके लाशको वह अपने खेमेंमें घसीट ले गया । चालीस पचास बन्दर घुड़कते और धमकाते उसके खेमेकी ओर आये । पर जब उस साहबने अपनी बन्दूकको उनके सामने किया तो वे दूर खड़े हो गये तो
कयामतसेभी पहिले आवागमन आवागमन पर कुरान
भी एक बंदर जो उनका सरदार मालूम होता था, आगे बढ़कर धमकाता हुआ खुर खुर करने लगा। वह बहुत रुष्ट जान पड़ता था। उसको बन्दूकका तनिक भी भय नहीं जान पड़ता था। अन्तको खेमाके द्वारपर पहुँचा। तब उसके आकारसे कायरता, नम्रता आदिके चिह्न प्रगट होते थे ऐसा जान पड़ता था कि, वह उस शवके लिये निवेदन करता है वह शव उसको दे दिया गया। वह उस लाशको अपना गोदमें ले बड़े प्रेमके साथ अपने साथियोंमें गया। पीछे सारे बन्दर न जाने कहाँ चले गये।
रोटी बनानी—दक्षिण पश्चिम एफ्रिका तथा कितने ही देशोंमें बन्दरोंकी अनेक जातियाँ हैं उनकी बहुत कहानियाँ हैं। उन देशोंके मनुष्य इस प्रकार विश्वास करते हैं कि, बन्दर मनुष्योंके समान वार्तालाप कर सकते हैं। परन्तु इस भयसे वे नहीं बोलते कि, मनुष्य उनको पकड़कर काम करावेंगे। जब वे चाहते हैं तब बोल लेते हैं पर भय उनको इतना ही है। बन्दरोंकी अनेक जातियाँ हैं, मनुष्य तथा बन्दरमें कुछ विभिन्नता नहीं है। मैंने सुना था कि दक्षिण एफ्रिकामें लोग बन्दरोंसे रोटी पकबाते हैं। वहाँके बन्दरोंके कार्य बड़े विचित्र तथा आश्चर्य-वर्द्धक हैं।
मनुष्यकी सन्तान—पूर्वोक्त पुस्तकमें लिखा है कि, एक बाबरची बड़ा ही दृढ़ तथा हृष्ट पुष्ट था उसने एक स्त्रीसे अपना विवाह किया, वह पतिसे अपनेको श्रेष्ठ समझती थी, इस प्रतिज्ञा पर उसने विवाह किया था कि, बाबरची उसको बाबरची खानामें कभी न रखेगा उसके रहनेके निमित्त पृथक् मकान बनावेगा उसमें उसको रखेगा इसी प्रतिज्ञापर दोनोंका विवाह हुआ था पर बाबरचीके पास बाबरची खानेके सिवा दूसरा मकानही नहीं था। इस कारण वह अपनी स्त्रीको उसीमें लाया। प्रथम तो वह स्त्री न बोली कि, कहीं उसका प्रति रुष्ट न हो जावे। अन्तमें ऐसी विवश हुई कि, अपने पतिको द्वेष्टी ठहराने लगी। पहले तो कोमलतासे बात करती थी आगे झिड़कियाँ देने लगी। जब वह बारम्बार उलटी सीधी सुनाने लगी तो उस मर्दने स्त्रीको चुप करनेका बहाना किया कि, मैं वनमें जाकर लकड़ियाँ लाता हूँ तेरे लिये नवीन मकान बना देता हूँ। वह गया कई घण्टोंके पीछे लकड़ियाँ ले आया। दूसरे दिन गया। समस्त दिन वहाँ रहकर थोड़ीसी लकड़ियाँ ले आया। स्त्री यह देख बड़ी असन्तुष्ट हुई, एक बड़ी लकड़ी उठाकर अपने पतिको भली प्रकार मारा। तब वह पुरुष तीसरी बार वनमें गया रातभर वहाँ रहकर भी कुछ लकड़ियाँ न लाया, आकर अपनी स्त्रीसे कहने लगा कि, जो वृक्ष मैंने काटा था वह बहुत भारी था मैं इसी कारण उसको
मुहम्मद साहिबका आत्माका मोर और फल होनेके बाद बीबी एमनाके गर्भमें जाना
अकेला न ला सका। फिर वह वनमें गया दो रात दिन वहाँ रहा इस बातपर उसकी स्त्री अत्यंत रुष्ट हुई। फिर जब वह आया उसकी स्त्री बहुत रोई। उससे नम्रता पूर्वक कहने लगी कि, मैं अब हर्ष पूर्वक इस बाबरची खानेमें ही रहूँगी तू मुझको मत छोड़। उसने उत्तर दिया कि, तूने मुझको बारंबार वनमें भेजा, अब मैं वनको हृदयसे चाहता हूँ। मैं जाऊँगा सदैव वनमें रहूँगा। इतना कहकर वह पुरुष बाबरचीखानेसे चला गया हृश्चदेशके वनमें घुसकर वहाँही रहने लगा वह बन्दर हो गया वहाँ उसीसे सब बन्दर उत्पन्न हुए।
एटलेश—एमेरिका देशके चतुष्पाद पशुवोंमेंसे यह एक प्रकारका बन्दर है। उसकी विचित्र चाल है। वह अनेक रीतियोंसे चलता है। कभी तो पशु-वोंकी तरह चारों पैरोंसे चलता है, कभी दोनों पावोंसे मनुष्यके समान चलता है, दोनों चालें उसके वशमें है। वह अन्यान्य बन्दरोंको भ्रान्ति नहीं है। गम्भीर स्वभाव तथा रजीदः चेहरा रखता है। न वह चिलबिल्ला है, न कुछ क्षतिही पहुँचाता है। उसकी कहानियाँ बड़ीही विचित्र तथा आश्चर्यप्रद हैं। वह अपने मालिकसे नम्रता पूर्वक बहुत प्रेम करता है।
शराब लानेवाला—अकालटा साहब अपनी पश्चिमीय इतिहास पुस्तकमें इस प्रकार लिखते हैं कि, लोगोंने इस प्रकारके एक बन्दरको कलवरियामें मदिरा लाने भेजा। उसके एक हाथमें मदिराकी बोतल तथा दूसरेमें पैसे दे दिये। वह कलवरियामें गया, किसीकी सामर्थ्य नहीं थी कि, बिना मदिरा दिये उसके हाथसे पैसे ले ले, पहिले मदिरा दे दे तो मूल्य पावे। कलवारने पहिले मदिरासे बोतल भर दी, उसने मूल्य दे दिया। यदि पथमें कोई पाजी लड़का उसपर पत्थर मारता तो बन्दर भी अपने हाथसे बोतल अलग धरकर उस लड़के पर ऐसे पत्थर मारता कि, उसे भागना पड़ता। कोई भी लड़का उसका सामना करने न ठहरता सब भाग जाते एकदम मैदान साफ हो जाता, मदिराकी बोतल लेकल कुशल मङ्गलसे अपने स्वामीके पास पहुँचता। यद्यपि वह बन्दर बहुत मदिरा पीता था तो भी अपने स्वामीकी आज्ञा बिना उसका एक बूंद भी न छूता था। इस बन्दरकी आठ जातियाँ हैं, वे सब अत्यन्त बुद्धिमान्नीसे कार्य किया करती हैं।
चेम्पेनका आकार—यह बन्दर हृश्चदेशके बहुत तपनेवाली भूमिका रहनेवाला है। यह मनुष्यके समान होता है मानों मनुष्य ही है। उसके सारे शरीर पर बड़े २ बाल होते हैं उसके सिर तथा पीठ पर अधिक बड़े बाल होते हैं। उसके कान पतले होते हैं, उसपर बाल नहीं होते। मनुष्यके कानके
समान कान होते हैं, उसके नाकके चर्ममें केवल झूलमात्र जान पड़ती है। उसके हाथके अंगूठे छोटे तथा निर्बल जान पड़ते हैं। पाँव के अंगूठे बड़े २ तथा सुदृढ़ जान पड़ते हैं। चार फीटसे अधिक ऊँचा नहीं होता उसकी बुद्धिमानी तथा चातुरीकी अनेक कहानियाँ लिखी हुई हैं।
औरंग औरटंग—एक जातका बन्दर (मलायाका जङ्गली मनुष्य है)। उसको औरङ्ग औरटङ्ग कहते हैं। औरङ्ग नाम एक प्रकारके बन्दरका है, वह एफ्रिका देशका रहनेवाला है। उसको काला औरङ्ग कहते हैं। औटङ्ग बड़ी जातिका बन्दर है यह पाँचफीट ऊँचा होता है। यह लाल और भूरे रङ्गका होता है। औरङ्ग सुमात्रा तथा बोरनियो टापूका रहनेवाला है। इसका यथार्थ नाम बोरनियो है इन टापुओंके बनोमें रहता है। इसी बनमें उसकी अधिकता है, यह पशु कभी कूदता उछलता नहीं है। पर लम्बे लम्बे पग बढ़ाकर एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर चला अवश्य जाता है। यह पशु घोंसलेके समान लकड़ियोंका घेरा बनाता है। एक डालसे लेकर दूसरी डालपर लकड़ियोंको पुष्टतापूर्वक जमाकर बड़ी दृढ़ता और सुन्दरताके साथ अपना मकान बनाता है, इसमें नर-मादा अपने बच्चों सहित स्वतंत्रतापूर्वक रह सकते हैं। यह वृक्षोंके फल और घासोंके दाने खाकर रहता है। कोई कोई अति कटु फल हैं जिनको कि, ये सब खाते हैं, इस देशके रहनेवाले ऐसा कहते हैं कि, औरङ्ग औटङ्ग न किसीपर विजयी होता है और न किसीसे पराजित, पर जब वह जलके किनारे जाता है तो घड़ियाल सचमुचही उसको खाने दौड़ता है। इन बन्दरोंके पूँछ नहीं होती जिससे ये स्पष्ट मनुष्य जान पड़ते हैं कि, ये हूबहू मनुष्य हैं।
गोरला, एनजिना या एगिना—पश्चिमी हृब्रशमें एक प्रकारका बन्दर होता है। उसको अंग्रेजी भाषामें गोरैला कहते हैं। यह उच्च जातिका बन्दर होता है यह स्पष्ट मनुष्य स्वरूप है। पर चेम्पेनजीके स्वरूपसे इसका स्वरूप पृथक् है, इसकी जाति पृथक् है। युवावस्थापर पहुँचकर यह पाँचफीट तकका लम्बा हो जाता है। एफ्रिका देशके भ्रमण करनेवाले महाशयगण इसकी विचित्र कहानी कहा करते हैं, गुरैला चेम्पेनजीसे अधिक लम्बा होता है, युवावस्थातक पहुँचकर पाँच फीट और छःइञ्चका लम्बा होता है तथा युवावस्थापूर्ण होनेपर पाँचफीट आठ इञ्चका भी हो जाता है जो इनमें सबसे बड़े हैं वो छः फीटसे भी अधिक बड़े होते हैं। दबा बलिष्ठ तथा सुदृढ़ होता है। उसका अङ्ग प्रत्यङ्ग तथा दाँत बड़े ही दृढ़ होते हैं। उसके आँख परकी हड्डियाँ ऊँची होती हैं। नरके
शैतानका आवागमन समीक्षा
मस्तककी हड्डियां ऊँची खोपड़ी बड़ी तथा उसमें थोड़ा भेजा भी अधिक होता है। उसकी नाक चम्पेनजीसे ऊँची होती है। उसका आकार भयानक मनुष्य कासा होता है। उसके दोनों मोढ़े चौड़े होते हैं उसकी पसलियोंमें तेरह जोड़ हैं। उसका आकार अन्यान्य बन्दरोंकी अपेक्षा मनुष्यसे अधिक मिलता जुलता है। उसके पाँव तथा जाँघ मनुष्योंसे छोटे पर चम्पेन जीसे बड़े होते हैं। जब सीधा खड़ा होता है तो उसका हाथ जाँघ तक पहुँच जाता है। उसके पैर पृथिवी पर चलने योग्य बने हैं। पांवके अँगूठे मनुष्योंके अँगूठोंके समान हैं। उसके हाथ बड़े बड़े तथा बहुत सुदृढ़ हैं। ऊँगलियाँ छोटी छोटी पर बहुत मोटी हैं। इसका चमड़ा काला और बाल कुछ भूरे भूरे होते हैं।
उनमें काले रङ्गकी कुछ मिलावट होती है। उसकी भुजा पर लम्बे-लम्बे बाल होते हैं। उसके मुँहपर भी बाल होते हैं। छातीपर किसी प्रकारके बाल नहीं होते। उसका मोढ़ा बड़ा तथा यहां तक चौड़ा होता है कि, ग्रीवा कठिनतासे दिखाई देती है। उसकी आंखें भीतर घुसी हुई मालूम होती हैं। उसका आकार इतना भयानक होता है कि, जब वह किसीकी ओर देखता है तो भय जान पड़ता है। बहुत खानेवाला है। विशेषतः उसका भोजन साग पात इत्यादि है। उसका पेट बड़ा तथा उभरा हुआ जान पड़ता है। यह प्रायः पृथिवी पर रहता है पर विशेषतः वृक्षोंपर भोजन ढूँढ़ता फिरता है अपने महाबाहुबलसे बचता है। अपने बैरियों तथा हिंसकों को मार हटाता है। इसप्रकारके बन्दर बहुत बड़े घने वनमें रहते हैं बनवासियोंसे बहुत डरते हैं। सरतान तथा जदा नामक स्वतोपर इसकी अधिकता है। उसके दुम नहीं होती। अब तक गुरेला कहीं पाला नहीं गया न घरैला हुआ। उसकी युवावस्थामें उसका पालना अथवा परचा लेना कठिन कार्य है। इसकी बुद्धिमान्नी तथा चातुरीकी अनेक कहानियाँ हैं। पश्चिमी गुरेलाको पकड़ पकड़ कर लोग काम कराते हैं। वहाँके मनुष्य गुरेलाको एनजिना और एगिना कहते हैं, उन बन्दरोंमें संयोगसेही किसी विषयकी विभिन्नता होती है। उनका समस्त शरीर ठीक मनुष्योंकासा जान पड़ता है।
कौरोनकिया और पोस्ती गाम्बी—पश्चिमी हृदयमें कहीं कहीं, यह बात सुनी जाती है कि डीवडी लेकस साहबकी पुस्तकमें लिखा है कि, उनने देशमें दो प्रकारके बन्दर देखे हैं। जो गुरेलासे कुछ छोटे होते हैं। एकका नाम कौरोनकिया दूसरेका नाम पोस्ती गाम्बी। यह दोनों प्रकारके बन्दर अपने निवासार्थ अच्छा मकान बना लेते हैं। छतरीके स्वरूपका उनका घर होता है।
बराबरी एप—एक जातिका बन्दर बरबर देशमें होता है, वह अनेक
प्रकारकी लीलायें करता है। उसको पकड़कर लोग प्रायः योरोपको ले जाते हैं वहाँ उसको बुद्धि तथा गुणकी अनेक बातें सिखाते हैं। यह बन्दर जिब्राल्टरके पर्वतोंपर भी अधिक होता है। बुद्धिके बड़े बड़े कार्य करता है।
रुपये लेनेवाला— पञ्जाब प्रदेशस्थ फीरोजपुर प्रान्तके अन्तर्गत दो बनजारा आरा चला रहे थे। वह जब रोटी खाने गये तो वृक्षसे एक बन्दर उत्तर कर उसी प्रकार आरा चलाने लगा। दोनों लकड़ियोंके बीचकी किल्लीको खींचा करने पर उसका अण्डकोष दोनों लकड़ियोंके बीच दब गया, जिससे वह चिल्लाने तथा तड़पने लगा। एकने आकर उसको छुड़ाया वह बन्दर कूदकर वृक्षपर चढ़ गया। वहाँसे लाकर एक रुपया बढईके सामने रखा। जब वह बन्दर कहों इधर उधर चलागया तब वो बढई सोचने लगा कि, इस बन्दरने रुपया कहाँसे पाया। समय पाकर वह वृक्षपर चढ़ गया उसने उस वृक्षपर और भी कई रुपये पाये। वह उन सबोंको उठा लाया। कुछ कालके पीछे जब वह बन्दर घूमता घामता आया वृक्षपर चढ़ा तो देखा कि, वहाँ उसका रुपया नहीं है। तब वह उस बढईके निकट आया चिल्लाता २ कौप कर गिर पड़ा तब उस स्थानके सब बन्दर उसका शब्द सुनकर एकत्रित हो गये। उस बढई की ओर देखकर खुर खुर करने लगे। जब उसने देखा कि, यह सब तो मुझको काटेंगे तो सब रुपये बन्दरके सामने फेंक दिये। उसने अपने सब रुपये गिनकर देख लिये कि ठीक हैं जाना कि, वह एक रुपया जिसको उस बन्दरने अपनी प्रसन्नतासे दिया था, रुपयोंके साथ लौटा दिया तो उस बन्दरने एक रुपया निकालकर अपने चूतडसे पोंछकर लकड़ी चौरनेवालेकी ओर फेंक दिया, बाकीके सब रुपयों को लेकर वहाँसे चला गया। समस्त बन्दर वहाँसे चले गये।
प्रत्युपकारी—एक और बन्दर इसी प्रकार आरा चौरनेकी नक़ल करने लगा तो उसका भी अण्डकोष लकड़ीके छिद्रमें दब गया वह चिल्लाने लगा। जो दोनों लकड़ी चौरनेवाले देख रहे थे। उनमेंसे एकने बन्दरको छुड़ाना चाहा दूसरा मना करने लगा कि, उस बन्दरको फँसकर मरने दे क्योंकि, यह हमारा अनुकरण करता है। दूसरेने उसका कहना न माना आकर छुड़ा दिया। जब बन्दर छूटा तो वनसे दो फल लाया और दोनों लकड़ी चौरनेवालोंकी चादर पर धर गया। जिसने उस बन्दरकी जान बचाई थी वह उन फलोंको खाकर बड़ा हर्षित हुआ। क्योंकि, वह बड़ाही स्वादिष्ठ फल था। दूसरा लकड़ी चौरनेवाला जो उसको छुड़ानेसे मना करता था उसने जब अपना फल खाया तो मर गया।
भाग्यानुसारीवस्तु
क्योंकि, वह बड़ा ही विषैला फल था । इस प्रकार बन्दरने बुरेको बुरा और अच्छेको अच्छा फल दे दिया ।
शराबी बन्दर—पञ्जाब देशके कोटकोगडमें एक मनुष्य मंदिरा पी रहा था । उसके निकट एक बन्दर भी आकर बैठ गया । उसने उसको भी मंदिरा पिला दी । बन्दर उसको पी प्रसन्न हो एक रुपया लेकर उस मनुष्यके सामने रख दिया । दूसरे दिन जब वह मनुष्य मंदिरा पीने लगा तो वह बन्दर आ बैठा, उसने फिर मंदिरा पिलाई । उस बन्दरने फिर एक रुपया लाकर शराबीको दे दिया । इसी प्रकार कुछ दिन होता रहा । उस मनुष्यने विचार कि, यह बन्दर रोज रोज कहाँसे रुपया लाता है यह जानना चाहिये यह शोच एक दिन उस बन्दरको भली प्रकार मंदिरा पिलाकर मस्त कर दिया जब वह बन्दर चला तब वह भी उसके पीछे छिपकर चला । वह बन्दर पर्वतकी एक खोहमें घुस गया वह शराबी गुप्त रीतिसे उसका गृह देखकर चला आया । दूसरे दिन एक मनुष्य को बैठा रखा उसको सिखा दिया कि, तू इस बन्दरको मंदिरा पिलाता रह, जब वह बन्दर अपने समय पर आया तो दूसरा मनुष्य उसको मंदिरा पिलाने लगा । वह बन्दर तो मंदिरा पीनेके ध्यानमें रहा । वह, शराबी बन्दरकी आँख बचाकर उसके मकानपर गया देखा कि, एक लोटा रुपयोंसे भरा धरा है उस बर्तनको लेकर अपने घर चला आया । बन्दर अपने घरको गया तो देखा कि, रुपयोंका बरतन नहीं है । फिर जब दूसरे दिवस वह बन्दर नियमित समयपर मंदिरा पीने न आया तो शराबी उस बन्दरके घर गया तो देखा कि, वह मरा पड़ा है ।
पूर्वजन्मवेत्ता —एडिसन नामक एक अंग्रेजी पुस्तक है । उसमें यह कहानी लिखी हुई है कि, एक मनुष्यके यहाँ एक बन्दर था । एक दिन उस घरके सभी आदमी कहीं चले गये थे, उस बन्दरको वह घर खाली तथा सुनसान रह गया कोई मनुष्य नहीं रहा । उस समय उसने जब मकान खाली देखा तो कूदकर कुरसी पर बैठ गया कागज लेखनी तथा मसि आदि लेकर अपने पूर्वजन्मका सारा हाल लिखने लगा कि, अमुक बादशाहका मैं मंत्री था, अपने बादशाहकी बड़ी शुभचिन्तकता किया करता था, बादशाहका भण्डार भरनेका विचार दिन रात रखता था, इसी कारण प्रजाके साथ अत्याचार किया करता था, उनपर अन्याय करता था समस्त प्रजा अत्याचारसे पीड़ित होकर बादशाहके सामने जा न्यायके लिये प्रार्थना करने लगी । बादशाहने मेरा प्रत्यक्षमें दोष देखा तो उसने तीर कमान लेकर मुझको मार डाला, मैं मरकर मंत्रीका शरीर छोड़ अब बन्दरकी देहमें हो गया हूँ । इस प्रकार वह बन्दर अपना सारा
समीक्षा, कयामतके दिनकी तीन बातें
हाल लिख रहा था कि, घरके लोग आये उस बन्दरको कुरसीपर बैठकर लिखता हुआ देखकर आश्चर्यान्वित हुये कि, बिना पढ़ाये तथा बिना सिखाये इस बन्दरने कैसे लिखना जाना ? क्या मनुष्य क्या पशु सभी वासनाओंके फन्दमें फँसे हुए हैं । इसी बातको निम्नलिखित गजलमें भी दिखाया है --
नहीं कोई आदमी कोई बन्दर । नचाता रुहको करमें कलन्दर ॥
करमके जालमें यह जीव फन्दा । परीशां हाल यह फिरता है घर घर ॥
हुवा मुफ़लिस शहंशह आलमोंका । कि रि रता माँगते यह भीख दरदर ॥
सिग त तीनों वहम अरवा अनासर । किये घरखास इस अखलास अन्दर ॥
हवस नफसानिये आजिज दबाया । कि शहबतमें फँसा योगी मछिन्दर ॥
आदमी और मनुष्य सबको करम नचा रहा है कभी आदमी बना देता है तो कभी बन्दर बनाकर नचाता है । इससे मत्स्योदर जैसे योगियोंको भी नहीं छोड़ा ।
मृगेन्द्र ।
क्रोधी तथा बदला लेनेवाले मनुष्य शेरकी योनिमें जाते हैं, मृत्युके पीछे शेर तथा चीते आदिकी देह पाते हैं उनकी पहली आदतें उनके साथ होती हैं । शेर बड़ा वीर तथा साहसी होता है । यदि कोई शेरको धमकावे तथा गदहा आदि कहे तो वह बिना विलम्बके तुरन्तही उस पर टूट पड़ता है । या तो उसको मार लेता या उसके मारनेके उद्योगमें आपही मर जाता है । जो शेरको ललकारेगा वो कदापि जिन्दा न बचेगा । मैंने अपनी आखोंसे देखा है कि, गिड़गिड़ाने तथा प्रशंसा करनेसे शेर वशमें हो जाता है, उसका क्रोध ठण्डा पड़ जाता है । शेर बड़े उच्च स्वभावका होता है सुतरां बादशाहों तथा अमीरोंके शेरखानोंमें जो रक्षक रहते हैं वे शेर तथा चीतोंकी खुशामद किया करते हैं कि, आप अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, आप उच्च घरानेके हैं, आपके बापदादे बहुत वीर तथा श्रेष्ठ थे वैसे ही आप भी हैं । आप बड़े पिताके पुत्र हैं । ये बस बातें सुनकर शेरका मन प्रसन्न तथा ठण्डा रहता है, यह अपने साथ किये हुए वर्तावको अच्छी तरह जानता है ।
कुमरसिंहजीका सिंह—पूर्वीय भारतके डुमरोंव रियासतके पास जगदीशपुर रियासत है । वहाँके राजाका नाम कुँवरसिंह था । एक समय उनका पालतू शेर छूटकर नगरके चौकमें जा बैठा । उस समय नगरके समस्त द्वार बन्द होगये थे, भयके मारे कोई घरके बाहर न निकलता था । राजाको समाचार मिला कि, आपका मोतीलाल शेर छूट पड़ा है, नगरका द्वार बन्द हो रहा है । राजा कुँवरसिंह स्वयम् ढाल तलवार लेकर जा पहुँचे उसका नाम लेकर कहा कि, ए
सालिग्राम पूजनेकी प्रतिज्ञा
भोतीलाल ! तुमने बहुत दिनोंसे हमारा अन्न पानी खाया है, तुम आपसे आप चलकर अपने पिंजरेमें घुस जाओ नहीं तो मेरा सामना करो । वह कृतज्ञ व्याघ्र चुपके २ राजाके आगे होकर अपने पिंजरेमें घुस गया । उस दिनसे राजाने उसकी सेवा शुश्रूषाका खर्च बढ़ा दिया ।
कांटानिकालनेवाला—कोट काँगडेके पास एक शेरके पाँवमें लोहेकी ऐसी कील गड़ गयी थी कि, जिसके कारण वह बड़ाही दुःखी हुआ, क्योंकि, उसका पाँव बहुत ही सूज तथा पक गया था । वह एक मनुष्यके सामने बैठ गया अपना पिछला पाँव दिखाया । उसने देखा कि, उस शेरके पाँवमें एक मेख चुभी हुई है जिसके कि, कारण वह चल फिर नहीं सकता है । उस मनुष्यने उसके काँटेको पकड़कर खींच लिया, वह सुखी हो कृतज्ञता दिखाता हुआ चला गया ।
एक अहीरके पास बहुततेरी भेंसें थीं । वह शेर बड़ा बलिष्ठ था । जब भेंसको पकड़कर फेंकता था तो वह दूर जा पड़ती थी । गूजर देखा करता था कि, यह शेर तो हमारी भेंसोंकी बड़ी क्षति करता है । एक दिन उसने देखा कि, शेर भेंसोंके झुण्डमें घुस एक अच्छी भेंसका कान पकड़ उस मनुष्यके घर पर लेगया जिसने कि, उसके पैसे मेख निकाली थी । उसके मकानमें उस भेंसको छोड़कर चला आया । वह गूजर यह कौतुक देखता रहा । जान लिया कि, इस शेरने इस भेंसको इस मनुष्यको दे दिया है । उसने इस बातपर कोई हिचकिचाहट न दिखाई । जिसके घर भेंस गई उसने सानन्द रख लिया । पीछे उस शेरने अहीरकी दूसरी किसी भेंसको कोई भी कष्ट नहीं पहुँचाया ।
इस्पारमनसाहबका मत—अपनी हृष्यदेशकी यात्राके बृत्तान्तमें लिखते हैं कि, यह विचित्र बात है कि, यदि कोई शेरको क्रुद्ध करे तो भी वह सहसा मनुष्यकी हत्या किया नहीं चाहता केवल घायल करके जीवित छोड़ देता है अथवा अत्यन्तही उत्तेजित हो तो भी कुछ विलम्ब करके मारता है ।
होप साहब—का यह कथन है कि, हेमिलटन नगरके रहनेवाले एक धनाढ्य पुरुषकी बेगमके पास एक शेर था, कितने ही लोग उसको देखने आगये । द्वारपालने बेगमको समाचार दिया कि, एक जमादार अन्यान्य मनुष्योंके साथ शेर देखनेके लिये खड़ा है । बेगमकी आज्ञासे जमादार भीतर गया । उस समय शेर शिकारके लिये गुरा रहा था । जमादार शेरसे विज्ञ था, उसने पिंजरेके निकट जाकर उसका नाम लेकर कहा कि, नीरू ! नीरू ! तुम मुझको जानते हो ? उस समय तुरन्त ही वह अपना शिर उठाकर खड़ा हुआ, अपना भोजन छोड़कर पिंजरेके किनारे खड़ा हो दुम हिलाने लगा । उस जमादारने उसपर
समीक्षा, यथार्थ तात्पर्य वैकुण्ठका पक्षी
थाप दी, अपने हाथसे सुहलाकर कहा कि, तीन वर्ष पीछे इस शोरको देखा है। जिब्राल्टरसे मैं इस शोरकी रक्षा करता आया हूँ। अब मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ कि, इस पशुने अकृतज्ञता नहीं की। एहसान नहीं भूला। वास्तवमें वह शोर उस जमादारको देखकर बहुत प्रसन्न जान पड़ता था। अपने प्राचीन मित्रको देखके इधर उधर फिरता था। उसकी उंगलियाँ चाटता हुआ प्रेम प्रगट करता था।
कच्चे मांस खिलानेका दोष—एक शोरको पक्का मांस तथा अन्यान्य वस्तु खिलाकर पाला था। वह शोर कुत्तोंके समान नम्र था। घरमें फिरा करता था। एक दिन कहीं उसने रक्त लगे मांसका भक्षण कर लिया। उसको खातेही बहुत घातक हो गया। अत्यन्त शीघ्रताके साथ उसने उस मनुष्यको जो समीप खड़ा था फाड़ डाला। भयानक रवसे गरजता हुआ वह बनकी ओर चला गया। फिर उसे किसीके आधीन क्यों रहना था?
शोरका प्रेम—एक शोर बड़ा सुन्दर था, उसकी सुन्दरताके कारण वह सङ्गलसे पेरिस नगरको पहुँचाया गया था। जहाजपर चढ़नेके समय बहुत बीमार हो गया था इस कारण उसे मरनेके लिये लोग पृथ्वी पर छोड़ गये। एक पथिक जो आखेटसे आता था उसने उस शोरको अत्यन्त विवश देख उसपर बड़ी करुणा दिखलाई, कुछ दूध उसके मुँहमें डाला। उससे उसको सन्तोष हुआ। उसको आराम मिला। उस समयसे वह शोर ऐसा हिल गया, एवं अपने ऊपर कृपा दिखानेवालेसे इतना प्रेम करने लगा कि, उसके गलेमें रस्सी डालकर कुत्तोंके समान जिधर चाहता उधर ले जाता था। वह खाना भी उसीके हाथसे खाया करता था। शेरनी शोरका रखवाला तथा सेवा करनेवाला एम. फील्कस नामक एक मनुष्य था, उसे बहुत बीमार हो जानेपर शोरकी सेवासे रहित कर दिया गया। कई दिन बीत गये पर सेवा करने न गया। उनकी सेवाके लिये दूसरा मनुष्य नियुक्त किया गया। पर उनका प्रथम सेवक जो उनको पेरिस नगरमें लाया था बीमार पड़नेसे न आया तो शेर भी खाना पीना सब छोड़ पिंजरेके एक कोनेमें उदास पड़ा रहने लगा। कोई भी अपरिचित मनुष्य उसके समीप जाता तो वो उसपर गुराँता हुआ कोलाहल मचाके अरुचि प्रकट करता था। यहाँ तककी अपनी शेरनीके साथ रहनेसे भी घृणा करता हुआ उससे भी पृथक् रहने लगा। वह पशु रोगी जान पड़ता तो भी भयभीत होकर कोई उसके पास नहीं जाता था। अन्तमें उसका सेवक अरोग्यता प्राप्त करके उसके पास आया। उसने पिंजडेकी छड़ोंके समीप जाकर उसको अपना मुँह दिखलाया जिसमें उसको आश्चर्यान्वित
पूर्वके प्रेम आदि भाग्य
करें । जब शेरने उसका मुँह देखा तो कूदा उछला और उस छड़के समीप आकर अपने पञ्जेसे उसको प्यार करने लगा तथा मुँह चाटने लगा । मारे प्रसन्नताके कौपने लगा, शेरकी भादा भी उसको प्यार करने दौड़ी । उस शेरने उसको भगा दिया । जिसमें वह भी उसकी आरोग्यतापर प्रसन्नता प्रगट करनेमें भाग न ले । तब वह रखवाला उस पिंजरेके भीतर घुस गया बारी बारी दोनोंको प्यार किया । इसके, पीछे प्रायः उन दोनोंके पास जाया करता था । उनपर उसका पूरा अधिकार था जो चाहे सो करावें वे दोनों उसको बहुत प्यार किया करते थे ।
रीछ और शेरकी मैत्री—निउआरलैंस नामक नगरमें एक बड़ी ही विचित्र घटना हुई । कौतुकी निर्दयी मनुष्योंने सन १८३२ ई० में एक पुराने हन्श देशके शेर बबरके पिंजरेमें एक रीछ डाल दिया । वह जिससे यह रीछके टुकड़े टुकड़े कर दे । इस निर्दयताका तमाशा देखनेके लिये अनेक मनुष्य एकत्रित थे । रीछ लड़नेके विचारसे उस शेरके सामने दौड़ा । पर जैसा लोगोंने अनुमान किया था वैसा नहीं हुआ । रीछने शेरके शिरपर अपना पञ्जा धर दिया मानों उसने अपनी दया प्रगट करके उसके साथ मैत्री करना चाहता हो । शेर इस ध्यानसे कि, यह रीछ मेरी शरण आया है, प्यार करता हुआ अत्यन्त रक्षा करता था । किसीको अपने पिंजड़ेके निकट नहीं आने देता था । अपने नवीन मित्रका बहुत ध्यान रखता था । यहाँ तक कि, आप भूखा रहकर भी उस रीछको भली प्रकार भोजन देता था ।
तेंदुआ—की शेरहीके समान ही आदत होती है । एक मनुष्यसे मालूम पड़ा कि, जब वह पथसे चला जाता था तो देखा कि, एक तेंदुआ उसकी राहके बीच खड़ा है । वह मनुष्य उसको देखते ही घबरा गया । उसको उस समय कोई युक्ति न सूझी पर अपनी टोपी उतारकर सलाम करके कहा कि, ऐ साहब ! सलाम । यह बात सुनते ही वह तेंदुआ उस मुसाफिरसे कुछ न कहकर चला गया ।
शेरका बच्चा—कुछ जहाजी लोग छः सप्ताहके एक शेरके बच्चेको जहाज पर उठा लाये । वह उनके साथ रहने तथा प्रेम करने लगा । यहाँ तक कि, वह उनके पलंगपर लेटा रहता था, जहाजी तकियाके स्थानपर उसको अपने शिरके नीचे रखकर लेटा करते थे । उसके बदले वह शेर जहाजियोंके खानेका मांस चुराकर खा जाया करता था । एक दिन उस शेरने बड़ईके खानेका मांस भी चुराया पर उसके मुँहमेंसे वह बड़ई फिर छीन ले गया । चोरीके बदले, उस शेरको खून मारा । उस शेरने कुत्तोंकी तरह दण्डको सहन कर लिया । वह वृक्षकी डालियोंपर बिल्लियोंकी तरह चढ़ जाया करता था, भाँति भाँतिके
हजरत शेख सादीका कौल
विचित्र खेल किया करता था। उस जहाजपर एक कुत्ता था। उसके साथ वह खूब खेला करता था। एक बरसका पूरा होनेके पहले इङ्ग्लेण्डमें पहुँचा दिया।
चीता—बिल्लियोंकी तरह अपने बच्चोंको आपही खा जाया करता है कोई कोई प्रेम भी किया करते हैं। कप्तान विलियमसन साहबका कथन है कि, जब वह बाहर शिकार करने गये तो उन्होंने चीतेके चार बच्चे देखे, उनमें से दो को उठा लाये। उनकी माता शेरनी उस समय वहाँ नहीं थी। रातके समय वे दोनों चिल्लाया करते थे। कुछ दिवसोंके पीछे वह बच्चोंको दूँदती हुई उसी अस्तबलके समीप आ ऐसे जोरसे चिल्लाई कि, उसके सारे रखवाले डर गये बच्चोंको द्वारके बाहर निकाल दिया कि कहीं ऐसा न हो कि, वह शेरनी तख्ता तोड़कर भीतर चली आवे। वह शेरनी रातको ही अपने दोनों बच्चोंको लेकर जङ्गलमें चली गई।
हाथी
हाथी बहुत बुद्धिमान पशु है। उसकी अधिक बुद्धिका प्रमाण यह है कि, वह प्रत्येक वस्तुको आजमाकर तब उसपर पाँव रखता है यदि निर्बल हो तो, उसपर पाँव नहीं धरता, बड़ा कौतुक तो यह है कि, हाथी रस्सियोंपर नाचता है।
सिलोनका हाथी—सिलोन टापू जिसको लङ्का भी कहते हैं, वहां जब उसी देशके मनुष्य राज्य करते थे तो उनका भी यही नियम था कि, जो बंधुवा मारे जाने योग्य होता था उसको हाथीके पाँव तले दबाते थे। जब वहाँका हाकीम हाथीको आज्ञा देता था कि, इस कैंदीको भली प्रकार लिथाड़ जिसमें इसको अधिक कष्ट हो, तब वह हाथी उसको भली प्रकार लिथाड़ा करता था। जब-तक दूसरी आज्ञा न हो तबतक कदापि नहीं मारता था। जब हाकिम आज्ञा देता था कि, अब इसको मार दे तो वह उसको मार देता था। उसके शिरपर एक पाँव और दूसरा पाँव पेटे पर धरकर उसके जीवनका अन्त कर देता था।
उम्र—हाथीकी बुद्धि तीक्ष्ण तथा वयस सौ वर्षके लगभग है।
कृतज्ञता—एकबार सुना गया था कि, एक हाथीके पैरमें एक लोहेकी कील गड़ गई थी वह विवश होकर एक स्थानपर पड़ा रहता था। उसकी सुधि लेनेवाला कोई न था उसके जिस पाँवमें कील गड़ी थी उसको ऊपर किये पड़ा रहता था। जो मनुष्य उधरसे जाता तो उससे इशारा करके बताता कि, मेरे पाँवमें कील गड़ी है परंतु जङ्गली हाथी जानकर लोग डरके मारे भाग जाते थे। अन्तमें एक मनुष्य उसका अभिप्राय समझ गया, साहस करके हाथीके निकट गया। हाथीके पाँवको देखा तो उसमें एक लोहेकी कील गड़ी थी। उसने
शेख फरीदुद्दीन अत्तार
उसके निकालनेकी अनेक युक्तियां की पर वह नहीं निकली । वह दौड़कर बस्तीमें से एक संड़ासी ले आया उसके पांवको खूब जोरसे दबाकर उस संड़ासी द्वारा उस गुलमेखको पकड़ बाहर निकाल दी । उस हाथीको सुख मिला उस मनुष्यको धन्यवाद देनेके बदले उसने उस मनुष्यको अपने सूँडसे पकड़ अपने शिरपर बैठकर उसका आभिवादन किया ।
पुत्रसे प्रेम-बनारसके राजाके पास एक बहुत मस्त हाथी था, उसने किसी अपराधके कारण महावत मार डाला । फीलबानके मरनेपर उसकी स्त्री अत्यन्त क्रुद्ध तथा दुःखी होकर हाथीके निकट अपने छोटे बच्चेको भी उसके सामने डाल कर बोली कि, ले इसको भी मार डाल । क्योंकि, अब इसका पालन कौन करेगा ? उस हाथीने धीरेसे उस बच्चेको उठाकर अपनी गरदन पर बैठकर इशारा किया कि, अपने पिताके स्थान अब यह फीलबानी करेगा ।
बनेलेकी बुद्धिमत्ता—सम्बत् १८६० विक्रमीमें पञ्जाबदेशके आनन्दपुरके चारों ओर बड़ा भारी वन था । वहाँ एक गाँवके समीप मक्काके खेत थे । एक खेतमें मँचान पर एक मनुष्य बैठा रखवाली कर रहा था । रातके समय उसके निकट एक हाथी आया, उसको मँचानसे उतारके पृथ्वी पर रख दिया । उसके सामने उसने अपना एक पांव दिखलाया उस समय चाँदनी रात थी । उसने देखा तो हाथीके पांवमें लकड़ीकी एक मेख गड़ी हुई दिखाई दी । उस मनुष्यने लकड़ीको पकड़कर खींच लिया, जब हाथीको परम सुख मिला तो उसने उसको अपने शिरके ऊपर रखकर उसी मँचान पर रख दिया, उस दिनसे हाथीका यह नियम हुआ कि, प्रति दिन दूसरोंके खेतसे मक्कियाँ उखाड़ उसके मँचानके समीप रखकर चले जाना । अन्यान्य मनुष्य उस मनुष्य पर चोरीका दोष लगा दोहाई मचाने लगे कि, यह मक्काकी चोरी करता है । उस मनुष्यने शपथ की कि, मेरा यह कार्य नहीं है, अन्तमें मनुष्य रातको छिपकर देखने लगे तो देखा कि, एक बनेला हाथी मक्का उखाड़कर उसके मँचानके निकट ढेर कर जाता है लोगोंने आग जला तथा दूसरे २ भय दिखाकर उस हाथीको इस कार्यसे रोका ।
मक्कारीका बदला—एक चित्रकार हाथीको बुला उसके मुँहमें फल तथा चारा देने लगा । वह हाथी अपनी सूँड ऊपर किये खड़ा होता वह उसके मुँहमें डालता जाता । कुछ दिनके पीछे बहुत चारा डालनेके भयसे उसने बन्द कर दिया केवल चारा डालनेका बहाना मात्र करने लगा । हाथीने जाना कि, यह मेरे साथ हँसी करता है । इस बातसे असन्तुष्ट होकर अपनी सूँडमें जल भर उसके चित्रोंपर डालकर नष्ट कर दिये ।
इब्र, अब्बास संग आसूदका काला होना सिद्धिका नाश पूर्व जन्मका कुत्ता, इस्लामी फिरके
बोरडरका कथन है कि, इङ्ग्लिस्तानमें एक हाथी था। उसके साथ एक मनुष्यने दिल्ली करके डेढ सेंरकी रोटीके साथ अदरकके टुकड़े मिला पकाकर खिला दिये। वह हाथी अज्ञान वश खा गया। कुछ क्षणोंके पीछे उसको बड़ी गर्मी जान पड़ी। उसने अपने महावतसे जल मांगा, उसने छः डोल पानी दिया। वही डोल पकड़कर उस हाथीने जिसने रोटीके साथ अदरक दिया था उस मनुष्यको ऐसा मारा कि, वह मर जावे वरन् वह नहीं मरा। एक वर्ष पीछे वही मनुष्य पुनः उसी हाथीके समीप आया, पुनः दो प्रकारकी रोटियाँ लाया। अच्छी रोटी तो हाथीने खाली जब गरम रोटी देखी तो क्रोधसे उस मनुष्यकी कुरती पकड़ ऊपरको उठाया। कुरती की आस्तीन निकल गई। वह अधमुआ होकर पृथिवीपर गिर पड़ा जो हाथीकी सूँडमें उसके कुरतेकी आस्तीन रह गई भी उसके टुकड़े टुकड़े करके उस मसखरेके सिर पर मारे।
शिकारीको दण्ड—बहुतेरे अंग्रेजी अफसर हृन्शके देशके हाथियोंका आखेट करने गये। उनमें एक अफसर बड़ा निडर शिकारी था, वो ठीक निशाना मारता था। उसने एक हाथीको घायल किया। उसने हाथी पर गोली मारी तो गोलीने इस पर भली प्रकार फल न दिखाया, हाथीके शरीर में ठण्डी हो गई। वह क्रुद्ध हाथी भयानक हो उन अफसरोंकी ओर झपटा। अन्यान्य सब अफसरोंको छोड़कर उसीको पकड़ लिया जिसने कि, उसको गोली मारी थी। उसको पकड़कर ऐसे जोरसे पृथिवी पर पटका कि, उसका प्राण निकल गया। उसके शवको चूर चूर कर धूलमें मिला दिया। यह भयानक काण्ड देखकर समस्त अफसर भाग गये। पर दूसरे दिन पुनः उसी स्थानपर आ उसकी हड्डियोंका चूर्ण एकत्रित करके वहीं गाड़ दिया।
आसक्ति—जार्डनड सप्लाटसमें एक घरैला हाथी रहता था। वह एक छोटी बालिका पर आसक्त था। नित्य प्रातःकाल वह उस स्थानपर उस लड़कीको देखकर प्रसन्न होता था, वह लड़की भी हाथीको देखकर प्रसन्न रहा करती थी। जब वह हाथी आता तो धीरेसे अपनी सूँड लड़की की बगलके भीतर चला इशारा करके चला जाता था।
बच्चेका माँ पर प्रेम—शिकारियोंने एक हथिनीको मारा तो वह मर गई। उसका एक छोटा बच्चा था। वह माताके दुःखके कारण चारों ओर घूम कर चिल्लाने लगा। उस हथिनीके साथी अन्यान्य हाथी तो भाग गये पर उस बच्चेने माताका शव नहीं छोड़ा। शिकारियोंको वह रात वनमें बीती प्रातःकाल वे सब उस बच्चेके निकट आये उसको बहुत कुछ धीरज धराने लगे पर
मुहम्मद बोध
वह बच्चा सन्तुष्ट न हुआ, अपनी माताके दुःखमें दौड़ता फिरा वह अपनी माता-परसे गिद्धोंको हटाता फिरता था। अत्यन्त उद्योग तथा परिश्रमसे अपनी माँको उठाया चाहता था पर वह मृत देह कैसे उठे ? यद्यपि उस बच्चाको परिश्रमका फल नहीं मिला तो भी उसके प्रेमकी यह प्रशंसा अवश्य है।
शिक्षण—एम् फ्रेडरिक क्वेरे साहब पशुपालन विधिके वर्णनमें लिखते हैं कि, जार्डन डिस्प्लाटसमें एक हाथी था, वह केवल तीन चार वर्षका था तो उसकी सेवा एक युवकको सौंपी गयी। उस हाथीको ऐसे ऐसे कौतुक सिखाये, जिन्हें कि, देखकर मनुष्यका मन मोहित होता था, वह अपनी सेवा करनेवालेको बहुत चाहता था उसकी आज्ञाको कदापि नहीं टालता था। उसकी अनुपस्थितिमें तथा उसको न देखनेसे बहुत अप्रसन्न रहता था। कोई दूसरा उसकी कितनी ही सेवा क्यों न करे पर तो भी वह उसस प्रसन्न न होत था दूसरोंके हाथसे कठिन-नताके साथ खाता पीता था।
दरजीको दण्ड—डाक्टर गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल हिण्ट्रीमें लिखा है कि, दिल्ली नगरीमें एक हाथी चला जाता था। वह एक दरजीकी दूकानके पास होकर गुजरा। उसने दरजीकी दूकानमें अपनी सूँड डाली। दरजीने उसकी सँडमें सूई चुभो दी। उस समय तो वह हाथी चुपचाप चला गया, उस पथसे पलटा तो सँडमें कीचड़ भर लिया, उस दर्जीकी दूकानपर पहुँच उसके कपड़ोंपर डाल दी, जिससे जो जो अच्छे कपड़े उसकी दूकानपर फँल रहे थे कीचड़से भर गये। उसने इस प्रकार अपने सुई चुभानेका बदला उस दरजीसे ले लिया।
लिपी—इसी किताब में लिखा है कि, एक हाथी सँडकी नोकसे लेखनी पकड़कर बहुत उत्तमतासे लाटिनके अक्षर लिखा करता था। हाथी बहुत बुद्धिमान और सचेत पशु है। जब यह बनमें रहता है तो बड़ा हाथी झुण्डके आगे आगे चलता है। हाथीमें यह बड़ा गुण है कि, वह बस्तीमें रहता है तो सम्भोग नहीं करता, हाथीकी बुद्धिमानीकी अनेकों बातें लिखी हुई हैं।
गेंडा
गेंडा भी एक बड़ी जातिका जानवर है, उसके सूँघने सुननेकी बड़ी तीक्ष्ण शक्ति होती है पर उसकी आँखें छोटी हैं इस कारण वह थोड़ी दूरतक देख सकता है, गेंडा हवस देश तथा भारतवर्षमें होता है। उसमें भी हाथीके ही समान बुद्धि होती है उसका आखेट भी लोग करते हैं।
बेफीगाकी सहायता—गेंडा बनमें चरता फिरता है उसके साथ एक
प्रकृति नहीं बदल सकती अपनी आत्माका डालना मनुष्यसे बन्दर
छोटी चिड़िया होती है। उस चिड़ियाको अंग्रेजी भाषामें बेफीगा बोलते हैं। यह गेंडेकी बड़ी सहायता करती है। यह सर्वत्र गेंडेके ऊपर बैठी रहती है उसके शरीरकी जुवोंको खाया करती है, गेंडेके शरीरको स्वच्छ रखती है। गेंडा थोड़ी ही दूर देख सकता है, इस कारण जगदीश्वरने इस बेफीगाको उसका अङ्गरक्षक बनाया है। क्योंकि, शिकारी लोग इसको मारनेके लिये आते हैं तो यह पक्षी दूसरे देख लिया करता है। शिकारियोंको देखकर उसी मसय ऊपर उड़कर बड़ा कोलाहल मचाता है और गेंडा उसके चिल्लानेके तात्पर्यको खूब समझता है कि, अब शिकारी मुझको मारने आते हैं, तुरंत भाग जाता है शिकारी उसको नहीं पाते। यदि वह अचेत सोया हो आखेट करनेवाले आकर उसे मारना चाहें तो चिड़िया बहुत कोलाहल करके गेंडेको जगा देती है। उसके चिल्लानेसे न जागे तो वह उसके कानके परदेमें चोंच मार मार कर ऐसी चिल्लाती है कि, अन्तमें वह जाग ही जाता है, गेंडा अपने मित्रकी सूचनाका ज्ञान होते ही तुरन्त भागकर घोर बनकी राह ले लेता है।
ऊंट
रेगिस्तानकी एक सवारीका नाम है। इसकी सवारी रेतीमें अच्छा काम देती है, अरब और राजपुतानेके मैदानमें इसका अच्छा प्रचार है। संस्कृतमें इसे उष्ट्र कहते हैं, साहित्यिकोंने इसे करहुला कहा है।
ऊंटकी प्रतिहिंसा—पञ्जाब प्रान्त सिरसा तहसील दण्डावली थानाके चोराला गांवमें एक जमींदारने अपने ऊंटको मारा। वह ऊंट कुछ होकर बदला लेनेको उतारू हो गया। एक रात वह जमींदार अपने खेतमें लेटा था ऊंटको घरके बाड़ेके भीतर जञ्जीरसे बांध गया था। जमींदारका दूसरा भाई उस द्वारके ऊपर चारपाई पर लेटा था। जब सब मनुष्य निद्राके वशीभूत हुये, चारों ओर सन्नाटा छा गया तब ऊंट इतना धीरे २ चला कि, खड़का भी नहीं जान पड़ा। बाड़ेके द्वारपर पहुँचा धीरेसे उस जमींदारके भाईको फांद गया उसको तनिक भी खड़का न जान पड़ा। धीरे धीरे खेतकी ओर चला जहां कि, वह जमींदार लेटा पड़ा था। ऊंटके घुंधरूका शब्द हुआ उस समय जमींदार जाग पड़ा जान गया कि, अब ऊंट अपना प्रतिशोध करने आता है मुझपर अवश्यही चोट करेगा। ऊंट पहुँचा वह जमींदार अपनी चारपाई छोड़कर भाग गया जहां कि, मूंगका ढेर लगा था उसके भीतर छिप गया। ऊंट जमींदारकी खाटके निकट पहुँचा। उसको खाली पाया इधर उधर ढूँढ़ने लगा। ऊंटके संधनेकी शक्ति अधिक होती है। इस कारण वह संधता हुआ उस घासके ढेरके निकट पहुँचा