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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

कबीर साहबकी चार वाणी और चारों वेदोंका वर्णन

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लेलेवें । इसी भयसे वह उनको बहुत कष्ट देने, उनसे कठिन परिश्रम कराने और उनके बच्चोंकी हत्या करने लगा । उनके बेटोंको तो वह मार डालता और उनकी बेटियोंको जीवित रखता । इस प्रकार जब उनपर दारुण दुःख उपस्थित हुआ तब खुदाने उनपर दया प्रगट किया ।

इकसठवाँ प्रकरण

मूसाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त ।

उमराव नामक एक इब्रानी था । उसका पुत्र मूसा उत्पन्न हुआ । वह मूसा बड़ाही सुन्दर था उसके माता पिताको बड़ी दया आयी कि, उसको फिरऊनके हाथ कैसे सौंपें । इससे उन लोगोंने उस बालकको टोकरीमें रक्खा और नदीके किनारे झाऊके वृक्षमें रख आये संयोगन फिर उनकी बेटी वहाँ स्नान करनेको गयी और उसने उस बच्चेको देखा, उसको उसपर दया आयी, उसने उस बच्चेको अपनी लौडीको सौंप दिया और वह दासी उस लड़केको अपने घर ले आयी । वह उसका पालन पोषण करने लगी, जब वह सीखने योग्य हुआ तब वह उसको शिक्षा देने लगी । यह मूसा फिरऊनकी बेटिका गोद लिया बालक ठहरा । वह मूसाको अपना बेटा समझकर उससे बड़ा प्रेम किया करती थी । मूसा मिस्र देशकी शिक्षा पाकर परम विद्वान् हुआ । जब उसका वय चालीस वर्षका हुआ तब उसने एक इब्रानीका पक्ष करके एक मिसरीको मार डाला, फिर उसको फिरऊनका भय हुआ कि, मिसरीके बदले में भी मारा न जाऊँ । तब वह मिश्रदेशसे भागकर कनआँमें गया और मदियानामें रहने लगा । वहाँ पितरू नामी एक इब्रानीकी बेटीके साथ उसका विवाह हुआ । वह अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराया करता था ।

कुछ दिनोंके पश्चात् खुदाने आज्ञा दी कि, ऐ मूसा ! तू मिस्रदेशको जा और अपनी जातिको फिरऊनके जुल्मसे बचा ।

उस समय मूसाकी उम्र अस्सी वर्षकी थी, कारण यह कि, मूसामें चालीस वर्षके वयमें मिस्रदेशसे भागा था और वह चालीस वर्षतक अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराता रहा । परमेश्वरकी आज्ञासे मूसा मिस्रदेशको गया, परमेश्वर उसके साथ था । उसने अनेक चमत्कार दिखलाये । तब फिरऊन बादशाहने इब्रानियोंको मूसाके साथ जानेकी आज्ञा दी । जब मूसा तीनलाख इब्रानियोंको लेकर, जिन बाल युवा बृद्ध बालिका स्त्री वृद्धा सभी थीं, मिस्रदेशसे कनआनकी ओर चला और लाल समुद्रके समीप पहुँचा, अर्थात् एक पड़ाव तक कूच कर आया । तब फिरऊन पछताया कि, इब्रानियोंको तो हमने बिदा कर दिया, हमारी सेवा

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तथा बेगार कौन करेगा । यह सोचकर उसने आठ लाख फौज लेकर उनका पीछा किया । जब यहूदियोंने देखा कि, फ़िरऊन हमारे पीछे धावा किये आरहा है, तब वे रोये और पुकारा कि, मूसाने व्यर्थही हमारे प्राण नाश किये । क्यों कि, हमारे दोनों ओर दो पर्वत हैं सामने लाल समुद्र है । और पीछे २ फ़िरऊन अपने दलबल सहित चढा चला आता है, हम अब कहाँ जायँ कहीं भागनेकी राह नहीं रही । तब मूसाने खुदासे प्रार्थना की । तब खुदाने कहा कि, ऐ मूसा तू नदीमें अपना सोंटा मार मूसाके सोंटा मारतेही समुद्रका जल फट गया और पानी दोनों ओर पर्वतके समान खड़ा हो गया । मध्यमें शुष्क पथ प्रगट हुआ । अब मूसा समस्त इब्रानियोंको अपने साथ लेकर पार उतर गया । पीछे फ़िरऊन आया और अपने दलबलसहित उसी समुद्रीय रास्तेसे पार जाना चाहता और समुद्रमें घुसा, तब फिर परमेश्वरने आज्ञा दी कि, ऐ मूसा ! पुनः समुद्रकी ओर सोंटा बढ़ा । मूसाने वैसाही किया । तब दोनों ओरका जल मिल गया और फ़िरऊन ससैन्य मर गया । पश्चात् मूसा प्रसन्नतापूर्वक बनी इसराईलको अपने साथ लेकर चला । जब वह सीना पहाड़के समीप पहुँचा और पडाव किया तब मूसाका आसमानी रङ्गका परमेश्वर बैकुण्ठसे सीना पहाड़ पर उतरा । उस समय समस्त पर्वतसे धुँवाँ उठने लगा और वहाँ पर मूसा तथा आसमानी रङ्गके परमेश्वरसे बातें होने लगीं ।

इस स्थानपर खुदा (विष्णु महाराज) ने ऋग्वेदसे कुछ बातें निकालकर और सांसारिक रीत व्यवहारको इच्छानुसार वर्णनकर, उसे बनी इसराईलके योग्य समझकर, मूसाको प्रदान किया । वही किताब मूसाकी तौरीतके नामसे विख्यात हुई । यह पहली किताब है जो पश्चिमीय देशवासियोंको मिली । यद्यपि उसका ढङ्ग बदल गया पर उसको ऋग्वेदही मानना चाहिये । कोई तौरीत पढे और कोई ऋग्वेद पढे, एकही फल प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है ।

बासठवाँ प्रकरण

दूसरी किताब जबूरका वृत्तान्त ।

यह किताब जबूर दाऊदके लिये उत्तरी, यह जबूर पुस्तक सामवेदसे है । सामवेद गीतों तथा पदोंसे भरा हुआ है सो वही जबूर पुस्तक है, दाऊद कवी बड़ा गवैया था । वह परमेश्वरके प्रेममें लीन रहा करता था, बडे प्रेमके साथ खुदाकी स्तुति रागोंमें किया करता था । उसके रागोंमें इतना प्रभाव था कि, पाषाण भी मोम होजाता था । दाऊदके गीतोंकी बड़ी प्रशंसा किताबोंसे लिखी है और मूल इसका सामवेद है । और सामवेदके गुण तथा उत्तमता संसारमें प्रगट है, अंग्रेजी

वेद तब और अब

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भाषामें भी साम नाम गीतका है इसी लिये अंग्रेजीमें 'साम्स आफ डेविड' दाऊदकी गीतको कहते हैं, साम कहिये गीत और डेविड नाम दाऊदका है, अतः इस ज़बूरको सामवेद जानना चाहिये ।

त्रैसठवाँ प्रकरण

तीसरी किताब इञ्जीलका वृत्तान्त ।

यह इञ्जील ईसा नबीको उत्तरी । इस इञ्जीलको यजुर्वेद मानना चाहिये, अतः ये तीन किताब तो तीन वेदोंसे हैं, इन तीनों वेदोंको और इनके गुण मिलाकर देख लेना चाहिये ।

चौसठवाँ प्रकरण

चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त ।

अन्तिम पैगम्बर हजरत मोहम्मद रसूलिल्लाह साहबके निमित्त कुरान उत्तरी यह किताब अथर्वण वेदसे है, यह अथर्वण वेदही है । जो बातें अथर्वण वेदमें हैं सोई बातें कुरानमें हैं । इस बातके प्रमाण अल्ला उपनिषदमें देखो, जो कोई अथर्वण वेदके अल्लाह उपनिषदको पढ़ेगा, स्पष्ट जान जावेगा कि यह कुरान वास्तवमें अथर्वण वेद है । अल्लो उपनिषदमें अल्लाके नाम और मुहम्मद रसूलिल्लाहकी स्तुति और उनके प्रतापकी स्तुति वर्णित है जो बातें कुरानमें हैं सो सब अल्ला उपनिषदमें तथा अथर्वण वेदमें हैं । यह कबीर साहबका बचन है कि, कुरान अथर्वण वेद है ।

पैंसठवाँ प्रकरण

आठ वेदोंका वर्णन ।

यह तो चारों किताबें पश्चिमी चार वेद हैं, पूर्वीय चारों वेदों सहित बही, संसारके पथदर्शक ठहरे । इन्हीं आठों वेदके आदेशानुसार सर्व मनुष्य चलते हैं एक जाति दूसरे जातिके साथ लड़ती और झगड़ती और एक दूसरेसे अपनेको अच्छा ठहराती है, अपनेको सत्यवादिनी तथा दूसरेको झूठी कहती है, उनको इस बातकी तनिक भी सुध नहीं है कि, उन सबका बनानेवाला एकही है तथा सबमें एकही बात है । ये आठों निरञ्जनकी ओरसे हैं, मनुष्योंको यह सुधही नहीं रही कि इन आठों वेदोंसे वे कैसे त्राण पासकते हैं । जिस अवस्थामें कि, आठों वेद स्वयम् धोखेमें पड़ रहे हैं, ऐसी अवस्थामें वे किस प्रकार मुक्तिमार्ग बता सकते हैं । इन वेदोंने न

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तो परमेश्वरको पहचाना और न मुक्तिके यथार्थ पथकोही जाना । यदि हंस कबीर लोगोंको समझाते हैं कि, ये वेद तो भ्रम और धोखेकी टट्टी है, ये आठों वेद जञ्जालोंमें फँसे हुओंके निमित्त हैं, मुक्ति पाएहुओंके निमित्त नहीं तो कोई कहना नहीं मानता और व्यर्थ वादविवादके लिये प्रस्तुत होता है, सब संसारी मनुष्य इन्हींमें फँस रहे हैं और इन्हींको अपना धर्म समझते हैं ।

इन आठों वेदके निष्प्रयोजन टट्टे बहुत हैं, जिनको पढ पढकर सब मनुष्य अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं, । किसी प्रकारकी खोज कोई नहीं करता । न तो स्वसंबेद को कोई जानता है और न उसकी शिक्षाको स्वीकार करना उचित समझता है । अब इसके आगे पांचों देवताओंके पंथ प्रचारका वर्णन लिखा जाता है ।

छ्यासठवाँ प्रकरण

१ निरञ्जनका पंथ ।

पांचों देवताओंमें सबसे बड़ा निरञ्जन देवता है और जैसा कि, कबीर साहबने पंथ 'कबीरवाणी और अनुरागसागर और भवतारण इत्यादिमें लिखा है । वही तीनों लोकका रचयिता और स्वामी है । ब्रह्माण्डके सिरेपर उसकी स्थिति है । वही सहस्र दल कमलमें अपनी शक्ति सहित रहता है, योगसमाधि इत्यादि द्वारा उसका दर्शन होता है, यही तीनों लोकोंका राजा तथा सृष्टि रचयिता है और इसीकी पूजा समस्त संसार करता है । अब चारों देवी तथा देवताओंके धर्मोंका विवरण करता हूँ ।

सरसठवाँ प्रकरण

२ आदिभवानी-अद्याका पंथ ।

पहले आदिभवानी है, यह तीनों देवताओंकी माता है तथा बड़ी प्रभाव शालिनी है, तीनों देवता उसके सामने डरते कांपते हैं और उसकी सेवा किया करते हैं । इस अध्याने चाहा कि, अपने तीनों पुत्रोंकी परीक्षा करलू जिसमें जान पड़े कि, कौन, इन तीनोंमें उसके अनुकूल है जिसके साथ वह रहै ।

कालीपुराणमें इस प्रकार लिखा है कि, सृष्टिके उत्पन्न होनेके पहले तीनों भाई एक स्थान पर बैठे, एक वृक्षकी छाहमें आपसमें बातलाप कर रहे थे, उस समय उन लोगोंने ऐसा कौतुक देखा कि, एक रक्तकी नदी महावेगसे बही चली आती है, जिसमें निरा रक्तही रक्त है और कुछ नहीं है । उस नदीमें कूड़ा कुरकुट

वेद मंत्रोंकी शक्तिका वर्णन

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और फेन सब एकही स्थानसे बहता चला आता था, अभी तक वह तीनों भाइयों के समीप पहुँची नहीं थी कि, उसमेंसे महा दुर्गन्धि आने लगी । वह बदबू जब उन तक पहुँची तब पहले विष्णु उठकर भाग गये, उनसे वह दुर्गन्धि सहन नहीं की जा सकी । ब्रह्मा और शिव बैठे रहे । जब वह दुर्गन्धि कुछ और समीप आयी तब ब्रह्मा भी उठकर भाग गये और शिव चित्तको दृढ़करके बैठे रहे । जब वह दुर्गन्धि शिवके अत्यंत समीप आगयी तब शिवजी उसको पकड़ अपने चूतड़ोंके नीचे रख अपना आसन बना उसीपर बैठ गये । यद्यपि उसमें बड़ी असह्य दुर्गन्धि थी, तथापि शिवजीने उससे तनिक भी घृणा नहीं की, वरन उसको अपना आसन बना लिया । तब उसमेंसे अच्छा प्रगट होगयी और शिवजीसे कहा कि, मैं अब सदैव तेरे साथ रहूँगी। क्योंकि, मैं तुझसे अत्यंत प्रसन्न हुई, अब तुझको अपना पति बनाऊँगी । तब शिवजीने कहा कि, तू मेरे दोनों भाइयोंकी पत्नी हो और उनको अपना पति बना । तब अद्याने उत्तर दिया कि, मैं अपना दो रूप और भी बनाकर उन दोनोंके साथ भी रहूँगी, पर मेरी विशेषता तेरे साथ है और तू मेरा विशेष पति हुआ । फिर अच्छा अपना तीन रूप—महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली बनाकर अपने तीनों पुत्रोंके साथ रही और समस्त संसारकी रचना की । अच्छा विशेषतः शिवजीके साथ रहती है, शैव लोगही इस भवानीके धर्मके अगुआ हैं अर्थात् सन्यासी तथा योगी इत्यादि देवीधर्मके प्रचारक हैं ।

गोरखनाथ, मोहम्मद साहब और शंकराचार्य इत्यादि सब शिवजीके अवतार हैं और जितने धर्म इस अच्छाके हैं सब नितान्तही घृणित और बुरे आचरणोंसे भरे हुए हैं । बारह पन्थ तो इस अच्छाके प्रगट पृथ्वीपर प्रचलित हैं ही, उनके अतिरिक्त और भी कितनेही प्रकारकी पूजा देवीकी होती है, वह सब नितान्तही घृणित हैं और हिंसा दुर्गन्धि तथा भ्रष्टतासे भरी हुई हैं । जो कोई शिवके समान बलिष्ठ हो वह इन घृणित बातोंको स्वीकार करे और दूसरेकी सामर्थ्य नहीं है ।

संस्कृतमें भी नाम शिवजीका है और भो नाम श्रमका भी है, और भो नाम भग अर्थात् स्त्रियोंकी योनििका भी है । भवानी नाम अच्छाका भी कहा जाता है, भवानी दो शब्दोंके संयोगसे बना है, भो और आनी, आनी कहिये खान, अर्थात् भोकी खान । इसी प्रकार भो नाम उत्पत्तिका है सो भो और भवानी इस भवसागर के सरदार हैं । अर्थात् जो कोई भो और भवानीकी पूजा करे सो भवसागरके पार कभी जा न सके । यही भो और भवानी, महाकाल और महाकाली हैं । येही दोनों समस्त संसारके बंधनके निमित्त हैं, ये दोनों शिव और शक्ति एकही रूप हैं, शिव शक्तिके पन्थ सदा मिले मिलाये रहते हैं ।

वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त

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अडसठवाँ प्रकरण

ब्रह्माका पंथ ।

दूसरे ब्रह्माजीका पंथ यह है कि, जिसके द्वारा ब्राह्मणलोग यज्ञ और दान पुण्य हवन इत्यादि कराते हैं। अद्याके शापसे ब्रह्माकी पूजा तो कोई नहीं करता, केवल मीमांसाधर्म और यज्ञ इत्यादि ब्राह्मणोंद्वारा अभी कहीं २ होता है।

विष्णु और शिवका पंथ ।

चौथे और पाँचमें विष्णु और शिव हैं, इन दोनोंकी पूजा का प्रचार संसारमें सबसे अधिक प्रचलित है, कबीर साहबका वचन है कि, केवल दो सम्प्रदाय इस संसारमें हैं एक विष्णुसम्प्रदाय तथा दूसरा शिवसम्प्रदाय ।

उनहत्तरवाँ प्रकरण

विष्णुका पंथ ।

जितने धर्म विष्णुके हैं, इनमें चार सम्प्रदायके वैष्णव विशेष सत्त्वगुण धर्मवाले लोग हैं और यही लोग वैष्णव हैं, इन चारों सम्प्रदायमें हिंसा आदि दुराचार नहीं है। यद्यपि ये लोग ठाकुरकी पूजा करते हैं, पर इनकी चाल पूर्णतया सत्त्वगुणियोंकी ऐसी है। इसी सत्त्वगुणी चालसेही मुक्तिद्वार खुल जाता है। इन चार सम्प्रदायोंके वैष्णव सब रामकृष्णआदिकी पूजा करते हैं और ठाकुरको पूजते हैं। ऐसा करते करते जब उनको बड़ा ठाकुर मिल जाता है तब उनका बेंडा पार कर देता है।

रजोगुण ब्रह्मा यह सांसारिक है, सतोगुण विष्णु भक्ति तथा मुक्तिकी राहपर चढ़ानेवाला है और तमोगुण शिव बन्धनका कारण है। विष्णुके जितने धर्म संसारमें हैं सबमें ये चारों सम्प्रदायके लोग उत्कृष्ट हैं। उनका परिणाम भी भला है, क्योंकि अन्त सबके सब सत्यपुरुषकी ओर ध्यान दिला देते हैं, इस कारण में चारों सम्प्रदायके वैष्णवोंके धामक्षेत्र लिखकर इनके गुण प्रगट करता हूं, चारों सम्प्रदायका सविस्तार विवरण में ग्रन्थ 'कबीरभानुप्रकाशमें' देकर आया हूं। यहां लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं केवल धामक्षेत्र लिखता हूं।

प्रथम श्रीसम्प्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त ।

अयोध्या धर्मशाला, चित्रकोट सुखविलास, गोदावरी प्रदक्षिणा, क्षेत्रधङ्ग तीर्थ, रामनाथधाम, अच्युतगोत्र, शुक्लवर्ण, सीता इष्ट, जानकी मंत्र, रामोपासना मंत्र, राघवानन्द महाप्रसाद, अनन्तशाखा, सामीप्य मुक्ति, श्रवण द्वारा, लक्ष्मी

स्वसंवेदकी शुद्धता

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आचार्य, विश्वामित्र ऋषि, वाशिष्ठ मुनि, हनुमान् देवता, हनुमान् मंत्र, राम-
गायत्री, ऋग्वेद, हरनाम आधार, विष्णवसेन पारिषद, रामानुज वैष्णव ।

दूसरे शिवसम्प्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त ।

विष्णुकाञ्ची धर्मशाला, मार्कण्डेय क्षेत्र, इन्द्रधनु सुखविलास, पुरुषो-
त्तम धाम, लक्ष्मी इष्ट, जगन्नाथ उपासी, तुलसी मंत्र, त्रिपुरारि शाखा, वामदेव
आचार्य, सायुज्यमुक्ति, नेत्रद्वारा, हरनाम अहार, यजुर्वेद, अच्युत गोत्र, शुक्ल
वर्ण, वटकृष्ण, परिक्रमा, जलबिम्ब, ऋषि नारद, देवता विष्णुश्याम वैष्णव ।

तीसरे ब्रह्मसम्प्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त ।

अवन्तिका पुरी धर्मशाला, बदरिकाश्रम धाम, नैमिषारण्य सुखविलास,
अंकपात्र क्षेत्र, सावित्री इष्ट, ब्रह्मउपासी, विष्णुहंसमंत्र, हंस देवता, सालोक्य-
मुक्ति, मोक्षद्वारा, श्रीकालाचार्य, उदितशाखा, अच्युतगोत्र, शुक्लवर्ण, हरनाम
अहार, परमहंस ऋषि, नारायण पारिषद, अथर्ववेद, माधवाचार्य वैष्णव ।

चौथे सनकादिक सम्प्रदायका वृत्तान्त ।

मथुरा धर्मशाला, क्षेत्रगोमती, वृन्दावन सुख विलास, गोबर्धन परिक्रमा,
द्वारावती धाम, रुक्मिणी इष्ट, गोपालउपासी, हंसगोपालमन्त्र, गोपालगायत्री,
हंसशाखा, सारुप्य मुक्ति, नासिकाद्वारा, सनकादिक आचार्य, नारदमुनि, दुर्वासा
ऋषि, गरुडदेवता, सामवेद, महाप्रसाद, अच्युत गोत्र, शुक्लवर्ण, हरिनाम अहार,
वीमादित्य वैष्णव ।

चारों भाई के धामक्षेत्र ।

माता बरुणावती, पिता अगस्त्य मुनि, गुरुधर्म ऋषि, स्वर्गनगरी, अच्युत
गोत्र, शुक्लवर्ण अनन्त शाखा, सूक्ष्मवेद, निष्काम इच्छा, धाम रङ्गनाथ, सुख-
विलास कोटपाट, हरनाम अहार, परम बदरिकाश्रम क्षेत्र, मठ वैकुण्ठ, लक्ष्मीदेवी,
नारायण देवता, पूजा अक्षयवट, श्रीरङ्गसम्प्रदाय, ओखल खाडा, शून्यस्थान,
सुमेरुपरिक्रमा वीर्यमंत्र ।

सत्तरवाँ प्रकरण

वैष्णवधर्मकी श्रेष्ठता ।

वैष्णवाचार्य ग्रंथ देखकर ये धामक्षेत्र लिखे गए हैं, जो कोई चाहे सो
संस्कृतके वैष्णवाचार्यके ग्रंथको देखकर मिलान करलेवे । इन चार सम्प्रदायोंके
वैष्णव पृथ्वीके देव दूत हैं, इनके रूप तथा आचार व्यवहारको देखकर स्पष्ट प्रगट
होता है कि, वास्तवमें वे लोग देवदूत हैं, मनुष्य नहीं हैं । निरञ्जनके जितने धर्म

संसारके सब धर्मोंका मूल वेद अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन

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पृथ्वीपर हैं उन सबमें बड़ा श्रेष्ठ धर्म यह वैष्णवोंका है ये वैष्णव जब अपने समस्त चिन्हां सहित दीख पड़ते हैं तब जान पड़ता है कि, सतोगुण मूर्ति धरकर निकल पड़ा है इनके रखना दश चिह्न होते हैं—१ भद्रवेष्ट अर्थात् दाढ़ी मूँछ शिरके बाल और नाखून आदि मुड़ेहुए, २ तप अर्थात् पूजन बंदना करना, ३ भीतर बाहरसे विशुद्ध रहना, ४ तुलसीकी कण्ठी गलेमें, ५ रामकृष्ण मंत्र, ६ बारह तिलक, ७ यज्ञोपवीत, ८ चोटी, ९ कमण्डलु, १० श्वेत वस्त्र; इन दश चिह्नों सहित जब वे प्रगट होते हैं तब जान पड़ता है कि, वे पानीके स्वरूप सतोगुणकी प्रतिमूर्ति हैं जब इन चारों सम्प्रदायोंके वैष्णवोंकी पूजा उपासना उच्चश्रेणीपर्यन्त पहुँचती है तब वे लोग पाँचवी सम्प्रदायमें मिलकर, धर्म ऋषि गुरुसे मिलते और स्वसम्बेदको प्राप्त होते हैं। वह धर्मऋषि कवीर साहब हैं, जिनका वह स्वसम्बेद है। अतः इन चारों सम्प्रदायका द्वारा कवीर साहबके घरकी ओर खुला हुआ है। यद्यपि वे लोग ठाकुरकी मूर्तिका पूजन करते हैं, तथापि उनका पूजन उन्हें सत्यगुरुसे मिलावेगा और यह मूर्तिपूजा उनको इस प्रकार उचित मार्गपर लगावेगी जैसे पिता माता अपने छोटे बच्चोंको धूल मिट्टी और झुनझुना इत्यादि खेलनेकी आज्ञा देते हैं और जब तक वे अज्ञान रहते हैं तबतक उनको इस कार्यसे निषेध नहीं करते, पर जब उनमें कुछ ज्ञान आजाता है तब उनको दूसरे काममें लगाते हैं। यह विष्णु सतोगुणी देवता है और उसके भक्त लोग सब सतोगुणी हैं, उनके रूप लक्षणसे ही सतोगुण प्रगट होता है।

यहांतक मैंने विष्णुसम्प्रदायका वृत्तान्त लिखा, अब शांकरीसम्प्रदायका विवरण करता हूँ।

शांकरीसम्प्रदायका वृत्तान्त ॥

१—पूर्व ओर गोवर्धन मठ, भूगमबार सम्प्रदाय, वनारण्य द्विपद, पुरुषोत्तमक्षेत्र, जगन्नाथ देवता, पद्माचार्य, चैतन्यब्रह्मचारी, तीर्थ महोदधि, विमला देवी, राते ब्राह्मण, ऋग्वेद, गटकन्य उपनिषद्, अकारमात्रा, परज्ञा, नम् । आनंदम् ब्रह्म महावाक्य । २—पश्चिम ओर शारदामठ, कीटमवार सम्प्रदाय, तीर्थ द्वारका क्षेत्र, सिद्धेश्वर देवता, भद्रकाली देवी, स्वरूपाचार्य, नन्दा ब्रह्मचारी, तीर्थ गोमती सामवेद, उपनिषद् ब्राह्मण केन, तत्त्वमसि महावाक्य, उकारमात्रा, १ तीर्थ, आश्रमा द्विपद । ३—उत्तर ओर जोशीमठ, आनन्दवार सम्प्रदाय, पद तीन, १ गिरि, २ पर्वत, ३ सागर, क्षेत्र बदरिकाश्रम, नारायण देवता, पुण्यगिरि देवता, त्रिविद्काचार्य, नन्दा ब्रह्मचारी, तीर्थ अलकनन्दा, ब्राह्मण ब्रह्म, अथर्ववेद, माण्डूक्योपनिषद्, मामात्रा, अयंआत्मा, ब्रह्म महावाक्य । ४—दक्षिण ओर, श्रीनगरी

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मठ, भूरीबार सम्प्रदाय, १ सरस्वती, २ भारती, ३ पुरी तीन पद, क्षेत्र रामेश्वर, आदिवाराह देवता, कामाक्षा देवी, भृङ्गी ऋषि, पृथ्वीधराचार्य, तुङ्गभद्रा तीर्थ, यजुर्वेद, बृहदारण्य उपनिषद्, ब्राह्मण, इच्छाविष, अहम् ब्रह्मास्मि महावाक्य, अर्धमात्रा ।

इकहत्तरवाँ प्रकरण

शांकरी सम्प्रदायसे मिलते और पंथ ।

शांकरीसम्प्रदाय जो संसारमें है, इनमें ये उपयुक्त दश नामके सन्यासी हैं, और बारह पंथके योगी हैं, शिवधर्ममें यही लोग बड़े हैं, ये सब लोग शिवजीको अपना गुरु तथा आचार्य मानते हैं—इन समस्त सन्यासियोंमें भी दो सन्यासी सबसे श्रेष्ठ हैं, एक दंडी और दूसरे दिगम्बरी, इन दोनोंकी चालचलन अच्छी है और मद्यमांस आदि बुरे खाद्य तथा घृणित कार्योंसे बिलकुलही पृथक् रहते हैं । इनके अतिरिक्त और कितनेही सन्यासी और योगीभी अपने आचरणको विशुद्ध रखते हैं, किन्तु कितनोंके आचरण ठीक नहीं, मांस मदिरा तथा श्मश्रि २ के घृणित पदार्थोंको व्यवहारमें लाते हैं । वाममार्गी तथा अघोरी इत्यादि इन्हींमें होते हैं और खूनी वस्त्र, अर्थात् गेरुवा वस्त्र इन्हींके निमित्त उपयुक्त है । और खप्पर समुद्रीय पशुकी खोपडी तथा मनुष्यकी खोपडी भी यही अघोरी लोग रखते हैं । उसीमें वे खाते और पानी पीते हैं, इनमेंसे कोई २ मूत्र पुरीष तथा अन्यान्य घृणित वस्तुओंको भी खाया पीया करते हैं। ये भी और शिवभक्तिके पंथका प्रचार करते हैं । इस वेषमें जाति पाँतिका कोई ध्यान नहीं है, कारण यह कि, अद्याका वचन हो चुका था कि, हे शिव ! तेरा वेष भयानक होगा, और तेरी जाति पाँतिका कोई ठिकाना नहीं रहेगा, तू बड़ा क्रोधी होगा । वैसाही रङ्ग ढङ्ग सन्यासी आदिकोंमें प्रगट है । शिवजी तमोगुणी देवता विष्णुके अधीन हैं, इस कारण शिवसम्प्रदायके लोग विष्णुसम्प्रदायके अधीन हैं । शिव लोग जो अत्यंत परिश्रमके साथ भक्ति करते हैं वे कौलासको जाते हैं, शिवजीके सेवक प्रायः भूत, प्रेत, राक्षस इत्यादि हैं, जो अनेकानेक कुकर्मोंमें डूबे रहे हैं ।

यह तमोगुणी देवता उत्पत्तिकी प्रवाह स्वरूप हैं, स्वयम् अद्या शिवके साथ रहती है, जैसा कि, मैं पहले लिख आया । देवीभागवत और कालीपुराण इत्यादिमें इस अद्याकी बहुत बड़ाई लिखी गई है । इसी अद्याको उसके सेवकगण संसारकी रचयिता जानते हैं और कहते हैं कि, इससे बडी और कोई नहीं है, इसीसे उत्पत्ति स्थिति और परलय हुआ करती है ।

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इस चार सम्प्रदायके धामक्षेत्र लिखनेसे मेरा यह तात्पर्य है कि, विष्णुके चार सम्प्रदाय हैं उसमें पांचवां धामक्षेत्र कबीर साहबका है, इस कारण कि सारे वैष्णव अन्तमें कबीर साहबसे मिलकर परम धाम को सिधारेंगे, समस्त वैष्णवों के गुरु कबीर साहब हैं, और उनका वेद स्वसम्बेद है और यह संन्याससम्प्रदाय विष्णुसम्प्रदायके अधीन है।

बहत्तरवाँ प्रकरण

भवसागर ।

इस अद्याने चारों खानिकी उत्पत्तिके पूर्व अपने पुत्रोंको जो रक्तकी नदी दिखलायी थी वह भवसागर है। वही नदी स्त्रीकी योनि है, जो रक्तसे भरी हुई है, इसीसे सबकी उत्पत्ति होती है, कारण यह कि, जो ब्रह्माण्डमें हैं सो पिण्डमें हैं, कभी इस योनिके भीतर जाता है और कभी बाहर निकलता है, जब स्त्री पुरुष संभोग करते हैं तब वही स्वरूप प्रगट करते हैं, कभी भीतर और कभी बाहर आना जाना अपना आवागमन स्पष्टरूपसे प्रगट करता है।

कबीर साहबका वचन देखो बीजक ।

चौदह लोक बसै भग मोहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥
भग भोगे ओ भगत कहावै । फिर फिर भग भोगनको आवै ॥

तिहत्तरवाँ प्रकरण

बन्धन ।

यह मनुष्य स्त्रीके साथ संभोगकी कामना रखता है, इस कारण बारंबार इसका आवागमन होता है और जितनी स्त्रीके साथ यह संभोग करता है, उन सबके गर्भसे उसको उत्पन्न होना पड़ता है। यही स्वसम्बेदका आदेश है, इसी कारण मनुष्यके आवागमनका संबंध नहीं टूटता और दिन २ प्रति विशेष दृढ़ होता जाता है।

इस संसारमें जितने धर्म हैं सो सब इन्हींके हैं और इन पांचोंके अतिरिक्त क्या है इसका मनुष्य मात्रको तनिक भी ध्यान नहीं, नरक, वैकुण्ठ और चार मुक्ति, धनसम्पत्ति, राजकाज सबके प्रदान करनेवाले यही हैं। पांचों सब कुछ दे सकते हैं, पर मुक्ति देना इनके वशमें नहीं, कारण यह कि, वे स्वयम् आवागमनसे रहित नहीं हैं और दुःख सुख पाया करते हैं, जिस बातमें वह स्वयम् असमर्थ हैं तो दूसरोंको क्या दे सकेंगे।

श्रीमद्भगवद्गीता अ. ३ श्लो. ४५ विवेचन

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चौहत्तरवाँ प्रकरण

प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार ।

वहांतक तो मैंने कालपुरुषके धर्मका विवरण किया, जिनमें फँसकर मनुष्य के पथ नहीं मिलता. कारण यह कि, यह अहंकार तथा भ्रममें फँस रहा है, न यह ईर्षा तथा अहंकारको छोड़ता है न इसको सत्यपुरुषकी भक्तिका मार्ग मिलता है, सब इसी अभिमानमें “कि, मैं बड़ा और मेरा धर्म तथा गुरु बड़ा” डूबे हुए हैं, कौन सत्यका इच्छुक है जो मिथ्याको छोड़कर, स्वसम्बेदकी सत्य शिक्षाकी खोज करे ।

ग़ज़ल आजिज़ ।

यह मुत कब्रिबर हुआ इनसान खाकी । जिधर देखो उधर सामान खाकी ॥
पड़ा जो फ़र्श पर लाचार कोई । रसाई अर्श इम्कान खाकी ॥
बहर काने तमाशा मजहरे जाता । वही खुद सूरते इनसान खाकी ॥
जो मुरशिदके कदमकी खाक होजा । सफ़ाकर आइनः ईमान खाकी ॥
कदम गाहे उसीकी जा सलामत । बजुज उसके नहीं दरमान खावी ॥
नहीं कोई दूसरा दुश्मन हमारा । कि खाकी शकलका शैतान खाकी ॥
हिमाकृतसे है पैवस्तः लजायज़ । सरीरो सूतवतो सुलतान खाकी ॥
न अपने अस्लको पहचानता है । हुआ मगरूर नाफ़रमान खागी ॥
सिफ़त तीनों बहम अरबः अनासर । बहम मखलूत हैं यकसान खाकी ॥
न इनसे आदमीको पेश दरती । तेरे बे फायदः अरमान खाकी ॥
न हो सगरूर खुद इल्मो अमलपर । कि बानीवेद और कुरआन खाकी ॥
मिलेगा आजजीसे हकको आजिज़ । करे अपनेको गर कुरबान खाकी ॥
इति श्री कबीर मन्शूरके प्रथम भागका प्रथम अध्याय ॥ १ ॥

प्रथम अध्यायका परिशिष्ट

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कबीर मन्शूरके इस अध्यायमें चौहत्तर प्रकरण हैं । अब आगे इस अध्याय का परिशिष्ट भाग दिया जाता है जिसके लिये पीछे कई स्थानोंमें टिप्पणी द्वारा सूचना दी जा चुकी है । इन प्रमाणोंको यह इसलिये दिया है कि, बहुतसे महंत संत सेवक सतियोंने अनुरोध किया है कि, जहाँ जहाँ ग्रन्थोंके प्रमाणकी आवश्यकता हो वहाँ वहाँ वह जरूर दे देना चाहिये । यद्यपि मेरा भी यही विचार था

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कि, इन प्रमाणोंकी जहाँ जहाँ आवश्यकता है ये वहीं वहीं दे दिये जायें किन्तु, कितने कारणोंसे वह न होसका, इसलिये यहा दे दिया है ।

प्रमाण कबीर वाणीका ।

देबो प्रकरण ५ पृष्ठ २२.

प्रथम वानी सुनियो चितलाई । आदि अंतकी संधि देहुँ बताई ॥
प्रथम आदि समरथ हत सोई । दुसरा अंस हता नहिं कोई ॥
आदि अंकुर सुरति तब कीन्हा । सात करीको गरभ तब दीन्हा ॥
इच्छा सूरति दुसरे उपजाई । सातो करी में चित्त बनियाई ॥
छिपा रूपहिं कीन्ह परगासा । स्वाति रूप इच्छा रहिवासा ॥
सात तेहिंते इच्छा उपजाई । भिन्न भिन्न परकार बनाई ॥
विमल शब्द विगसित तब भयेऊ । तब हुलासबुंद पाँच करिमें दयेऊ ॥
तब पांच अंड भयो उत्पानी । तत एक भिन्न परसानी ॥
नहिं तब धरनी नहिं अकासा । नहिं तब दुसरो हतो अवासा ॥
धावै अंड करै चौचन्दा । आपु अदेख और सहज अनन्दा ॥
तबकी बात नहीं कोई जाने । कहाँ समुझाय तो झगरा ठाने ॥
धर्मदास सुनियो चितलाई । फूटो अंड सूरतसे भाई ॥
सहज अंकुर बीज निरमाई । तिहिंकी इच्छा अंड उपजाई ॥
तब सरबनते साजी बानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलबुन्दतेहिं सुरतिको दीन्हा । पांच अंश तब उत्पन कीन्हा ॥
पांचों अंस तब कहाँ बुझाई । पांचों अंडमें तुम जाओ समाई ॥
एकहिं एक अंड तब गयेऊ । आपहु आप कलामें ठयेऊ ॥
तबअविगति एक खेल बनावा । पांच सरूप पांचों अंडहिं आवा ॥
फूटो अंड तेज भई धारा । सबमें देखु पांच ततसारा ॥
पांच तत भिन्न भिन्न विस्तारा । सात अद्विस्ट तेहिंमाहिं संचारा ॥
देखि सरूप अंडकर भाई । सोहंग सुरति तबहिं उपजाई ॥
पुरुष सकती भई दौय प्रकारा । तिन्हको सोंप्यो उत्पन सारा ॥
तासों अंकुर भेद बतावा । वचन सुरत एक संग समावा ॥
ताते ओहं पुरुषको अंसा । ओहं सोहं भए दो बंसा ॥
तिनकी आज्ञा उत्पन्न कीन्ही । शब्द सनद उनहूको दीन्ही ॥
मूलसुरति औ पुरुष पुराना । रचना बाहेर कीन्ह अस्थाना ॥
ओहं सोहं अंडनमें रहेऊ । सकल सृष्टिके कर्ता कहेऊ ॥

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प्रथम अंकुर दूसर इच्छा उत्पानी । तिसर मूल चौथ सोहं ठानी ॥
ओहं सोहं की बंधानी । आठ अंस तिन्ते उत्पानी ॥
आठ अंस भए एकहि ध्याना । करता ख्रिस्टिको भयो परवाना ॥
करता सरूप आठ भए अंसा । तिन्हके भए सृष्टि सब वंसा ॥
तेज अंड अंचितकूं दीन्हा । प्रथम सुरत जब उत्पत कीन्हा ॥
जोहं अंस दुसरे भए भाई । धीरज अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
तिसरे अंस अंक निरमाई । छमा अण्ड तिन्ह बैठक पाई ॥
चौथे अंस सुकृत है सारा । सत्य अंड है ताहि पसारा ॥
पांचऐ अंस हिरम्पर भाई । सुमत अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
दोय अंस दोय करी समाने । तिनका भेद गुरुगम जाने ॥
एक अंस त्रिगुण अवतारा । ते सब सृष्टिके भये कडिहारा ॥
साखी—एती उत्पत सुरत की, भिन्न भिन्न परकार ।

कहें कबीर धर्मदाससों, आगे बंस असार ॥

धर्मदास बचन ।

साँचे सद्गुरु की बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥
धन्य भाग मोहि मिले गुसाई । अपनो कै मोहि लीन्हमुकताई ॥
चारि वेद अरु सास्त्र पुराना । सबहीके हम सुनिया ज्ञाना ॥
अविगति गति काहु नहिं जानी । जो तुम कही आदिकी बानी ॥
सुरत सोहंगके आठ भए अंशा । तिनके सृष्टि सबही भए वंशा ॥
अपरंपार है तिनका सेषा । अचित्य ख्रिस्टिको कहो विवेषा ॥
साखी—तुम निज सतगुरु सत्य हो, हम निज चिन्हा सोय
अचित ख्रिस्टिको भेद कहो, अविगति पूछौं तोय
धर्मदास तुम बडे विवेकी । तुम्हारे घटमें बुधि बड देखी ॥
अचित्य ख्रिस्टिको कहो पसारा । तेज अंड तिन्ह पाये सारा ॥
वाराहि पालंग अंड विस्तारा । तिहिमें पांच तत्त्व है सारा ॥
इनको बैठक आसन दीन्हा । अंड सिखर लोक तिन्ह कीन्हा ॥
प्रेम सुरति तिन कीन उपचारा । तिन्हते भयो अच्छर विस्तारा ॥
अच्छर सुरत तब मोहमें आई । ताते अंस चार निरमाई ॥
चारिअंस भये चारि परकारा । चौविध दीप चौविधहि पसारा ॥
प्रथम अंस पर माया भयऊ । सो पिरथी तत्त्व बीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कूर्म भये अवतारा । पालङ्ग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥

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तिसरे अदली अंस निरमावा । सेसनाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंस भए धरमराई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारि अंस अच्छर ते भयऊ । चार अंस चार मत ठयऊ ॥
तब समरथ अनिगति यक कीन्हा । पूरी नींद अच्छरको दीन्हा ॥
चौसठ जुगलौं सोय सिराई । तौलौं कैल सुरत ठहराई ॥
समरथ सुरति जल तत्त्व समानी । कैल अंड कीन्हा उत्पानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त भये अनुरागा ॥
चक्रित होय अच्छर बिलखाना । सोई मोह सब स्लिस्ट समाना ॥
अंड स्लिस्टमें देखा भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समरथ छाप अंड सिर दीन्हा । अच्छर छापदेखि सो लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें बिहराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
ताते जोत निरंजन भयेऊ । तिनको सब जग करता कहेऊ ॥
अच्छर सुरति समरथकी बानी । तेहि गुण खेल भए उत्पानी ॥
निरंजन नाम अच्छर ठहराई । अर्चित भेद नहिं पावै भाई ॥
कैलिहिं देखा सकल पसारा । तब अच्छर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आग्या सोई । जो कछु इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोलै पुरुष अतीता ॥
जाव पुत्र जहां प्रिथ्वीको मूला । तहां कूरम बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूरमको भाई । सोलह माथ हथ चौसठ पाई ॥
चले निरंजन कुरम लगि आये । पुरुष ध्यानसे कुरम जगाये ॥
उत्पति हमकूं मागे देह । ना देहो तो मारिकै लेहैं ॥
तर्वाहि कूर्म अपने मन मानी । ऐतो कैल भयो अभिमानी ॥
हम माँगे कछु देब न भाई । जाउ पुरुष लगिवेगि सिध्दाई ॥
कैल कूर्मते युद्ध निर्मयऊ । माथा तीनछीन पुनि लयऊ ॥
लेकर माथै सुन्यमें आवा । कैल सुरत घट मोह समावा ॥
तीनों माथे भच्छ तब लीन्हा । तबते अच्छर पुरुष डर कीन्हा ॥
मनमें तब अभिमान समाई । त कर जोरिके सेवा लाई ॥
सोला चौकडी जब चलिआई । तब लगि निरंजन सेवा लाई ॥
अच्छरपुरुष जो कीन्ह विचारा । तिन्हको समरथ वचन उचारा ॥
विदेह बानि तब अच्छर पाई । तो बानी कन्या भइ भाई ॥
ताको बहुत सिखापन दीन्हा । अस्तंगी तिन कन्या कीन्हा ॥

दूसरी व्याख्या

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पुत्री निरंजन लागि सिधाऊ । तुमको समरथ सदा सहाऊ ॥
तब कन्या निरंजन लग आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥

देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।

उपज्यो मोहऊ प्रेम तब, विप्रित मनमें बाढ़ि ॥

पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥

कहै कैल सुनो तुम बानी । मो कारन तुहि पुरुष उत्पानी ॥

हम तुम कीजै स्लिस्ट पसारा । तीनहि लोक सकल महिभारा ॥

तब अस्टंगी कैलसों कहाई । मोर तोर नहि होय सगाई ॥

मैं तोरि बहिनी तू मोर भाई । सो अनरीति सब दीन चलाई ॥

कहैं कैल सुनु आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥

जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निरन ठानौ ॥

तब अस्टंगी कहै बुझाई । बिन अज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥

बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अंत करि दीन्हा ॥

देखि स्वरूप कन्यहि को, मनमें रोष भराय ।

मनमें रोष भरयो जब, कन्यहिं लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हिये सम्हारा ॥

तब सुरति बनाते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै वहि वारा ॥

यहि प्रपंच अच्छर सब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥

कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥

पिता पिता कैल सो कहेऊ । मदन प्रचंड कैल छन भयेऊ ॥

अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥

कियो संयोग भयो त्रैवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णुकुमारा ॥

तीजे संभु विस्तुते छोटा । येक निरंजनही के ढोटा ॥

जैसे रूप निरंजनही, तैसे तीनों भाय ।

यह उत्पत है कैलकी, आगे स्लिस्ट उपाय ॥

करि परपंच सूत्र में गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥

यहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते स्वासा सुरति उठाई ॥

तेहि स्वासाते वेद कढ़ि आई । रूप निधान चारों बने भाई ॥

हाथन पोथी सुरसुर बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥

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चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अच्छर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचंड भयो बरियारा । तब अच्छरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अच्छर चलै अचिन्त लगि गयऊ । महासूत्र छोडि तब दयऊ ॥
तब अचित्य अच्छर समझावा । यह अविगति गति काहु ननपावा ॥
तुम तो सुरति हमारहि भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लच्छ जीव नित करै अहारा । सवा लच्छ नितप्रति विस्तारा ॥
अंसवंस मिलि एक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप है भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समरथको ध्यान लगावो । अंतर गति समरथ सुख पावो ॥
चारि ज्ञानमें निरनय कीन्हा । सो निरनय चारि अंशको दीन्हा ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ॥
तीन सुरतिको खेल भयो, चौथे हंस उबार ॥

धर्मदास उवाच ।

धरमदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसो विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अंतकी निरणय ठानी ॥
कौन है अंड कौन है अंसा । कोहै अंस कौन है वंसा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन स्निस्ट कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जनि राखो ॥
विन देखी सबही कहै, सुनि पाई हम कान ।
सोई अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥

सतगुरु कबीर उवाच ।

सुनि सतगुरु मनमें बिहँसानै । तुमसों धर्मनि निरनय ठानै ॥
तेज अंड है अच्छर बंसा । अचित्य अंस सोहं है हंसा ॥
निरंजन कैल चारि गुन धारी । तिन स्निस्ट अविगति संचारी ॥
तेज अंड अचित्त है अंसा । ओहं अंड जोहं है हंसा ॥
सत्य अंज जोहं है अंसा । सोरह तिनके उपज्यो वंसा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपांजी तिनको बैठारा ॥
तिसरो अंड छमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥
अकहनामते सताविसै बंसा । तिन्हके सकल और हैं अंसा ॥

वेदके प्राकट्यपर मतभेद

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चौथा धीरज अंड है भाई । ताते सुक्ति अंस निरमाई ॥
वंश बयालिस तिनके कडिहारा । तिनकी सनद चलै संसारा ॥
पाँचे अंड सुमत निरमाई । अंश हिरम्भर बैठक पाई ॥
तिन्हके वंस सात परवानी । यह सब भेद लेहु पहिचानी ॥
पाँचहि अंड आठ भए अंसा । सात सुरति इक्कोत्तर बंसा ॥
चारि अंडको एक विचारा । दोए करीको भेद अपारा ॥
एक अंश कोई पार न पावै । सतगुरु निजही भेद बतावै ॥
सुरति सरूप हमही सब कीना । मान बंडाइ अंसनको दीना ॥
जब अतीत सुरत ठहरानी । सुरति समरथ घट आनि समानी ॥
दोई मछय एक आए समाई । तिन्हको नाम अच्छर ठहराई ॥
अक्षर इच्छा उपजी भावा । दूसर अंस कैल होय आवा ॥
आठवाँ अंस कालकी वानी । अच्छर घट जो आए समानी ॥
स्वासा होय बाहर कडि आई । तिन्हकी गति कोइ विरलै पाई ॥
पांच परगट तीन गुप्त पसारा । इनके अंस इग्यारह सारा ॥
चारि अंस भवतारन कीन्हा । चारि वेद निरंजन दीन्हा ॥
तीन देव स्त्रिस्टि अधिकारी । उपजनि बिनसनि दुखसुख भारी ॥
तिन चौरासी लच्छ बनावा । जीव अनेक बहुत निरमावा ॥
यह अविगति काहू नहि पावा । समरथ ऐसा खेल बनावा ॥
साखी-वेद कितेब जाने नहीं, पावे ग्यानी थाहू ।
तीन अंशलों सबही खेले, आगे अगम अथाहू ॥
इति कबीर बाणीका प्रमाण सृष्टि उत्पत्ति विषय ।

प्रमाण अनुराग सागर सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका ।

धर्मदास प्रश्न ।

अब साहब मोहि देहु बताई । अगर लोक सो कहौं रहायी ॥
लोक दीप मोहि बरनि सुनावहु । तिरषावन्तको अमि पियावहु ॥
कौने द्वीप हंसको बासा । कौने द्वीप पुरुष रहि बासा ॥
भोजन कौन हंस तहँ करई । औ बानी कहँ तहँ उच्चरई ॥
कैसे पुरुष लोक रचि राखा । द्वीपहिं को कैसे अभिलाखा ॥
तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णतहु सकल गोय जनि राखो ॥
काल निरंजन केहि विधि भयऊ । कैसे षोडश सुत निर्भयऊ ॥

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कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव काल बस डारी ॥
कैसे कूरम सेस उपराजा । कैसे मीनबराह्मिं साजा ॥
त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकास निरमयऊ ॥
चंद सूर कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागन सब ठयऊ ॥
किहि विधि भइ शरीरकी रचना । भाषो साहेब उत्पत्ति बचना ॥
जाते संसय होय उछेदा । पाई भेद मन होय अखेदा ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति कहो सतगुरु, क्रिपाकरि निज दासको ॥
बचन सुधा सु परकास कीजे, नास हों जम त्रासको ॥
एक एक विलोय बरनहु, दास मोहि निज जानिकै ॥
सत्य वक्ता सद्गुरु तुम लेब निश्चय मैं मानिकै ॥ १० ॥

सोरठा—निश्चय बचन तुम्हार, मोहि अधिक प्रिय ताहिंते ।
लीला अगम अपार, धन्य भाग दरसन दीये ॥ १० ॥

कबीर बचन ।

धरमदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥
अब तुम सुनहु आदिकी बानी । भाषों उत्पत्ति प्रलय निसानी ॥

सृष्टिके आदिमें क्या था ?

तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पताल अकासा ॥
जब नहिं कूर्म बराह औ सेसा । जब नहिं सारद गौरि गनेसा ॥
जब नहिं हते निरंजन राया । जिनजीवन कहैं बांधि झुलाया ॥
तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥
ब्रह्मा विस्नु महेशुर नहिं तहिया । सास्त्र वेद कुरान न कहिया ॥
तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बटबूच्छ मध्य रह छाहीं ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति सुनहु धर्मनि, कोइ न जानत ताहि हो ॥
सबहि भो विस्तार पाछे, साख देऊँ मैं काहि हो ॥
वेद चारों नाहिं जानत; सत्य पुरुष कहानियां ॥
वेदको तब मूल नाहीं, अकथकथा बखानियां ॥ ११ ॥

सोरठा—निराकारते वेद, आदि भेद जाने नहीं ॥
पंडित करत उछेद, मते वेदके जग चले ॥ ११ ॥

ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता

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सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना ।

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारन करन नहीं निरमाये ॥
समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुप माहि रह पुरुष विदेहा ॥
इच्छा कीन्ह अंस उपजाये । हंसन देख हरष बहु पाये ॥
प्रथमहि पुरुष सब्द परकासा । दीप लोक रचि कीन्ह निवासा ॥
चारि करी सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीप कर चीन्हा ॥
पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥
सहस्र अठासी दीप रचि राखा । पुरुष इच्छातै सब अभिलाखा ॥
सबै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥

सोलह सुतका प्रगट होना ।

दूजे सब्द जु पुरुष परकासा । निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥
तीजे सब्द सु पुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकि चरन सम्मुख ह्वै रहेऊ । आज्ञा पुरुष दीप तिन्ह दयऊ ॥
चौथे सब्द भयो पुनि । जबहीं । विवेकनाम सुत उपजे तबहीं ॥
आप पुरुष किय दीप निवासा । पञ्चम सब्द सो तेज परकासा ॥
पँचऐ सब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भौ अवतारा ॥
तेज अंसते काल होय आवा । ताते जीवन कहैं सन्तावा ॥
जिवरा अंस पुरुषका आहीं । आदि अंत कोई जानत नाहीं ॥
छठऐ सब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥
सतऐ सब्द भयो संतोषा । दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥
अठऐ सब्द पूरुष उच्चार । सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥
नवमें सब्द अनन्द अपारा । दशऐ सब्द समा अनुसार ॥
ग्यारहें सब्द नाम निष्कामा । बारहें सब्द जलरंगी नामा ॥
तेरहें सब्द अचित्त सुत जानो । चौदहें सब्द सुत प्रम बखानो ॥
पन्द्रहें सब्द सुत दीनदयाला । सोलहें सब्द मैं धिरज रसाला ॥
सत्रहवें सब्द सुत योगसंतायन । एक नाल षोडश सुत पायन ॥
सब्दहिते भयो सुतन अकारा । सब्दहि ते लोक दीप विस्तारा ॥
अगर अमी दिय अंस अहारा । दीप दीप अंसन बैठारा ॥
अंसन सोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा वसन्ता ॥
अंसन सोभा अगम अपारा । कला अनन्तको वरने पारा ॥

वेद और किताबोंके मूलका वर्णन

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सब सुत करें पुरुषको ध्याना । अभी अहार सदा सुख माना ॥
याही विधि सोलह सुत भयऊ । धरमदास तुम चित धरि लेऊ ॥
छन्द-दीप करीको अनंत सोभा, नाहि बनत सो बने ॥
अमित कला अपार अद्भुत, सुतन सोभाको गने ॥
पुरुषके उजियारसे सुन, सबै दीप अंजोर हो ॥
सत पुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द सूर करोर हो ॥
सोरठा-सतपुर आनंदधाम, सोग मोह दुख तहैं नहीं ॥
हंसनको विसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥ १२ ॥

निरञ्जनकी तपस्या और मानसरोवर तथा सूनकी प्राप्ति ।

यहि विधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥
जुग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढपुरुषचित्त दीन्हा ॥
सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हरषित होय चीन्हा ॥

पुरुष वचन-निरञ्जनप्रति ।

पुरुष अवाज उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥
निरञ्जन वचन ।

कहैं धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहैं बैठों जायी ॥
आज्ञा किये जाहु सुत तहवों । मानसरोवर दीप है जहवों ॥
चले धरम तब मानसरोवर । बहुतहरषचित्त करत कलोहर ॥
मानसरोवर आये जहिया । भय आनन्द धरम पुनि तहिया ॥
बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥
यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

विकस्यो पुहुप उठयो जब बानी । बोलत वचन उठयो अघरानी ॥
जाहु सहज तुम धरमके पास । अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥
सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥
तीन लोक तब पलमें दीन्हा । लिखि सेवकाइ दया आस कीन्हा ॥
तीन लोक कर पायो राजू । भयो आनन्द धरम मन गाजू ॥
जब का चाहे पूछो जाई । जो कछु कहै सो देउ सुनाई ॥

सहजका निरञ्जनके पास जाना ।

चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥