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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

हनुमान्को पान २ सर्वांनन्द तिल घोटकर पिलाना

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देवताओंके प्रसन्न करनेको किया करता है। वे तो कुछ भी नहीं हैं, यदि उनमें कुछभी सामर्थ्य होती तो तुझको वे मेरे हाथसे छुडा लेते। (१) जो कर्मोंका फल देता है सो मैं हूँ, मेरे गुण संसारको पालनेवाले हैं। ब्रह्माके चारों मुँहसे यह तात्पर्य समझो कि, मेरे मुँह चारों ओर हैं। निदान तुझको चाहिये कि, किसी ओर ध्यान न कर सब मरनेवाले और मैं अमर हूँ, सबोंकी स्थिति दूसरोंके द्वारा है। मैं अपनेहीसे स्थिर हूँ, यज्ञका फलभी मैं हूँ, वह दूध जो यज्ञको शुद्ध करता है मैं हूँ। (२) वह अग्नि जो यज्ञके द्रव्योंको जलाती है मैं हूँ, समस्त संसारमें मैं हूँ, स्वसे पृथक् मैं हूँ, वर्नर जो सर्पस्वरूप है, पर्वतोंमें रहता है शौतान कहलाता है, नबको भयभीत करता तथा बहकाता है उसका मारनेवाला भी मैं ही हूँ। (३) तुझे उचित है कि, जैसा मेरे जाननेका धर्म है वैसा मुझे पहचान कि, मैं अद्वितीय और एक हूँ, मायाके कारण मेरी भिन्न भिन्न मूर्तियाँ दिखलाई देती हैं। (४) मैं निभंय हूँ, सबके हृदयमें बैठकर जो चाहता हूँ करता हूँ। (५) कोई मेरे यथार्थको नहीं जानता, मैं पृथ्वीमें हूँ आकाशमें हूँ और सबके प्रतिपालनका कारण हूँ, कर्म और यज्ञका करानेवाला मैं हूँ और सृष्टिको उत्पन्न करनेवाला मैं हूँ, समस्त सृष्टिका पिता मैं हूँ, जो ओसकी बूँदे गिरती हैं मैं हूँ, वेद तथा वेदका जानने वाला मैं हूँ। (६) वह अग्नि जो समुद्रमें है मैं हूँ, सूर्य जो बारहों मास यात्रा करता रहता है, वह और चन्द्र भी मैं हूँ। (७) जो कुछ देखने सुनने और बोलनेमें और ध्यान तथा सिद्धान्तमें आता है, अथवा इससे पृथक् है वो मैं हूँ, (८) मुझे अपने मनके गृहमें दूढे तो तू भी निभंय हो जावेगा मैं पाँच और दश और सहस्र प्रकारकी मूर्ति रखता हूँ, जो मुझे समझता है वो मुझसा होजाता है। (९) जो झूठ जानता है, झूठ बोलता है और पाप करता है वो यद्यपि वह सहस्र यज्ञ और जीवनपर्यन्त बंदना करे, अन्न जल शयन इत्यादि सभी त्याग दे, दान पुण्य भी करता रहे, तो भी वह मेरे समीप आने नहीं पाता है। (१०) मैं सबको खाता हूँ, मुझको कोई नहीं खा सकता है। (११) तूने जो बंदना किया और तात्पर्य मुझसे रक्खा, इस कारण मैं तुझको उठा लाया। अब जो मैं हूँ वही तू है। इसमें कोई संदेह न कर। पूर्वकालमें तू अज्ञानी था इस कारण मुझसे पृथक् था, अब तू ज्ञानी है और मुझसा होगया। समस्त संसारका रचयिता तथा पालन कर्ता मेरे गण हैं और भी कितनी ही जगह इन्द्रके ऐसे वाक्य आते हैं—‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस भावसे सत्यपुरुषको याद करता हुआही अपने कार्यमें रहता है।

बृहस्पति और शुक।

देवोंके गुरु बृहस्पति तथा असुरोंके गुरु शुक महाराज हैं। वाणीको

नानकशाहसे दूध मांगना

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बूहती कहते हैं । उसके स्वामीको बूहस्पति कहते हैं । इस तरह यह स्वसंवेदके प्रगट करनेवाले सत्य पुरुषका नाम होता है । देवोंको देवगुर स्वसंवेद सुनाते रहते हैं । इस कारण ये भी उसी नामसे बोले जाते हैं । वेद और पुराणोंमें इनके अनेक तरहके आख्यान मिलते हैं । ताराके विषयको लेकर ये विशेष प्रसिद्ध हैं । कहीं २ तारा इनकी स्त्री तथा कहीं उसी प्रकरणमें तारा करके ब्रह्म विद्याका स्मरण किया है । शुक्र तेजको कहते हैं । इससे परमात्माका ग्रहण होता है ये अपने तेज तपस्या तथा दिव्य बलसे दैत्योंको तेजस्वी बनाये रहते हैं । इस कारण ये शुक्र कहलाते हैं ये दोनों सत्यपुरुषके नामोंसे बोले जाते हैं, यदि इनके सूक्ष्म जीवन पर विचार किया जाय तो ये गुरुपनेकी दशामें भी सत्य सच्चिदानन्द सत्य पुरुषके अत्यन्त समीपी प्रतीत होते हैं ।

नारद ।

जहां सच्चिदानन्द भगवान्के अनन्य भक्तोंका प्रसंग आ उपस्थित होता है वहां नारदजीकी खड़ी चोटीकी मूर्ति आ उपस्थित होती है । वेद पुराण कोई भी इनसे बाकी नहीं है । सब जगह इनका कुछ न कुछ प्रकरण अवश्य मिलता है कहीं कहीं तो यह भी लिखा मिलता है कि, यह सत्य पुरुषका मनही है । ज्ञानेच्छुओंको ज्ञान, भक्तिके प्यासोंको भक्ति एवम् लड़ाईके प्यासोंको घोर समर, दिलाना इनका कार्य रहा है । भक्ति से सब साधनोंके उपदेश इन्होंने अपने शरीर पर घटाकर दिये हैं । यहां तक बता दिया कि, सब कुछ जीत कर भी जीतके अभिमानको जबतक नहीं जीता तब तक कुछ भी नहीं है । नारदके मोहके प्रकरण सब इसी बातके उदाहरण हैं । ये सत्य पुरुषके समीपी तथा स्वसंवेदके प्राकट्य करनेवालोंमें एक हैं । शब्दोंसे भगवान्को रिझाने और स्मरण करने का कार्य उन्होंने प्रारंभ हुआ है । नारदीय शिक्षा तथा स्मृति एवम् भक्तिसूत्र आदि इन्होंने बनाए हुए भक्तिपथके परिचायक हैं । कबीरदासजीने भी इन्हें सिद्ध सुरुषोंमें मानकर स्मरण किया है ।

सन्तो मते मात जनरंगी ।

पीवत प्याला प्रेम सुधारस, मतवारे सतसंगी ॥ १ ॥

अर्ध ऊर्ध्व लै भाठी रोपी, ब्रह्म अगिनि उदगारी ।

मून्दे मदन कर्म कटि कसयल, सन्तत चूवे अभारी ॥ २ ॥

सच्चिदानन्द रामके सच्चे उपासक जिनके गुरु हैं ऐसे अथवा सुरति कमलपर बैठकर जो रकार बीजका उच्चारण करते हैं उन सिद्ध पुरुषोंके मुखसे वहाँ सुननेवाले पूरेरंगे पुरुष सन्त पुरुषोंके सिद्धान्तोंमें मस्त रहते हैं । क्योंकि,

गोरख कबीर

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सतसंगी पुरुष रामचन्द्रजीकी प्रेमलक्षणा पराभक्तिरूप अमृतके प्यालेको पीते हैं और उसीके नशामें संसारको भूले हुए ध्येयके रूपमें निर्विकल्प रहते आते हैं। और प्रेम मदिरा कैसे तैयार की जाती है ! इस पर कबीर साहिब कहते हैं कि जैसे शराब खीचनेके लिये ऊपर नीचे दो हुन्डे नीचे ऊपर रखकर नली लगाकर खींच लेते हैं, इसी तरह प्रेम मदिरा खींचनेके लिये, ऊपर और नीचेके लोकोंके सारासारका विवेक कि, इनमें सार क्या तथा असार क्या है ! इसे लेकर भाठी-भट्ठी यानी लौरूपी भाठी रोप दी और ब्रह्मके स्वरूपके ध्यानरूपी अग्नि जला दी। मदन-महुआ और कामको कहते हैं जैसे-उन दोनोंमें महुआ भरा जाता है, उसी तरह कामका निरोध करनेपर कर्मरूपी मैलके निकलजाने पर सामनेही बुद्धिरूपपात्रमें निरन्तर चुबाने लगी।

गोरख दत्त वशिष्ठ व्यास कवि, नारद शुक् मुनि जोरी।

सभा बैठि शंभू सनकादिक, तहाँ फिरि अधर कटोरी ॥ ३ ॥

अम्बरीष औ याज्ञ जनक जड़, शेष सहस मुख पाना।

कहलों गिनो अनन्तकोटि लै, अमहल महल देवाना ॥ ४ ॥

इस प्रेम मंदिराको गोरख योगी, दत्तात्रेय, वशिष्ठ, व्यासदेव, शुक्ताचार्य्य और शुक् मुनिने इकट्ठा किया। यानी ये सब प्रेमरूपा पराभक्तिके ही उपासक थे। एवम् वही इन्होंने पूर्वोक्त भट्ठीपर खींची थी। जिस सभामें शंभू और सनकादिक बैठते हैं वहाँ वो प्रेम मदिराकी भरी कटोरी अपर-फिरती रही यानी उसे ये हाथों हाथ पीगये इतना भी सीकीको अवकाश नहीं मिला कि, उसको जमीनपर टेक तो लेता। अथवा जो रस मन वाणीमें न आये पान करते ही सब छक जायें वो रस इन्होंने पिया। अम्बरीष, याज्ञवल्क्य और जडभरत इन्होंने उसे पिया तथा शेषनाग हजार मुखसे पीगये। उस प्रेम मदिराके पीने-वाले अनन्त कोटि हैं जो सत्य पुरुषके सत्यलोकमें भी प्रेममदिरा पीकर अप्राकृत महलोंमें दीवाने बने बैठे हैं। अथवा निर्गुण और सगुण दोनोंसे विलक्षण केवल भक्तोंके लिये ही सब कुछ बने हुए हैं। प्रेम मदिराके दीवाने भक्त उसी सच्चिदानन्दमें निमग्न रहते आते हैं।

ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते, माती शिवकी नारी।

सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन, अनहुँ न छूटि खुमारी ॥ ५ ॥

सुर नर मुनि जेते पीर ओलिया, जिनरे पिया तिनजाना।

कहें कबीर गूंगे को शक्कर, क्योंकरि करे बखाना ॥ ६ ॥

इस प्रेमरूपी मदिराको पीकर ध्रुव प्रह्लाद और विभीषण तथा पार्वती

कमालीका ज्ञान

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मतवाले हो गये । इस पराभक्तिरूपा प्रेम मदिराका नशा यहाँतक बड़ा कि, गोपियोंकी पी हुई प्रेममदिराके वश हो संगुण ब्रह्म भगवान् कृष्ण दीवानी गोपियोंके पीछे आप भी दीवाने बन कर छः मासकी रात की । उसका नशा अब भी नहीं गया है । वृन्दावनकी रास कुंजमें अब भी गोपियोंके साथ नाचना पड़ता है तथा वहाँ सामगानके साथ अपने स्वरूपको याद करते कराते रहते हैं । सुर नर मुनि पीर और ओलिया जिन्होंने पिया है उनको पता है क्योंकि, वो आनन्द-वाणीसे तो कहाही नहीं जाता । इसी कारण कबीरदासजी कहते हैं कि, गूंगा यदि सक्कर खाले तो वो उसका स्वाद कैसे बता सकता है कि, ऐसा स्वाद है । इन इन्द्रियोंमें वो बल नहीं जो उस आनन्दका अनुभव भी बखान कर सकें । ये हैं कबीर साहिबके अक्षर कि, वे गोरखनाथ, दत्तात्रेय, वशिष्ठ, व्यासदेव, शुक्राचार्य, नारद, शुक्रदेव, शिव, सनकादिक, अम्बरीष, याज्ञवल्क्य, जनक, जड़भरत, शेष, ध्रुव, प्रह्लाद, विभीषण, पार्वती और गोपियाँ ये सब सब सच्चिदानन्द सत्य पुरुषके परम भक्त हुए हैं । यहाँतक कि, कबीर साहिब भी इनका प्रेमके साथ स्मरण करते हैं इन्हें उस स्वादका लेनेवाला बताते हैं जो कि, वाणीसे न कहा जा सके । कबीरके प्रकाशमें ये भी स्मार्य रूपसे आगये हैं अतः इनकी भक्तिसे सनी जीवनीकाही उल्लेख होना चाहिये जैसी कि, इनमें कबीर साहिबकी श्रद्धा है ।

वसिष्ठजी ।

जिनका स्मरण कबीर साहिबने श्रद्धाके साथ किया है उनमें वसिष्ठजी भी आ गये हैं । आपने परा भक्तिरूप प्रेममदिरामें मस्त होकर ही केवल रामके दर्शनोंके लिये ही पौरोंहित्य स्वीकार किया था । आपका लिखा योगवासिष्ठ, मुक्तिपथका अपूर्व प्रदर्शक है । जीवनमुक्तिकी शिक्षा देनेके लिये तो वो सूर्यसे भी बढ़कर है । इनमें नामकी उपासनामें भी वो बल है कि, भगवान् राम उसके अहंग्रहके उपासकको भी अपना गुरु मानने लग जाते हैं । अभी कुछ दिन हुए अयोध्याके वसिष्ठजीके चरणामृतके मिले बिना सत्य पुरुष रोने लग जाया करते थे । जिस दिन तकलीफ होती थी तो सीताजी भी आकर कहती थीं कि, बाबा ! आज मेरा कलेवा नहीं रखा गया, यह है वसिष्ठजीका माहात्म्य । आज इस कराल कलिकालमें भी अपने को वसिष्ठ माननेवालोंको सीताजी बाबा कहके अभिवादन करती हैं । इनकी अनेकों कथाएँ पुराणोंमें लिखी हुई हैं । यदि समन्वयके साथ विचारी जायें तो आनन्दका सामान मिलेगा किन्तु जिसकी आखोंमें बही छाई हुई हैं उनका तो कहनाही क्या है ?

आमीनका ज्ञान

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गौतम ऋषि ।

आपभी ज्ञानके अगाध भण्डार वेदके मंत्रोंके द्रष्टा हैं। अनेकों ऐसे शास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, जिनसे मनुष्योंका कल्याण हो। अहल्या आपकी ही पत्नी थी, जिसे कि, भगवान् रामने पत्थरसे मनुष्य कर दिया था। आपके बहुतसे कार्य आपकी प्रसिद्धिके हैं पर यह काम सबसे अधिक है कि, आपकी भक्तिके वश ही भगवान् रामने आपकी शिला बन कर पड़ी हुई स्त्रीमें चरण लगाकर उसे फिर अहल्याही बना दिया। आपकी भक्तिकी कथा सदा भूमण्डलको पवित्र करती रहेगी।

कपिल मुनि ।

ये सांख्यशास्त्रके आदि प्रवर्तक हैं। आपने अज्ञानी पुरुषोंको आत्मतत्त्व बतानेके लिये कर्दमऋषिसे देवहूतिमें अवतार लिया था। इन्होंने तत्त्वोंका निर्णय माताको सुनाया था कि, संसारका कल्याण हो। इनका पूरा उपदेश श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें मिलता है। ये जीव ईश्वर और प्रकृति इन तीन पदार्थोंको मानते हैं। सांख्यशास्त्रका कपिलसूत्र इन्हींका बनाया हुआ है। सांख्य-कारिकाके निर्माता ईश्वर कृष्णपर आके इनके शास्त्रके दो भेद हो गये। यानी उसके इनके शास्त्रको निरीश्वरवादपर लगाया, केवल मुक्त पुरुषोंकोही ईश्वर माना। यह एक सत्य पुरुषका अवतार है जो लोगोंकी ज्ञान पिपासाको शान्त एवं सफलभूत करनेके लिये आपका अवतार हुआ था। आप ज्ञानियोंकी अवस्था दिखानेके लिये सदा योग समाधिमें ही रहे आते हैं।

दत्तात्रेय ।

ये भी प्रेम मदिराके दीवानोंमें गिने गये हैं। ये अत्रिमुनिके पुत्र तथा दुर्वासाके भाई ये अत्रिमुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सौवर्षतक कुलाद्रि पर पवनाहारी होकर एक पैरसे खड़े होकर तप करते रहे। जब इनके तपसे तीनों लोक विचलित हो उठे उस समय तीनों देव ऋषिजी महाराज के पास आ उपस्थित हुए। अत्रिने वर माँग लिया कि, आप मेरे घर जन्म लें तथा तीनों देवोंने भी इस बातको स्वीकार कर लिया। पीछे विष्णुके अंशसे दत्तात्रेय, शिवके अंशसे दुर्वास तथा ब्रह्माके अंशसे सोमकी उत्पत्ति हुई। ये परमहंसपथक प्रवर्तक थे। भगवानके भरोसे रहा करते थे लोगोंको दिखाते थे कि, प्रेम मदिराके दीवाने कैसे रहा करते हैं। एक बार ये सहस्रमुता कावेरीके किनारेके सानुपर पड़े हुए प्रह्लादको मिले। उस समय इन्हे कोई नहीं जान सकता था। कौनसे भी वर्ण आश्रम, आकृति और चिह्नोंसे नहीं पहिचान सकता था। प्रह्लादन चरणोंमें पड़कर पूछा कि, आप उद्यम तो कुछ भी नहीं करते परन्तु शरीर इतना

कबीर साहिबकी शिक्षा

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मोटा है जैसे कि, भोगी धनियोंका हो, क्योंकि, बिना भोगके शरीर इतना मोटा कैसे रह सकता है ? आप तो शरीरके लिये भी कोई उद्योग नहीं करते । प्रह्लादजीके बचन सुनकर दत्तात्रेयजीने उत्तर दिया कि, भगवानकी कृपासे अनेक जन्मोंके पीछे मोक्षका द्वार यह मनुष्य देह मिला है । सुख पानके लिये घर गृहस्थ किया करते हैं परन्तु सुखकी जगह दुख देखकर यहाँ एकान्तमें आ बैठे हैं । आत्मप्रकाशका घातक तथा अवास्तविक समझ भोग तथा उद्यमका त्याग करके प्रारब्धपरही सन्तोष कर लेता हैं । सदा स्वरूपमें स्थिर रहकर सबको भुलाये रहता हैं । मुझे मौहरकी मखली और अजगरकी चव्या उत्तम लगी । उसी तरह उस प्रेम मदिरासे परितृप्त हुआ सदा यहीं रहा करता हैं । इसके सिवा और भी लोकोपकारिणी बात हुई जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य उत्तम लोकोंको पा सकता है । वे सब पुराण ग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखी हुई हैं । प्रेम मदिराके दीवानोंका प्रकरण लेकर यहाँ थोडासा लिख दिया है ।

सनत्कुमार

ये परम भागवतोंमें हैं । इन्होंने निर्द्वन्द्व रहनेके लिये सदा बाल्यावस्था ही स्वीकार की है, ये किसीभी लोकमें आ जा सकते हैं, इनकी गति कहीं भी रुकी हुई नहीं है । हैं ये छोटेसेकी तरह रहनेवालेपर इनका ज्ञान यहाँतक बढ़ा हुआ है कि, नारदजीको भी इन्होंने उपदेश देकर सत्य पुरुषकी भक्तिमें लगाया था । ये सदा उस सुखका अनुभव करते हैं जिसकी कि, एक मात्रामें सारा संसार तृप्त रहता है । इनके जीवनकी अनेकों घटनाएँ उपनिषद् और पुराणोंमें भरी पड़ी हैं । जिन्हें इच्छा हो वो उठाकर देखलें, ये भी परा भक्ति, रूपा प्रेम मदिराको कबीर साहिबके कथनानुसार निकालकर पिये हुए मस्त दीवाने हैं ।

भवतबालक ध्रुव ।

विष्णुपुराणमें ध्रुवजीका वृत्तान्त इस प्रकार लिखा है कि, ध्रुवजी राजा उत्तानपाद चक्रवर्तीके पुत्र थे । जब ध्रुवजीका वय पाँच वर्षका था उस समय अपने पिताके गोदमें सिंहासनपर जा बैठे । उस समय ध्रुवजीकी सौतेली माता राजाके निकट बैठी थी । उसने ध्रुवजीको एक ऐसा थप्पड़ मारा कि, आप पृथ्वीपर गिर पड़े और कहा कि, तू सिंहासनारूढ़ होने योग्य नहीं । यदि तेरे भाग्यमें राज्य अथवा सिंहासन होता तो तू मेरे गर्भसे उत्पन्न होता । तब ध्रुवजी रोते २ अपनी माताके समीप गए और अपनी माताके व्यवहारका विवरण किया । तब ध्रुवकी माताने अपने पुत्रको गोदमें ले लिया और मुख चूम तथा प्यार करके कहने लगी कि, ए पुत्र ! इस संसारमें तेरा कोई नहीं । एक प्यारे परमेश्वरके अतिरिक्त तेरा कौन हैं ? तू उसीकी भक्ति कर । तब माताकी शिक्षासे ध्रुवजी

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तपस्याके निमित्त बनको चले । राजा उत्तानपादने सुना कि, ध्रुव बनको जाता है, तब लोगोंको भेजा कि, ध्रुवको समझाओ, परन्तु ध्रुवने किसीका कहना न माना और बनको सिधारे, वहाँ उनको ऋषियोंका उपदेश मिला, एक अँगूठे पर अपने शरीरका समस्त बोझ देकर खड़ा हो गया । छः महीने पर्यन्त बराबर खड़ा रहा, सब अन्न जल छोड़ दिया, केवल वायुही उसका भोजन था । इस अवसरमें राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुआ कि, ध्रुव ऐसी कठिन तपस्या कर रहा है ? मेरा राज्य न छीनले । ध्रुवजीको अनेक प्रकारके त्रास दिखलाने लगा, जिससे तपस्या छोड़कर भाग जावे, परन्तु ध्रुवजी तनिक भी नहीं भयभीत हुए । व्याघ्र सर्प अग्नि और राक्षस इत्यादि पशु जो उन्हींने देखे सबमें विष्णुको जाना दूसरा कुछ न जाना, तब विष्णुकी कृपा हुई नील वर्ण घनश्याम चतुर्भुज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए, गरुडपर सवार हो ध्रुवजीके सामने आकर कहा कि, माँग क्या चाहता है ? ध्रुवजीने कहा कि, ए महाराज ! अटल पदकी श्रेणी दीजिये, जहाँसे मैं कभी न गिर्छूँ । विष्णुने आज्ञा देदी कि, अभी तो तू राज्य कर फिर शरीर छोड़कर अटल पद पावेगा । जबलें पृथ्वी तथा आकाश है तबलें तू अटल रहेगा । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादि सब तेरे चारों ओर फिरा करेंगे । फिर विष्णुने कहा कि और जो कुछ माँगेगा मैं तुझको दूंगा । तब ध्रुवने कहा कि, मुझे आत्मज्ञान प्रदान करो जिसके बलसे मैं यह जान सकूँकि, मैं क्या हूँ । तब विष्णुने कहा कि, ए ध्रुव ! यदि मैं तुझको इस प्रश्नका उत्तर देता हूँ तो मैं और अटल पद तीनों मिथ्या ठहरते हैं । इस कारण तुमको इस प्रश्नका उत्तर सन्त देवेंगे । इतना कहकर विष्णु तो चले गए । उसके उपरान्त तीन सन्त ध्रुवजीके समीप आए ; वामदेव, पराशर और दत्तजी । तब दत्तजीने कहा कि, ए ध्रुवजी ! तू अटल पदसे पृथक् है । तूने अटल पद क्यों माँग लिया ? ए मूर्ख ! तू सोच समझ कि, जब तू नहीं रहेगा तब अटल कहाँ रहेगा । आत्माको तो मृत्यु नहीं है । शरीर तो जैसे नवीन कपड़ा पहना और प्राचीन छोड़ दिया, इसी तरह है । तूने अपनेको अटल पदके बन्धनमें क्यों डाल दिया, जब उन श्रेष्ठपुरुषोंकी शिक्षासे ध्रुवको ज्ञान हुआ और अटल पदको मिथ्या जान लिया, तब पछताया । अटल पदके बखेड़ेसे मनको हटाकर सदा पराभक्तिमें लीन रहने लगा, इसकी दिव्यचर्या लोगोंको भक्तिका पाठ सिखानेवाली है । अब आप अटल पदपर विराजे हुए भी प्रेम मदिरामें मस्त रहा करते हैं । यहाँ तक कि, आपकी दीवानगीके गुण स्वयम् कबीर साहिबने भी गाये हैं ।

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भक्त प्रह्लाद ।

विष्णुपुराणमें लिखा है तथा कबीर साहबका भी कथन है कि, जब प्रह्लादजीका वय सात वर्षका हुवा तब प्रह्लादका पिता जो कि, हिरण्यकशिपु था । वह बड़ा वेदान्ती था और कहता था कि, मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ । दूसरा कौन है । सबसे अपनी पूजन करवाता था । प्रह्लाद उसका पुत्र बड़ा भक्त था । राम २ कहा करता था, कबीर साहबका वचन है कि, जब यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें था, तब नारदजीने उसकी माताके गर्भमें जाकर उसको रामनामकी दीक्षा दी थी । भक्ति सिखलायी थी ।

जिस समय यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें आया तब राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुवा । कारण यह कि, इन्द्रने पूर्वही सुन रक्खा था जो हिरण्यकशिपुका पुत्र उत्पन्न होगा वह इन्द्रासनपर बैठकर राज्य करेगा । इस भयसे राजा इन्द्रने यह युक्ति की कि, जब प्रह्लाद गर्भमें आया तब वह प्रह्लादकी माताको चुराकर निज लोकमें ले गया । चाहा कि, गर्भ गिराकर बच्चाका वध करें । तब नारदजीने इन्द्रको समझाकर कहा कि, तुम ऐसा कार्य कदापि न करना इस स्त्रीके गर्भसे भक्त उत्पन्न होगा, वह सब सुखोंका देनेवाला होगा । तब नारदजीके कहनेसे इन्द्रने मान लिया । वह स्त्री पुनः अपने गृहमें आई । उसके गर्भसे प्रह्लाद उत्पन्न हुआ । सातवर्षके वयमें पिताने प्रह्लादको पढ़नेके लिए बँठाया । तब आप कुछ न पढ़ते थे केवल राम राम कहा करते थे । स्वयम् तो प्रह्लाद राम राम कहतेही थे पर समस्त पाठशालाके लड़कोंको भी सिखला दिया जिससे पाठशालाके समस्त छात्र राम राम कहते हुए प्रेममें मग्न हो गए । सभीने पढ़ना छोड़ दिया, पढ़नेकी ओरसे ध्यान छोड़ दिया । पण्डित राजा हिरण्यकशिपुके समीप दोहाई देते हुए कहने लगे कि, ऐ राजा ? प्रह्लादने पाठशालाके समस्त बालकोंको बहका दिया । न स्वयं पढ़ता है और न दूसरोंको पढ़ने देता है समस्त बालक राम राम कहनेके आनन्दमें मग्न हो रहे हैं । यह बात सुनकर हिरण्यकशिपुने प्रह्लादको बुलाकर समझाया कि, ए पुत्र ! तू पढ़, कारण यह कि, तू ही मेरे सिंहासनपर आरूढ़ होनेवाला है । तब प्रह्लादजीने उत्तर दिया कि, ए पिता ! मैं न पढ़ूंगा, न राज्य करूँगा, मैं तो राम राम कहूँगा, किसी वस्तुकी मुझको इच्छा नहीं है । तब हिरण्यकशिपुको अत्यंत क्रोध आया और कहा कि, मैं शिव हूँ, मेरे अतिरिक्त और दूसरा कौन है, प्रह्लादने तो रामनामके प्रेमका प्याला पीलिया था । पिताकी बात कौन सुने, राम राम कहनेसे न हटते थे । इस कारण पिता तथा पुत्रमें महा विरोध उत्पन्न हुवा, हिरण्यकशिपुने

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प्रह्लादको दंड देना आरंभ किया। प्रह्लादको हिरण्यकशिपुने पर्वतपरसे नीचे डाल दिया, हाथी झँकाया, अग्निमें डाल दिया और और अनेक दंड दिए, परन्तु जब प्रह्लादको दंड देता था तब विष्णु प्रह्लादको सामने खड़े दिखाई दे समस्त कठिनाइयोंको रोक लिया करते थे। पर दूसरे किसीको दिखलाई नहीं देते थे। विष्णु प्रह्लादको इक्षित करते जाते थे कि, भयभीत न होना, सशंकित होनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं तेरा रखवाला तेरे सामने खड़ा हूँ। हिरण्यकशिपु प्रह्लादको स्तंभसे बाँधकर वधपर प्रस्तुत हुआ। तब स्तंभ फाड़कर वे नृसिंहजी निकल पड़े। हिरण्यकशिपुका वध किया, प्रह्लादको राज्य दिया। जब प्रह्लादजी-पर कठिनाई आन पडती, तब तो विष्णुका ध्यान करते और “विष्णु विष्णु” पुकारते और जब वह बाधा टलजाती तब वेदशास्त्रानुसार अपने स्वरूपका ध्यान करते। ऐसे विचारोंको देखकर विष्णुने प्रह्लादकी निष्ठा बढ़ानेके लिये कहा कि, ए प्रह्लाद ! कठिनाईके समय तो तू मुझे पुकारता है। जब बला टल जाती है तब तू अनुमान करता है कि, समस्त संसार मैं ही हूँ मैं ही हूँ समस्त संसार मेराही स्वरूप है। यदि समस्त संसारमें तूही तू है तो आपत्तिकालमें मुझको क्यों पुकारता है। तेरे चित्तकी दुविधा नहीं गई फिर विष्णुने प्रह्लादको सिंहासपर बैठा दिया तथा प्रह्लादके उत्तरको सुनकर परम प्रसन्न हुए। ये भी प्रेम मदिराके दीवाने हैं।

अम्बरीष ।

जब भक्तोंकी कथाएँ चलती हैं तो भक्तवर राजर्षि अम्बरीषकी जीवनी भी आखोंके सामने आ खड़ी होती है। ये परम भक्त थे सब कुछ होते हुए भी अपनेको भक्तोंके चरणकी धूलिही समझते थे। यद्यपि ये भक्त गोष्ठीसे तो छिपे हुए नहीं थे पर ऐसी घटना घटी कि, ये सर्व साधारणकी दृष्टिमें आगये। दुर्वासा ऋषि बड़े तपस्वी तथा अत्यंत क्रोधी थे। एक बार राजा अम्बरीषके गृह आप पधारे और वे राजा बड़े भक्त थेही और ठाकुर पूजा करतेही थे। राजाने ठाकुरका चरणामृत लिया तब दुर्वासाको अत्यंत क्रोध आया कि, विना मुझे भोजन कराए तूने चरणामृत क्यों लेलिया ? मैं तुझको शाप दूंगा। तब राजा हाथ बाँधकर खड़ा हो बोला कि, महाराज ! मेरा अपराध क्षमा करो। दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधमें थे। जब उन्होंने उसे मारनेके लिये कृत्या उत्पन्न की तो उस समय विष्णुका चक्र सुदर्शन दुर्वासाके ऊपर छूटा कि, भस्म करदो। तब दुर्वासा भागा। जहाँ जाते थे वहाँ चक्र सुदर्शन दुर्वासाके पीछे जाते। जब दुर्वासाने देखा कि, यह चक्र सुदर्शन मुझको न छोड़ेगा तब विष्णुके शरण गए कि,

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मुझको चक्र सुदर्शनसे बचाओ । तब विष्णुने कहा कि, ए दुर्वासा ! तुम राजा अम्बरीषके शरणमें जाओ । तुमने भक्तसे क्यों वैर किया तब दुर्वासा भागकर राजाके शरणमें आए, राजासे अपना अपराध क्षमा करवाया । राजाने चक्र सुदर्शनकी बड़ी स्तुति की । चक्र सुदर्शन शान्त हुवा । दुर्वासाके प्राण बचे । कबीर साहिबने इन्हें भी परा भक्तिरूपी प्रेम मंदिराका दीवाना मानकर अत्यन्त आदरके साथ स्मरण किया है ।

भगवान् शुक्देव ।

प्रेम मंदिराके दीवानोंमें व्यासपुत्र शुक्देवजीका नाम बड़े आदरके साथ लिया जाया करता है । ऋषियोंमें वामदेव और शुक् सत्यलोकवासी संभाले जाते हैं । देवीभागवतमें इन्हें अयोनिज तथा अरणिसे उत्पन्न हुआ कहा है । ये किस तरह प्रकट हुए इस प्रकरणपर विचार किया जाता है । जब व्यासजी सरस्वती नदीके किनारे गए देखो देवीभागवत १-स्कंध, ४-अध्यायमें इस प्रकार लिखा है कि, इस नदीके तटपर बैठकर तपस्या करने लगे उस समय आपके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं थी । इस नदीतटपर गुलबंग नामक एक पक्षी रहता था, इस गुलबंगकी स्त्री गर्भिणी थी, अल्पकालके उपरान्त उसको बच्चा उत्पन्न हुवा । बच्चा जन्मनेसे गुलबंग अतिहर्षित हुवा, बारम्बार बच्चेको चाटने और प्यार करने लगा । इस पक्षीको देखकर व्यासजीके मनमें यह कामना उत्पन्न हुई कि, यदि मेरा पुत्र भी उत्पन्न होता तो कैसा अच्छा होता, कारण, यह कि, बिना पुत्रके गति नहीं । इस समय व्यासजीके बुढ़ापेका समय था, समस्त पुराण और वेद महाभारतादि बनाचुके थे । तब इस नदीतटपर पुत्रकामनासे तपस्या करने लगे । तब समस्त देवतागण प्रसन्न हो, व्यासजीके सामने आए । तब नारदजीने व्याससे कहा कि ए व्यास ! सब देवता भगवतीके पूजनसे अपने मनोरथको पहुँचते हैं इस कारण तुम देवीका पूजन करो । तब नारदके उपदेशानुसार वे भगवतीकी वंदनामें लगे ।

फिर देखो दशवें अध्यायमें लिखा है कि, व्यासजीने पर्वतकी चोटीपर जाकर समाधि लगादी । जब आधी तपस्या होचुकी तब राजा इन्द्रको भय उत्पन्न हुवा कि, व्यास जो कठिन तपस्या कर रहा है कहीं मेरा सिंहासन नछीनले, और शिवजीसे जाकर कहा तब शिवजीने समझाया कि, तुम भय न करो । व्यासजी बरदान लेकर अपने स्थानपर आये वहाँ अग्निहोत्रके लिये अरणि मथन करते सोचने लगे कि जैसे नीचेकी अरणिसे मन्थाके संयोगसे मथनेसे अग्नि प्रकट हो जाता है, इसी तरह मुझे भी पुत्र मिलजाय । इसके साथही गृहस्थाश्रम

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को तुच्छसमझनेवाली ज्ञानधारा भी बहती जाती थी। इतनेहीमें बहो घृताची नामकी अप्सरा आ उपस्थित हुई पर उसे उन्होंने अपने लिये उचित न समझा अतः उसके शरीरको न छुआ तथा न मुग्धदृष्टिसे देखाही ऋषिकी स्थिर वृत्तिसे तपस्वियोंके ठगनेवाली वो लचीली अप्सरा तोती बनकर उड़ती बनी। अरणीके प्रति जो अग्नि जैसे पुत्रकी भावना हुई थी वो इतनी प्रबल हो उठी कि, उन्हें इसका भान भी न हुआ उनका तेज अरणिमें प्रविष्ट हो गया, मथते मथते व्यास जैसी आकृतिके शुक्रदेव उसीसे प्रकट हो गये। भगवान् व्यास देवके इन्हें गृहस्थके उपदेश देनेपर इन्होंने पितासे कह दिया कि, मैं गृहस्थ न होऊँगा न कर्मकाण्ड ही पढ़ूँगा। मुझे योग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, तथा और भी प्रारब्धके भंजक शास्त्रोंको पढ़ाइये, दूसरे विषयोंको मैं कदापि न पढ़ूँगा। पुत्रके ऐसे भावोंको देखकर व्यासदेवजीने उन्हें बेही शास्त्र पढ़ाये तथा परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवत भी पढ़ा दी। अन्तमें जीवन्मुक्तिका उपदेश लेनेके लिये जनकजीके पास भेजा कि, बहो इनकी रही सही कमी पूरी हो जाय। ये गृहस्थचव्यसि नितान्त उदासीन थे। राजा जनकके समझानेपर जीवन्मुक्तोंकी तरह गृहस्थों में रहे। पीछे सबका त्याग करके संन्यासी हो गये। पीछे महाराज परिक्षित् को उपदेश देनेके लिये हस्तिनापुर पधारे थे। बहोसे आपने परीक्षित्को मुक्त करनेके लिये भागवत सुनाई थी। आपके तेजके सामने सबका तेज फीका पड़ जाया करता था। कबीर साहिबने इन्हें अधर कटोरीक दीवानोंमें याद किया है कि, ये अब भी पराभक्तिरूपी प्रेम मदिराको पीकर दीवाने बने फिर रहे हैं।

भगवान् व्यास।

संसारमें ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जो भगवान् व्यासदेवको न जानता हो। चाहे कोई हिन्दू हो वा अहिन्दू सबको इसीका अध्यात्मप्रकाश मिल रहा है। इसीके बनाये ब्रह्मसूत्रके भाष्योंका निर्माण करके आज आचार्य कहलाये जा रहे हैं। शुक्र जैसे पुत्र पानेका सौभाग्य आपको ही मिला था।

उनके अवतार।

सूतजी कहते हैं कि, सातवें मन्वन्तरमें और अट्ठाईसवें युगमें जो मनु उत्पन्न हुवा वह व्यास था और उन्नीसवें युगमें द्रोणी नामक व्यास उत्पन्न होगा और सातवें युगमें अनन्त नामक व्यास होंगे। यह बात सुनकर शौनकजीने सूतजीसे पूछा कि, ए महाराज! व्यासजीके अवतारोंका विवरण सविस्तार रूपसे कहो कि, किस २ युगमें कौन २ अवतार हुए? तब सूतजीने कहा कि, पहले द्वापरमें (१) स्वयम् वेद नामक व्यास जिसको स्वयम्भू कहते हैं

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उत्पन्न हुए । (२) दूसरे द्वापरमें प्रजापति नाम हुआ । (३) कृष्ण (४) बृहस्पति (५) सिवता (६) सविता (६) भूत (७) मध्वा (८) वसिष्ठ (९) सारस्वत (१०) धाता (११) भारद्वाज (१२) तृवृष (१३) अन्तर्यक्ष (१४) धर्म (१५) त्रिपुरारणी (१६) धनञ्जय (१७) मेधातिथि (१८) व्रती (१९) अत्रि (२०) गौतम (२१) उत्तम (२२) बाजश्रवा (२३) त्रोतलवेदव्यास (२४) भार्गव (२५) आग्नेय (२६) मुक्ति (२७) महामति (२८) कृष्णद्वैपायन व्यास ।

ये सब वेदव्यास जीवन्मुक्त हैं । पहले भी जीवन्मुक्त थे अब भी जीवन्मुक्त हैं और भविष्यमें जब उत्पन्न होंगे, तब भी श्रद्धेय जीवन्मुक्तिके पदको प्राप्त प्राप्त होंगे । कबीर साहबने इन्हें अपने प्रेम मदिराके दीवानोंमें मानकर वही श्रद्धा प्रकट की है ।

जैनके तीर्थंकर ।

ऐसेही जैनके चौबीस समस्त तीर्थंकर हैं, पहले तीर्थंकर ऋषभनाथजी थे, इनका विवरण देखनेसे जान पड़ेगा । कबीर साहबका कथन है कि वनमें आग लगी निर्मही आप जल मरे । येही परमहंसचर्याके प्रवर्तक हैं । जबलों ये तीर्थंकर जीवित रहते हैं तबही आपके दिव्य ज्ञानका निर्णय हो जाता है । जैसे वेदधर्मके केवल ज्ञानियोंकी दशा है वैसेहीवही जैनधर्मके केवल ज्ञानियोंका विवरण है । तनिक भी विभिन्नता नहीं । ये केवल ज्ञानी चाहें जीवन्मुक्त है, नाम मात्रके निमित्त है प्रारब्धसे करते रहते हैं । केवल ज्ञानी कहलाते हैं । यथार्थमें हैं भी । अन्तके तीर्थंकर महावीर हैं महावीरनाथका यह विवरण है कि, कशाला नामक एक मनुष्यके शापसे आपको छः मासपर्यन्त बराबर रक्त पड़ता रहा, बड़ा कष्ट पाया, पर उन्हें कुछ भी पता न चला क्योंकि शरीर-राध्यास नहीं था और व्यवहारसूत्रके चूलकामें लिखा है कि, पाँचवें कालमें मुक्ति नहीं । दूसरे उत्तरार्धसूत्रमें भी यही लिखा है कि, पाँचवें कालमें किसी मनुष्यकी मुक्ति नहीं होगी । इनके उपदेशकी शैली मनोहर है ।

चौबीस तीर्थंकरसे लेकर जितने तिरसठ शलाका पुरुष हैं सबके वृत्तान्तकी जाँच करनेसे समस्त विवरण भली प्रकार मालूम हो जावेगा कि, प्रत्येक संप्रदायके विशिष्ट पुरुषमें कुछ सार अवश्यही होता है । मुक्तिका विचार करते २ एक जगह आपने कह डाला है कि, मुक्तिपथमें किसी संप्रदायका नियम नहीं हैं कि, इसके मुक्त हों इसके न हों किन्तु, यही नियम है कि, चाहें कोई हो “सम-

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भावभावितात्मा लभते मोक्षं न सन्देहः” हृदयमें पूरी समता हो, सब बातोंमें समता समाई हुई हो, मोक्ष मिल जायेगा।

योगी गोरखनाथ।

गोरखनाथजी बड़े योगी हुए। समस्त योगियोंमें शैव गोरखनाथकी श्रेष्ठता है। गोरखनाथने चौरासी कल्प करके अपने शरीरको वज्र कर लिया। जैसे शिव वैसेही गोरखनाथको जानना चाहिए। इनका कबीरसाहबसे वाद विवाद हुवा था वह वृत्तान्त पढ़नेसे समस्त ए सब विवरण जाना जावेगा। योगक्रियाका जिनको अभिमान हो समझते हैं कि, योगक्रिया द्वाराही हमारी मुक्ति होगी, वो उनकी मूर्खता जानली जावेगी कि, योगक्रियामें केवल इतनाही बल है कि, समाधिमें ही मिला देवे। इससे विशेष नहीं। इस कारण योगभी व्यर्थ है। यद्यपि समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, सो समस्त सिद्धियाँ अस्थायी तथा जलपरके फूल बूँटे हैं।

भगवाग बुद्ध।

मगध देशका राजा सिद्धोदन था उनकी रानीका नाम माया था। रानीको गर्भ रहा उससे बौद्ध उत्पन्न हुवा। उस बौद्धका नाम शाक्यमुनि रक्खा गया। वह उत्पन्न होनेके समय गर्भके बाहर निकल नहीं सका। माता मर गई तथा पेट फाड़कर बालक निकाला गया ऐसी किंवदन्ती है। जब वह बालक गर्भके बाहर निकला उसी समय खड़ा हो गया। पृथ्वीपर सात पग चला पुकारकर बोला कि, पृथ्वी तथा आकाशके बीचमें मेरे समान पूजनीय अन्य कोई देवता नहीं है। जब इस बालकका वय सत्रह वर्षका हुवा तो उसके तीन विवाह हुए। एक पुत्र उत्पन्न हुवा। इस शाक्यमुनिको सांसारिक धन तथा राजपाटकी कामना नहीं थी, यह उन्नीस वर्षके वयमें तपस्या करनेके निमित्त चला गया, बारहवर्षके उपरान्त परमेश्वरके दर्शन पाकर अपना धर्म, वेद यानी पूर्व भीमांसा (कें) विरुद्ध प्रचलित किया, बड़ी धूमधामसे यह धर्म प्रचलित हुवा। उसने हिंसाकी बड़ी निन्दा की। जैन तथा बौद्ध यह दोनों हिंसाके विरुद्ध हैं। जब इस धर्मकी प्रबलता हुई तो तब हिंसा दब गयी। यह बौद्ध विष्णुका अवतार कहलाता है। ये भी सत्य पुरुषका एक बड़ा अवतार है। इस धर्मके लोग अर्थात् बौद्ध कहते हैं कि, हमारा गुरु अर्थात् शाक्यमुनि आठसहस्र बेर उत्पन्न हुवा मरा, फिर भी अमर है कभी नहीं मरता, केवल आपका चोला बदलता जाता है। अब इस धर्मके लोग भारत वर्षमें नहीं हैं। परन्तु सब धर्मोंसे

ऋषीश्वरोंके वचन

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इसका आधिक्य विशेष है । ब्रह्मा और चीन इत्यादि देशोंमें भरे हैं । योगी तथा संन्यासियोंके समान समाधि लगाते हैं । और बंदनामें डूब जाते हैं ।

शङ्कराचार्यजीका वृत्तान्त ।

शंकराचार्यजी ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुए । लड़कपनहीसे आपमें बड़प्पन तथा श्रेष्ठताके चिह्न प्रगट थे । पढ लिखकर आप अच्छे पण्डित हुए योग साधन भी किया और अपने योग तथा विद्याबलसे प्रत्येक स्थानपर जाकर विजयी हुए । समासधर्म चलाया, वेदधर्मका भली भाँति प्रचार कराया । जैन तथा बौद्ध दोनोंके अप धर्मोंके भलीप्रकार पददलित किया । वेदधर्म तथा संन्यासी ब्राह्मणोंकी मर्यादा बढ़ाई । राजा अमिरुके मृतशरीरमें अपने योगबलसे घुसकर योगसिद्धि दिखाते हुए कोकशास्त्र पढा, कोकशास्त्रके पण्डित होकर मण्डनमिश्रकी स्त्रीको परास्त किया । उसके साथ बहुत विवाद हुवा । तब मण्डन और उसकी स्त्री दोनों शंकराचार्यके सेवक बन गए । बदरीनाथकी मूर्तिको गङ्गाभेंसे बहिर्गत करके स्थापित कर दिया । मूर्तिपूजाको प्रचलित किया । वेदान्तशास्त्रको भी उज्ज्वल किया । जैसे दत्तजीने वेदान्त, सिखलाया और फिर शिवलिङ्गकी पूजाका प्रचार किया, वही कार्य शंकराचार्यजीने भी प्रचलित रक्खा कि, मूर्ति-पूजा भी होती और 'एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति' भी कहते । जिसका मन चाहे वह 'एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति' कहा करे । ये बात उसकी इच्छापर रही । ये लोग विष्णु तथा शिव दोनोंको एक स्वरूप समझकर पूजते हैं । कुछ भी विभिन्नता नहीं जानते । यह शंकराचार्य शिवजीका अवतार है । वेदधर्मके स्थिर करनेके निमित्त हुवा है ।

रामानुजस्वामीका वृत्तान्त ।

रामानुजस्वामी शेषजी के अवतार थे । विष्णुकी आज्ञासे शेषजी अवतार लिया । केशव यज्वा ब्राह्मणके गृह जन्म लेकर वैष्णव धर्म पृथ्वीपर चलाया । वेदधर्म तथा ठाकुरपूजनका भली भाँति प्रचार किया । बडी धूम धामसे आपका धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुवा । भक्तमालमें आपका वृत्तान्त बहुत कुछ लिखा है । इस धर्मके लोग बहुत बचाव रखते हैं । यहाँ लो कि, अपने हाथकी पकाई हुई रोटी खाते हैं । ऐसा कि, किसी दूसरे अयोग्य मनुष्यकी परछाई पर्यन्त पड़ने न पावे । परदेके भीतर रोटी पकाते और खाते हैं । ये लोग शिवको ईश्वर नहीं मानते विष्णुकी मूर्तिका पूजन किया करते हैं । ये और रामानुजस्वामीकी श्रेष्ठता संसारमें प्रगट है । आपके लाखों शिष्य भारतमें हैं । कबीर साहिबभी इसी परंपरामें आजाते हैं ।

शिवतन्त्रका प्रमाण ७ अ० विष्णुभगवान्

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रामानन्द स्वामी ।

रामानुजस्वामीके सम्प्रदायमें रामानन्दस्वामी कबीर साहबके भी गुरु उत्पन्न हुए । रामानन्दस्वामी काशीधाममें रहा करते थे । रुणावस्थामें उनके आचार्यमें कुछ भेद पड़ गया था । फिर जब आप दक्षिणके आचार्योंमें गए तब उन लोगोंने आपको अपने समूहसे पृथक् कर दिया । तब रामानन्दजीने अपने गुरु राघवानन्दसे पूछा कि, अब क्या करूँ ? तब राघवानन्दने कहा कि, तुम आचार्योंसे पृथक् हो जाओ । तुम्हारी एक न्यारी सम्प्रदाय चलेगी । इस दिवससे रामानुज और रामानन्दके लोग पृथक् हुए । रामानुज और रामानन्दकी सम्प्रदाय पृथक् हुई । रामानुज सम्प्रदायके आचार्यकी कड़ाई रामानन्दके सम्प्रदायमें नहीं । इस सम्प्रदायमें प्रत्येक जातिका मनुष्य सरलतापूर्वक मिल जाता है । रामानुजके सम्प्रदायमें जातिका विशेष ध्यान रहता है । इन दोनों सम्प्रदायोंके लोग एकही हैं तथापि उनकी रीति भौति पृथक् पृथक् हैं ।

तीन सम्प्रदाय ।

इन सम्प्रदायोंके रीतिव्यवहारमें तनिक विभिन्नता है । एक दूसरे से अपनी रीति भौतिको श्रेष्ठ जानते हैं । विष्णुश्याम माधवाचार्य निम्बार्क रामानुजके लोगोंके सदृश ये सब ठाकुरपूजा करते हैं । इन चारों सम्प्रदायोंके मनुष्य, कुछ २ पृथक् २ ध्यान रखते हैं । सब रामकृष्णकी मूर्तिपूजते हैं । कोई भीतरी पूजा करता है चार प्रकारकी मुक्तिके अभिलाषी हैं । इसका समस्त विवरण ग्रंथ कबीरभानुप्रकाशमें सविस्तार लिखा गया है । इन चारों साम्प्रदायोंकी चाल पूर्णतया सतोगुणी हैं । सतोगुणी चाल और ढङ्ग मुक्तिमार्ग दिखलानेवाले हैं । जबलें मनुष्य सतोगुणकी चलन स्वीकार न करे तबलें उचित स्थानपर्यन्त पहुँच नहीं सकता । इसी कारण कबीर साहबने समस्त धर्मोंपर इस धर्मको श्रेष्ठ समझा है ।

अध्याय ९ ।

पश्चिमके महापुरुष ।

यद्यपि कबीर मन्शूर में उन्हीं पुरुषोंके प्रसंग आने उचित थे जो कि, कबीरसाहिबकी दिव्य वाणीसे सम्बन्धित हैं, पर पश्चिम देशके महात्माओंका जीवन केवल इसीलिये यहाँ रखा गया है कि, कबीर दर्शनके प्रेमियोंको पश्चिमके महात्मा पुरुषोंके जीवनका भी पता चल जाय कि, पश्चिमके निवासी इन

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व्यक्तियोंमें विशेष भाव रखते हैं। तथा इनमेंसे बहुतोंका प्रकरण उनकी वाणीमें आ भी गया है यह भी एक कारण इस प्रसंगके यहाँ रखनेका है।

हजरत आदम तथा नूह महात्मा ।

हजरत आदम तथा नूह दोनों श्रेष्ठ महात्मा हुए। आपकी बातें परमेश्वरके साथ हुवा करती थीं। विष्णु प्रत्यक्षमें आपको दर्शन दिया करते तथा आपसे वार्तालाप किया करते थे। कबीर साहबने कहा कि, आदम ब्रह्माका अवतार है। आदमके बाद हजरत नूह आदमके समान हुए। जिससे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति तथा स्थिति है। सांसारिक वासनाओंमें फँसे हुए तथा पूरे और पक्के दुनियाँदार थे।

हजरत इबराहीम और इसहाक आदि।

हजरत नूहके उपरान्त इबराहीम बड़ा धार्मिक हुवा, एक परमेश्वरके माननेमें बड़ा सच्चा था। परमेश्वरपर भरोसा रक्खा करता था। ये पश्चिमीय देशोंके भविष्यवक्ता गण प्रायः गृहस्थ थे। स्वच्छ हृदय तथा भले थे अपने आन्तरिक प्रकाशसे बहुतसी बातोंको जान लेते थे। हजरत इबराहीमके साथ परमेश्वर बातें किया करता था बरन् आपके शिष्टाचारको भी ग्रहण किया करता था। इबराहीमका पुत्र इसहाक भी ऐसाही अपने पिता इबराहीमके सदृश भला आदमी एवं ईश्वरपूजक था, दोनोंके गुण तौरीतमें देखो।

इसहाकका पुत्र याकूब अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराता था। स्त्रीके निमित्त उसने चौदह वर्षपर्यन्त अपने श्वशुरकी सेवा की।

याकूबका दूसरा नाम इसराईल हुवा। परमेश्वरने उसको आशीर्वाद दिया, उसके बारह पुत्र हुए, वही यहूदियोंके बारह सरदार कहलाते हैं। ये सब गृहस्थ और सांसारिक वासनाओंमें सने हुए हैं।

इसराईलकी परिश्रम सेवा पर परमेश्वरने दया की कि, उसके बारह पुत्र, बरन् कनआनके सम्भ्राद् हो गए।

हजरत दाऊन और सुलेमान।

हजरत दाऊन बादशाह और नबी था। परमेश्वरके प्रेममें गाता नाचता और रोता था। उसने बादशाहीमें बहुत रक्तपात और काटकुटकिया। दाऊदके गानेमें बड़ा प्रभाव था, जैसा कि मने इतः पूर्व दिखलाया है। दाऊदका पुत्र सुलेमान बादशाह हुवा। इन दोनों महाशयोंकी परमेश्वरसे आपसमें वार्तालाप हुवा करती थी। सुलेमान बादशाहको परमेश्वरने तीनों पदार्थ प्रदान किये। अर्थात् बुद्धिमानी, अनागतवक्तृता और बादशाही। इन दोनों महाशयोंका वृत्तान्त पुराने अहदनामा और मुसलमानी हदीसोंमें देखो।

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दाऊद बादशाहकी निन्यानवें स्त्रियाँ थीं। परन्तु उरियाह अपने भृत्यकी स्त्रीको अपने कार्यमें लानेके कारण वह विशेषतः बंधनमें पड़ा। परमेश्वर उससे रुष्ट हो गया। परन्तु उसके रोने धोनेके कारण परमेश्वर उसपर दयालु हो गया।

दाऊदका पुत्र मुलेमान जब सिंहासनारूढ़ हुवा तब उसने आनन्द सम्भोगके अनेक आयोजन किये, उसकी जो सातसौ स्त्रियाँ और तीन सौ वेश्याएँ थीं, उन सबने मिलकर मुलेमानकी बुद्धि भ्रष्ट कर दीं। मूर्तिपूजा करवाई। ये दोनों महाशय सांसारिक शारीरिक विकारोंके वशीभूत हुए इस लोकसे विदा हुए।

हजरत मूसा।

हजरत मूसा का जन्म मिश्रदेशमें हुआ। इबराहीमके घरानेमें मूसा श्रेष्ठ नबी (भविष्यवक्ता) हुवा। उसको फ़िरऊनके बंधनसे इबराहीमकी सन्तानको छुडानेके निमित्त परमेश्वरकी आज्ञा हुई। यह फ़िरऊनकी सेवामें उपस्थित हुवा परमेश्वरकी आज्ञासे अनेक कौतुक दिखलाये। इब्रानियोंको फ़िरऊन बादशाहके बंध बंधनसे छुडाकर कनआऊनके वास्तविक देशमें पहुँचा दिया। इसका पूर्णतया विवरण किताब तौरीतकी उत्पत्तिमें लिखा है।

चालीस वर्षके वयमें मूसाने एक मिसरीको इक इब्रानीके बदले मार डाला। इस भयसे कि, अब फ़िरऊन (परमात्मा बांगीशाह) मुझको मार डालेगा भयसे वह भागा। चालीस वर्षपर्यन्त महमानियामें अपने श्वशुर पतरूकी भेड़ बकरियाँ चराता रहा। अस्सी वर्षके वयमें मूसाने अपूर्व तत्त्ववक्ताकी पदवी पाई। परमेश्वरकी आज्ञासे पुनः मिश्र देशको गया। मूसाका वृत्तान्त तौरीत और गुलजार मूसा और अहादीस मुहम्मदियामें इस प्रकार लिखा है कि, जब इब्रानियोंका आधिक्य देखा गया तब फ़िरऊन नितान्तही भयभीत हुवा कि, यह सब चढ़ाई करके मेरा राज्य न छीनलें। उनको बालकोंकी हत्या वह करने लगा। जब इब्रानियोंकी रोलार्डका शब्द आकाशपर्यन्त पहुँचा तब परम दयालु परमेश्वरको दया आई। कुतुबमुहम्मदियामें लिखा है कि, एक दिवस फ़िरऊनने ऐसा स्वप्न देखा कि, शाम देशमें एक ऐसी अग्नि आई है कि, जिसने मेरे मिश्र देशको जलाकर भस्म कर दिया है। यह स्वप्न देखकर वह नितान्तही भयभीत हुवा। बुद्धिमानोंसे पूछा कि, इस स्वप्नका तात्पर्य कहो? उन लोगोंने कहा कि, इब्रानियोंमें एक ऐसा मनुष्य उत्पन्न होगा जो फ़िरऊनके राज्यको

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मिटादेगा । इस भयसे फ़िरऊन नितान्तही भयभीत हुवा । इब्रानियोंके बच्चोंको मारने लगा । सदैव ज्योतिषियों पण्डितोंसे पूछा करता था कि, वह बालक किस दिवस और किस समय गर्भमें आवेगा । तब उन लोगोंने बतलाया कि, अमुक दिवस रात्रिके समय वह बालक गर्भमें आवेगा । जिस दिन इन लोगोंने बतलाया था उस रात्रिके दिवस फ़िरऊनने आज्ञा दी कि, कोई पुरुष स्त्रीसे संभोग करने न पावे । समस्त इब्रानियोंको नगरके बाहर निकाल दिया । बड़ी चौकसीसे पहारा खड़ा कर दिया । एक इब्रानी जिसके वीर्यसे मूसा उत्पन्न होनेवाला था उसका नाम उमरान था । इस उमरानको फ़िरऊनने अपनी निजकी पल्लेगके समीप अपने शयनागार में खड़ा कर रक्खा । जब अर्ध निशाका समय हुवा तब एक दूत इस उमरानके निकट उसकी स्त्रीको ले आया, उसने अपनी स्त्रीके साथ संभोग किया । इसके उपरान्त वह दूत उस स्त्रीको उठाकर पुनः उसी स्थानपर उसके गृह रख आया । इस अवसर फ़िरऊन ऐसा घोरनिद्राके वशीभूत हो रहा था कि, उसको तनिक भी सुध न रही कि, वह स्त्री किधरसे आई किधर गई और क्या हुवा ।

जब प्रातःकाल हुआ तब फ़िरऊन पुनः ज्योतिषियों और बुद्धिमानोंसे प्रश्न करने लगा कि, उस बालकका वृत्तान्त कहो ? उन लोगोंने उत्तर दिया कि, वह बालक तो माताके गर्भमें आचुका । मेरी कोई युक्ति नहीं चली । तब दाइयोंको सचेत किया कि, बच्चा उत्पन्न होतेही मार डालो, अन्तमें जब गर्भ-काल समाप्त हुआ तब उमरानकी स्त्रीके गर्भसे एक अत्यंत सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ । तब माता पिताने बच्चाके प्रेमसे तीन मासपर्यन्त छिपाकर रक्खा । फिर इनके मनमें इस अत्याचारी बादशाहका भय उत्पन्न हुवा । तब इन्होंने एक सरकण्डेकी टोकरी बनाई उसमें उस बच्चेको रख दिया अपनी पुत्री मरियमसे कहा कि, तू इस टोकरीको बच्चेसहित नीलनदीके तटपर रख आ । तब मरियम गई, उस बालकको नदी तटपर झाऊके वृक्षोंमें रखकर चली आई । मरियम दूर खड़ी होकर देख रही थी कि, देखिए इस बालकको क्या होता है ? इतनेमें क्या देखा कि, फ़िरऊनकी बेटी अपनी लौंडियोंको साथ लिए स्नानार्थ नदी तटपर आपहुँची । उस बच्चेको उस टोकरीमें देखा उसके मनमें उस बच्चेका प्रेम उपजा और दया आई । उसने कहा कि, यह किसी इब्रानीका पुत्र है । अपनी लौंडियोंको आज्ञा दी कि, इस बच्चेको ले चलो । वह अपने गृह ले आई इस बच्चेको अपना मुंहवोला पुत्र मान लिया, इस समस्त घटनाको मरियम दूसरे खड़ी होकर देख रही थी । जब फ़िरऊनकी पुत्री उस बालकको अपने

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गृहमें ले गई उस समय मरियम उसके पास दौड़ी गई और कहा कि, यदि आज्ञा दो तो मैं इस बच्चेके निमित्त एक दूध पिलानेवाली दाई ले आऊँ। तब राजकुमारीने आज्ञा दी कि, ले आओ। तब मरियम उसी समय गई और अपनी माताको बुललाई। राजकुमारीने उसे सेवा तथा दूध पिलानेके निमित्त रख लिया। जो उस बालककी माता थी वही दूध पिलाई दाई बन गई। इस बच्चेको अत्यंत प्रेम सहित पालने लगी। इस बच्चेका नाम मूसा रक्खा गया मिसरी भाषामें मूसाके अर्थ जलसे निकलाके होते हैं। मूसा इस राजकुमारीका मुंहबोला पुत्र होकर पलने लगा। जब फ़िरऊनने उस बालकको देखा तब ज्योतिषियों से पूछा कि, इस लड़केका हाल कहो कि, कैसा है? तब ज्योतिषियोंने कह दिया कि, यह वही बालक है जो तुझे तथा तेरे राज्यको चौपट करेगा। यह बात सुनकर फ़िरऊन उस बालकके मारनेपर प्रस्तुत हुवा। पर उसकी पुत्रीने उसकी ओरसे निवेदन किया कि, यह अनजान बालक है यह आपका कोई दोष नहीं करेगा। समस्त ज्योतिषी झूठे हैं। तात्पर्य यह कि, अपनी पुत्रीके कहने सुननेसे उस बालककी हत्या नहीं की। एक दिन फ़िरऊनने मूसाको अपना नाती समझ अपने क्रोडमें प्यार करने लगा। इतनेमें मूसाने फ़िरऊनकी दाढ़ीको पकड़कर इतने जोरसे खींचा कि, फ़िरऊनके नेत्रोंसे जल निकलने लगा। इस पर उसको निश्चय हो गया कि, यह बालक मेरा बँरी है। आज्ञा दी कि, इसका बध करो। तब पुनः फ़िरऊनसे लड़कीने प्रार्थना की कि, यह अनजान बालक है। यह मैंत्री अथवा द्वेष क्या जाने इस अनजानको न मारिये। फ़िरऊनने कहा कि, यदि यह अनजान बालक है तो इसकी परीक्षा ली जावे। इस बालकके सामने दो ढेर लगा दिये एक तो अग्निके लाल कोयलोंका और दूसरा लाल लालोंका ढेर लगा दिया और कहा कि, यदि यह बच्चा लाल अङ्गारोंके ढेर पर हाथ डालेगा तो मैं समझूंगा कि, यह बच्चा अबोध है, यदि इसने लालोंको पकड़ा तो बेसुध नहीं है इस कारण यह मारा जावेगा। जब दोनों ढेर मूसाके सामने लगाये गये मसाने चाहा कि, लालोंके ढेरपर हाथ डालें। तब परमेश्वरकी ओरसे इतने गुप्तरीतिसे मूसाका हाथ पकड़कर शीघ्रतापूर्वक अग्निपर डाल दिया। उस अग्निमेंसे एक अङ्गारा पकड़कर मूसाकी जिह्वापर रख दिया। उसकी जिह्वा जल गई। इसी कारण मूसाकी जिह्वा तोतली हो गई। फ़िरऊनने जान लिया कि, वास्तवमें यह अबोध बालक है, मूसाकी हत्या नहीं की। उस बच्चेका लालन पालन होने लगा। फ़िरऊनकी पुत्रीने उसके पढ़ानेके निमित्त एक शिक्षक रक्खा, वो भली भाँति शिक्षा पाने लगा, अत्यंत सावधानीपूर्वक पाला गया, फ़िरऊनके नातीके

इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता

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नामसे विख्यात हुवा । मूसा सुबूद्ध सुदृढ तथा बलिष्ठ था । ये जब वह मिश्र-देशसे भाग अपने बाप दादेके देशमें आया तब उसका विवाह पितरू नामक एक भले आदमीकी लड़कीके साथ हुवा । फिर अस्सी वर्षके वयसमें परमेश्वरकी आज्ञानुसार वह पुनःमिश्र देशमें गया । अपनी जातिको फिरऊनके बंधनसे छुडाकर लेआया । जब सीना पर्वतके समीप आया तब परमेश्वर आकाशसे उत्तरा मूसाको तौरीतकी पुस्तक प्रदान की । जब इब्रानियोंने परमेश्वरकी आज्ञा उल्लंघन की तब उनपर ईश्वरीय क्रोध उपस्थित हुआ । वे चालीस वर्षपर्यन्त इधर उधर वनमें भटकते फिरे । तबतक न उनके वस्त्र जीर्ण हुए, न उनका जूता फटा । जो उनके पुत्र उत्पन्न होते, सब वस्त्र सहित उत्पन्न होते जैसे वे बढ़ते जाते वैसेही उनका वस्त्र भी बढ़ता जाता था । प्रातःकाल उनके भोजनके निमित्त आकाशसे एक वस्तु ओसकी बूंदके समान बरसती थी । जिसको इब्रानी भाषामें मन्न बोलते हैं । इस मन्नका स्वाद गुंधे हुए मायदे मधुके सहित हो, उस मन्नको इब्रानी प्रातःकाल उठकर एकत्रित होकर खाते हैं । संध्या समय बटेरे आते थे । उन बटेरोंका झुंड इतनी अधिकतासे आता कि, उनके पडावके निकट गज गज भर ऊँचा ढेर लग जाता था । वे इब्रानी सदैव मांस खाया करते थे, इस कारण उनकी प्रार्थनापर परमेश्वर उन्हें बटेरें दिया करता था । वे लोग मांसभक्षणके निमित्त परमेश्वरके सामने रोए, परमेश्वरने उनको वह भोजन प्रदान किया वे सदैव मांस भक्षण करते रहे । इससे उनपर परमेश्वरका प्रकोप उपस्थित हुवा कि, बीस वर्षके वयके जो ऊपर थे सो सब मर गये । मूसा इब्रानियोंको लेकर कनआँदेशमें पहुँचा पर्वतपर चढ़ गया वह एक सौ बीस वर्षका वय पाकर मर गया । उसका भांजा मरियमका पुत्र यशू उसका स्थानापन्न हुवा, वह इब्रानियोंको लेकर कनआँ देशमें आया बत्तीस बादशाहोंको नष्ट करके देशको इब्रानियोंके सरदारोंमें बाँट दिया ।

मूसाको साढ़ेतीन सहस्र वर्षका समय बीता । जिस समय मूसा मिश्र-देशसे यहूदियोंको लेकर चला था उस समय फिरऊन बादशाहने मूसाका पीछा किया । परमेश्वरने ससैन्य फिरऊनको लालसमुद्रमें डुबाकर मार डाला । फिरऊन दलबल सहित मारडाला गया । यहूदियोंने प्रसन्नतापूर्वक अपना पथ पकड़ा । जैसी घटनाएँ मूसापर उसके उत्पत्तिकालमें बीती थी वैसेही कृष्ण तथा इब्रानीमके साथ भी बीती थी । जबलों मूसा जङ्गलमें था तबलों आसमानी रङ्गका परमेश्वर उसके साथ था । बराबर मूसाको उपदेश देता जाता था । मूसा तथा आसमानी रङ्गके परमेश्वरमें बराबर बात होती जाती थी । धर्म तथा