कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मुहम्मद साहिब
उद्यान बन्धवरुण मंडल कामाक्षा देवीमलागनि गर्भावस्था कामानि वसि २ योगिनी मोक्षदायनी जठराग्नप्रवेशे नाभिस्थानं कुंडलिनी शक्तिः रक्तवर्ण अधोमुखी जगन्माता योगिनी गर्भपुटम् ॥ ॐ तीसरी कुण्डलिनी शक्तिका स्थान है । यह कुण्डलिनी शक्ति सँदूरके रङ्गकी है । यह सर्पके स्वरूपकी है । उसका मुँह नीचेको है, अग्नि उसका देवता है । कोहरनी शक्ति है । ब्रह्मा ऋषि है । कूर्म कला है । उद्यानबन्ध वरुण मण्डल और कामाक्षा देवी है । मल अग्नि है । गर्भकी अवस्था है । सम्भोग कामनामें रहनेवाली योगिनी मोक्षकी देनेवाली है । जठराग्निके भीतर है । नाभिमें इसका स्थान है । इसका नाम कुण्डलिनी देवी है । तँवेकी कला है । समस्त संसारकी माता योगिनी गर्भपर है । यह कुण्डलिनी देवी समस्त उत्पत्तिका कारण है । इसके मुँहसे जो सर्पके सद्गुण फूँकारका शब्द होता है । इस फोंकार ओँकारकासे शब्द बहिर्गत होता है और इस ओँकार शब्दसे हृदय हरा-भरा होता है । और हृदयके हरा-भरा होनेसे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । ऊपरका भाग सूर्य है यह कुण्डलिनी देवी एक डब्बेमें रहती है । नीचेके डब्बेके भागमें चाँदका स्थान और कुण्डलिनीकी फूँकारसे प्राण अपान वायु हिलती है । इस वायुके हिलनेसे समस्त संसार जीवित रहता है । और उस नाभिके स्थानमें दोनों वायु लड़ती हैं । इस लड़ाईसे जो अग्नि उत्पन्न होती है उसको जठराग्न कहते हैं । यह देवी बड़ी सुन्दर है ।
ॐ द्वितीयम् स्वाधिष्ठानचक्रं लिंगस्थानं पीतवर्ण रजोगुण आकारं ब्रह्मा देवता सावित्री शक्तिः तेजारुण ऋषि. ३ धारणाप्यदं देहजाग्रतावस्था परा वाचा ऋग्वेद आचार्यः लिंगगता भूमिका सायुज्यता हंसो वाहनः षण्मात्रा बं भं मंयं रं लं ६ अंतर मात्रा ६ वहिर्मात्रा ६ काम १ कामाक्षा २ तेजोसि ३ तक्षासा ४ चेष्टता ११ मैथुन देवता १० अजपाजाप षट् सहस्र ६००० घटिका १६ पल ३२ अक्षर २४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥
ॐ दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र वह लिंग स्थानमें हैं । उसका रंग पीला है । रजोगुण स्वरूप है, ब्रह्मा देवता है, सावित्री शक्ति है, वरुण ऋषि है, सम्भोग कामनाकी अग्नि है, तेजारुण ऋषि है । समस्त धारणा शरीरकी रक्षक है, जाग्रता-वस्था है । परा वाचा है । ऋग्वेद है । कर्म कर्ता लिंग है । उसकी गता भूमिका सायुज्यता है । हंसवाहन है । अक्षर मात्रा है । बं भं मं यं रं लं ये भीतरली छः मात्राएं हैं । बाहरी छःमात्रा हैं वे काम, कामाक्षा, तेजोसि, तक्षासा, चेष्टिता, मथुन देवता ये हैं अजपा जाप षट् सहस्र है । सोलह घड़ी तथा तीसपलमें हैं ही । अक्षरचार हैं सोहम्भावसे मानसी पूजा है । सुगन्धियों इतर इत्यादिके साथ मैं पूजता हूँ उसके
लिये नमस्कार है। ॐ प्रथमाधारचक्रं गुदा स्थानं रक्तवर्णं देवता सिद्धिः बुद्धिः शक्ति कूर्म ऋषि मूषक वाहन अपान वायु कूर्म कला अंकोचन मुद्रा मूल बंध चतुरदल ४ चतुरमात्रा ४ वं शं षं सं अंतर मात्रा ४ वहिर्मात्रा ४ आनंद १ योगानन्द खीरानन्द ३ श्रीपरमानंद ४ अजपा जाप षट्शतानि ६०० घटिका ४ पल ३२ अक्षर ४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥ ॐ प्रथम आधारचक्र है यह गुदाके स्थानमें है लाल रंग है। उसका देवता गणेश है। सिद्धिबुद्धि शक्ति है। कूर्म ऋषि है। मूल बंध है। चार पत्ते हैं। चार मात्रा हैं। बं शं षं सं भीतरी चार मात्रा। बाहरी चार मात्रा, आनन्द, योगानन्द, वीरानन्द और श्रीपरमानन्द हैं। अजपाजाप छः सौ है। यह चार खड़ी तथा बत्तीसपलमें होता है। अक्षर चार है। पूजा मानसी है सोहम् भाव करके पूजें यों कहे कि, इत्र गन्ध इत्यादिसे मैं पूजता हूँ ॥
महासमुद्र अर्थात् समस्त स्थानपर जलही जल परिपूर्ण हो रहा है और दूसरा कुछ नहीं। यह जलस्थान जलरञ्ज गोसाईंका है।
ब्रह्माण्ड ।
पूर्व कहा हुआ स्वरूपही समस्त ब्रह्माण्डका भी है। इसीको तीन लोक भव-सागर कहते हैं। इसीमें उत्पत्ति स्थिति तथा विनाशका समस्त कौतुक हो रहा है। इस कौतुकको बड़े कौतूकीने बनाया है। जिसके भेदको भवसागरके रहनेवाले नहीं जान सकते। जितने खिलाड़ी हैं उन सबमें यह खिलाड़ी बड़ाही बलिष्ठ है। किसी तांत्रिकका तंत्र अथवा कौतुकीका कौतुक इसके आगे जा नहीं सकता। इस कारण संसारमें जितने जादूगर हैं सब इसके चरे बन गये। जो जादूगर उसके सामने खड़ा होता है, उसीको वह दबालेता है। सबको अपने अधीन बना लेता है। ऐसेही तौरीतमें लिखा है कि, जब मूसा बहुतेरे कौतुक दिखलाने लगा, तब फिरऊन बादशाहने अनेक जादूगरोंको बुलवाया, उन जादूगरोंने अनेक सर्प उत्पन्नकर दिये। तब मूसाने अपना सोंटा चलाया वह सोंटा बहुत बड़ा अजगर बन गया। उसने जादूगरोंके समस्त सर्पोंको खालिया। समस्त जादूगर मूसाके सामने न ठहर सके, भाग गये। इस प्रकार समस्त कौतुकवाले इस विशाल कौतुकी की सेवावंदनामें रहते हैं। जिसको सत्यगुरु मिल जावे वह वास्तवमें उसके पञ्जेसे बच निकले। दूजी कोई युक्ति नहीं। इस ब्रह्माण्डका स्वरूप जो बनाया गया उसमें पहला चित्र इस प्रकार नहीं बनाया गया। कारण यह कि, उक्त स्थान-पर्यन्त कोई भी भाग्य शाली पहुँच नहीं सकता है। जितने सिद्ध साधु हैं वे तीन स्थान पर्यन्त पहुँचते हैं। अर्थात् सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, जो सायुज्य मृक्ति
१० अध्याय । विशेष बलि
है वहाँकी पहुँच दुर्लभ है । जितने लोग सांसारिक वासनाओंके आनन्दमें फँसे हैं वे सब इन्हीं चारों श्रेणियोंमें रहते हैं । पर ये चारो श्रेणी बिना सत्यपुरुषकी कृपाके शूलीस्तम्भके सदृश हैं, समस्त जीव इन्हीं चारोंपर लटक रहे हैं । जिनके मनमें वासना है । उनमें कोई न बचेगा । इस भवसागरमें बिलकुल अंधेर हो रहा है । किसीके हृदयपर प्रकाश नहीं, न बल है कि, इस अंधरेसे बाहर निकल सके । परन्तु हों इससे वह मनुष्य बहिर्गत हो सकेगा जिसके निजके दो गुण हों । एक स्वच्छ बुद्धि, दूसरे सोचनेकी शक्ति । जिस मनुष्यमें ये दोनों गुण न होंगे वह अंधकारसे कदापि बहिर्गत नहीं हो सकेगा । यह भवसागर अंधेरपुर नगर है और इसमें चारों ओर अज्ञानता तथा मूर्खताकी लहरें हैं । इसमें समस्त जीव डूबते उछलते रहते हैं, जिसका एक उदाहरण मैं देता हूँ ।
उदाहरण—एक नगर था इसका नाम अंधेरपुर था । इस अंधेरपुर नगरीके राजाका नाम अंधेरी था । इस राजाके राज्यमें महा अंधेर था इस अंधेरपुरमें समस्त पदार्थ टकासेर बिकते थे । साग पात, अन्न घृत, मीठा इत्यादि सभी वस्तुएँ टका सेर बिका करती थीं । दैवात् उस नगरमें दो साधुओंका आगमन हुवा । उनमें से एकका नाम विवेक तथा दूसरेका विचार था । विचारने विवेकसे कहा कि, आओ भाई ! कुछ दिवसों पर्यन्त हमलोग इसी नगरमें निवास करें । कारण यह कि, यहाँकी समस्त वस्तुएँ सस्ती हैं भली भाँति खाएँ पीएँ, चैनसे जीवन व्यतीत करें । दोनोंने ऐसा विचार कर वहाँ रहना आरम्भ किया । भलीभाँति खा पीकर बड़े मोटे हुए । एक रातको उस नगरके एक महाजनके घरमें चोर लगे । उन चोरोंमें से एक चोर दीवारके नीचे दबकर मर गया, तब वे रोते हुए राजा अंधेरीके पास गये, न्यायके प्रार्थी हुए । इस बातके सुनतेही राजाने महाजनको बुलाकर कहा कि, तेरी ही दिवारके नीचे चोर दबकर मर गया अब तू फाँसी पावेगा । यह बात सुनकर उस महाजनने निवेदन किया कि, महाराज मेरा दोष नहीं, दीवार बनाने वालोंका दोष है कारण यह कि, उन्होंने निर्बल दीवार बनाई । तब राजाने राजगीरोंको बुलाया इनको उपस्थित कर राजाने उनसे कहा कि, हे राजगीरो ! तुमने महाजनकी दीवार निर्बल बनाई उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे, तब राजगीरोंने निवेदन किया कि, महाराज ! हमारा कुछ दोष नहीं इसमें समस्त अपराध मजदूरोंका है कि, उन्होंने हमको नितान्तही निर्बल गारा दिया इस कारणही दीवार निर्बल हो गई । तब राजाने मजदूरोंको बुलाकर कहा कि, तुमने निर्बल गारा बनाया इस कारण महाजनकी दीवार निर्बल होगई ।
उसके नीचे चोर दबके मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे तब मजदूरोंने कहा महाराज ! हमारा कोई दोष नहीं, काजीकी बेटी अच्छे अच्छे वस्त्र आभूषण पहनकर अटारीपर चढ़ गई उसके देखनेको हमारा मन दौड़ गया गारेकी ओर ध्यान नहीं रहा, इस कारण हमारा कोई दोष नहीं, दोष काजीकी लड़कीका है। तब राजाने काजीकी लड़कीको बुलाकर कहा कि, तू भली भाँति वस्त्र तथा आभूषण पहनकर अटारीपर चढ़ी तेरे देखनेके निमित्त मजदूरोंका हृदय ललचाया उन्होंने कच्चा गारा बना दिया, महाजनकी कच्ची दीवार हो गई, उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण अब तू फाँसी पावेगी। तब काजीकी बेटीने कहा कि, महाराज ? मेरा कुछ दोष नहीं कारण यह कि, एक बादशाह ससैन्य इस पथसे जाता था, उसके देखनेहीके निमित्त मैं अटारीपर चढ़ी थी सो इस बादशाहका दोष है। तब राजाने आज्ञादी कि, जाओ बादशाहको पकड़ो, उस पर बादशाह की फौज दौड़ी, इधर उधर दूँढा, न बादशाह और न उसकी सैन्यको पकड़ सके, वह बलिष्ठ बादशाह राजाके पकड़नेसे न पकड़ा गया वह डंका देता हुवा अंधेरे नगरसे बाहर निकल गया, राजाका कुछ वश नहीं चला तब राजाने देखा कि, मेरा न्याय तो पूरा नहीं हुवा इस कारण बड़े दुःखमें बैठ था। इतनेमें राजाका मंत्री वहां आन उपस्थित हुआ। पूछा कि, महाराज ! आपके दुःखका क्या कारण है ? तब राजाने कहा कि, मैं चाहता था कि, बादशाहको गिरफ्तार करूं पर वह मेरे वशमें नहीं आया, न मेरा न्यायही पूरा हुआ यह महादुःख मेरे हृदयको बेधे डालता है। यह बात सुनकर मंत्रीने उत्तर दिया कि, आप दुःखी न हों हमारे अंधेरे नगरमें दो सण्ड मुसण्ड साधू फिरते हैं उनको आप फाँसीपर चढ़ावें, कारण यह कि, बादशाह तथा साधुओंकी मयदि समान होती है इस प्रकार आपका न्याय पूरा हो जावेगा। यह बात सुनकर वह अंधेरी राजा प्रसन्न हुवा, विवेक तथा विचार नामक दोनों साधुओंको पकड़ लिया। आज्ञा दी कि, इन दोनों साधुओं को फाँसीपर लटका दो। तब उन दोनों साधुओंने यह युक्ति की कि, आपसमें लड़ने झगड़ने लगे। एक कहता कि, मैं फाँसी चढ़ूँ, दूसरा कहता कि, मैं पहले चढ़ूँ। दोनोंको झगड़ते देखकर राजाने पूछा कि, तुम दोनों क्यों झगड़ते हो। तब उन्होंने उत्तर दिया कि, महाराज ! इसका कारण यह है कि, हम लोग बड़े ज्योतिषी हैं, लग्न तथा मुहूर्तसे भली भाँति विज्ञ हैं, भविष्यकी बातोंको जान लेते हैं और हमें यह जान पड़ा है कि, इस समय चार लग्न ऐसे हैं कि, इन लगनोंमें जो फाँसी चढ़ेगा सो सर्वोच्च भंगीपर अधिकृत होगा। जो पहले फाँसी चढ़ेगा वह
विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला सत्यपुरुष पश्चिमके माहात्माओंका विराट् दर्शन
तीनों लोकका बादशाह होता है तीनों लोकमें उसका राज्य होगा । जो दूसरे लगनमें फ़ौसी चढ़ेगा, वह उसके मंत्री आदिक होंगे, जो तीसरे लगनमें चढ़ेगा सो उसके बराबरके बैठनेवाला तथा सलाही होगा । जो चौथे लगनमें फ़ौसी चढ़ेगा वह सैन्य सिपाही सरदार इत्यादि होगा । यह बात सुनकर राजाने दोनों साधुओं से कहा कि, तुम दोनों साधु पृथक् होवो, साधु तो अलग हो गए और उस अंधेरी राजाको सांसारिक कामनाओं ने इतना दबाया कि, वह पहले फ़ौसी चढ़ गया, दूसरे मंत्री तथा उच्चपदाधिकारीगण फ़ौसी लटके, तीसरे समस्त कारबारी फ़ौसी लटके, चौथे सैन्य दल प्रजा फ़ौसी पर छरपराई । उस समय विवेक तथा विचार दोनों साधु अपने प्राण लेकर उस अंधेर नगरीसे भाग निकले ।
इस प्रकार जिन मनुष्योंके मनमें सांसारिक वासना भरी है, भय आशा तथा दुःख, सुखमें बँधे हैं और बेद तथा पुस्तकोंके अनुसार समस्त आज्ञाओं और वर्जितकार्यों को प्रतिपालन किया करते हैं, वे सब स्वर्गों तथा चार प्रकारकी मुक्तिको कोरी कामनामें हैं, वे निश्चय कालचक्रमें आवेंगे । जब वे सुकार्य करते हैं तब स्वर्गोंमें जा पहुँचते हैं, बुरे कार्यसे चौरासी योनि तथा नरकोंमें अपना घर बनालेते हैं, इस अंधेरी राजाके अधीन रहते हैं । सत्यगुरु जो समस्त सृष्टियों का बादशाह है सो अपने हंसोंको लेकर इस अंधेरपुरसे पार चला जाता है, अंधेरी राजाका कुछ बश नहीं चलता । जो इस अंधेर नगरमें रहकर अंधे होरहे हैं सत्य तथा मिथ्याको जान नहीं सकते वे वासनाओंमें फँसकर मारे गए । वे सत्यगुरुको पहचान नहीं सके क्योंकि इनकी बुद्धि तथा इनका चित्त ठिकाने नहीं रहा ।
गजल ।
दिल किससे लगाऊं मेरा दिलदार कहाँ है ।
बेगानः हैं सारे यगानः पार कहाँ है ॥
अंधेर घेर सारे इस अंधेर पुरीमें ।
मैं ढूँढ़ता महबूब तरहदार कहाँ है ॥
जाँबकश रुह अफजा गुल्फार कहाँ है ॥
न गुल है नहीं बू है इस ब्राग खुश्क में ।
पुरखार चारसू है गुलजार कहाँ है ॥
मस्तान सब हैं झूठे न मस्त कोई है ।
दिलबरके इश्क बाहरा सरशार कहाँ है ॥
सब इश्कके व्यापार चले मुफ़लिस कल्लाश है ।
शरीर और विराटकी एकता
सर हाथ अपना लेके खरीदार कहाँ हैं ॥
हरचार सिम्त दूढ़ता दीवानः दिल मेरा ।
दिल किसके हाथ दीजे दिल अफगार कहाँ है ॥
सहमूरत और सूरत और सरहा पुजारी ।
अंधेरेमें न सूझ वह करतार कहाँ है ॥
जहाँ पहुँच नहीं अकल वहम क्योंकर जाए ।
उनका कवन रूप निराकार कहाँ है ॥
जब आनपड़ा सहमा सारी अकलको मारा ।
बेहोश सारे होगा हुशियार कहाँ है ॥
दाही हजार लख हैं कोई पेशवा है एक ।
सब जिसकी फौज उसका सरदार कहाँ है ॥
सब उलझ पड़े फासिक जञ्जीर जुल्फ में ।
रह जुल्फ मेरे महरू खमदार कहाँ है ॥
सरकार लाख जगमें हुए सदहा हुकमरों ।
सारे हैं फानी बड़ा सरकार कहाँ है ॥
आते हैं और जाते हैं सह पीर पैगम्बर ।
पीरानका जो पीर सो सालार कहाँ है ॥
गाते बजाते हैं सारे ढोल नकारे ।
अब आरजी हैं शब्दका झनकार कहाँ है ॥
तनमनसे हुए आजिज उसकी खाक कदमको ।
खुद हैं खालिक कबीर वारापार कहाँ है ॥
तात्पर्य—मेरा दिलदार इस दुनियाँके बाहिर है । मैं किससे दिल लगाऊँ ? इस अन्धेर नगरीमें अन्धेरही अन्धेरे है, मैं अपने तरफदारको दूढ़ता हूँ वो यहाँ कहाँ है ? सब पशुही बोल रहे हैं मेरे प्राणोंको बचानेवाली प्यारेकी भीठी आवाज यहाँ कहाँ है ? चारों ओर कांटे लगे हुए हैं, यहाँ गुलाब कहाँ है ? जो दुनियाकी मस्तीके मस्त हैं ? उनकी मस्ती झूठी है, यहाँ प्यारे सत्यपुरुषके इश्कसे हरा भरा कोई नहीं है, सब प्रेमके बाजारमें खाली हाथही आजा रहे हैं । शर हाथमें लेकर इश्कका सौदा खरीदने कोई नहीं आता । मैं मेरे दीवानेको चारों दिशाओंमें दूढ़ता हूँ, मैं अपने दिलको कितने दूँ इसके लेनेका पात्र कहाँ है इस अन्धेर नगरीमें सब एकसेही हैं, अज्ञानके अंधेरेमें नहीं दीखता कि, वो करतार कहाँ है ? जब बुद्धिकी पहुँच नहीं तो वहम कैसे पहुँचे उसका रूप क्या वो निराकार कहाँ है ? जब भ्रम
विराटकी उपासना
का भार आगया तो सब बुद्धि दबादी सब बेहोस हो गये हैं यहाँ हुशियारका तो नामही नहीं है । उसकी अर्दलीमें रहनेवाले तो लाख हैं परबो पेश बा एक है । सब जिसकी फौज हैं उस सरदारका पता नहीं है । उसके भूकुटिविलासमें सब फसे पड़े हैं, मेरे प्यारेके वे लचीले जूल्फ कहाँ हैं ? या वो मेरा प्यारा कहाँ है ? निर्द्वन्द्व हुकम करनेवाले अनेको बादशाह हो गये, पर सब मिट गये और मिट जायंगे क्यों कि, उनकी न मिटनेवाली सरकार कहाँ हैं ? सब पीर पैगम्बर आते जाते रहते हैं, जो पीरोंका भी पीर हो वा मालिक कहाँ है ? सब ढोल नगारे बजाते आते हैं, वो शब्द कहाँ है ? जिसकी झनकारसे ये बोल रहे हैं हम उसके चरणोंकी धूलपर तनमनसे कायम हो गये वो कबीर सब संसारका मालिक है, उसका पार किसने पाया है ?
ग्रन्थल ।
आ मेरी गली बुलबुल बीमार हमारे ।
दावत है भली बुलबुल बीमार हमारे ॥
माहे न खिज़ा दाएम जेहि वक्त बहारी ।
गुल है न कली बुलबुल बीमार हमारे ॥
खाली न मेरे कूचः में आ मेरी नज़रला ।
सर हाथ तले बुलबुल बीमार हमारे ॥
जितनी है हवस दिलमें रहे कोई न बाकी ।
इश्क आग जली बुलबुल बीमार हमारे ॥
खिलअत हो अतातर्कतुकर जामए नापाक ।
आफात टली बुलबुल बीमार हमारे ॥
इनसान हो पी प्याला न हो मिस्ल सतूर्राँ ।
मत खाए खुली बुलबुल बीमार हमारे ॥
क्यों सोता पड़ा नालःका वक्त जो आया ।
अब रात ढली बुलबुल बीमार हमारे ॥
अब जाग खबरले तुने जो बोया है आजिज ।
खेतै है फली बुलबुल बीमार हमारे ॥
ए मेरे प्रेमके बीमार बुलबुल ! मेरी गली आ, क्यों कि, वहाँ तेरो खातिरका सामान अच्छा है । तू जानती है कि, फसले बहार सदा नहीं रहा सकती । बहारका समय गया । न तो बागमें फूल है तथा न कलीही है जिसका खिलकर फूल बन जाय । मेरी गली खाली हाथ न आना, कुछ भेंट लेकर आना, अपना शिर हाथपर
सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त
रखकर आना । ए ! इशककी दिलमें आग लगी हुई है दिलमें जितनी हवस हो उसे पूरा करले । जा तूने दुनियाँकी हवससे नापाक जाम भर रक्खा है उसको छोड़ने कीही भेंट भाट हो ए मेरे बीमार बुलबुल ! उसके छोड़ेसे सब आफत टल जायंगी । प्याला पीकर मनुष्यवर सिंडीके समान न हो, न दुनियाँकी ही हविश कर । जब नाले लगानेका वख्त आया तब सोता पड़ा है । ए ! अब रात बीत चुकी है, जग खबर ले जो तने बीज बोया है, उसीकी खेती फलती है इसमें पूर्ण प्रकरण तथा बुलबुलसे जीवात्माका संबोधन किया है ।
हेला (नदा) के अङ्गकी साखिया ।
कबीर देश दे हम वगरिया, ग्राम ग्राम सब खौरा ।
ऐसा जिवडा न मिला, ए जो फरक विछोर ॥ १ ॥
कबीर समझाए समझे नहीं, पर हाथ आप बिकाय ।
समझाए समझे नहीं, बाँधे यमपुर जाय ॥ २ ॥
कबीर जाए नाता आदिको, विसर गयो वह ठौर ।
चौरासीके विसपर, अखत औरकी और ॥ ३ ॥
कबीर वस्तु है गाहक नहीं, वस्तु सोगरव मोल ।
बिना दामको मानवा, फिरे सो डावों डोल ॥ ४ ॥
कबीर —यह जग तो झेडे गया, भया जोग नहिं भोग ।
तिल तिल झार कबीर लए, तलठी झारें लोग ॥ ५ ॥
सुरनर मुनि और देवता, सात द्वीप नौ खण्ड ।
कहै कबीर सब भोगिया, देह धरेको दण्ड ॥ ६ ॥
कबीर-लघुताई सबते भली, लघुताते सब होय ।
जस दुतियाको चन्द्रमा, शीष नवें सब कोय ॥ ७ ॥
कबीर—जो कोई मिला सो गुरुमिला, चेला मिला न कोय ।
छः लाख छानवे रमैनी, एक जीवपर होय ॥ ८ ॥
कबीर—श्रोता तो घरही नहीं, वक्त बदे सो बाद ।
श्रोत्रा वक्ता एक घर, तब कथनीको स्वाद ॥ ९ ॥
कबीर—सुन कागज छुवों नहीं, कलम गहों नहिं हाथ ।
चारों युगको महात्म, मुखहि जनाई बात ॥ १० ॥
कबीर—दुःख न था संसारमें, था नहिं शोग वियोग ।
सुखहीमें दुःखला दिया, बोली बोलें लोग ॥ ११ ॥
हम देश देश और गाम २ में फिर । सब जगहोंमें गये पर ऐसा कोई जीव
नहीं मिला जिसके दिलमें कोई फरकही न हो ॥१॥ हमने समझाया पर न समझे, दूसरेके हाथोंमें बिक गये, हमने बारंबार कहा कि, मानजा नहीं तो चौरासीमें भटकता फिरेगा, यम पकड़ कर लेजायगा पर अंतमें ऐसाही हुआ ॥ २ ॥ जब गर्भमें था तब भगवान्से पुकारता था कि, मैं तेराही हूँ पर जब वो ठौर छूट गया गर्भके बाहिर आया कि, हठवायुके लगतेही सब भूल गया । चौरासी लाख योनिके चक्करमें पड़ गया औरका औरही होगया ॥ ३ ॥ वस्तु हैं पर उसके खरीददार नहीं क्योंकि, उसकी कीमतें सबकुछ देना पड़ता है । जिसके पास देनेको दाम नहीं अथवा न देसके वो ढाँवा डोल फिरता है ॥ ४ ॥ यह संसार तो झाड़वामें ही रह गया न भोग कर सका एवम् न योग करसका । इसके जन्म लेनेका सार तो कबीर ने लेलिया है लोग तो छूछके पीछे लगे हुए हैं ॥ ५ ॥ सात द्वीप और इसके नौ खण्डोंमें के सुर नर मुनि और देवता सब भोगीही हैं क्योंकि, जिसप्रारब्धसे जो देह बनेगा उसका फल भोगना ही पड़ेगा ॥ ६ ॥ सबसे छोटा बनके रहना सबसे अच्छा है, उसीसे सब कुछ हो सकता है, जैसे कि, द्वितीयाके बालचांदको सबही प्रणाम करते हैं ॥७॥ जितने मिले सब गुरु मिले कोई भी चेला नहीं मिला, इस कारण छः लाख छानवे रमैनी एकही जीवपर गुजर रहीं हैं ॥८॥ जबतक श्रोता न समझे उस समयतक कथा कहना समयको व्यर्थ खोना है । जब श्रोता बक्ता दोनोंका एक विचार मिलजाय तबही कहनेका आनन्द है ॥ ९ ॥ सुन, न मैं कागज छूता हूँ न कलम पकड़ता हूँ । चारों युगोंकी बातें मुहसे कहनेकी बात है ॥१०॥ यदि शोच और वियोगका दुख न होता तो कोई शोच नहीं था, पर जब सुखमें इनसे दुख मिलता है, दुनियाँके लोग बोली बोलते हैं तो फिर इससे जयावा कोई दुख नहीं होता ॥ ११ ॥
शब्द — अन्तर मैल जो तीरथ न्हावे, उसे वैकुण्ठ न जाना ।
लोक पतीजै कछु नहिं होवै, नाहीं राम अयाना ॥
पूजा राम एक है देवा, सांचा नाम न गुरुकी सेवा ।
जलके न्हाए जो गति होवे, नित नित मेंडक न्हावे ॥
जैसे मेंडक तैसे वह नर, फिर फिर जूनी आवे ।
मन कठोर दोनीसे बना रस, नरक न पांचा जावे ॥
हर गानेसे जोबरे, हड़मिए सगरी सैन तराए ।
दिन नहिं रैन वेद नहि शासतर, तहाँ बसे निरंकारा ॥
कहैं कबीर नर ताको ध्यावो, बाहिरिया संसारा ॥
जिसके दिलमें बुरी वासनोंका मेल भरा हुआ है वो चाहे हजार तीरथ करे
बो वेंकुण्ठ नहीं जा सकता । चाहें लोग उसपर विश्वास करें कि, यह महात्मा हो गया इससे क्या है ? वो राम क्या अनजान है जिससे वो छिपजाय । एक रामकी पूजा तथा रामनाम एवं रामके लिये नमन करना ही सच्चा है । सिवा इसके कोई दूसरा देव नहीं है । इससे कल्याण हैं । यदि केवल स्नानसे ही कल्याण होजाय तो मँढक तो रातदिन पानीमें पड़ा रहता है क्यों न मुक्त हो जाय तो फिर २ मँढकही बना करता है । इसी तरह वो मनुष्य भी फिर २ कर योनियोंमें फिरता रहता है । मन तो कठोर पाप करनेमें लगा है फिर नरक क्या पांचमां (या ढाँटा) जायगा । भगवानके गुणानुवाद गानेसे तो वित्त अकुलाता है पर इसकके गन्धे गानाके सुनने में सारी रात बिता देता है । जहाँ सत्यपुरुष विराजते हैं वहाँ रात और दिन दोनों ही नहीं हैं, यानी वहाँ कालकी गति नहीं है, न वहाँ विधि-निषेधके शास्त्र ही हैं । कबीर साहिब कहते हैं कि, मैं तो उसीका ध्यान करता हूँ । यह संसार तो बाहिरिया बेकाम हैं मुझे इससे क्या लेना है ?
मैं किसको कहूँ, कोई न सुनता न मानता, सबकी बुद्धिपर परदा पड़ गया है । एक न भूला दो न भूला सारा संसार भूला पड़ा है, सब अचेत होगये, किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं रही । सब अंधेरीराजाके वशमें आगए इस राजाके मंत्रियोंकी जो दुष्ट बुद्धि है वह सर्व बुद्धिकोंका उपदेश दिया करती है । दोनों साधु जो विचार तथा विवेक हैं उनको मटियामेट किया चाहती है, वे दोनों अपनी बुद्धि-मानोसे बच निकले । कोई मनुष्य हो उसके हृदयके किसी कोनेमें छिपकर दोनों रह गये हों तो वह सोचे तथा समझे कि, जहाँ टका सेर घास मिठाई बिकती हो वहाँ कुशल नहीं है, यहाँके मनुष्य अंधे हैं इनमें तनिक भी सोच विचार नहीं । वे गुरु साधु तथा परमेश्वरको क्या पहचानें ? उनके निमित्त वासनाओंकी फाँसी खड़ी है सब उसके ऊपर लटककर मरते हैं, मर गए और निश्चय मरेंगे ।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह सब फँसनेवालोंके लिये फाँस बनाये गये हैं । सब दौड़ दौड़ कर आपसे आप इस जालमें फँसते हैं । जिसने तन मन धनसे प्रेम किया, मिटनेवाली वस्तुसे मंत्री जोड़ी वह मरेगा । जिस किसीको परमेश्वरने मंत्री प्रदान की वही समझे कि, उत्पत्तिके आरम्भमें केवल एक अण्डा वासनासे भरा हुआ उत्पन्न हुआ था । इसी कारण वह फूटा, आनन्द लेनेके निमित्त उसने सूक्ष्म शरीर धारण किया । यह शरीर कामक्रोधादिकके बंधनमें जबतक पड़ा है और जबलों सांसारिक आनन्दोंका ध्यान है, शरीरकी रक्षा चाहता है तबलों बंधनमें पड़ा रहेगा । मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम जब अवनकी
वाटिकामें था तब आयुषके वृक्षके फलको खाता था । जब उसने गेहूँका दाना खाया तब उसको शौचकी आवश्यकता हुई । तब परमेश्वरने उसको वैकुण्ठसे बाहर निकालकर कहा कि, यह वैकुण्ठ शौच तथा लघुशंकादिककी जगह नहीं है । अब तू पृथ्वीपर जा ; इस प्रकार यह पृथ्वी मुक्तिकी कामना रखनेवालोंके निमित्त नहीं है ॥
पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड ।
ब्रह्माण्ड और पिण्डका एकही स्वरूप है तनिक भी विभिन्नता नहीं हैं । दोनों की एकसी अवस्था है तनिक भी घट बढ़ नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें जल है इस जलके बीच विचित्र कौतुक बना है । यह ब्रह्माण्ड भवसागर कहलाता है । इसमें ऐसे कौतुक हैं जो मनुष्योंके अनुमानमें भी आ नहीं सकते । उत्पन्नके पूर्व जल था, इस जलमें एक बुल्ला उठा । अण्डेके स्वरूपमें वह जलपर उतराता फिरता था । सो जलही जल था । वह बुलबुलाभी जल था । जो कुछ जल तथा बुलबुलेमें था सो भी सब जलही था । जल और बुलबुले सब स्थानोंमें परमेश्वरकी आत्मा थी । वह बुलाबुला अर्थात् अण्डा फूट गया । यह ब्रह्माण्ड एक बड़ी नदी है । पिण्ड बूंद हैं, जो कुछ नदीमें है उसीके सामान बूँदमें हैं । नदी बूँद है, तथा बूँद नदी है । लोक तथा वेद इस नदीके दो किनारे हैं । भौति भौतिकी इच्छाएँ हैं, यहाँ श्वासमें जल भरा हुवा है । जब दोनों एक ठहरे तब उचित है कि, प्रथम अपने पिण्डकी अस्थिके जाननेका उद्योग करें । जब पिण्डकी सुध होजायगी तब समस्त ब्रह्माण्ड का समाचार जानलिया । जायगा । जिसने अपने पिण्डका वृत्तान्त नहीं जाना वह ब्रह्माण्डका तनिक भी वृत्तान्त नहीं जान सकता । जो अपनेको न जाने वह परमेश्वर को क्या जान सकता है ? दोनों का समाचार पारख गुरुके अतिरिक्त और कोई दूसरा बतला नहीं सकता । पाँव पाताल सो सातवीं पृथ्वी है । पाँवकी पीठ सो छठी पृथ्वी है । पाँवकी उँगलियाँ सोई असुर हैं । पैरके नाखून सो असुरोंकी सवारी हैं । अष्टालिङ्ग सो पाँचवाँ महातल है । एड़ी चौथा तलातल है । ठिगुनी सो तीसरा सुतल है । जाँघ, सोई तल है । जो पग हैं सोई पहला अतल है, यही भूमि है । लिङ्ग प्रजापति है । स्त्री तथा पुरुष जब दोनोंका वीर्य स्थलित होता है, तब पृथ्वी और आकाश मिलते हैं, तभी वीर्यवृष्टि होती है । चूतङ्गका सिरा सोई प्रभातकी उज्ज्वलताका आरम्भ है । जो पहले दिखाई देता है श्वेतरेङ्ग है । जो मोटी मांस है सो माया है । वह दयालु हैं । जो नाभिकी गम्भीरता है वो समुद्रका घेर है । उधर तो झड़ा अग्नि है । इधर बडवा अग्नि है । समस्त नसें नदियाँ हैं और जो पेट है बही
अकाल पुरुषके धार्मिक नियम
भवदर लोक है । बालभोग छोटी महाप्रलय है । प्यास बड़ी महाप्रलय है । हृदय पृथ्वीके ऊपरका स्वर्ग है । इधर वैजयन्ती माला है । उधर नक्षत्रगण वैजयन्ती माला हैं और दाहिना कुच वह है जो भोगनेके पूर्व दान देवे और बाँया कुच वह है जो भोगनेके उपरान्त दान देवे । जहाँ तीनों गुण मिलते हैं वह हृदयकी इच्छा है । वही ब्रह्मा है । पालन करना ही विष्णु है ।
इसमें जो क्रोध है वो रुद्र है । हँसना तथा प्रसन्न होनाही माया है । इसमें ज्ञान है वही दुःखका दूर करनेवाला है । प्राणही हवा है और पीठ बुरी करनी है । जो पीठका हाड़ है सोई पहाड़ है । जो बाएँ दाएँकी पसुलियाँ हैं वेही हिमालयके इधर उधरके पर्वत हैं । दाहिना हाथ उदारता और वृष्टि है । बाँया हाथ कञ्जूसी तथा सूखा है । हाथकी रेखा अर्थात् चिह्न अप्सरागण हैं । हाथके नाखून दूतगण हैं और हाथका जोड़ा आरञ्जपर्व्यन्त सोई अग्निलोकपाल हैं । बाँया जोड़ा इंक देवता पूर्व तथा उत्तरका है । आरञ्जसोई कल्पवृक्ष है । दाहिना मोड़ा सो दाहिना ओर है । बाँया मोड़ा सो बाँया ओर है । ग्रीवाका मोड़ा वरुण देवता है । गला सो महर्लोक ऊपरका स्वर्ग है । अच्छी बुद्धि अनहद शब्द सो महर्लोकके ऊपर है सोई ब्रह्म लोक है । सासारिक कामना सोई कष्ट दुःख है । नीचे का होंठ लालच है । ऊपर का होंठ लालच लज्जा है । तालुवाणी है । जिह्वा अग्नि है । वार्तालाप सरस्वती है अर्थात् जिह्वा है और दाँत सो मोर हैं, समस्त लोग जो खाते हैं वही भोजन है । इधर वाणी है और उधर चारों वेद हैं । इधर हँसी और उधर माया तथा मायाकी रचना है इधर दोनों कान हैं और उधर दिशाएँ हैं । इधर नाकके दो छिद्र हैं और उधर अश्वनीकुमार हैं । जो शरीरकी बू है वह पृथ्वी है । दाहिनी आधी देह सो पाँचवाँ यमलोक है । आधी देह जो उत्तरकी है वो छठवाँ तपलोक है । मस्तक बल अर्थात् मस्तकपरके जो चिह्न हैं सो प्राकृतिक तेज है । जो आरम्भ की उत्पत्ति उसका वह सूर्य है । आँखोंका खुला रहना वो सृष्टिकी रचना है । पलकका जो मारना है वही दिनरात है । जो दाहिनी ओरकी भौँ है सो प्रीत देवता वो महतर है, जो बाईँ ओरकी भौँ हैं वह क्रोध देवता है । जो माथा है सो तपलोक है । वह जन लोकके ऊपर है, सोई लोका लोक है । वह समस्त लोकोंके ऊपर है । जो शिरके बाल हैं वही काले बादल हैं । इधर शरीरके बाल हैं । इधर वृक्ष तथा हरियाली है । जो सौन्दर्य है वही लक्ष्मी है, जो शरीरकी चमक है वोही सूर्यका प्रकाश है । संसारमें जो देह है वो समस्त देह महापुरुषके घर है, आत्मा सोई चिदा-
बलिप्रदान
नन्द है । ज्ञानी पुरुषका देह महलमें रहता है । जब नीचेको दम जाता है तब समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । जब दम रोकता है तब समस्त संसार हरा भरा होता है । जब श्वास ऊपरको छोड़ता है, तब महाप्रलय होजाता है ।
नाकशाह और जन्दाका सम्बाद ।
नान० — तीन लोककी कहो गोसाईं । कैसे जान परै तनमाहीं ॥
जन्दा० — पीठ चरन हैं शीश अकाशा । तीनलोक देही परकाशा ।
शब्दखण्ड ब्रह्मण्डमें सोई । माया ब्रह्म फैल घट दूई ॥
हमरे पदको लखै न कोई । भली बूझ तुम पारख होई ।
नान० — चार दिशा कहु मोहिं गोसाईं । सात द्वीप मोहिं कहु बुझाईं ॥
जन्दा० — आगा पीछा दक्षिण वामा । चार दिशा देही परमाना ।
साढ़ेतौन हाथकी देही । उनचास कोट विष खाई एही ॥
नवों खण्ड नौ सन्धी जानो । पिण्ड अण्डको लेखा मानो ॥
पर्वत यामें हाड़ लगाया । ढर पानसो ब्रह्मण्ड रचाया ॥
चन्द्र सूर्य दुइ नेत्र जगावा । देखे पीठ सुमेरु बतावा ॥
तिम नदिया तन भीतर जानो । पेट गँडा पिण्डमें मानो ॥
नान० — तत्त्वप्रकार कहे तुम बानी । ताकी सांध शब्द पहचानी ॥
सात समुन्दर कहो बखानी । तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जन्दा० — जीभ नासिका नेत्र बखानो । श्रवण नाभि गुद इन्द्री मानो ॥
क्षार मीठ जल सब पहचानो । नौ सौ नदी पिण्डमें मानो ॥
श्वासानदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रसखासा ॥
ये समुद्रमें जाय समानो । है गण्डार नहीं तृप्तानो ॥
नान० — सात समुद्रकी लहर परवानो । उनकी लहर कौन विधि मानो ॥
जन्दा० — काम क्रोध अरु लोभ हँकारा । मनउ मायाकी लहर अपारा ।
अग्नि पवन पानी परचण्डा । पाँच तत्त्व करते नौखण्डा ॥
नान० — वाहि लहर हीरा औ मोती । यामें कहा निकस है सोती ॥
सबहि भेद मोहिं कहु गुरु देवा । नहिं छोड़ूँ अब तुमरी सेवा ॥
जब गुरु मिले बहुरैंग समरङ्गा । ब्रह्म ज्ञान ऊँचे सत्संगा ॥
सुमिरन भजन होय परकासा । अनहद ध्यान पुरुषकी आसा ॥
अर्श गैवमें ध्यान लगावे । तब वा सिध बाह कोई पावे ॥
जाय हंस तहैं डुबकी मारा । तबले निकसी वस्तु अपारा ॥
हीरालाल नाम परकासा । शब्द सुरत हंसाको वासा ॥
यज्ञ शब्दार्थ, नरमेघ अश्वमेघ, गोमेघ
कहता समाज निकसे है जानो । सो हीरा मनि माणिक जानो ॥
यथा — क्षार मीठ जल यहाँ अपरा । वहाँ कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥
जन्दा० — नैन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानो जलधारी ॥
क्षार मीठ जल सबहीं भराही । जो ब्रह्माण्ड सो पिण्ड कहाही ॥
नान० — यहाँ तो काठ लोहकी नौका । कहो स्वामि व्यौहार वहाँका ॥
जन्दा० — पुरुष नाम नौका यहँ भाई । खेवट सद्गुरु संत मिलाई ॥
पुरुष शब्द सुमिरौ लौ लाई । पुरुष प्रताप उत्तर चल भाई ॥
नान० — वाह गुरु समरथ' वाह गुरु जन्दा । काट देव तुम भवजल फन्दा ॥
धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमर भेद भाखी निजवानी ॥
समर्थन ।
केवल भारत वर्षीय ज्ञानी गणही इस बातको मानते नहीं हैं कि, जो कुछ पिण्ड है वही ब्रह्माण्ड है । बरन् अरब यूनान मिश्र और अलीमानके सब ज्ञानियों का ऐक्य है कि पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों समान हैं, तनिक भी विभिन्नता नहीं । वे लोग भी कहते हैं कि, हाड़ पर्वत हैं, पसीना निकलना बृष्टिका होना है । समस्त पशु और देवतागण दोनोंमें एकही ढङ्गसे भरे हैं । समस्त चरनेवाले उड़नेवाले और फाड़नेवाले दोनोंमें एक समान बसे हुए हैं । ऐसाही सेवक परिश्रमी भजद्वर इत्यादि दोनोंमें एक समान हैं जो पाचक शक्ति है उसको बबरची बोलते हैं । जो बल अंतडियोंमें भोजन रखता है उसका नाम गन्धि है, जो बल रक्तको श्वेत करता है, स्त्रीके स्तनमें दुग्ध और मर्दके फोतामें वीर्यको श्वेत करता है उसको धोबी कहते हैं । जो बल शरीरके अङ्गमें भोजन बाँटता है उसका नाम बंधानी है । जो बल जलको श्वेत बनाकर बाहर निकालता है वह भिश्ती है । जो बलविशेष को बाहर निकाल डालता है वह हलालखोर है । जो बल वायु तथा पित्तको भीतर रखता है सो न्यायी है । जो क्रोध है वह भेड़िया है । ऐसाही समस्त बनाव पिण्ड तथा ब्रह्माण्डका है सब एक है उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं ।
प्राचीन कालके लोगोंका तो यही सिद्धान्त है । अब हालके लोगोंको बातें सुनो कि, अंग्रेजीकी पुस्तकें जो मैंने देखीं तो उससे प्रगट है, नेचुरल डिक्शनरी और नेचुरल हिस्ट्री इत्यादिको भलीभाँति ढूँढ़कर देखो तो समस्त विद्वान इस
१ पहिले जो विषय कहा गया है, कि पिण्ड और ब्रह्माण्ड ये दोनों एक हैं इसी विषयकी पुष्टिमें कबीर नानक शाहका संवाद लिख दिया है जो कि, नानक बोधमें लिखा हुआ है । पहिले जो कुछ पदार्थ कह दिया है वो इसका विस्तृत अर्थ है इस कारण इसका अर्थ नहीं करते ।
उष्ट्रमेघ, मेघमेघ, मृगमेघ
बातको मानते हैं, यही बात प्रमाणित करते हैं और दोनोंहीकी एकही सूरत और एकही वास्तविक ढङ्ग है ।
प्रलयकी समानता ।
इस बातपर तनिक भी विचार न करके यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों भ्रममें पड़े हुए हैं जो कहते हैं कि, मनुष्यकी बुराई भलाईका निर्णय महा-प्रलयके समय होगा । इसका यह कारण कि, आज मनुष्य परमगतिको प्राप्त हो, उसका हिसाब आजसे कोट्यानुकोट वर्षके उपरान्त हो दोनोंका प्रलय तथा महाप्रलय पृथक् पृथक् तथा एकही स्वरूपके हैं । ब्रह्माण्डका प्रलय तब है जब समस्त मनुष्य पापसे भर जाते हैं । जब पापिष्ठी हुए तब मृतक समझे जाते हैं । पापोंके कारण भयानक चिह्न भी परिलक्षित होते हैं । सबके सब मटियामेट भी होजाते हैं । यह ब्रह्माण्डका प्रलय तथा महाप्रलय है । पिण्डका प्रलय तथा महा-प्रलय उसके साथ है । पिण्डका प्रलय तो तब है जब मनुष्य मृत्युशय्यापर पड़ता है, जब वह न जीवित रहता न मरही जाता है, उसके भीतर बाहरी समस्त बल स्थिर होजाते हैं । आँख तो रहती हैं, पर सूक्ष्मता नहीं । कान खुले रहते हैं, पर सुनता नहीं, जिह्वा रहती है, पर बोलता नहीं । श्वास चलता रहता है, पर मुरदा समझा जाता है । केवल देखनेके निमित्त वह जीवित समझा जाता है नहीं तो मुरदा हो चुका । न मुर्दोंमें एवं न जीतोंमें ही गिना जाता है । यह पिण्डका प्रलय है । जब शरीरसे प्राण पृथक् होगा तभी महाप्रलय होती है ।
पाप पुण्यका हिसाब ।
जब कोई मरता है उसी समय उसका हिसाब होता है । पिण्डका प्रलय जब होता है उसीको मुसलमान लोग कब्रका कण्ट कहते हैं । प्राण निकलनेके समय यह नरक वेंकुण्ठ कण्ट सुख सबका अनुभव कर लेता है । जबलों जीवका हिसाब नहीं होता इस मध्यवर्ती समयमें यह सब कौतुक देखता है उसको ऐसा जान पड़ता है कि, मेरे भोजनके निमित्त उत्तमोत्तम पदार्थ और आनन्द सम्भोग के सामान हैं भले ये आदमियोंको दिखलाई देते हैं । जो पापिष्ठी होता है, उसको भयानक नरककी समस्त यंत्रणाएँ दिखाई देने लगती हैं । नरक तथा वेंकुण्ठका समस्त कौतुक दिखलाई देता है । हिन्दू धर्मावलम्बी तथा मुसलमान लोग इस कब्रके कण्टको सविस्तार रूपसे कहा करते हैं । जब जो कोई मरता है उसी समय उनकी भलाई बुराईका हिसाब होता है । ऐसा नहीं कि, आज मरे और हिसाबके निमित्त ब्रह्माण्डके महाप्रलयमें पाप पुण्यके लेखोंकी आशा रखे । यह केवल भ्रम मात्र है । हाँ ब्रह्माण्डके प्रलयके साथ जितने जीव मिटेंगे उनके लेखाका
अजमेघ, बलि प्रदानकी रीति
हिंसाबका ध्यान मूसलमान लोग किया करते हैं। इस बातपर मैं एक उदाहरण देता हूँ :—
उदाहरण :—एक नगरमें कोई बड़ा बादशाह अथवा साहूकार हो, इस बादशाहकी समस्त प्रजा जो नगरमें बसती हो सब ऋषि हो, उन नगरवासियोंमेंसे कुछ एक नगरको छोड़कर किसी दूसरे स्थानको जावे अथवा भाग जाना चाहे तो उस नगरका राजा उन भगोड़ोंका हिंसाब उसी समय लेगा या जब समस्त नगर भाग जावेगा तब लेखा लेगा। निस्संदेह वह राजा उनको कदापि न जाने देगा, जबलों उनका पूरा हिंसाब न कर ले. अतः प्रत्येक दिवस तथा प्रत्येक क्षण प्रलय और महाप्रलय होता रहता है। जो लोग इस बातको नहीं मानते और सदैव आवागमनका सिलसिला नहीं समझते तो जो कुछ उनका विश्वास और ध्यान है, उसीके अनुसार उनका हिंसाब होगा। जैसा कुछ उनका ध्यान है इसीके अनुसार उनको दिखाई देगा। पर सत्य किसीके बशका नहीं है।
यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या झूठ एवं व्यर्थके बाँधनू हैं पिण्ड ब्रह्माण्डके समस्त पदार्थ झूठे हैं जो साम न पिण्ड और ब्रह्माण्डमें हैं वे सब बाँधनूमात्र हैं। बेजड़के तथा अस्थायी हैं, जिसने गुरु तथा पीर पिण्ड ब्रह्माण्डके भीतर खेल रहे हैं वे दूसरोंको खेला रहे हैं। समस्त कौतुक जलका बताशा है उसकी कोई जड़ तथा स्थिरता नहीं। समस्त खेल कौतुक जादूगरीका है। निरञ्जनकी जादूगरीमें समस्त ऋषि मुनि पड़े डुबुकियों लगा रहे हैं। जबतक अपने प्राकृतिक स्वरूपका ज्ञान न होगा तबतक समस्त जीवोंकी यही दशा रहेगी। ज्ञान केवल पारख गुरुद्वारा प्राप्त होवेगा दूसरेसे नहीं।
ब्रह्माण्ड पागलखाना है।
इस ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंहीका एक स्वरूप है। कुछ विभिन्नता नहीं। एक घेराव अण्डाकार है दूसरा घेराव उससे छोटा अण्डाकार है। कभी तो पिण्ड ब्रह्माण्ड बन जाता है। कभी ब्रह्माण्ड पिण्ड बन जाता है। जब इस पिण्डमें वह विद्या होती है तो यह ब्रह्माण्ड बन जाता है। जब इसकी विद्या जाती रहती है तब फिर यह पिण्ड हो जाता है। जब इसका ज्ञान न्यून हो जाता है तब इस ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टि जीवको अपना सर्जनकर्ता मानने लगता है। इस जीवको इस ब्रह्माण्डके भीतर सैकड़ों प्रकारके सैर और कौतुक दिखाई देते हैं जितने जीव इस ब्रह्माण्डके भीतर बंद हैं वे सबके सब बँधे हुए तथा पूरे पशु हैं। इनमें तनिक भी मनुष्यता नहीं है। जिनको मनुष्यताका ज्ञान हुआ वे ब्रह्माण्डके पार चले जाते
हैं, फिर वे बंधुवे नहीं रह सकते । जितने गुरु तथा चले इस ब्रह्माण्डके भीतर रहनेवाले हैं वे सब अपने असलसे अनभिज्ञ हैं, वे अनजान अनजानोंसे सूचना देते हैं । जो अंधे अंधोंको पथ दिखलाते हैं वे दोनों कुएँमें गिर पड़ते हैं । गुरु और चले दोनोंमें से एकको भी सुध नहीं कि, वास्तवमें बात क्या है ? यह ब्रह्माण्ड पागलों का घर है । पागलोंका काम पागलोंसे पड़ रहा है । भौति भौति के कौतुक हो रहे हैं । पागलपनकी अवस्थामें सहस्रों प्रकारके कौतुक तथा पाप पुण्य सभी कुछ कर रहा है । इनसे नितान्तही अनभिज्ञ है कि, भलाई बुराई तथा नरक वैकुण्ठ क्या वस्तु है ? जो कुछ मैं मान रहा हूँ सो क्या है ? यह अपनी अवस्थाको बिलकुल जान नहीं सकता । न चिन्ता तथा सोच करता है । न समझता है न सच्चे गुरुका उपदेश स्वीकार करता है अपने अज्ञानमें अपनेको ज्ञानी जानता है । अपनी दुर्बुद्धितापर तनिक भी ध्यान नहीं देता । जैसे मनुष्य अपना मुंह अपनी आँखोंसे देख नहीं सकता है । इस कारण दर्पण जब सामने रखता है तब अपना मुंह देखता है । वह मूर्ख है जो बिना दर्पणके अपना मुंह देखना चाहता है । इसी प्रकार यह मनुष्य अपने यथार्थ स्वरूपको देखने जाननेके निमित्त सदैव सत्य-गुरुके अधीन है । कारण यह कि, ब्रह्माण्ड पागलखानेके सदृश है । समस्त जीव इसमें जन्म भरके लिये बंधनमें पड़े हैं । जबलों उनको ज्ञान न हो जावेगा तब लों वे उसीमें पड़े रहेंगे । जब उसका ज्ञान ठिकाने आवे यह आपको तथा अपने मित्रोंको भली भाँति पहचाने सच्चे वैद्यकी कसौटीमें पक्का उतरे तब यह इस पागलखानेसे बहिर्गत किया जावे उसका एक उदाहरण मैं देता हूँ—
उदाहरणः—सन् १८४४ ईस्वीमें मैं काशी नगरीमें था काशीका पागल-खाना नगरसे बाहर बहुत दूर बना हुआ था । एक दिवस मैं उस पागलखानेके देखनेको गया जब उसके घिरावके भीतर गया तो बहुतसे पागल दिखलाई दिए । वे सब भौति भौतिके कौतुक कर रहे थे । कोई गाता, कोई नाचता, कोई हँसता, कोई रोता, कोई भूमिपर लिखता, कोई मुहँपर कालिखमल कर हँसता तो हँसताही जाता । रोता तो रोताही जाता । अनेक प्रकारके कौतुक हो रहे थे, मैं कहौतक लिखूँ ! कोई बकता है तो बकताही जाता है । कोई आनकर मुझसे बुद्धिमानीकी बातें करता है किसीमें थोड़ा पागलपना है किसीमें अधिक । अनेक प्रकारके पागलपनोंके ढङ्ग दिखाई दिए कैसे रङ्ग मैं देखता फिरा । वहाँपर एक राजाका पुत्र मुझको दिखाई दिया जो पूर्वकालमें मेरा परिचयी था । वह एक बड़े सुधर मकानमें था । उसके चारोंओर नौकर चाकर फिरते थे । जब मैं उसके पास गया तो वह बुद्धिमानी बातें करने लगा । मेरे
११ अध्याय । पश्चिमकी पुस्तकें । मूसाकी पुस्तकें
सामने प्रत्यक्षमें उसका पागलपना तनिक भी जान नहीं पड़ा। पर जब उस-पर पागलपना सवार होता था, तब बड़े उपद्रव मचाया करता था। उन पागलोंमेंसे कोई आकर मेरे साथ भली भली बातें करता। प्रत्यक्षमें तनिक भी पागल मालूम नहीं होता था पर यथार्थमें वह पागल था। उन पागलोंकी सूरत देखकर उनकी अवस्थापर मुझे खेद हुआ। डॉक्टर साहब उनकी औषध करते थे। कुछ लाभ न होता था। क्योंकि, जिसपर उस बड़े वैद्यकी दया हो वही आरोग्य होकर उस घरसे बाहर निकाला जावे।
पागलोंके काम।
एक दिवस ऐसा हुआ कि, गरमियोंका दिन था। उस पागलखानेका जो जमादार था, वह अचेत सो रहा था। दिनके समय वह अकेला पड़ा था। उसका मुहँ खुला था। उसके दाँत दिखाई देते थे। उसी समय एक पागल उसी स्थानपर आ पहुँचा एवं कहने लगा कि, तू मेरे ऊपर हँसता तथा ठट्ठा करता है ! मैं तुझको मारूँगा यह कह एक कक्कड़ उस जमादारके मुहँ पर इस जोरसे मारा कि, उसी समय वह मर गया। उस पागलको तनिक भी सुध नहीं कि, मैंने बुरा काम किया अथवा भला। यदि उसको भले बुरेका ज्ञान होता तो वह ऐसा कार्य कदापि न करता। लोगोंकी जानमें तो उसने बुरा किया पर अपनी समझमें भला किया। कारण यह कि, उसने अपने बैरीको मारा जो उसपर हँसी ठट्ठा कर रहा था।
यहाँ इस उदाहरणसे मेरा तात्पर्य है कि, इस ब्रह्माण्डमें जितने जीव रहते हैं वे सब उन पागलोंके सदृश हैं जो जमादार और सिपाही हैं वे सब गुरु और पथप्रदर्शक हैं और राजकुमार वह है जो योगीसे जगदीश्वर हो गया है। वह भी उसी पागलखानेमें बंद है उस पागलपनेमें एक दूसरेको मारते मरते हैं। एक मनुष्य तो अचेत सो रहा है। दूसरा उसका दाँत निकला देखकर जानता है कि, वह उसके ऊपर ठट्ठा करता है। उसको अपना बैरी समझकर मारता तथा हत्या करता है। इसी प्रकार इस संसारके समस्त मनुष्य एक दूसरेके बैरी बन रहे हैं। एक धर्मका मनुष्य दूसरे धर्मवालोंको दुःख पहुँचाता है अपनेको भला तथा सच्चा जानता है। इस पागलखानेसे जिसको सत्ययुग बाहर निकले वे सुख पाते हैं। कबीर साहबने मुहम्मद साबको पाँच कलमे पढ़ाये। वे केवल चार कलमें संसारके निमित्त कहे बाकी एक उनके लिये कहा।
काम क्रोध लोभ मोह अहंकारादिकी कामनाओंसे यह पागलखाना भरा है। चारों अवस्था जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति तुरीया इनसे तुरीयातीत भिन्न हैं।
यह समस्त अवस्था जीवके बंधनके निमित्त ठहराई हैं । जबतक इन अवस्थाओंमें रहेगा तबतक बराबर फँसा रहेगा । कर्म, उपासना, योग और ज्ञान इत्यादि सब आज्ञानावस्थामें कर रहा है । जितने उसके कर्म धर्म हैं सब अचेतनावस्थाके कृत्य हैं । यह मनुष्य अपनी मुक्तिकी सहस्रों युक्तियाँ करता है । पर कोई सूरत छुटकारेकी दिखाई नहीं देती । मिथ्याको सत्य और सत्यको मिथ्या जान रहा है । अपने व्यर्थके विचारोंको सत्य तथा ठीक मान रहा है । कितने पीर पैगम्बर सिद्ध साधु ऐसे हुए कि, जिनको चौथे घरका समाचार तो मिला पर उसकी विद्या नहीं मिली इस कारण उन्होंने ब्रह्माण्डके भीतर रहना स्थिर किया । सांसारिक कामना पृथक् नहीं हुई । उनको विद्या प्राप्ति भी नहीं हुई । पर तीनों लोकोंके भीतरकी प्राप्ति हुई । उनको सृष्टिके उत्पन्न करनेका बल भी हो गया वे अपनेको सृष्टिका उत्पन्न करता मानने लगे और अपनी अल्पबुद्धिवश अपनेको उन्होंने परमेश्वर मान लिया पर यथार्थ भेदसे अनभिज्ञ रहे । 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते रहे वे सब इसी जमादारकी तरह मारे गए । कारण यह कि, उनको इसका अण्डाकार घरेके भीतरही ज्ञान था उन्होंने न जाना कि, ईश्वर क्या वस्तु है और मैं क्या हूँ और जिन लोगोंने न पूर्ण विद्या पाई और ब्रह्माण्डसे पार होकर सत्यलोकको पहुँचे पूर्ण विद्यासे परिपूर्ण होगा । उनको कोई मार नहीं सकता । सहस्रों युक्तियाँ कीं पर फिर भी उनका बाल बाँका नहीं हुवा । वे न किसीके मारनेसे मरते हैं और न उत्पन्न होते हैं उनका जन्म मरण फिर कभी नहीं होता । उनका आवागमन एकबारगीही बंद हो जाता है । सिद्ध, साधु जिनमें वह विद्या नहीं वे अण्डाकार घरेके भीतर बंद हैं । वह राजकुमार जो पागलखानेमें बंद था, वह राजयोगीके समान है । वह राजकुमार जो नजरबंद था वह पागलखानेका बादशाह तो नहीं था । जैसे अन्यान्य पागल बंद थे वैसे ही वह बंद था । पर उसके मस्तकमें यह ध्यान था कि, मैं राजकुमार हूँ । भ्रान्त करके यह जीव ब्रह्मा जगत् इत्यादिका कौतुक देख रहा है । ज्ञानकी अवस्थामें न कुछ ब्रह्मा है न जगत्ही है । यह ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनों कुछ नहीं । उसके समस्त खेल और कौतुक और तमासे तथा जादूगरी हैं ।
अकालपुरुष एक महाप्रबल जादूगर है । जब वह भानमतीका पिटारा खोल देता है तब समस्त कौतुक प्रगट होने लगते हैं । जब वह अपना कौतुक समेट लेता है तब कुछ दिखाई नहीं देता सब शून्य हो जाता है ।
प्रथम तोरीत दूसरी जबूर पुस्तक
सत्य कबीर बचन ।
बाजीगरने डंक वजाया । सब लोग तमाशे आया ॥
बाजीगरने डंक सकैला । तब रह गया आप अकैला ॥
जो लोग बाजीगरका कौतुक देखनेवाले हैं वे डंका बजतेही तमासेको आजाते हैं उनमें किसीको इतनी विद्या नहीं है कि, इस कौतुकीके कौतुकको जान सकें । वे सब कडपुतलीके समान हैं । बाजीगरके तमाशेके साथ नाचते फिरते हैं जब वो समेटता है तो जो पुतलियाँ जाबूगरके कौतुकके साथ नाच रही हैं वे न जाने कहाँ चली जाती हैं इस कारण वे सब पागलपनेकी अवस्थामें हैं उनमें किसीको सुध नहीं कि, बाजीगर कौन है सबके ऊपर इस मानिकका मंत्र फल दिखला रहा है, वे सब विक्षिप्त हैं । नहीं जान सकते इनमें तनिक भी बुद्धि नहीं है कि, भले बुरेको जान सकें पागलोंको ज्ञान क्या होता है । भगवन् ! अपने पागलोंपर कृपाकर उन्हें चेतना देकर पागल खानेसे निकाल ।
कबीर साहिबने इस बातपर भी विचार किया है कि, संसारके सब जीव क्यों पागल हो रहें तथा पागलपनेका कारण भी बताया है कि, ये आपही अपनेको भूलकर पागल बने हैं ।
शब्द कबीर बीजक ।
अपनपो आपनही विसरो ।
(जैसे श्वान काच मन्दिरमें भरमत भूखिमरो ।
जों केहरि वपु निरखि कूपजल तामें जाय परो ॥
ऐसेहि गज लखि फटिक शिलाको प्रतिमा देखि अरो ।
मरकट मूठी स्वाद न छोडे घरघर नटत फिरो ।
कहैं कबीर नलनीके सोना कोने तोहि पकरो ॥
यह जीव इस संसाररूपी पागलखानेमें आकर अपने प्यारे रामको अपने आत्मस्वरूप सच्चिदानन्दको अपने आपही भूल गया । इसके बाद यह अपने आप अपने स्वरूपमें भ्रममें फँसकर ऐसे मर रहा है, जैसे कांचके मंदिरमें कूकर अपनी परछाई देखकर दुख पाता फिरता है और भूक २ कर अन्तमें मर ही जाता है शेर अपनी परछाई पानीमें देख उसे शेर समझकर पानीमें गिर पड़ता है । इसी तरह हाथी स्फटिक शिलामें अपने प्रतिबिम्बको, कुत्ते और सिंहकी तरह मुकाबिलेका लड़नेवाला समझकर, उसमें दातोंकी टक्कर भारने लग जाता है । बन्दर बाजीगरकी दी हुई मुट्ठीका स्वाद नहीं भूलता घर २ नाचता फिरता है । कबीरजी कहते हैं कि, ए ललनी (लटकनी) के तोते ! तुझे किसने