कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिंसाबका ध्यान मूसलमान लोग किया करते हैं। इस बातपर मैं एक उदाहरण देता हूँ :—
उदाहरण :—एक नगरमें कोई बड़ा बादशाह अथवा साहूकार हो, इस बादशाहकी समस्त प्रजा जो नगरमें बसती हो सब ऋषि हो, उन नगरवासियोंमेंसे कुछ एक नगरको छोड़कर किसी दूसरे स्थानको जावे अथवा भाग जाना चाहे तो उस नगरका राजा उन भगोड़ोंका हिंसाब उसी समय लेगा या जब समस्त नगर भाग जावेगा तब लेखा लेगा। निस्संदेह वह राजा उनको कदापि न जाने देगा, जबलों उनका पूरा हिंसाब न कर ले. अतः प्रत्येक दिवस तथा प्रत्येक क्षण प्रलय और महाप्रलय होता रहता है। जो लोग इस बातको नहीं मानते और सदैव आवागमनका सिलसिला नहीं समझते तो जो कुछ उनका विश्वास और ध्यान है, उसीके अनुसार उनका हिंसाब होगा। जैसा कुछ उनका ध्यान है इसीके अनुसार उनको दिखाई देगा। पर सत्य किसीके बशका नहीं है।
यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या झूठ एवं व्यर्थके बाँधनू हैं पिण्ड ब्रह्माण्डके समस्त पदार्थ झूठे हैं जो साम न पिण्ड और ब्रह्माण्डमें हैं वे सब बाँधनूमात्र हैं। बेजड़के तथा अस्थायी हैं, जिसने गुरु तथा पीर पिण्ड ब्रह्माण्डके भीतर खेल रहे हैं वे दूसरोंको खेला रहे हैं। समस्त कौतुक जलका बताशा है उसकी कोई जड़ तथा स्थिरता नहीं। समस्त खेल कौतुक जादूगरीका है। निरञ्जनकी जादूगरीमें समस्त ऋषि मुनि पड़े डुबुकियों लगा रहे हैं। जबतक अपने प्राकृतिक स्वरूपका ज्ञान न होगा तबतक समस्त जीवोंकी यही दशा रहेगी। ज्ञान केवल पारख गुरुद्वारा प्राप्त होवेगा दूसरेसे नहीं।
ब्रह्माण्ड पागलखाना है।
इस ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंहीका एक स्वरूप है। कुछ विभिन्नता नहीं। एक घेराव अण्डाकार है दूसरा घेराव उससे छोटा अण्डाकार है। कभी तो पिण्ड ब्रह्माण्ड बन जाता है। कभी ब्रह्माण्ड पिण्ड बन जाता है। जब इस पिण्डमें वह विद्या होती है तो यह ब्रह्माण्ड बन जाता है। जब इसकी विद्या जाती रहती है तब फिर यह पिण्ड हो जाता है। जब इसका ज्ञान न्यून हो जाता है तब इस ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टि जीवको अपना सर्जनकर्ता मानने लगता है। इस जीवको इस ब्रह्माण्डके भीतर सैकड़ों प्रकारके सैर और कौतुक दिखाई देते हैं जितने जीव इस ब्रह्माण्डके भीतर बंद हैं वे सबके सब बँधे हुए तथा पूरे पशु हैं। इनमें तनिक भी मनुष्यता नहीं है। जिनको मनुष्यताका ज्ञान हुआ वे ब्रह्माण्डके पार चले जाते