भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 459

उद्यान बन्धवरुण मंडल कामाक्षा देवीमलागनि गर्भावस्था कामानि वसि २ योगिनी मोक्षदायनी जठराग्नप्रवेशे नाभिस्थानं कुंडलिनी शक्तिः रक्तवर्ण अधोमुखी जगन्माता योगिनी गर्भपुटम् ॥ ॐ तीसरी कुण्डलिनी शक्तिका स्थान है । यह कुण्डलिनी शक्ति सँदूरके रङ्गकी है । यह सर्पके स्वरूपकी है । उसका मुँह नीचेको है, अग्नि उसका देवता है । कोहरनी शक्ति है । ब्रह्मा ऋषि है । कूर्म कला है । उद्यानबन्ध वरुण मण्डल और कामाक्षा देवी है । मल अग्नि है । गर्भकी अवस्था है । सम्भोग कामनामें रहनेवाली योगिनी मोक्षकी देनेवाली है । जठराग्निके भीतर है । नाभिमें इसका स्थान है । इसका नाम कुण्डलिनी देवी है । तँवेकी कला है । समस्त संसारकी माता योगिनी गर्भपर है । यह कुण्डलिनी देवी समस्त उत्पत्तिका कारण है । इसके मुँहसे जो सर्पके सद्गुण फूँकारका शब्द होता है । इस फोंकार ओँकारकासे शब्द बहिर्गत होता है और इस ओँकार शब्दसे हृदय हरा-भरा होता है । और हृदयके हरा-भरा होनेसे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । ऊपरका भाग सूर्य है यह कुण्डलिनी देवी एक डब्बेमें रहती है । नीचेके डब्बेके भागमें चाँदका स्थान और कुण्डलिनीकी फूँकारसे प्राण अपान वायु हिलती है । इस वायुके हिलनेसे समस्त संसार जीवित रहता है । और उस नाभिके स्थानमें दोनों वायु लड़ती हैं । इस लड़ाईसे जो अग्नि उत्पन्न होती है उसको जठराग्न कहते हैं । यह देवी बड़ी सुन्दर है ।

ॐ द्वितीयम् स्वाधिष्ठानचक्रं लिंगस्थानं पीतवर्ण रजोगुण आकारं ब्रह्मा देवता सावित्री शक्तिः तेजारुण ऋषि. ३ धारणाप्यदं देहजाग्रतावस्था परा वाचा ऋग्वेद आचार्यः लिंगगता भूमिका सायुज्यता हंसो वाहनः षण्मात्रा बं भं मंयं रं लं ६ अंतर मात्रा ६ वहिर्मात्रा ६ काम १ कामाक्षा २ तेजोसि ३ तक्षासा ४ चेष्टता ११ मैथुन देवता १० अजपाजाप षट् सहस्र ६००० घटिका १६ पल ३२ अक्षर २४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥

ॐ दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र वह लिंग स्थानमें हैं । उसका रंग पीला है । रजोगुण स्वरूप है, ब्रह्मा देवता है, सावित्री शक्ति है, वरुण ऋषि है, सम्भोग कामनाकी अग्नि है, तेजारुण ऋषि है । समस्त धारणा शरीरकी रक्षक है, जाग्रता-वस्था है । परा वाचा है । ऋग्वेद है । कर्म कर्ता लिंग है । उसकी गता भूमिका सायुज्यता है । हंसवाहन है । अक्षर मात्रा है । बं भं मं यं रं लं ये भीतरली छः मात्राएं हैं । बाहरी छःमात्रा हैं वे काम, कामाक्षा, तेजोसि, तक्षासा, चेष्टिता, मथुन देवता ये हैं अजपा जाप षट् सहस्र है । सोलह घड़ी तथा तीसपलमें हैं ही । अक्षरचार हैं सोहम्भावसे मानसी पूजा है । सुगन्धियों इतर इत्यादिके साथ मैं पूजता हूँ उसके

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 459, कुल 1367 में से · BharatKosha